दूसरे महायुद्ध के गौरवमय दिन की गाथा : द लॉंगेस्ट डे

23 जनवरी 1991

दूसरे महायुद्ध के गौरवमय दिन की गाथा : द लॉंगेस्ट डेर्ष 1944, द्वितीय विश्व युद्ध अपने निर्णायक मोड़ पर आ पहुंचा। अमेरिका द्वारा ब्रिटेन और फ्रांस से हाथ मिलाने के उपरान्त ‘एलाइड‘ (संयुक्त) सेना में नई स्फूर्ति का संचार हो गया था। ब्रिटेन में अब तैयारी चल रही थी जर्मन-शासित फ्रांस से जर्मनी को खदेड़ने की। वहीं दूसरी ओर नाजी उन्माद और अहंकार शिखर पर था। संयुक्त आक्रमण की पूरी संभावनाओं के बावजूद अधिकांश जर्मन ऑफिसर अति आत्मविश्वास और सत्ता के नशे में मदमस्त थे। महीनों से इस दिन की प्रतीक्षा में एलाइड सेना आतुर थी। परन्तु मौसम बिलकुल विपरीत था। इंग्लिश चैनल में गत बीस वर्षों का सबसे बड़ा खराब तूफान और लहरें चल रही थीं, लेकिन नाजी साम्राज्य के पतन को उन्मुख रणबाकुरों का मौसम क्या मार्ग रोकता?

जिस दिन, जिस समय और जिस स्थान पर जर्मन सेना को आक्रमण की सबसे क्षीण आशा थी, वहीं पर एलाइड सेना ने धावा बोल दिया। इस पूरे आक्रमण को ‘ऑपरेशन ओवरलॉर्ड‘ का नाम दिया गया था। 6 जून 1944 (अब यह तारीख डी-डे के नाम से जानी जाती है।) नॉर्मन्डी के समुद्र तट, फ्रांस। द्वितीय विश्व युद्ध के इसी ऐतिहासिक दिन का चित्रण है ‘द लांगेस्ट डे‘ में। मध्य रात्रि के बाद से प्रातः तक लगभग एक हजार जहाज, 17000 वाहन, 11000 वायुयान सहित लगभग 1,50,000 सैनिकों ने चंद घंटों में नाजी दमन के पतन का शंखनाद नॉर्मन्डी के समुद्र तटों पर कर दिया था।

इस महान घटनाक्रम के सजीव रूप से फिल्मांकन का महज ख्याल ही रोंगटे खड़े कर देता है

इस महान घटनाक्रम के सजीव रूप से फिल्मांकन का महज ख्याल ही रोंगटे खड़े कर देता है। तीन व्यक्तियों ने संयुक्त रूप से इस फिल्म का निर्देशन किया है। फिल्म की पृष्ठभूमि ही इतनी विशाल है कि एक व्यक्ति तो सभी कोण निर्देशित कर ही नहीं सकता था। न सिर्फ निर्देशन, अपितु फिल्मांकन भी फिल्म इतिहास का एक अमिट पन्ना है। आउटडोर और भीषणतम युद्ध का अत्यन्त वास्तविका चित्रण। निश्चित कहना मुश्किल है लेकिन ‘द लांगेस्ट डे‘ के छोटे-बड़े रोल मिलाकर पात्र संख्या हजारों में होगी। भाषा, वेशभूषा, अभिनय और युद्ध चित्रांकन में त्रुटि निकालना कठिन काम है। फिल्म के प्रमुख कलाकारों रिचर्ड बर्टन, शॉन कौनरी, जॉन वायन, पॉल हार्टमैन और हेनरी फोन्डा में से कुछ की भूमिका तो सिर्फ चंद लम्हों की है।

एलाइड आक्रमण में फ्रांस ही में बसे नाजी विरोधी नर-नारियों के योगदान को भी फिल्म में बखूबी दर्शाया गया है। फ्रांस के नागरिक समुद्र तट पर ब्रिटिश तोपों से स्वयं के घर ध्वस्त हो जाने के बावजूद झूम रहे थे। तट पर भारी गोलाबारी के बीच निर्भीक होकर एलाइड फौजों का शैम्पेन से स्वागत कर रहे थे। दिलेरी और बहादुरी की अनेकानेक मिसालों के बीच ‘द लांगेस्ट डे‘ में मृदु-हास्य के भी कई दृश्य हैं। हास्य से अधिक अचंभे के विषय हैं कि चैनल के पार जोरदार तैयारी से पूर्णतः वाकिफ जर्मन सेना के प्रमुख अधिकारी निश्चिंत हैं। द्वितीय विश्व युद्ध की कई ऐतिहासिक लड़ाइयों पर अत्यन्त रोमांचक फिल्में बनी हैं, लेकिन एक ही फिल्म में इतनी सारी कथा शायद ही किसी में है। निःसंदेह, ‘द लांगेस्ट डे‘ एक सर्वकालिक क्लासिक है।

फिल्म : द लांगेस्ट डे (कॉर्नलियस रायन की किताब पर आधारित)

भाषा : मुख्यतः अंग्रेजी, जर्मन (अंग्रेजी सबटाइटल सहित)

समय : 180 मिनट

रंग : श्वेत-श्याम

निर्देशक : एन्ड्रयू मार्टिन, केन अनाकिन, बनॉर्ड विकि,

निर्माता : डेरील जानुक

वितरण : 20 सेंचुरी फॉक्स

फिल्मांकन : जीन बोजोन, वॉल्टर वॉटी

टाइटल संगीत : पॉल एन्का (हिन्दी गीत ‘जिंदगी हंसके बिताएंगे’ की धुन इसी पर आधारित है।)

कलाकार : हेनरी फोन्डा, जॉन वायन, पॉल हार्टमैन, रिचर्ड बर्टन, शॉन कौनरी

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