चाय : तीन हजार एक सौ पच्चीस रुपए प्रति किलो

10 जून 1991

चाय : तीन हजार एक सौ पच्चीस रुपए प्रति किलोचौंकिए नहीं। बाजार में जहां साधारण खुली चाय 50 रु. प्रति किलो और उम्दा पैकेट बंद चाय 200 रु. प्रति किलो में मिलती है, वहीं भारत में चाय की एक ब्रांड हाल ही में बाजार में आई है। कीमत है, सिर्फ 625 रुपए की 200 ग्राम, अर्थात्‌ 3125 रुपए प्रति किलो। तुलनात्मक शब्दों में एक किलो चाय की लागत लगभग आधा किलो चांदी (जी हां चांदी) के बराबर। खाद्य पदार्थों में तो शायद उच्च श्रेणी की स्पेनिश केसर ही प्रति किलो आधार पर इस चाय से महंगी बिकती है।

अब यह जिज्ञासा होना अत्यंत स्वाभाविक है कि आखिर इस चाय में ऐसी क्या खासियत है कि इसकी कीमत खुली चाय से लगभग साठ गुना अधिक है? वैसे तो सुबह के अखबार और गरमागरम चाय की प्याली का रिश्ता कुछ ऐसा है कि एक के बगैर दूसरे का मजा ही नहीं आता। परंतु अब भारत के सबसे वृहद समाचार पत्र-पत्रिका प्रकाशन ‘टाइम्स ऑफ इंडिया समूह‘ ने इस रिश्ते को एक नया स्वरूप दिया है।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ के 150 वर्ष पूर्ण होने पर और समूह के सभी प्रकाशनों को नए कलेवर और रंग-ढंग से प्रस्तुत करने हेतु पिछले वर्ष से ‘टाइम्स समूह‘ कई कला, संगीत, संस्कृति के कार्यक्रमों को जनता तक लेकर आए हैं। उच्च और कुलीन वर्ग के पाठकों से जुड़े होने के परिचायक स्वरूप ही ‘टाइम्स समूह‘ ने इस चाय की बिक्री प्रारंभ की है। उत्कृष्ट किस्म की इस दार्जीलिंग चाय का नाम है ‘एडिटर्स चॉइस‘ (संपादक की पसंद)।

इस चाय का नाम तो है ‘संपादक की पसंद‘, परंतु क्या भारत में कोई भी संपादक इतनी महंगी चाय को खरीद कर पसंद करने की हैसियत रखता है?

‘एडिटर्स चॉइस’ चाय की विज्ञापन शैली भी इस चाय की ही तरह एकदम अनूठी और महंगी है- ‘टाइम्स समूह‘ के ही विभिन्न प्रकाशनों में बड़े-बड़े रंगीन विज्ञापनों के द्वारा इसी समूह के कई नामी-गिरामी संपादक इस चाय का विज्ञापन कर रहे हैं। ये संपादक हैं- प्रीतिश नंदी (इलेस्ट्रेटेड वीकली, द इंडिपेन्डेन्ट), विमला पाटिल (फेमिना), रऊफ एहमद (फिल्मफेअर) एवं अनिल धारकर (कार्यकारी संपादक, द इंडिपेन्डेन्ट)। उल्लेखनीय है कि अभी तक प्रकाशित विज्ञापनों में ‘टाइम्स समूह‘ के मुखपत्र ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया‘ और ‘द इकोनॉमिक टाइम्स‘ के संपादक दिलीप पडगाँवकर और टी.एन. नेनन कहीं नजर नहीं आए। यह शायद पहला मौका होगा, जब कोई संपादक अपनी ही पत्र-पत्रिका में किसी वस्तु का व्यावसायिक तौर पर विज्ञापन कर रहा हो- और वह भी अपने ही समूह द्वारा विपणन की गई चाय का।

एक वित्तीय पाक्षिक के अनुसार इस पूरे विज्ञापन अभियान की लागत 22 लाख रुपए आंकी गई है। 23 किस्मों की बेहतरीन चाय पत्तियों में से दो व्यावसायिक चाय चखने वालों ने चार महीनों के ‘रसास्वादन‘ के बाद ‘एडिटर्स चॉइस‘ हेतु दार्जीलिंग चाय की एक खास पत्ती का चुनाव किया है। पौसीलीन और पीतल के खूबसूरत हस्तशिल्पित 200 ग्राम के डिब्बों में यह चाय बंबई, दिल्ली और कलकत्ता में सिर्फ पांच सितारा ओबेरॉय होटल की चुनिंदा दुकानों पर ही उपलब्ध है।

एक सूत्र के मुताबिक इस चाय के सिर्फ 1800 डिब्बे (प्रति डिब्बा 200 ग्राम) तैयार किए गए हैं। (ये सभी बिक जाने पर तो विज्ञापनों की भी आधी लागत वसूल नहीं होगी। चाय की खरीदी कीमत अलग) जिसमें से करीब 200 डिब्बे तो बिक चुके हैं। ‘टाइम्स समूह‘ ने अपने प्रकाशनों और संपादकों की उत्कृष्टता को चाय से दर्शाया है, परंतु इस बेहद विलासिता से ओतप्रोत तीन हजार रु. प्रति किलो की चाय से बेहतर और सार्थक साधन उपलब्ध नहीं थे। मुख्य मुद्दा इतनी महंगी चाय के खरीददारों का होना या न होना नहीं है, सवाल तो यह है कि भारत के सबसे विस्तृत और वयोवृद्ध प्रकाशन समूह द्वारा देश की मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में ऐसी चाय का बेचना और वह भी इतने बड़े ‘विज्ञापन अभियान’ के जरिये, जिसे उसके लाखों पाठकों ने पढ़ा होगा। उनमें से इस चाय के खरीददार 1800 से ज्यादा हो नहीं सकते।

यहां यह उल्लेखनीय है कि इस वर्ष भारत से चाय का कुल निर्यात लगभग 1000 करोड़ रुपए का रहा है, जो कि मूल्य आधार पर तो विगत वर्ष से बेहतर है, किंतु किलो आधार और विश्व चाय बाजार में भारत के हिस्से में गिरावट आई है। क्या यह बेहतर नहीं होता कि इस उत्कृष्ट चाय का निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती, या फिर भारत ही में इसकी बिक्री सिर्फ विदेशी मुद्रा के भुगतान द्वारा ही की जाती। इसी तर्ज में ‘एडिटर्स चॉइस‘ चाय के सामाजिक औचित्य पर पक्ष-विपक्ष में कई दलीलें दी जा सकती हैं, परंतु एक गुमनाम पत्रकार ने व्यंग्यात्मक शैली में बहुत ही सटीक चुटकी ली है, ‘इस चाय का नाम तो है ‘संपादक की पसंद‘, परंतु क्या भारत में कोई भी संपादक इतनी महंगी चाय को खरीद कर पसंद करने की हैसियत रखता है?’

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