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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल &#187; जे आर डी टाटा | जे आर डी टाटा के बारे में सम्पूर्ण जानकारी</title>
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		<title>यूं हुआ देश में विमान सेवाओं का जन्म</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:44:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[इंपीरियल एयरवेज]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा एअर लाइंस]]></category>
		<category><![CDATA[मेसर्स टाटा एंड संन्स]]></category>
		<category><![CDATA[लॉग बुक]]></category>

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		<description><![CDATA[दिसंबर 7, 1937। विमान प्रकार-वेको.सी-6 । इंजिन प्रकार जाकोबो; एच.डी.-225 । बंबई से इंदौर-उड़ान समय 2 घंटे 20 मिनट। वापसी दिसंबर 8 इंदौर से बंबई, समय 2 घंटे 15 मिनट। सहचालक नेविल विन्टसेन्ट के साथ। आधा उड़ान समय दर्ज। ऊपर लिखे इस वर्णन को पहली बार पढ़ने पर तो शायद आपको कुछ ज्यादा समझ नहीं आएगा, लेकिन अगर यह बताया जाए कि यह &#8216;पायलट लॉग बुक&#8217; (किसी भी विमान चालक द्वारा उड़ान के गंतव्य, प्रस्थान व आगमन के समय आदि [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd10_jrd_on_throttle.jpg" alt="यूं हुआ देश में विमान सेवाओं का जन्म" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3140" /><span class="dropcap">दि</span>संबर 7, 1937। विमान प्रकार-वेको.सी-6 । इंजिन प्रकार जाकोबो; एच.डी.-225 । बंबई से इंदौर-उड़ान समय 2 घंटे 20 मिनट। वापसी दिसंबर 8 इंदौर से बंबई, समय 2 घंटे 15 मिनट। सहचालक नेविल विन्टसेन्ट के साथ। आधा उड़ान समय दर्ज।</p>
<p>ऊपर लिखे इस वर्णन को पहली बार पढ़ने पर तो शायद आपको कुछ ज्यादा समझ नहीं आएगा, लेकिन अगर यह बताया जाए कि यह <em>&#8216;पायलट लॉग बुक&#8217;</em> (किसी भी विमान चालक द्वारा उड़ान के गंतव्य, प्रस्थान व आगमन के समय आदि के विवरण को दर्ज करने की पुस्तिका) का एक पन्ना है, तो शायद स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। आपको यह जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि यह विवरण किसी साधारण पायलट की &#8216;<em>लॉग बुक</em>&#8216; का नहीं, बल्कि भारत में उड्‌डयन के प्रणेता, भारत रत्न जे.आर.डी. (जहांगीर रतनजी दादाभाई) टाटा की ऐतिहासिक <em>&#8216;लॉग बुक&#8217;</em> से है। जे.आर.डी. की &#8216;<em>पायलट लॉग बुक</em>&#8216; और उसमें इंदौर का जिक्र, वह भी ठेठ 1937 का? थोड़ा सब्र कीजिए।</p>
<p>भारत में हवाई डाक सेवा का शुभारंभ 15 अक्टूबर 1932 को हुआ था, जब कराची (विभाजन से पूर्व भारत में) से अहमदाबाद होते हुए बंबई की उड़ान भरकर जे.आर.डी. टाटा ने इतिहास रचा था।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">दी इंडियन नेशनल एअरवेज ने प्रस्तावित विमानतल पर रात्रि में विमानों के उतरने से संबंधित सुविधाओं की व्यवस्था करने के लिए शासन से निवेदन किया है<span></span></div>
<p>उस उड़ान के कुछ ही समय पहले जे.आर.डी. और उनके &#8216;<em>नेविल विन्टसेन्ट</em>&#8216; के संयुक्त प्रयासों के बाद टाटा एअर लाइंस का जन्म हुआ था। वह उद्‌घाटन उड़ान टाटा एअर लाइंस के ही विमान &#8216;डी. हैवीलैण्ड पस मोथ&#8217; में पायलट के रूप में जे.आर.डी. टाटा ने 6 घंटे 50 मिनट में पूरी की थी।</p>
<p>वैसे मूलभूत योजना कुछ इस प्रकार थी कि तत्कालीन इंपीरियल एयरवेज लंदन से कराची तक हवाई डाक सेवा का संचालन कर रही थी। उसी सेवा से पूरे भारत को जोड़ने के लिए कराची से अहमदाबाद होते हुए बंबई और फिर बंबई से बेलारी होते हुए मद्रास विमान से डाक और थोड़े ही समय बाद यात्रियों को ले जाने का सिलसिला प्रारंभ हुआ। धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्से भी विमान सेवा के जरिये जुड़ने लगे।</p>
<p>इसी तारतम्य में इंदौर में भी हवाई पट्‌टी निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। सन्‌ 1934 की होल्कर स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट जिसके प्रमुख अंश इंदौर गजेटियर में उद्‌धृत हैं, के अनुसार, &#8216;मेसर्स टाटा एंड संन्स, विमान विभाग (टाटा एअर लाइंस का प्रारंभिक स्वरूप) के मिस्टर विन्टसेन्ट से परामर्श करने के बाद विमानतल के निर्माण के लिए बिजासनी स्थल को चुना गया। संपूर्ण योजना मंजूर कर दी गई है। लागत का अनुमान 1,84,092 रुपए है। प्रथमावास्था में 14,500 रुपए की अनुमानित लागत से एक विमान-शाला (हेंगर) के लिए भी व्यवस्था की गई है।&#8217;</p>
<p><strong>1 फरवरी, 1935</strong> को कमांडर वॉट, विमानतल अधिकारी, कराची ने स्थल का निरीक्षण किया और अपने सुझावों सहित प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसे तत्कालीन सरकार ने स्वीकृति प्रदान कर 2,20,488 रुपए की राशि मंजूर कर दी। कमांडर वॉट के प्रतिवेदन में भी रात्रि अवतरण-क्षेत्र का जिक्र था। वहीं दूसरी ओर 1936 के आते टाटा एअर लाइंस में नए अमेरिकी &#8216;वेको वाय.क्यू.सी.-6&#8242; विमान का आगमन हो गया। ब्रिटिश &#8216;पस मोथ&#8217; के 120 हॉर्स पॉवर शक्ति वाले इंजिन के मुकाबले &#8216;<em>वेको</em>&#8216; की इंजिन 225 हॉर्स पॉवर की थी। यह &#8216;पथ मोथ&#8217; से एक और मायने में बेहतर था- &#8216;पस मोथ&#8217; के इंजिन को स्वयं चालक को हाथ से घुमाकर शुरू करना पड़ता था, जबकि &#8216;<em>वेको</em>&#8216; में यह व्यवस्था स्वचालित थी। इसी &#8216;<em>वेको</em>&#8216; के आगमन के पश्चात टाटा एअर लाइंस ने दिल्ली से ग्वालियर, भोपाल और इंदौर होते हुए बंबई के लिए हवाई डाक सेवा प्रारंभ करने का विचार बनाया। चूंकि उस वक्त टाटा एअर लाइंस में सिर्फ तीन ही पायलट थे (जे.आर.डी., विन्टसेन्ट और होमी भरूचा), इसलिए जे.आर.डी. को भी विमान चालन का काफी भार उठाना पड़ा था।</p>
<p><strong>9 नवंबर, 1937</strong> को दिल्ली से बंबई की उद्‌घाटन उड़ान को बिदा करने के लिए दिल्ली की वेलिंगटन हवाई पट्‌टी पर खासी भीड़ जमा थी। टाटा लाइंस के दो विमानों से उस सेवा की शुरुआत हुई, जिसमें से एक नेविल विन्टसेन्ट उड़ा रहे थे। उस विमान में 3,500 चिटि्‌ठयां और एक यात्री बैठा था। दूसरे विमान में तीन पत्रकार थे। रेशम की चार नीली सुनहरी थैलियों में तत्कालीन वाइसराय द्वारा तीनों रियासतों के प्रमुखों और बंबई के गवर्नर के लिए शुभकामना संदेश थे। पूरे समारोह की रपट रेडियो से प्रसारित की गई थी। उद्‌घाटन सेवा में कुल उड़ान समय 6 घंटे 15 मिनट का रहा। यानी, 10000 करोड़ रुपए से भी अधिक कारोबार वाले समूह का प्रमुख तब इंदौर सिर्फ &#8216;डाकिए&#8217; के रूप में आता था। हां, इसमें उसकी पूर्ण स्वेच्छा थी, कोई मजबूरी नहीं। उपरोक्त संदर्भ के साथ उल्लेखनीय है कि इंदौर में नियमित हवाई सेवा 26 जुलाई, 1948 को प्रारंभ हुई। यहां यह भी विचारणीय है कि जिस रात्रि विमान सेवा हेतु विमानतल को सुसज्जित करने का प्रावधान सन्‌ 1935 में बना था और जिसे शासन की मंजूरी भी मिल गई थी, उसे नागरिक विमानन सेवा में लागू होते-होते 53 साल लग गए, जब 20 अप्रैल 1988 को इंदौर हवाई अड्‌डे पर रात्रि विमान सेवा की अंतिम रिहर्सल की गई।</p>
