मेरे शब्दकोष में तटस्थ अम्पायरिंग का नाम नहीं

28 दिसम्बर 1987

मेरे शब्दकोष में तटस्थ अम्पायरिंग का नाम नहींराजसिंह डूंगरपुर क्रिकेट का एक ऐसा व्यक्तित्व है, जिन्हें हम क्रिकेट का ‘इनसायक्लोपीडिया’ कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। रिलायंस कप बिलकुल पास है और ऐसी परिस्थितियों में उनसे खुलकर भारतीय क्रिकेट पर चर्चा करना सुखद पहलू है।

जितेंद्र मुछाल की राजसिंह डूंगरपुर से बातचीत

पिछले दिनों राजभाई इंदौर आए थे, जितेन्द्र मुछाल ने उनसे क्रिकेट पर लंबी बातचीत की। क्या वास्तव में सुनील-कपिल में मतभेद हैं? राजभाई का कहना है कि दोनों में कोई मतभेद नहीं है, हां दोनों की शैली बिलकुल भिन्न है। एक अंतर्मुखी है तो दूसरा बहिर्मुखी। एक पश्चिम भारत से आया है और दूसरा उत्तर भारत से। दोनों की आदतें अलग हैं, दोनों का लालन-पालन अलग-अलग ढंग से हुआ है। प्रस्तुत है उनसे लंबी बातचीत के अंश-

प्रश्न - राजसिंहजी, अभिवादन शब्द के रूप में आपने सिर्फ ‘नमस्कार’ का उपयोग कब से शुरू किया?

उत्तर- ये बात 1979 की है। 1978 में जब बिशनसिंह बेदी के नेतृत्व में भारतीय टीम पाकिस्तान के दौरे पर गई थी, तब पाकिस्तानी टेलीजिन पर हम लोग ‘गुड मार्निंग’ या ‘असलामालिकुम’ कहा करते थे। ‘गुड मार्निंग’ तो हमने किसी दूसरे मुल्क से उधार लिया है, और फिर हमारा मौलिक अभिवादन तो ‘नमस्कार’ ही है।

प्रश्न- अब सीधे क्रिकेट पर आ जाते हैं। हाल ही में संपन्न भारत-पाक श्रृंखला के बाद क्या आप यह सोचते हैं कि कप्तान के रूप में कपिल का चयन सही है?

उत्तर - निस्संदेह। मैं अत्यधिक बारीकियों में तो नहीं जाना चाहूंगा परंतु बार-बार कप्तानी में परिवर्तन टीम के लिए उत्साहवर्द्धक नहीं सिद्ध होता है। एक व्यक्ति, जो कि जुलाई में किसी कार्य के लिए सक्षम है, वह एकदम मार्च में इतना खराब तो नहीं हो सकता। मेरे ख्याल से तो भारतीय टीम स्तरहीन क्रिकेट खेली है। कपिल एक ऐसे कप्तान तो निश्चित तौर पर नहीं हैं, जो कि बहुत नीति व दूरदर्शिता से खेलते हैं। वह तो अपनी स्वाभाविक प्रकृति पर अधिक निर्भर करते हैं। और, ऐसे बहुत से कप्तान हुए हैं, जो कि नीतियों के मामले में निपुण थे, परंतु टीम ग्यारह खिलाड़ियों के सामूहिक प्रदर्शन से बनती है, किसी एक से नहीं।

वे बातचीत में निपुण हैं और वे एक बहुत अच्छे नेता हैं। आखिर, नेतृत्व भी तो कप्तानी के आयामों में से एक है। एक अच्छे कप्तान को अच्छा नेता होना बहुत जरूरी है

प्रश्न- क्या आपको यह नहीं लगता कि उनमें दिमाग के बजाय दमखम ज्यादा है?

उत्तर- वे निःसंदेह रूप से एक बुद्धिजीवी या क्रिकेट के महान दृष्टा तो नहीं हैं, परंतु वे खेल के मौलिक तत्वों से भलीभांति परिचित हैं।

प्रश्न- तो क्या आपके अनुसार वे मैदान पर पूरा अपना जी-जान लगाते हैं?

उत्तर- बेशक। और उनके साथ सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे बातचीत में निपुण हैं और वे एक बहुत अच्छे नेता हैं। आखिर, नेतृत्व भी तो कप्तानी के आयामों में से एक है। एक अच्छे कप्तान को अच्छा नेता होना बहुत जरूरी है।

प्रश्न- परंतु, मोहिंदर अमरनाथ द्वारा बेहतरीन प्रदर्शन के बावजूद गेंदबाज के रूप में कपिल उनका प्रयोग इतना कम क्यों करते हैं?

उत्तर- मोहिंदर एक ऐसे गेंदबाज हैं, जिन्हें सफल होने के लिए वातावरण या गेंद की चमक की सहायता चाहिए। परंतु जब कपिल के पास अन्य प्रारंभिक गेंदबाज टीम में होते हैं तो फिर वही नई गेंद मोहिंदर को नहीं दे पाते हैं और फिर कपिल कोई बहुत ज्यादा ‘परीक्षण’ करने वाले कप्तानों में नहीं हैं।

प्रश्न- लेकिन, श्रीकांत, अजहर या राजपूत को तो वे गेंद सौंप देते हैं?

उत्तर- श्रीकांत को तो वे सिर्फ एक-दो ओवर के लिए गेंद देते हैं। वह भी इसलिए कि जिसने श्रीकांत की गेंदें पहले नहीं खेली हों, उन बल्लेबाजों को श्रीकांत कुछ कठिनाई में डाल देते हैं। वे एक ऑफ स्पिनर माने जाते हैं, परंतु उनकी गेंदें तो दूसरी ओर घूमती हैं। परंतु एक बार खेलने के बाद तो उनकी गेंदबाजी काफी सरल नजर आती है। उनका उपयोग वे चंद ओवर से ज्यादा नहीं करते।

प्रश्न- अगर गावस्कर को रिलायंस कप के लिए कप्तान चुना गया तो क्या आप समझते हैं कि वे स्वीकार कर लेंगे?

उत्तर- ये तो खुद सुनील ही बता सकते हैं। परंतु जैसा मैं उन्हें जानता हूं, वे नहीं करेंगे। एक बार वे किसी चीज का परित्याग कर देते हैं तो फिर उसे वापस बहुत कम ही स्वीकार करते हैं। और अगर वे ऐसा करते हैं तो यह उनके विचारों का अच्छा प्रतिबिंब नहीं होगा। और क्या भारतीय टीम इतनी जर्जर स्थिति में है कि हम सिर्फ सुनील को कप्तान बना सकते हैं, यह जानते हुए भी कि वे खुद अपनी मर्जी से इसका त्याग कर चुके हैं।

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