आधुनिक विचारों और शाश्वत आस्थाओं का संगम

29 जुलाई 1992

JRD_lessBlackनामकरण के अनुसार जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा, कुछ समय पहले तक टाटा उद्योग से जुड़े हर व्यक्ति के ‘चेयरमैन‘; करोड़ों देशवाशियों के ‘जे.आर.डी‘ और चंद अजीज साथियों के लिए सिर्फ ‘जेह’-आज अपने जीवन के 88 घटनापूर्ण वर्षों के पूरे होने पर आयु के नवासीवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। आज ही से ठीक 54 वर्षों पूर्व जे.आर.डी. टाटा ने न सिर्फ समय के मान से अपने जीवन के सबसे लंबे, बल्कि सर्वाधिक महत्व के पद का कार्यभार भी संभाला था। 26 जुलाई 1938 को जे.आर.डी. संपूर्ण टाटा औद्योगिक समूह की पैतृक कंपनी, टाटा सन्स लिमिटेड के अध्यक्ष मनोनीत किए गए थे।

पाठकों के मन में इस सवाल का उठना स्वाभाविक है कि जे.आर.डी. टाटा के जन्म और पदभार ग्रहण की वर्षगांठ तो हर साल आती है, फिर इस बार उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर विशेष फोकस क्यों? बदलते हुए परिवेश के साथ मूल्य आधारित व्यवस्था और वैधानिक व्यवहार में पतन को तो हमने जैसे आधुनिकीकरण और औद्योगीकरण की प्रक्रिया का ही एक अभिन्न पहलू मानकर स्वीकार कर लिया है। आज हमारे सामाजिक, सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में तो इस गिरावट का असर स्पष्ट दिखाई देता ही है, किंतु जितनी सर्वव्याप्य और स्पष्ट यह समस्या आर्थिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों में है, उतनी शायद किसी और में नहीं। आज चारों ओर सिर्फ पैसा बटोरने की ही अंधी दौड़ चल रही है। और इस साध्य को पाने के लिए साधन की संतता पर किसी का ध्यान नहीं है। ऐसे मलिन माहौल में भी अगर कोई उद्योग और उद्योगपति अपने मूल्यों को तजने की बात सोचता भी नहीं हो, तो क्या वह हमारे आदर का हकदार नहीं है? इस लुप्तप्राय श्रेणी में अगर कोई नाम सबसे ऊपर है, तो वह निस्संदेह जे.आर.डी. का ही है।

ऐसे मलिन माहौल में भी अगर कोई उद्योग और उद्योगपति अपने मूल्यों को तजने की बात सोचता भी नहीं हो, तो क्या वह हमारे आदर का हकदार नहीं है?

आज टाटा समूह के उद्योग भारत में स्टील, ट्रक, रसायन, उपभोक्ता वस्तु, सीमेंट, अभियांत्रिकी कलपुर्जे, कम्प्यूटर, बिजली और संचार साधनों जैसे विविध और महत्वपूर्ण उत्पाद कार्यों में संलग्न हैं। लेकिन ‘विविधता में एकता’ को चरितार्थ करते हुए कुछेक अपवादों को छोड़कर इस समूह की सभी इकाइयां; उत्पादकता, लाभप्रदता, मधुर औद्योगिक संबंध और उनके उत्पाद, गुणवत्ता के लिए हर ओर पहचाने जाते हैं। यह कोई आकस्मिक संयोग नहीं, वरन वर्षों की तपस्या और साधना से संचित ‘गुडविल’ का मूर्त रूप है। स्वयं जे.आर.डी. ने इस बात को स्वीकार करते हुए एक बार कहा था- ‘कंपनियों को मूल्य आधारित और बाजार आधारित व्यवस्था पर एक साथ चलना कोई असंभव बात नहीं है। मुनाफा कमाने के लिए नीतियों को ताक पर रखना भी जरूरी नहीं है। शालीन और गरिमामयी ढंग से भी पैसा कमाया जा सकता है।’