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		<title>समय की पाबंदी</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:43:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[इंपीरियल एयरवेज]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा एअर लाइंस]]></category>
		<category><![CDATA[वायुसेवा]]></category>
		<category><![CDATA[विमान सेवा]]></category>
		<category><![CDATA[हवाई डाक सेवा]]></category>

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		<description><![CDATA[भारत में नागरिक उड्‌डयन के जनक जे.आर.डी. टाटा के अनुसार एक अच्छी विमान सेवा की सबसे पहली पहचान है- समय की पाबंदी। अगर अन्य साधनों से अधिक पैसा खर्च करके भी यात्री समय पर अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सकते तो फिर वायुसेवा का क्या औचित्य रह जाता है? नागरिक उड्‌डयन निदेशालय द्वारा 1933-34 में जारी रिपोर्ट में टाटा एअर लाइंस के कार्यकलापों का वर्णन कुछ इस प्रकार था। &#8216;हवाई डाक सेवा के आदर्श संचालन के लिए एक मिसाल के [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd4_jrd_in_office_air_india.jpg" alt="समय की पाबंदी" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3138" /><span class="dropcap">भा</span>रत में नागरिक उड्‌डयन के जनक जे.आर.डी. टाटा के अनुसार एक अच्छी विमान सेवा की सबसे पहली पहचान है- समय की पाबंदी। अगर अन्य साधनों से अधिक पैसा खर्च करके भी यात्री समय पर अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सकते तो फिर वायुसेवा का क्या औचित्य रह जाता है?</p>
<p>नागरिक उड्‌डयन निदेशालय द्वारा 1933-34 में जारी रिपोर्ट में टाटा एअर लाइंस के कार्यकलापों का वर्णन कुछ इस प्रकार था। &#8216;हवाई डाक सेवा के आदर्श संचालन के लिए एक मिसाल के रूप में हम टाटा एअर लाइंस की सेवाओं की प्रशंसा करते हैं, जिन्होंने 10 अक्टूबर 1933 को सदा की तरह समय पर कराची पहुंचकर कामकाज का एक वर्ष सौ फीसदी समय की पाबंदी का पालन करते हुए पूर्ण किया है। प्रकृति की विषम परिस्थितियों-आंधी, तूफान, मूसलधार वर्षा में जब पश्चिमी घाटों के ऊपर हवाई उड़ान अत्यंत दुष्कर और</p>
<div class="simplePullQuoteRight">पचास के दशक में एक बार जिनेवा में एक स्विस नागरिक ने दूसरे से पूछा, &#8216;भाई, इस वक्त क्या बजा है?&#8217; दूसरे ने तुरंत खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा, <em>&#8216;ठीक 11 बजे हैं&#8217;</em> पहले ने पूछा, &#8216;<em>पर आपने घड़ी तो देखी ही नहीं।</em>&#8216; दूसरे बोला, &#8216;एअर इंडिया का विमान अभी-अभी उतरा है, इसलिए ठीक 11 ही बजे हैं।&#8217;<span></span></div>
<p>जोखिमभरा कार्य था, उन हालातों के बावजूद एक बार भी बंबई से मद्रास डाक पहुंचने में देर नहीं हुई। लेटलतीफ इंपीरियल एयरवेज को अपने कर्मचारियों को समय की पाबंदी सीखने के लिए टाटा एअर लाइंस <em>&#8216;डेपुटेशन&#8217;</em> पर भेजना चाहिए।&#8217;</p>
<p>पचास के दशक में एक बार जिनेवा में एक स्विस नागरिक ने दूसरे से पूछा, <em>&#8216;भाई, इस वक्त क्या बजा है?&#8217;</em> दूसरे ने तुरंत खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा, &#8216;<em>ठीक 11 बजे हैं।</em>&#8216; पहले ने पूछा, <em>&#8216;पर आपने घड़ी तो देखी ही नहीं।&#8217;</em> दूसरे बोला, &#8216;एअर इंडिया का विमान अभी-अभी उतरा है, इसलिए ठीक 11 ही बजे हैं।&#8217; और वर्तमान में भारत की नागरिक विमान सेवाओं की <em>&#8216;समय की पाबंदी&#8217;</em> के शब्दों में, &#8216;आजकल तो भारत में कई बार विमान गंतव्य पर पहुंचने के उनके निर्धारित समय तक तो &#8216;<em>टेक-ऑफ</em>&#8216; ही नहीं करते हैं। जब उड़ान ही नहीं भरी तो फिर पहुंचने के समय का क्या ठिकाना?&#8217;</p>
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		<title>एक युग की शुरुआत&#8230; &#8230;और युग का अंत।</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:42:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[ए.आर. दलाल]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी.टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा घराने]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा सन्स]]></category>
		<category><![CDATA[बॉम्बे हाउस]]></category>
		<category><![CDATA[रतन टाटा]]></category>

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		<description><![CDATA[26 जुलाई 1938 को प्रातः 11.30 बजे टाटा सन्स के निदेशक मंडल की बैठक &#8216;बॉम्बे हाउस&#8217;, फोर्ट में हुई। बैठक का विवरणः श्री जे.आर.डी. टाटा, श्री एस.डी. सकलातवाला, श्री ए.आर. दलाल, श्री एच.आर. दलाल, श्री एचपी. मोदी उपस्थित थे। श्री एच.पी. मोदी को अध्यक्षीय आसन संभालने का प्रस्ताव पारित किया गया। श्री एस.डी. सकलातवाला ने मार्मिक शब्दों में अध्यक्ष, सर नौरोजी सकलातवाला की दुःखद और असामयिक मृत्यु पर शोक व्यक्त किया और निम्नलिखित शोक प्रस्ताव सर्वानुमति से पारित किया गया। [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd12_jrd_ratan.jpg" alt="एक युग की शुरुआत... ...और युग का अंत।" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3136" /><span class="dropcap">26</span> जुलाई 1938 को प्रातः 11.30 बजे टाटा सन्स के निदेशक मंडल की बैठक &#8216;बॉम्बे हाउस&#8217;, फोर्ट में हुई। बैठक का विवरणः</p>
<p>श्री जे.आर.डी. टाटा,</p>
<p>श्री एस.डी. सकलातवाला,</p>
<p>श्री ए.आर. दलाल,</p>
<p>श्री एच.आर. दलाल,</p>
<p>श्री एचपी. मोदी उपस्थित थे।</p>
<p>श्री एच.पी. मोदी को अध्यक्षीय आसन संभालने का प्रस्ताव पारित किया गया। श्री एस.डी. सकलातवाला ने मार्मिक शब्दों में अध्यक्ष, सर नौरोजी सकलातवाला की दुःखद और असामयिक मृत्यु पर शोक व्यक्त किया और निम्नलिखित शोक प्रस्ताव सर्वानुमति से पारित किया गया।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">कंपनी के उद्‌गम-दस्तावेज की धारा 118 के अंतर्गत श्री सोहराब सकलातवाला ने यह प्रस्ताव रखा और श्री अरदेशीर दलाल ने उसकी पुष्टि की, कि श्री जे.आर.डी. टाटा को टाटा सन्स के निदेशक मंडल का अध्यक्ष मनोनीत किया जाता है<span></span></div>
<p>टाटा सन्स के निदेशक मंडल को उनके अध्यक्ष, सर नौरोजी सकलातवाला के आकस्मिक निधन के समाचार से धक्का पहुंचा है। अपने प्रभावी व्यक्तित्व और अनेक विशेषताओं से उन्होंने अपने साथियों का आदर और स्नेह, दोनों ही पाया। जिस आत्मविश्वास का संचार उन्होंने अपने सभी सहयोगियों और टाटा घराने के अन्य कर्मचारियों में किया, वह टाटा घराने की परम्पराओं को बरकरार रखने में सदा याद किया जाएगा। कंपनी के उद्‌गम-दस्तावेज की धारा 118 के अंतर्गत श्री सोहराब सकलातवाला ने यह प्रस्ताव रखा और श्री अरदेशीर दलाल ने उसकी पुष्टि की, कि श्री जे.आर.डी. टाटा को टाटा सन्स के निदेशक मंडल का अध्यक्ष मनोनीत किया जाता है।</p>
