होल्कर : एक फैसला, एक गलती, एक इतिहास

8 जनवरी 1989

होल्कर : एक फैसला, एक गलती, एक इतिहास1944-45 में रणजी ट्रॉफी प्रतियोगिता में बंगाल को परास्त कर होल्कर टीम सेमीफाइनल में पहुंची थी, जहां उसका मुकाबला मद्रास से था। दूसरे सेमीफाइनल में तो बंबई की विजय लगभग तय ही थी। हमारी जीत के आसार भी अच्छे थे। मद्रास में सेमीफाइनल मुकाबले के दौरान होल्कर टीम के कप्तान कर्नल सी.के. नायडू को बंबई क्रिकेट एसोसिएशन का एक तार मिला। तार का आशय यह था कि अगर होल्कर टीम बंबई में फाइनल खेलने को राजी हो जाए तो बंबई सी.के. नायडू के सहायतार्थ मैच की मेजबानी करने को तैयार है। उस दिन शाम को कर्नल नायडू ने हम सबसे कहा, ‘वी शैल प्ले द फाइनल एट बांबे एंड बीट देम देअर ओनली।‘ हम सब अवाक् रह गए। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने कर्नल साहब से कहा, ‘रोटेशन की प्रथा के अनुसार फाइनल तो इंदौर में ही खेलना चाहिए, फिर इंदौर की मैटिंग पर हमारे गेंदबाज ज्यादा कारगर सिद्ध होंगे, बजाय बंबई के टर्फ पर।’

कर्नल साहब को जैसे हमारी जीत का पक्का भरोसा था। हमने मद्रास को मद्रास में 10 विकेट से हराया और फिर लंबा सफर तय करके सीधे बंबई पहुंचे। चार दिन सी.के. नायडू सहायतार्थ मैच खेल गया और सिर्फ एक दिन के विश्राम के बाद छह दिन का रणजी फाइनल। मुश्ताक ने दोनों पारियों में शानदार शतक लगाए और दूसरी पारी में डेनिस कांप्टन ने 249 रन बनाए। इसके बावजूद बंबई ने हमें 374 रनों से पराजित कर दिया। क्रिकेट में भविष्यवाणी का कोई महत्व नहीं है, फिर भी फाइनल मैच अगर इंदौर में खेला जाता तो हमारे गेंदबाज बेहतर प्रदर्शन कर पाते।

मैं यह तो नहीं कह सकता कि सी.एस. ने जानबूझकर ऐसा किया, लेकिन उसके बाद उनकी ज्यादातर गेंदें लेग स्टंप के बाहर टप्पा खाने लगीं और बल्लेबाजों ने आराम से रन बनाए

1945-46 के फाइनल में बड़ौदा को हराने के बाद 1946-47 में पुनः फाइनल में होल्कर-बड़ौदा मुकाबला हुआ। हमारी पहली पारी के 202 रन के स्कोर के जवाब में बड़ौदा ने 784 रन का विशाल स्कोर खड़ा कर लिया। चौथे विकेट की भागीदारी में गुल मोहम्मद और विजय हजारे का 577 रन का विश्व कीर्तिमान आज भी कायम है। बड़ौदा एक पारी और 409 रनों से विजयी रहा। 1947-48 में होल्कर ने बंबई को हराकर खिताब पुनः हासिल कर लिया, लेकिन उस दशक में केवल 1948-49 में होल्कर टीम फाइनल में नहीं पहुंची। उसे बड़ौदा ने सेमीफाइनल में ही प्रतियोगिता से बाहर कर दिया, किंतु होल्कर टीम को दोबारा अपनी धाक जमाने का मौका भी बड़ौदा के विरुद्ध ही मिला 1949-50 में। बड़ौदा में खेले गए फाइनल मैच में होल्कर टीम ने पहली पारी में 419 रनों का सम्मानजनक स्कोर बनाया। रणजी ट्रॉफी में पहली पारी के आधार पर बढ़त अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। मनोवैज्ञानिक दबाव के अलावा मैच ड्रॉ होने की स्थिति में इसी बढ़त के आधार पर मैच का फैसला किया जाता है। बड़ौदा हमारी पहली पारी की रनसंख्या से लगभग 30 रन पीछे था, तब नई गेंद लेने का समय हो गया था। मैंने कर्नल साहब से नई गेंद लेने को कहा, पर वे सी.एस. नायडू से कुछ और ओवर कराने के पक्ष में थे। सी.एस. अधिकांशतः फाइन लेग पर कोई क्षेत्ररक्षण नहीं रखते थे, परंतु उनकी दो गेंदों पर लगातार फाइन लेग क्षेत्र में दो चौके पड़ गए, इसलिए सी.के. ने फाइन लेग पर एक फील्डर खड़ा कर दिया।