वैसे जे.आर.डी. ने कभी टाटा समूह की प्रगति में अपने योगदान को उल्लेखनीय नहीं माना। उनके अनुसार उनकी भूमिका ‘प्रवर्तक‘ के बजाय ‘पालक‘ अथवा ‘पोषक‘ की अधिक रही है। कुछ अन्य लोगों का भी यह मानना है कि जिस वक्त तक जे.आर.डी. ने टाटा सन्स प्रमुख का पद संभाला, तब तक टिस्को, टोमको, इंडियन होटल, टाटा की तीनों बिजली कंपनियां अपने शैशव के कठिन दिन पार करके यौवन पथ पर अग्रसर थीं। अगर एक बारगी इस कथन को मान भी लिया जाए, तो क्या ऐसी विशाल कंपनियों का मात्र लालन-पालन-पोषण ही अपने आप में एक ‘भागीरथी’ कार्य नहीं है? और फिर इस कथन की सत्यता या अन्यथा पर निर्णय करने के लिए सिर्फ एक ही आंकड़ा काफी है- जिस वक्त जे.आर.डी. ने टाटा सन्स के अध्यक्ष का पद संभाला था, तब टाटा समूह में 14 कंपनियां थीं, जिनका वार्षिक कारोबार 280 करोड़ रुपए था। रतन टाटा के पदभार संभालते समय टाटा समूह बढ़कर 15 कंपनियों का हो गया था, जिनका वार्षिक कारोबार 10,000 करोड़ रुपए से अधिक का है।

कंपनियों को मूल्य आधारित और बाजार आधारित व्यवस्था पर एक साथ चलना कोई असंभव बात नहीं है

जे.आर.डी. के प्रबंधन की सबसे खास बात रही है- उनकी जनतांत्रिक अथवा ‘कोनसेन्स’ प्रणाली। ‘प्रोफेशनल मैनेजमेंट‘ शब्द विदेशों में किताबों के बाहर नहीं आया था, उन दिनों से जे.आर.डी. ने टाटा समूह की विभिन्न कंपनियों के समस्त कामकाज की जिम्मेदारी उस कंपनी से संबंधित प्रबंधकों को सौंप दी। कंपनी संचालकों को स्वायत्त नियंत्रण देने की प्रक्रिया को जे.डी.आर. ने इस चरम तक पहुंचा दिया, कि वे प्रबंधक कंपनी के मानो सर्वेसर्वा ही थे। यहां पर भी कुछेक आलोचकों का मानना है कि ऐसा करना जे.आर.डी. की मजबूरी थी, क्योंकि टाटा परिवार में इतने सदस्य थे नहीं कि हर कंपनी पर समुचित ध्यान दे सकें। लेकिन अगर ऐसी स्थिति होती, तो वे कंपनियां अब से बहुत पहले टाटा समूह से पृथक हो गई होतीं। 1969 में एम.आर.टी.पी. कानून और 1970 में मैनेजिंग एजेंसी प्रणाली की समाप्ति के बाद तो ऐसा कुछ भी नहीं था, जो सभी कंपनियों को एक साथ बांधे रखता। टाटा परिवार की अंशधारक के रूप में वित्तीय पकड़ भी नगण्य ही थी, अगर थी- तो एक पुकार, एक चाह उसी समूह के झंडे तले बने रहने की, उसी ‘चेयरमैन’ के पीछे चलने की, जिसने टाटा उद्योगों के ‘कानफेडरेशन’ की अथाह संपदा को सदैव राष्ट्रीय धरोहर और संपत्ति की तरह सहेज कर रखा, निजी पूंजी की तरह खर्चा नहीं। इसीलिए आज तमाम आकर्षणों और विकल्पों के बावजूद भारत में टाटा समूह की कंपनियों में रोजगार चाहने वालों की संख्या सर्वाधिक रहती है।

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