<p><strong>20 फरवरी&#8217; 1991</strong> को जे.आर.डी. ने दफ्तार में एक व्यस्त दिन व्यतीत करने के बाद शाम को एक सार्वजनिक समारोह में भाषण दिया। अगले दिन प्रातः जमशेदपुर रवाना होने से पहले उनकी छाती में दर्द महसूस होने लगा, फिर भी वे जमशेदपुर के लिए प्रस्थान कर गए। 3 मार्च को उन्होंने वहां संस्थापक दिवस के कार्यक्रमों में भाग लिया। वहां भी उन्हें छाती की तकलीफ बरकरार रही। जमशेदपुर से लौटने के पश्चात उन्हें पांच दिन बंबई में ब्रीच कैंडी अस्पताल में आराम करने की सलाह दी गई, जिसका उन्होंने न चाहते हुए भी पालन किया। अस्पताल से घर आने के अगले सप्ताह बुधवार, 27 मार्च को टाटा सन्स निदेशक मंडल की हर माह के अंतिम बुधवार को होने वाली परंपरागत बैठक निर्धारित थी। लेकिन जे.आर.डी. के आग्रहानुसार उसे दो दिन पूर्व, यानी 25 मार्च 1991 को ही बुला लिया गया। कार्यसूची में सामान्य विषयों के अलावा एक विशिष्ट मसौदा दर्ज था, &#8216;<em>जे.आर.डी. के पत्र पर विचार करना।</em>&#8216;</p>
<p>बैठक के प्रारंभ में ही जे.आर.डी. ने टाटा घराने से अपने साठ वर्षों से भी अधिक के संबंधों और अनुभवों का जिक्र किया। बैठक में उपस्थित निदेशकों के अनुसार वह बड़ा ही मार्मिक उद्‌बोधन था। उसके अंत में जे.आर.डी. ने कहा, <em>&#8216;मैंने 53 वर्षों के लंबे कार्यकाल का निर्वाहन किया है। अब मैं सेवानिवृत्त होना चाहता हूं और अपनी ओर से श्री रतन टाटा के नाम का टाटा सन्स के अध्यक्ष पद के लिए प्रस्ताव रखता हूं।&#8217;</em> टाटा सन्स में जे.आर.डी. के सहयोगी और लगभग 15 प्रतिशत के हिस्सेदार शापूरजी पालोनजी मिस्त्री ने प्रस्ताव की पुष्टि की। वहां उपस्थित किसी भी निदेशक ने उसमें कोई परिवर्तन का प्रस्ताव नहीं रखा। और, रतन टाटा टाटा सन्स लिमिटेड के अध्यक्ष बन गए। एक स्वर्णिम युग का पटाक्षेप हो गया।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>पैनी नजर &#8216;जहांगीर&#8217; की</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:40:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[एअर इंडिया]]></category>
		<category><![CDATA[जहांगीर रतनजी दादाभाई]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी.टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[विमान सेवा]]></category>

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		<description><![CDATA[जे.आर.डी. टाटा के प्रबंधन की सदैव यह विशेषता रही है कि उन्होंने छोटी से छोटी बात को भी हमेशा पूरा महत्व दिया। शायद इसके सबसे जीवंत उदाहरण जे.आर.डी. द्वारा विभिन्न समयों पर एअर इंडिया की विमान सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए दिए गए सुझाव थे। पहली नजर में तो अधिकांश मुद्दे &#8216;तुच्छ&#8217; जान पड़ते हैं, पर करीब से देखने पर इनसे जे.आर.डी. की विलक्षण क्षमताओं का सागर दिखाई पड़ता है, जो उस ऐतिहासिक वाक्य को चरितार्थ करता है, &#8216;आप [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd3_JRD_AirIndia.jpg" alt="पैनी नजर 'जहांगीर' की" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3134" /><span class="dropcap">जे</span>.आर.डी. टाटा के प्रबंधन की सदैव यह विशेषता रही है कि उन्होंने छोटी से छोटी बात को भी हमेशा पूरा महत्व दिया। शायद इसके सबसे जीवंत उदाहरण जे.आर.डी. द्वारा विभिन्न समयों पर एअर इंडिया की विमान सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए दिए गए सुझाव थे।</p>
<p>पहली नजर में तो अधिकांश मुद्दे <em>&#8216;तुच्छ&#8217;</em> जान पड़ते हैं, पर करीब से देखने पर इनसे जे.आर.डी. की विलक्षण क्षमताओं का सागर दिखाई पड़ता है, जो उस ऐतिहासिक वाक्य को चरितार्थ करता है, <em>&#8216;आप छोटी चीजों की ओर ध्यान दे दें, बड़ी चीजें खुद-ब-खुद ठीक हो जाएंगी।&#8217;</em> एअर इंडिया में अपनी हर यात्रा के दौरान जे.आर.डी. विमान में हर पहलू पर अपने अनुभव नोट करते थे और उनके आधार पर अपने सुझाव, प्रशंसा अथवा रोष को लगातार व्यक्त करते रहते थे।</p>
<p>एक बार उन्होंने एअर इंडिया के विज्ञापनों में कुछ परिवर्तन करने के लिए मध्य रात्रि में प्रचार प्रमुख जाल कावसजी को फोन कर दिया। <em>&#8216;महाराजा&#8217;</em> (एयर इंडिया का पहचान चिह्न) को सतत श्रेष्ठता की ओर अग्रसर होते देखना चाहने वाले &#8216;जहांगीर&#8217; की पैनी नजर के कुछ उदाहरण देखिए :</p>
<div class="simplePullQuoteRightPerpal">मैंने कुछ परिचारिकाओं को सफेद लिपिस्टिक का प्रयोग करते हुए देखा है, वह दूर से अच्छी नहीं दिखाई पड़ती<span></span></div>
<ul>
<li>&#8216;हमारे विमानों में गाढ़ी ब्रिटिश बीयर यात्रियों को पेय के रूप में दी जाती है। मेरे विचार में उड़ान के दौरान यात्री हल्की बीयर ज्यादा पसंद करेंगे।</li>
<li> जिनेवा से उड़ान के बाद दी गई चाय का रंग कॉफी से ज्यादा अलग नहीं था। यह रंग उसमें नैसर्गिक तौर पर है अथवा अधिक उकाली के कारण, कृपया जांच करवाएं।</li>
<li> विमान में कुछ कुर्सियां अधिक आरामदेह हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए, हर यात्री को समान रूप से आरामदेह यात्रा का अधिकार है।</li>
<li> परिचालक दल के सदस्य उड़ान के दौरान विमान के गलियारे में धूम्रपान करते हैं। इससे यात्रियों के मन में हमारी विमान सेवा का विपरीत प्रभाव पड़ता है। परिचालक दल को सिर्फ उनके लिए निर्धारित स्थान पर ही बैठकर धूम्रपान की अनुमति होनी चाहिए।</li>
<li> उड़ान के दौरान भोजन परोसते समय यात्रियों की कुर्सियों के ऊपर लगी रोशनी अवश्य जलाई जानी चाहिए। इससे भोजन परोसने और खाने के बर्तनों की चमक बढ़ जाएगी और यात्रियों पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा।</li>
<li> विमान परिचारिकाओं को उनके पहनावे और साज-श्रृंगार का निर्णय करने की पूर्ण स्वतंत्रता रहनी चाहिए। परंतु उन्हें इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें सैकड़ों यात्री देखते हैं और उनका सुंदर किंतु सौम्य व्यक्तित्व यात्रियों के मन में एअरलाइन की अच्छी छवि अंकित करता है। मैंने कुछ परिचारिकाओं को सफेद लिपिस्टिक का प्रयोग करते हुए देखा है, वह दूर से अच्छी नहीं दिखाई पड़ती।</li>
<li> उड़ान से पूर्व प्रसाधन कक्ष (टॉयलट) में टिश्यू पेपर के रोल व्यवस्थित ढंग से नहीं रखे हुए थे।&#8217;</li>
</ul>
<p>जिस विमान सेवा के अध्यक्ष भी उसकी सेवाओं के प्रति इतना सजग और जागरूक हों उसकी सफलता में तो कोई संदेह रह ही नहीं जाता और यही हुआ भी। इसीलिए कड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के बावजूद 1968 में लंदन के एक अखबार द्वारा किए गए सर्वेक्षण में एअर इंडिया <em>&#8216;विश्व की सबसे अच्छी विमान सेवा&#8217;</em> के खिताब से पुरस्कृत हुई। निर्णायक मंडल की एक सदस्या के अनुसार, <em>&#8216;मैं रोम में विमान के पड़ाव के दौरान अपनी कुछ चाकलेट विमान में अपनी सीट पर रखकर उतर गई थी। जब मैं वापस लौटी, तो चाकलेट यथावत रखी थी किंतु सिर्फ उसी कुर्सी के पास की खिड़की बंद कर दी गई थी, ताकि चाकलेट धूप पड़ने से पिघल न जाए।&#8217;</em></p>