मैं यह तो नहीं कह सकता कि सी.एस. ने जानबूझकर ऐसा किया, लेकिन उसके बाद उनकी ज्यादातर गेंदें लेग स्टंप के बाहर टप्पा खाने लगीं और बल्लेबाजों ने आराम से रन बनाए। जब बड़ौदा पहली पारी के आधार पर 18 रन की बढ़त ले चुका था, तब कर्नल साहब ने मुझे नई गेंद दी और बड़ौदा के अंतिम दोनों बल्लेबाज घोरपड़े और अमीर इलाही उसी ओवर में आउट हो गए। हालांकि बढ़त सिर्फ 18 रनों की थी, परंतु हमारे मनोबल पर इसका असर तो हुआ ही था। बड़ौदा चार विकेट से विजयी रहा। 1950-51 में होल्कर और गुजरात फाइनल में थे। गुजरात 189 रनों से परास्त हो गया, लेकिन अगले वर्ष 10 टेस्ट खिलाड़ियों से सज्जित बंबई की टीम निश्चित रूप से हमसे श्रेष्ठ थी। बंबई के पहली पारी के 596 रनों के जवाब में हमने 410 रन बनाए और दूसरी पारी में हमारी पूरी टीम महज 97 रनों पर ही ढेर हो गई, लेकिन फिर अगले बरस 48 वर्षीय नायडू की कप्तानी में होल्कर ने बंगाल को पहली पारी की बढ़त के आधार पर पराजित कर चौथी बार रणजी ट्रॉफी पर अपना नाम अंकित कर दिया। यह सी.के. का आखिरी रणजी मैच था।

1953-54 में होल्कर टीम के नेतृत्व की बागडोर संभाली मुश्ताक अली ने। पूर्वी पंजाब को हराने के बाद सेमीफाइनल में हमारा मुकाबला बंगाल से था। बंगाल और बंबई की टीम कॉयर मैटिंग पर कमजोर थी, इसलिए हमने सेमीफाइनल के पहले काफी डटकर अभ्यास किया और एक अभ्यास मैच भी खेला। बंगाल टीम की अगवानी के लिए हम सब स्टेशन गए थे। स्टेशन पर बंगाल टीम के कप्तान निर्मल चटर्जी ने मुश्ताक से पूछा, ‘वॉट आर वी प्लेयिंग ऑन? ‘मुश्ताक ने जवाब दिया, ‘जूट मैटिंग।‘ मैं हतप्रभ रह गया। तुरंत मुश्ताक को कोने में ले जाकर मैंने कहा, ‘हम इतने दिनों से कॉयर मैटिंग पर अभ्यास कर रहे हैं। हमारे मुख्य गेंदबाज गायकवाड़ की गेंदबाजी कॉयर पर कई बार घातक सिद्ध होती है, फिर यह जूट मैटिंग क्यों? मुश्ताक के पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं था। मैच जूट मैटिंग पर ही हुआ। हालांकि हमने बंगाल को 315 रनों से हरा दिया, किंतु फाइनल मैच में बंबई से हमें मुंह की खानी पड़ी। ठीक उसी तर्ज पर अगले साल मद्रास ने भी हमें इंदौर में ही पराजित किया। 1954-55 का रणजी ट्रॉफी फाइनल होल्कर टीम का अंतिम रणजी मैच था- और मेरा भी। उन दस वर्षों की हार-जीत के पुनरावलोकन का मेरा मकसद टीम के साथियों पर अंगुली उठाना कदापि नहीं है। कोई भी व्यक्ति या खिलाड़ी हमेशा सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता। उद्देश्य सिर्फ यही है कि अतीत की गलतियां भविष्य में कभी अपने को दोहराएं नहीं, जीत और पराजय का फासला कोई एक गलती पाट सकती है।

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