फ्री ई-मेल सुविधा : अब दिन गिनती के हैं

24 जुलाई 2001

फ्री ई-मेल सुविधा : अब दिन गिनती के हैंब इंटरनेट कमाने की राह पर आगे बढ़ रहा है। यहां विश्व के प्रमुख ई-मेल सेवा प्रदाताओं से संकेत मिले हैं कि वे करोड़ों डॉलर खर्च करके इसे मुफ्त में उपलब्ध कराने के लिए तैयार नहीं हैं। ई-मेल सेवाओं को शुल्क (भुगतान) आधारित सेवाएं बनाने की सुगबुगाहट से विश्व के 400 मिलियन मेल प्रेमियों में चिंता है। दूसरी ओर लाखों यूजर्स को मेल सेवा देने में लगी डॉट कॉम कंपनियां इस बात को लेकर उत्साहित भी हैं कि उन्हें बहुप्रतीक्षित ‘रेवेन्यू मॉडल‘ मिल रहा है।

बिल्ली के गले में कौन बांधे घंटी ?

‘ई-मेल सेवा प्रदाताओं में आम सहमति तो बन गई कि ‘ई-मेल यूजर्स को इतनी त्वरित सेवा पाने के लिए कुछ राशि तो खर्च करना पड़ेगी‘, लेकिन इस निर्णय को कौन लागू करे? यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न था। विश्व के अग्रणी सेवा प्रदाताओं जैसे हॉटमेल डॉट कॉम, याहू डॉट कॉम तथा यूएसए डॉट नेट में इस बात पर कोई सहमति नहीं हो सकी कि वे ई-मेल सेवा को रातोंरात एक साथ भुगतान योग्य सेवा के रूप में परिवर्तित कर दें। आखिर यह निर्णय लेने का साहस सबसे पहले यूएसए डॉट नेट ने लिया। यूएसए डॉट नेट, जो एक बड़ी ई-मेल सेवा मानी जाती है, ने फैसला किया है कि वह 31 जुलाई से अपने सभी ग्राहकों से 30 डॉलर प्रतिवर्ष के हिसाब से शुल्क लेगी।

भारत में यह साहसिक (संभवतः आत्मघाती भी) कदम उठाने का फैसला किया 123 इंडिया डॉट कॉम ने। इसने अपनी ई-मेल सेवाओं को अति त्वरित और तमाम सुविधाओं के साथ प्रदान करने का वादा करते हुए अपने 2 मिलियन यूजर्स को एक संदेश द्वारा सूचित कर दिया कि वे भुगतान करने के लिए तैयार रहें। कंपनी ने ग्राहकों से 1 अगस्त के बाद छह महीने के लिए 599 रुपए तथा एक वर्ष के लिए 999 रुपए फीस के रूप में शुल्क लेने का फैसला किया। भारतीय संदर्भ में ई-मेल की आवश्यकता तथा तमाम अन्य फ्री मेल की सुविधा को देखते हुए यह राशि कुछ ज्यादा लगती है। यह तो समय ही बताएगा कि 123 इंडिया डॉट कॉम को कहां तक सफलता मिलती है या फिर उसके ग्राहक किसी अन्य फ्री मेल सेवा में पंजीबद्ध होने के लिए निकल पड़ते हैं।

बड़े खिलाड़ी देखो और इंतजार करोकी मुद्रा में

विश्व के जाने पहचाने ई-मेल सेवा प्रदाताओं ने अभी ‘देखो और इन्तजार करो‘ की नीति अपना रखी है। यहां खबर है कि याहू ने यूजर्स का रुख जानने के लिए एक निश्चित जगह से ज्यादा जगह लेने पर ‘सर्वर स्पेस‘ के लिए अतिरिक्त शुल्क लेना शुरू कर दिया है। याहू को उम्मीद है कि इस तरह की सेवाओं को कम्पनियां जरूर काम में लेंगी। उल्लेखनीय है कि अमेरिका की सबसे बड़ी इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी अमेरिकन ऑन लाइन (एओएल) डॉट कॉम अपने ग्राहकों से पहले ही शुल्क लेती रही है।

विश्व के जाने पहचाने ई-मेल सेवा प्रदाताओं ने अभी ‘देखो और इन्तजार करो’ की नीति अपना रखी है

माइक्रोसॉफ्ट की योजना

यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि माइक्रोसॉफ्ट अपनी बिजनेस नीति के अनुसार ही पहले अपनी सेवाओं को सुधारने की इच्छुक है। उसका मानना है कि ई-मेल पर शुल्क लगने के बाद मुफ्त में मेल करने वाले यूजर्स उसकी वेबसाइट पर रजिस्टर्ड होंगे। उन्हें वह कुछ दिनों तक अच्छी सेवा देकर बाद में ‘पेड ई-मेल‘ का रास्ता दिखा देगी।

क्या लोग पैसा देंगे?

यह सवाल हर किसी की जुबान पर है। ई-मेल अति उपयोगी सेवा है, लेकिन क्या यह सेवा इतनी आवश्यक हो गई है कि लोग इसके लिए शुल्क देंगे? अमेरिका के लोग इसके लिए नाममात्र के भुगतान के लिए तैयार हो सकते हैं, बशर्ते उन्हें बेहतर गुणवत्ता की सेवाएं मिलें। भारत में यूजर्स की यह मानसिकता कम से कम अभी तक बनती दिखाई नहीं देती। उसका एक और कारण है कि ‘फ्री ई-मेल‘ देने वाली अनगिनत वेबसाइट्‌स मौजूद हैं। एक बंद होती है तो दो नई शुरू हो जाती हैं। अमेरिका में ‘वाल स्ट्रीट जरनल‘ तथा ‘इकोनॉमिस्ट‘ जैसे अखबारों में अपनी चयनित तथा विशेष सामग्री को पहले दिन से ही न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध कराया था। आज इस मॉडल की ओर सारी डॉट कॉम कंपनियों की निगाहें हैं, लेकिन माइक्रोसॉफ्ट की पत्रिका स्लेट डॉट कॉम को शुल्क आधारित बनाने का प्रयास पूरी तरह से असफल साबित हुआ।

भुगतान के माध्यम की समस्या

भुगतान किस रूप में हो, इस पर भी बड़े विवाद हैं। यूएसए डॉट नेट ने भुगतान को क्रेडिट कार्ड के जरिये स्वीकार करने का फैसला किया है, लेकिन अमेरिका के बाहर कितने लोगों के पास क्रेडिट कार्ड हैं? भारत में क्रेडिट कार्ड को भुगतान का माध्यम बनने में अभी कम से कम दो वर्ष और लगेंगे, लेकिन डॉट कॉम विशेषज्ञों का मानना है कि 2002 के गुजरते ही ‘फ्री ई-मेल‘ का जमाना भी गुजर जाएगा।

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