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		<title>क्या खतरा मात्र आर्थिक शक्ति बढ़ने से है?</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:39:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[अर्थव्यवस्था]]></category>
		<category><![CDATA[जमशेदजी टाटा]]></category>
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		<category><![CDATA[दादाभाई नौरोजी]]></category>
		<category><![CDATA[रतन टाटा]]></category>

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		<description><![CDATA[हमारे देश के सामने समाजवादी अर्थव्यवस्था का ढांचा रखा गया है। अगर समाजवाद का अर्थ सभी को समान अधिकार और मौके, दलितों के ऊपर उठने के उचित अवसर और न्यायप्रिय वैधानिक समाज व्यवस्था से है, तो मैं उस समाजवाद का पक्षधर हूं, परंतु अगर उस समाजवाद का तात्पर्य व्यक्तिगत प्रयत्नों पर पाबंदी, उद्योगों पर सरकार के नियंत्रण और निजी इच्छा के विपरीत सरकार द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार जीवन-यापन से है, तो मैं ऐसे समाजवाद के सख्त खिलाफ हूं। किसी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd5_profile_pic.jpg" alt="jm_jrd5_profile_pic" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3132" /><span class="dropcap">ह</span>मारे देश के सामने समाजवादी अर्थव्यवस्था का ढांचा रखा गया है। अगर समाजवाद का अर्थ सभी को समान अधिकार और मौके, दलितों के ऊपर उठने के उचित अवसर और न्यायप्रिय वैधानिक समाज व्यवस्था से है, तो मैं उस समाजवाद का पक्षधर हूं, परंतु अगर उस समाजवाद का तात्पर्य व्यक्तिगत प्रयत्नों पर पाबंदी, उद्योगों पर सरकार के नियंत्रण और निजी इच्छा के विपरीत सरकार द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार जीवन-यापन से है, तो मैं ऐसे समाजवाद के सख्त खिलाफ हूं। किसी भी व्यक्ति को अपनी निजी और पारिवारिक जरूरतों का पूरा करने के मार्ग में निर्धारित बनकर बैठने वाली व्यवस्था कैसे प्रशंसनीय हो सकती है?&#8217;</p>
<p><b>कन्सनट्रेशन ऑफ इकोनोमिक पावर</b></p>
<p>&#8216;हमारे नेताओं के भाषण सुनकर तो ऐसा लगने लगा है, मानो हमारे देश को बढ़ती हुई आबादी, सांप्रदायिकता, गरीबी, बेरोजगारी आदि किसी से भी नहीं, बल्कि सिर्फ आर्थिक शक्ति के एकत्रित होने से खतरा है। अगर निजी हाथों में आर्थिक शक्ति है, तो उसका सीधा तात्पर्य उपयुक्त स्थानों पर मनचाहे उद्योग लगाने की स्वतंत्रता, बाजार से आवश्यकतानुसार पैसा उधार अथवा अंशों के जरिये एकत्रित करने की आजादी और मनचाही शर्तों पर कर्मचारियों को नियुक्त करने की खुली छूट से है। परंतु इनमें से ऐसी कोई भी चीज नहीं है, जो हमारे देश का उद्योगपति स्वेच्छा से कर सकता है। तो फिर उसकी आर्थिक शक्ति का क्या फायदा। सही मायनों मे तो &#8216;<em>कन्सनट्रेशन ऑफ इकोनोमिक पॉवर हमारे सरकारी अफसरों और मंत्रियों के पास है, जिससे कि देश की प्रगति को वास्तविक खतरा है।</em>&#8216;</p>
<p>(उपरोक्त विचार वर्तमान आर्थिक परिवर्तनों के पूर्व व्यक्त किए गए हैं।)</p>
<p><b>मूल्य एवं आस्था</b></p>
<p>&#8216;दुःख का विषय है कि मूल्य आधारित सभ्यता अब समाप्त हो गई है। मैं जिन मूल्यों व स्तर का अनुसरण करने का प्रयास करता हूं, वह मुझे जमशेदजी टाटा से मिले हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं। स्वतंत्रता के बाद अधिक काला धन बनाने के साथ मूल्यों का ह्रास अधिक हुआ है। आज मोटे तौर पर मूल्यों में तो बहुत बदलाव नहीं आया है। हां, हमारे द्वारा उन्हें दिए जाने वाले महत्व में आमूल परिवर्तन हो गया है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">वह मेरी जिंदगी का पहला अवसर था, जब मेरे पास करोड़ रुपए अथवा कई लाख रुपए निजी संपदा के रूप में आए थे<span></span></div>
<p>मूल्यों में आई गिरावट के मेरे मान से प्रमुख कारण कुछ इस प्रकार हैं। पहला, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रगति ने धर्म पर से हमारी आस्था को डिगा दिया है, जो कि पुरातन समय में हमारे नैतिक आचरण का सबसे बड़ा संबल थी। दूसरा, यथार्थवाद और आर्थिक उपलब्धि की अंधी दौड़ ने मनुष्य को इतना स्वार्थी बना दिया है कि उसे अपने हितों के आगे कुछ दिखाई नहीं देता। तीसरा, हमारे देश में सरकारी कर्मचारियों को दी जाने वाली &#8216;<em>शर्मनाक</em>&#8216; तनख्वाह और उसके साथ उनके हाथों में लाइसेंस-परमिट देने का मनमाना अधिकार। अगर हमें मूल्यों को वहीं उनके उचित स्थान और गौरव पर लौटाना है तो इन सब मुश्किलों के उपाय तो ढूंढने ही पड़ेंगे।&#8217;</p>
<p><b>पुरस्कार और सम्मान</b></p>
<p>&#8216;मुझे देश-विदेश में कई पुरस्कार मिले हैं, हालांकि मेरी उनके लिए पात्रता कदापि नहीं थी। परंतु अपने जीवन में मुझे सबसे ज्यादा खुशी दादाभाई नौरोजी सम्मान पाकर हुई। वह इसलिए कि यह वह व्यक्ति था, जिसने सही मायनों में समाज सुधार का बीड़ा उठाया था। उनकी शिक्षा पूर्ण होने के बाद जब उन्हें ज्ञात हुआ कि कॉलेज का अधिकांश खर्च सरकार की ओर से मिलता है, जो उसे गरीबों से लिए गए कर में से देती है। बस, तभी उन्हें लग गया कि उनकी शिक्षा का खर्च तो उन गरीबों ने उठाया है, जिन्हें खुद पढ़ना भी नहीं आता।</p>
<p>दादाभाई घर-घर जाते थे और लोगों के घरों के द्वार के समीप ही बैठकर उनके बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाते थे। मुझे तो यह सब आश्चर्यजनक लगता है। इसीलिए, मुझे दादाभाई नौरोजी सम्मान मिलने पर जो आनंद की अनुभूति हुई, वह &#8216;भारत रत्न&#8217; मिलने पर भी नहीं हुई।&#8217;</p>
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		<title>जे.आर.डी. की उड़ान</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:37:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी. की उड़ान]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी.टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा एअर लाइंस]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा एअरक्राफ्ट]]></category>
		<category><![CDATA[सबसे ऊंची उड़ान]]></category>

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		<description><![CDATA[जीवन में पांच वर्ष की अबोध अवस्था से अस्सी बसंत की सुदीर्घ आयु तक कैसे कोई अगाध प्रेम की दास्तां के उन्माद का चंद शब्दों में वर्णन कर सकता है? जे.आर.डी. और &#8216;एविएशन&#8217; की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। नीचे इस ऐतिहासिक सफर की उन चुनिंदा तारीखों का जिक्र है जो जे.आर.डी. की उड़ान के साथ भारत के उड्‌डयन इतिहास की भी सबसे ऊंची उड़ान हैं। 1929 22 जनवरी : जे.आर.डी. टाटा की पहली प्रशिक्षण उड़ान 3 फरवरी : [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd1_50yrsinflight.png" alt="जे.आर.डी. की उड़ान" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3130" /><span class="dropcap">जी</span>वन में पांच वर्ष की अबोध अवस्था से अस्सी बसंत की सुदीर्घ आयु तक कैसे कोई अगाध प्रेम की दास्तां के उन्माद का चंद शब्दों में वर्णन कर सकता है? जे.आर.डी. और <em>&#8216;एविएशन&#8217;</em> की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। नीचे इस ऐतिहासिक सफर की उन चुनिंदा तारीखों का जिक्र है जो जे.आर.डी. की उड़ान के साथ भारत के उड्‌डयन इतिहास की भी सबसे ऊंची उड़ान हैं।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1929</b></span></p>
<p><strong>22 जनवरी</strong> : जे.आर.डी. टाटा की पहली प्रशिक्षण उड़ान</p>
<p><strong>3 फरवरी</strong> : जे.आर.डी. टाटा की जुहू हवाई हवाई पट्‌टी, बंबई से पहली &#8216;<em>सोलो</em>&#8216; (एकल) उड़ान</p>
<p><strong>10 फरवरी</strong> : जे.आर.डी. को पायलट लाइसेंस प्राप्त।</p>
<p><strong>17 मई</strong> : लंदन से फ्रांस के बीच जे.आर.डी. की &#8216;<em>पायलट</em>&#8216; के रूप में पहली अंतरराष्ट्रीय उड़ान।</p>
<p><strong><span style="text-decoration: underline;">1930</span></strong></p>
<p><strong>3 मई</strong> ड्रिग रोड, कराची से उड़ान भरकर जे.आर.डी. द्वारा आगा खां प्रतियोगिता (भारत से इंग्लैंड) जीतने का प्रयास</p>
<div class="simplePullQuoteRight">जे.आर.डी. की उड़ान के साथ भारत के उड्‌डयन इतिहास की भी सबसे ऊंची उड़ान<span></span></div>
<p><strong>12 मई</strong> : क्रायडन, लंदन पहुंचकर प्रतियोगिता मार्ग संपूर्ण, किंतु पुरस्कार एस्पी इंजीनियर को।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1932</b></span></p>
<p><strong>24 अप्रैल</strong> : जे.आर.डी. व नेविल विन्टसेन्ट के प्रयासों के फलस्वरूप टाटा एअर लाइंस और ब्रिटिश सरकार के बीच कराची-बंबई-मद्रास हवाई डाक सेवा प्रारंभ करने हेतु समझौते पर हस्ताक्षर।</p>
<p><strong>15 अक्टूबर</strong> : जे.आर.डी. द्वारा प्रातः 6 बजकर 35 मिनट पर कराची से अहमदाबाद होते हुए बंबई के लिए उड़ान भरकर भारत में हवाई डाक सेवा का शुभारंभ। कुछ दिनों बाद यात्री सेवा भी प्रारंभ।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1937</b></span></p>
<p><strong>6 नवंबर</strong> : टाटा एअर लाइंस द्वारा दिल्ली-ग्वालियर, भोपाल-इंदौर-बंबई उड़ान सेवा का प्रारंभ। कुल उड़ान समय 6 घंटे 15 मिनट।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1942</b></span></p>
<p><strong>मार्च</strong> : भारत में विमान निर्माण हेतु टाटा एअरक्राफ्ट कंपनी का जन्म, किंतु ब्रिटिश सरकार के असहयोग के कारण योजना सफल नहीं।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1943</b></span></p>
<p>योरप में विमान दुर्घटना में नेविल विन्टसेन्ट की मृत्यु।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1946</b></span></p>
<p>टाटा एअरलाइंस (अभी तक टाटा सन्स का ही एक निजी प्रभाग) सार्वजनिक निर्गम के बाद एअर इंडिया लिमिटेड के नाम से ज्वाइंट स्टॉक कंपनी में तब्दील, जे.आर.डी. टाटा कंपनी के अध्यक्ष।</p>
<p><strong>26 अक्टूबर</strong> : &#8216;<em>अयाटा</em>&#8216; (इंटरनेशनल एअर ट्रेफिक एसोसिएशन) की दूसरी सामान्य बैठक में भाग लेने जे.आर.डी. टाटा काहिरा में।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1948</b></span></p>
<p><strong>8 मार्च</strong> : जे.आर.डी. की पहल पर सरकार द्वारा अप्रत्याशित रूप से तुरंत स्वीकृति के पश्चात भारत सरकार (49 प्रतिशत), टाटा घराने (25 प्रतिशत) और सामान्य जनता (26 प्रतिशत) की भागीदारी से भारत की सर्वप्रथम संयुक्त क्षेत्र की कंपनी एअर इंडिया इंटरनेशनल का जन्म।</p>
<p><strong>8 जून</strong> : &#8216;<em>मलाबार प्रिंसेस</em>&#8216; नामक लोकहीड कॉन्सटेलेशन 749 विमान द्वारा एअर इंडिया इंटरनेशनल की पहली उड़ान बंबई से काहिरा, रोम और जिनेवा होते हुए लंदन के लिए रवाना। उद्‌घाटन उड़ान के यात्रियों में एअर इंडिया इंटरनेशनल के अध्यक्ष जे.आर.डी. टाटा भी।</p>
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		<title>जीवन का चरमोत्कर्ष : मेरी पहली &#8216;सोलो&#8217; उड़ान</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:35:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[जहांगीर रतनजी दादाभाई]]></category>
		<category><![CDATA[जेआरडी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा एअर लाइंस]]></category>
		<category><![CDATA[विश्व युद्ध]]></category>
		<category><![CDATA[सोलो उड़ान]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ वर्षों पूर्व एक पत्रकार ने जहांगीर रतनजी दादाभाई (जे.आर.डी.) से पूछ था- आपके जीवन के सबसे अनमोल क्षण कौन-से हैं? जे.आर.डी. की आंखों में चमक आ गई और उन्होंने तुरंत जवाब दिया, &#8216;मेरी पहली सोलो (एकल) उड़ान से ज्यादा खुशी और संतुष्टि मुझे कभी नहीं हुई।&#8216; जेआरडी टाटा जैसे व्यापक और बहुआयामी जीवन व्यतीत करने वाले बिरले ही होते हैं,परंतु विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े रहने के बावजूद वह क्षेत्र एक या दो ही होते हैं, जिनमें संलग्न होकर वह [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd2_inaugaralFlight.jpg" alt="जीवन का चरमोत्कर्ष : मेरी पहली 'सोलो' उड़ान" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3128" /><span class="dropcap">कु</span>छ वर्षों पूर्व एक पत्रकार ने जहांगीर रतनजी दादाभाई (जे.आर.डी.) से पूछ था- आपके जीवन के सबसे अनमोल क्षण कौन-से हैं? जे.आर.डी. की आंखों में चमक आ गई और उन्होंने तुरंत जवाब दिया, &#8216;<em>मेरी पहली सोलो (एकल) उड़ान से ज्यादा खुशी और संतुष्टि मुझे कभी नहीं हुई।</em>&#8216; जेआरडी टाटा जैसे व्यापक और बहुआयामी जीवन व्यतीत करने वाले बिरले ही होते हैं,परंतु विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े रहने के बावजूद वह क्षेत्र एक या दो ही होते हैं, जिनमें संलग्न होकर वह व्यक्ति &#8216;<em>आत्मिक शांति और तृप्ति</em>&#8216; की अनुभूति प्राप्त करता है। जेआरडी भी इससे विलग नहीं हैं। जो आनंद उन्हें स्वच्छंद हवा में उड़ान भरने अथवा दूधिया, बर्फीली पहाड़ियों में <em>&#8216;स्कीइंग&#8217;</em> करने में आता है, वह अन्य किसी गतिविधि में नहीं।</p>
<p>वायुयान से अपने पहले परिचय के बारे में याद करते हुए जेआरडी कहते हैं, <em>&#8216;बचपन में, जब मेरी उम्र 7-8 वर्षों की रही होगी, तब फ्रांस में प्रथम विश्व युद्ध के पहले मेरा वायुयानों से सरोकार हुआ था।&#8217;</em> वायुयान और जेआरडी के आपसी रिश्तों को अगर &#8216;पहली नजर में प्यार&#8217; कहा जाए तो कदापि अतिशयोक्ति नहीं होगी। हां, सामान्य तौर पर घटने के बजाय समय के साथ-साथ यह &#8216;<em>प्यार</em>&#8216; बढ़कर &#8216;<em>दीवानगी</em>&#8216; की हद तक पहुंच गया था। जेआरडी के पिता रतनजी दादाभाई टाटा का फ्रांस में नार्मेन्डी के पास इंग्लिश चैनल के तट पर हार्डिलोट कस्बे में &#8216;<em>लॉ-मस्कोट</em>&#8216; नामक एक छोटा-सा ग्रीष्मकालीन निवास था। इत्तिफाक से, इंग्लिश चैनल को वायुयान से पार करने वाले सबसे पहले व्यक्ति लुई ब्लेरियट ने भी छुटि्‌टयां बिताने के लिए अपना एक घर वहां बनाया था। पड़ोसी होने की वजह से दोनों परिवारों के सदस्यों, खासकर बच्चों में अच्छी दोस्ती हो गई थी।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">इसी आगा खां प्रतियोगिता के दौरान जेआरडी ने अपनी खिलाड़ी भावना का अप्रतिम परिचय दिया<span></span></div>
<p>कभी-कभी ब्लेरियट के वायुयान वहीं समुद्र तट पर उतरते थे। उन्हें उड़ाने वाला &#8216;पायलट&#8217; ब्लेरियट तो नहीं, बल्कि अडोल्फ पीगोड था, जिसने वायुयान से जांबाज कलाबाजियां प्रदर्शित कर सभी को हतप्रभ कर दिया था। इसी जांबाज उड़ाकू के करतबों को नियमित तौर पर देखते हुए बालक जहांगीर के मन में भी &#8216;<em>प्लेन</em>&#8216; में घूमने की इच्छा प्रबल होती गई। प्रथम विश्व युद्ध के बाद फ्रांस में कई &#8216;<em>पायलट</em>&#8216; अपने वायुयानों में नागरिकों को बैठाकर हवाई यात्रा का आनंद (जॉय-राइड) दिया करते थे। ऐसी ही एक हवाई &#8216;<em>जॉय राइड</em>&#8216; के लिए बालक जहांगीर ने एक बार अपने पिता से जिद पकड़ ली। बालहठ के आगे पिता आर.डी. टाटा को न चाहते हुए भी हामी भरनी पड़ी। &#8216;उस दिन मैं पहली बार वायुयान में बैठकर आसमान में उड़ा था। मुझे पूरा विश्वास है कि जब तक हमारा प्लेन सकुशल उतर नहीं गया, मेरे पिताजी ने सिर्फ भगवान को ही याद किया होगा। उस वक्त मैं सिर्फ 15 वर्ष का था और मेरा विचार पक्का हो चुका था- मैं पायलट (विमान चालक) बनना चाहता था।&#8217;</p>
<p>जिस वक्त जे.आर.डी. फ्रांस में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, उसी समय भारत में एक दूरदर्शी व्यवसायी और समाजसेवी, सर विक्टर सेसून के प्रयासों से बंबई फ्लाइंग क्लब की शुरुआत भी हो चुकी थी। मछुआरों की बस्ती जुहू के निकट अरब महासागर के तट पर हवाई पट्‌टी तैयार की गई। ब्रिटिश जलसेना से जुड़े रहे पायलट ई.डी. कमिंग्स को बंबई फ्लाइंग क्लब में प्रशिक्षक नियुक्त किया गया। जिस समय जे.आर.डी. फ्रांस से भारत आए, तब तक कमिंग्स के प्रशिक्षण में कुछ इच्छुकों का विमान चालन प्रशिक्षण प्रारंभ हो चुका था।</p>
<p><strong>22 जनवरी 1929</strong> को 25 वर्षीय युवक जे.आर.डी. ने बंबई फ्लाइंग क्लब में अपनी पहली &#8216;<em>पायलट लॉग बुक</em>&#8216; (चालक द्वारा रखा जाने वाला उड़ान के समय, स्थान, तारीख और विशेष घटनाओं का लेखा-जोखा) प्राप्त की और उसी दिन <em>&#8216;वी.टी.-ए.ए.ई.&#8217;</em> नामांकन वाले &#8216;डी-हैवीलैंड मोथ&#8217; विमान में ई.डी. कमिंग्स ने जेआरडी को 20-30 मिनट की उड़ान के दौरान पहला पाठ सिखाया। अपनी पहली प्रशिक्षण उड़ान के बाद सिर्फ एक ही पखवाड़ा बीतते वह स्वर्णिम दिन आ गया, जो जे.आर.डी. के सिर्फ &#8216;<em>ऐविएशन</em>&#8216; पहलू ही नहीं, वरन्‌ 88 बसंत के पूरे जीवन का चरमोत्कर्ष था। महज 3 घंटे 45 मिनट की युगल प्रशिक्षण उड़ानों के बाद अमेरिकन प्रशिक्षक ए.ई. एल्टन और कमिंग्स ने जे.आरडी. को अपनी पहली &#8216;सोलो&#8217; (एकल) उड़ान की इजाजत दे दी।</p>
<p><strong>3 फरवरी 1929</strong>, पूर्वाह्न, जुहू हवाई पट्‌टी के पूर्वी &#8216;<em>टू-सेवन</em>&#8216; छोर से <em>&#8216;डी.एच. मोथ&#8217;</em> विमान पश्चिम की ओर मुड़कर उड़ान भरने के लिए तैयार खड़ा था। विमान में सवार एकमात्र युवक, जो कि उसका चालक भी था, ने मानसिक तौर पर अपने सभी विमान चालन के पाठों को याद किया, मंद गति से विमान को &#8216;रन-वे&#8217; पर आगे बढ़ाते हुए &#8216;<em>कंट्रोल-स्टिक</em>&#8216; पर संचालन बनाए रखते हुए जमीन के स्पर्श से विलग होते हुए विमान को नभ-पथ पर अग्रसर कर दिया।</p>
<p>10 मिनट की पहली एकल उड़ान के बाद जब विमान चालक ने अपने प्रशिक्षक की ओर देखा तो उनकी आंखों से उसे संतोष दिखाई पड़ा। जेआरडी की उस 10 मिनट की संक्षिप्त &#8216;<em>सोलो</em>&#8216; उड़ान के दूरगामी महत्व का सबसे उपयुक्त वर्णन शायद चंद्र-विजयी नील आर्मस्ट्रांग के उस ध्रुव-वाक्य से मिला-जुला हो सकता है, &#8216;एक इंसान के लिए एक छोटी-सी उड़ान थी, मगर इंसानियत के लिए वह एक दूरगामी हवाई सफर था।&#8217; अगले सात दिनों तक जेआरडी ने एकल उड़ानें भरकर अपना अनुभव व विश्वास बढ़ाया और 10 फरवरी 1929 को 45 मिनट की &#8216;सोलो&#8217; उड़ान के पश्चात विमान चालक (पायलट) का लाइसेंस प्राप्त करने की पात्रता अर्जित कर ली थी।</p>
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		<title>जे.आर.डी. गुणा-भाग फ्रेंच में ही करते हैं</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:34:50 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[इतने वर्षों तक भारत में रहने के बावजूद फ्रांस का यह अवशेष तो बाकी रह ही गया। जब भी जे.आर.डी. को मानसिक गणित करने की जरूरत पड़ती है तो वे अंकों के साथ अंग्रेजी के बजाय फ्रेंच में गुणा-भाग करते हैं। जे.आर.डी. के शरीर की आयु भले ही 88 वर्ष हो गई हो, मन से वे अभी भी जवान हैं। वैसे, जे.आर.डी. अपनी शारीरिक तंदुरुस्ती का पूरा ख्याल रखते हैं। 41 वर्ष की आयु में जब अधिकांश लोग शारीरिक श्रम [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2021" alt="जे.आर.डी. गुणा-भाग फ्रेंच में ही करते हैं " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/621.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">इ</span>तने वर्षों तक भारत में रहने के बावजूद फ्रांस का यह अवशेष तो बाकी रह ही गया। जब भी जे.आर.डी. को मानसिक गणित करने की जरूरत पड़ती है तो वे अंकों के साथ अंग्रेजी के बजाय फ्रेंच में गुणा-भाग करते हैं।</p>
<p>जे.आर.डी. के शरीर की आयु भले ही 88 वर्ष हो गई हो, मन से वे अभी भी जवान हैं। वैसे, जे.आर.डी. अपनी शारीरिक तंदुरुस्ती का पूरा ख्याल रखते हैं। 41 वर्ष की आयु में जब अधिकांश लोग शारीरिक श्रम से पीठ फेरने लगते हैं, उस उम्र में जे.आर.डी. ने &#8216;<em>स्कीइंग</em>&#8216; करना शुरू किया और फिर जो सिलसिला शुरू हुआ वो अनवरत अगले 44 वर्षों</p>
<div class="simplePullQuoteRight">41 वर्ष की आयु में जब अधिकांश लोग शारीरिक श्रम से पीठ फेरने लगते हैं, उस उम्र में जे.आर.डी. ने &#8216;<em>स्कीइंग</em>&#8216; करना शुरू किया और फिर जो सिलसिला शुरू हुआ वो अनवरत अगले 44 वर्षों तक जारी रहा<span></span></div>
<p>तक जारी रहा। 85 वर्ष की आयु तक हर वर्ष तीन सप्ताह के लिए जे.आर.डी. योरप में आल्पस की बर्फीली पहाड़ियों में &#8216;<em>स्कीइंग</em>&#8216; का लुत्फ उठाने अवश्य जाते थे। घर पर जे.आर.डी. ने अपने प्रसाधन कक्ष में वर्जिश का साजो-सामान इकट्‌ठा कर रखा था। यूं तो जे.आर.डी. को गोल्फ भी बहुत पसंद था, और हर सप्ताहांत पर वे गोल्फ अवश्य खेलने जाते थे, परंतु अपनी पत्नी थेली को लकवा हो जाने के बाद वह गतिविधि भी बंद कर दी। &#8216;<em>अब न जाने हमारा कितना साथ बाकी है, इसलिए मैं ज्यादा से ज्यादा समय अपनी पत्नी के साथ बिताना चाहता हूं।</em>&#8216;</p>
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		<title>जीडी-जे.आर.डी.: इस &#8216;जहान&#8217; में ऐसे &#8216;बिरले&#8217; ही आते हैं!</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:33:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[जमशेदजी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[जी.डी. बिड़ला]]></category>
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		<category><![CDATA[टाटा-बिड़ला]]></category>
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		<description><![CDATA[अंग्रेजी के एक सुप्रसिद्ध उपन्यासकार इरविंग वालेस ने एक बेहतरीन काल्पनिक उपन्यास लिखा है &#8216;केन एंड एबल।&#8217; संक्षिप्त में उपन्यास का कथानक कुछ इस प्रकार है कि अमेरिका में दो युवक एक ही समय में बड़े हो रहे हैं- इसके अलावा उनके बीच हर मायने में असमानता है; शिक्षा, परिवेश, परिवार, माहौल आदि। फिर भी, एक दिन दोनों देश के सबसे बड़े व्यवसायी बन जाते हैं। अत्यंत विलग परिस्थितियों से समान ऊंचाइयों पर पहुंचने की इस कहानी के लेखक को [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2019" alt="जीडी-जे.आर.डी.: इस 'जहान' में ऐसे 'बिरले' ही आते हैं! " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/611.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">अं</span>ग्रेजी के एक सुप्रसिद्ध उपन्यासकार इरविंग वालेस ने एक बेहतरीन काल्पनिक उपन्यास लिखा है &#8216;केन एंड एबल।&#8217; संक्षिप्त में उपन्यास का कथानक कुछ इस प्रकार है कि अमेरिका में दो युवक एक ही समय में बड़े हो रहे हैं- इसके अलावा उनके बीच हर मायने में असमानता है; शिक्षा, परिवेश, परिवार, माहौल आदि। फिर भी, एक दिन दोनों देश के सबसे बड़े व्यवसायी बन जाते हैं।</p>
<p>अत्यंत विलग परिस्थितियों से समान ऊंचाइयों पर पहुंचने की इस कहानी के लेखक को वैसे कल्पना की भी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती। उसे सिर्फ भारत आकर जी.डी. बिड़ला-जे.आर.डी. से मिल लेना था। परिस्थितियों में पूरी असमानता के बावजूद प्रगति और प्रसिद्धि की समान ऊंचाइयों को छूने वाले ये दो शख्स आज उस मुहावरे के पीछे का पूरा अर्थ है, जहां भारत में संपदा, समृद्धि और उद्योगों का पर्याप्त शब्द &#8216;<em>टाटा-बिड़ला</em>&#8216; बन गया है।</p>
<p>जिस समय तक जी.डी. बिड़ला (घनश्यामदास बिड़ला) के दादा शिवनारायण बिड़ला 10 रुपए माहवार में मुनीम की नौकरी कर रहे थे, उस समय एक तो जमशेदजी टाटा नागपुर में एम्प्रेस मिल्स की शुरुआत कर चुके थे। अगर सीधे जी.डी. और जे.आर.डी. पर आएं, <strong>तो दोनों की भिन्नताएं देखिए।</strong></p>
<p><strong>जी.डी. का जीवन</strong></p>
<div class="simplePullQuoteRight">परिस्थितियों में पूरी असमानता के बावजूद प्रगति और प्रसिद्धि की समान ऊंचाइयों को छूने वाले ये दो शख्स आज उस मुहावरे के पीछे का पूरा अर्थ है, जहां भारत में संपदा, समृद्धि और उद्योगों का पर्याप्त शब्द &#8216;टाटा-बिड़ला&#8217; बन गया है<span></span></div>
<p>जी.डी. का जन्म राजस्थान के पिलानी गांव में हुआ और जे.आर.डी. का सभ्यता की नगरी पेरिस में। जी.डी. की प्राथमिक शिक्षा सिर्फ ग्यारह वर्ष की उम्र तक ही ग्रामीण पाठशाला में सीमित रही, वहीं जे.आर.डी. भी पढ़े तो स्कूल ही में परंतु फ्रांस, भारत, जापान और इंग्लैंड में। दोनों ही प्रारंभिक दिनों से ही व्यवसाय में कूद पड़े। बिड़ला घराने की व्यावसायिक शुरुआत तो टाटा घराने के बहुत बाद हुई, लेकिन कुछ ही वर्षों में उन्होंने उद्योगों की संख्या में टाटा घराने को पछाड़ दिया।</p>
<p>यहां यह उल्लेखनीय है कि आजादी के तुरंत बाद और वर्तमान में भारत के अग्रगण्य औद्योगिक समूहों की सूची बनाई जाए, तो शायद टाटा-बिड़ला के अलावा और कोई भी नाम दोनों ही सूचियों में नहीं मिलेगा। आजादी के समय उद्योगपतियों में बांगड़, सोमानी, श्रीराम, लालभाई, डालमिया आदि प्रमुख थे, तो आज ये स्थान थापर, सिंघानिया, अंबानी ने ले लिए हैं। स्थायी हैं तो सिर्फ दो- &#8216;<em>टाटा-बिड़ला।</em>&#8216; जी.डी. जे.आर.डी. की बनिस्बत महात्मा गांधी और कांग्रेस के काफी करीब थे, गांधीजी उन्हें अपना छोटा भाई-सा ही मानते थे। जे.आर.डी. भी महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थे, लेकिन कभी भी वे गांधीजी के बहुत करीब नहीं आए। 1944 में सम्राज्ञी मेरी द्वारा दोनों में किसी एक के साथ भोजन करने की चाह व्यक्त करने पर तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड वेवल ने एक खत में लिखा था, <em>&#8216;जी.डी. जे.आर.डी. के बजाय भोजन के लिए ज्यादा रुचिकर मेहमान होंगे। टाटा हैं तो सभ्य युवक, लेकिन बोलते बहुत कम हैं। वहीं जी.डी. दुनियाभर की बातें कर सकते हैं।&#8217;</em></p>
<p><strong>भारत की भावी योजना का प्रारूप</strong></p>
<p>इसी वर्ष 1944 में जे.आर.डी. व जी.डी. ने एक साथ बैठकर भारत की भावी योजना का प्रारूप तैयार किया (देखें आलेख बॉम्बे प्लॉन)। वर्ष 1946 में दोनों के बीच नागरिक उड्‌डयन को लेकर कुछ विवाद छिड़ गया, जिस पर दोनों ने एक-दूसरे को कई पत्र लिखे। जे.आर.डी. की सोच यह थी कि भारत में नागरिक विमानन की सीमित संभावनाएं हैं, उसमें अगर कई विमान सेवाएं घुस गईं तो सभी को नुकसान होगा। वहीं दूसरी ओर जी.डी. बिड़ला को भारत एयरवेज के जरिये मुनाफे का एक अच्छा स्रोत और उड्‌डयन में टाटा के आधिपत्य को समाप्त करने का अवसर दिखाई दिया। अंततः हुआ वही, जिसकी जे.आर.डी. को आशंका थी; सभी विमान सेवाओं का राष्ट्रीयकरण हो गया।</p>
<p>औद्योगिक क्षेत्र में दोनों ही की इकाइयों ने भारतीय व्यवसाय-वाणिज्य में नए पन्ने जोड़े हैं। वैसे जहां जे.आर.डी. की कार्यप्रणाली अत्यंत &#8216;<em>जनतांत्रिक</em>&#8216; और खुली थी, वहीं जी.डी. अत्यंत पैनी नजर से हर इकाई पर नजर रखते थे। एक बड़ा महत्वपूर्ण फर्क था दोनों की शैलियों में- जहां बिड़ला उद्योगों के प्रबंधकों में सर्वोच्च प्राथमिकता कंपनी से भी ऊपर मालिक के प्रति वफादारी की थी, वहीं टाटा घराने में सिर्फ व्यक्ति की काबिलियत और अपनी कंपनी के प्रति निष्ठा महत्वपूर्ण रही है।</p>
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		<title>बॉम्बे प्लान</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:31:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[घनश्यामदास बिड़ला]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी.टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा-बिड़ला प्लान]]></category>
		<category><![CDATA[बॉम्बे प्लान]]></category>

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		<description><![CDATA[द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम वर्षों तक यह साफ दिखाई देने लगा था कि अंग्रेजों के भारत पर शासन के दिन अब पूरे हो चुके थे। उन्हीं दिनों दूरदर्शी जे.आर.डी. टाटा को यह विचार सताने लगा था कि आजादी के बाद देश की प्राथमिक आवश्यकता औद्योगीकरण और आर्थिक प्रगति की रहेगी। उस जटिल समस्या से जूझने के लिए जे.आर.डी. ने वर्ष 1944 में ही देश के अग्रणी उद्योगपतियों को आमंत्रित किया, ताकि वे सभी आजादी के बाद के आर्थिक कदमों [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2087" alt="बॉम्बे प्लान " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/601.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">द्</span>वितीय विश्व युद्ध के अंतिम वर्षों तक यह साफ दिखाई देने लगा था कि अंग्रेजों के भारत पर शासन के दिन अब पूरे हो चुके थे। उन्हीं दिनों दूरदर्शी जे.आर.डी. टाटा को यह विचार सताने लगा था कि आजादी के बाद देश की प्राथमिक आवश्यकता औद्योगीकरण और आर्थिक प्रगति की रहेगी। उस जटिल समस्या से जूझने के लिए जे.आर.डी. ने वर्ष 1944 में ही देश के अग्रणी उद्योगपतियों को आमंत्रित किया, ताकि वे सभी आजादी के बाद के आर्थिक कदमों का मार्ग पहले ही से निर्धारित कर लें। जे.आर.डी. टाटा ने इस हेतु घनश्यामदास बिड़ला, कस्तूरभाई लालभाई, सर पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और सर श्रीराम को एक साथ विचार-विमर्श का न्यौता दिया।</p>
<p>जे.आर.डी. सहित इन पांच उद्योगपतियों के अलावा तीन प्रखर बुद्धिजीवी भी उस &#8216;<em>थिंक टैंक</em>&#8216; में शामिल हुए। वे तीनों ही टाटा घराने से संबद्ध थे- सर अरदेशी दलाल, ए.डी. श्रॉफ व डॉ. जॉन मथाई। इन आठों अनुभवी, भविष्यदृष्टा और व्यापक सोच वाले व्यक्तियों की चाह एक ही थी- आजादी के बाद भारत को आर्थिक प्रगति की राह पर प्रशस्त करना। जब उस &#8216;समिति&#8217; की पहली बैठकों में तो कोई निश्चित लक्ष्य या दिशा-निर्धारण नहीं हो सका, तब जी.डी. बिड़ला ने यह सुझाव दिया कि आजादी के बाद भारत को क्या करना चाहिए, इस प्रश्न के संभावित उत्तर पर अटकलें लगाने के बजाय प्राथमिकता इस बात को दी जानी चाहिए कि आजादी के बाद हमारे नागरिकों की भोजन, रहवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की जरूरतें क्या होंगी और उसी को आधार मानकर उनकी पूर्ति हेतु कार्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>उसी का दूसरा नाम ‘बॉम्बे प्लान’&#8230;</strong></p>
<p>अंततः जो दस्तावेज तैयार किया गया, वह उसी आधार पर था। &#8216;<em>भारत के आर्थिक विकास की योजना</em>&#8216; नाम से जो ऐतिहासिक दस्तावेज उस समिति ने जारी किया, उसी का दूसरा नाम &#8216;<em>बॉम्बे प्लान</em>&#8216; अथवा &#8216;टाटा-बिड़ला प्लॉन&#8217; पड़ गया। जनवरी 1944 में सार्वजनिक तौर पर जारी इस योजना की पूरी &#8216;ड्राफ्टिंग&#8217; आठ सदस्यीय समिति के एक सदस्य, डॉ. जॉन मथाई ने ही की थी।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">जनवरी 1944 में सार्वजनिक तौर पर जारी इस योजना की पूरी &#8216;<em>ड्राफ्टिंग</em>&#8216; आठ सदस्यीय समिति के एक सदस्य, डॉ. जॉन मथाई ने ही की थी<span></span></div>
<p>आज पीछे मुड़कर देखें तो उस महत्वाकांक्षी योजना में उसके प्रणेताओं की विस्तृत सोच की झलक दिखाई पड़ती है। 15 वर्ष की भावी योजना को तीन पंचवर्षीय योजनाओं में विभक्त किया गया था। सभी नागरिकों के लिए पर्याप्त भोजन, रहवास, कपड़ा और मूलभूत शिक्षा को योजना के मुख्य उद्देश्य मानकर भारत के हर गांव में एक प्रशिक्षित डॉक्टर और दो नर्सों की सेवाओं का प्रावधान था। उस समय के मुद्रा मूल्य के आधार पर योजना में प्रथम पंचवार्षिकी में 1400 करोड़ रुपए, द्वितीय में 2900 करोड़ रुपए और तृतीय में 4700 करोड़ रुपए- इस प्रकार कुल 15 वर्षों के अंतराल में 10,000 करोड़ रुपए के खर्च का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इसी के साथ बुनियादी उद्योग, उपभोक्ता वस्तु आधारित उद्योग, कृषि, शिक्षा, रहवास और संचार माध्यमों सहित सभी मुख्य जरूरतों पर खर्च की जाने वाली राशि का विवरण था। यही नहीं, योजना में इस 10,000 करोड़ रुपए की राशि को एकत्र करने हेतु विभिन्न बाह्य एवं आंतरिक साधनों का भी जिक्र था।</p>
<p>हालांकि योजना के प्रारूप को तैयार करने वाली समिति के सभी सदस्यों का यह विचार था कि उस &#8216;प्लान&#8217; के सफल क्रियान्वयन हेतु देश में स्वयं की राष्ट्रीय सरकार का सत्ता में होना बहुत लाभदायक रहेगा, फिर भी गरीबी-उन्मूलन और जीवन स्तर सुधार के लिए योजना के क्रियान्वयन में सरकार के स्वरूप बदलने का इंतजार करना देश के लिए अहितकारी होगा। उस योजना का एक ओर जहां &#8216;दूरदर्शिता और व्यापक सुझावों&#8217; के लिए स्वागत किया गया, वहीं दूसरी ओर उसको पूंजीवादी उद्योगपतियों की एक सोची-समझी &#8216;चाल&#8217; कहकर भी आलोचना की गई। वैसे योजना का सर्वाधिक विवादास्पद पक्ष था- उद्योग के लिए पचास प्रतिशत रखते हुए कृषि के क्षेत्र के लिए कुल रकम का सिर्फ दस प्रतिशत, जो कि भारत की तत्कालीन कृषि-बहुल अर्थव्यवस्था के लिए एक दिवास्वप्न-सा था।</p>
<p>वैसे &#8216;<em>बॉम्बे प्लान</em>&#8216; के प्रकाशन के कुछ ही दिनों में सर अरदेशी दलाल को वाइसराय की कार्यकारी परिषद में स्थान ग्रहण कर &#8216;<em>योजना विभाग</em>&#8216; के श्रीगणेश करने का सरकार द्वारा आमंत्रण मिला, जिसे उन्होंने स्वीकार किया। &#8216;<em>बॉम्बे प्लान</em>&#8216; का दूसरा खंड &#8216;विपणन-राज्यों की भूमिका&#8217; 1944 में ही दिसंबर माह में प्रकाशित हुआ, जिसके प्रारूप को लिखने में भी डॉ. जॉन मथाई ने ही उल्लेखनीय भूमिका अदा की है। भारत में परंपरागत योजना की शुरुआत तो सन 1951-52 में पहली योजना के शुभारंभ के साथ हुई, किंतु आजादी के भी तीन वर्ष पहले तैयार किए गए &#8216;बॉम्बे प्लान&#8217; के सुझाव कितने सही थे, इसका जीवंत उदाहरण तीस साल बाद भी मिलता रहा।</p>
<p>पांचवीं योजना के पहले योजना आयोग ने पहली चारों पंचवर्षीय योजनाओं की प्राथमिक कमजोरी पर रोशनी डालते हुए टिप्पणी की थी कि हमारे यहां योजना का पूरा ध्यान सिर्फ सकल आर्थिक उन्नति और विकास की ओर रहता है, जबकि हमारी पहली जरूरत है- विकास का आबादी के सीमित नहीं, अपितु सभी तबकों में व्यापक प्रभाव। यह आश्चर्यजनक सत्य है कि वर्षों पूर्व तैयार किए गए &#8216;बॉम्बे प्लान&#8217; में इसी बात पर जोर दिया गया था कि महज अंकों और सांख्यिकी में विकास दर में वृद्धि पर संतोष धारण करने के बजाय विकास कार्यक्रमों से समाज के आर्थिक रूप से विपन्न वर्गों तक समुचित लाभ पहुंचाना ही योजना की आधारशिला होनी चाहिए। वर्तमान स्थितियों को देखकर अगर जे.आर.डी. को क्षोभ और निराशा से पीड़ा होती है तो वह जायज ही है। आखिर उन्होंने तो और कल्पनाशील राष्ट्रभक्तों के साथ मिलकर देश की समुचित प्रगति का समग्र और महत्वाकांक्षी प्रारूप हमें आजादी से पहले ही थमा दिया था; पर हमने उसकी कोई कदर नहीं जानी।</p>
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