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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल &#187; कारोबार की दुनिया | व्यापार जगत</title>
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		<title>भारत में विदेशी निवेशकों के लिए सुनहरा मौका बुनियादी ढाँचे में निवेश की संभावनाएँ</title>
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		<pubDate>Wed, 15 Sep 2010 11:14:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारोबार की दुनिया]]></category>
		<category><![CDATA[आर्थिक मंदी]]></category>
		<category><![CDATA[इंडिया इन्वेस्टमेंट फोरम]]></category>
		<category><![CDATA[ऊर्जा उत्पादन]]></category>
		<category><![CDATA[परिवहन मंत्रालय]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[विदेशी निवेश]]></category>

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		<description><![CDATA[भारत में बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए अगले पाँच वर्षों में 15 खरब डॉलर निवेश की योजना है। इसमें से 500 अरब डॉलर का निवेश निजी क्षेत्र से संभावित है। भारत की प्रगति में शरीक होने का विदेशी निवेशकों के लिए यह सुनहरा अवसर है। हाल ही में न्यूयॉर्क में आयोजित इंडिया इन्वेस्टमेंट फोरम में ये बातें भारत सरकार के कैबिनेट मंत्रियों और शीर्षस्थ अधिकारियों ने कहीं। परिवहन मंत्री कमलनाथ ने कहा कि अगले पाँच सालों तक रोजाना 20 [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1744" alt="भारत में विदेशी निवेशकों के लिए सुनहरा मौका बुनियादी ढाँचे में निवेश की संभावनाएँ" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2013/01/138.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">भा</span>रत में बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए अगले पाँच वर्षों में 15 खरब डॉलर निवेश की योजना है। इसमें से 500 अरब डॉलर का निवेश निजी क्षेत्र से संभावित है। भारत की प्रगति में शरीक होने का विदेशी निवेशकों के लिए यह सुनहरा अवसर है। हाल ही में न्यूयॉर्क में आयोजित इंडिया इन्वेस्टमेंट फोरम में ये बातें भारत सरकार के कैबिनेट मंत्रियों और शीर्षस्थ अधिकारियों ने कहीं।</p>
<p>परिवहन मंत्री कमलनाथ ने कहा कि अगले पाँच सालों तक रोजाना 20 किमी सड़क बनाने की योजना है। अगर भारत में सड़क एक उत्पाद है, तो उसकी माँग के बारे में तो सोचना निरर्थक है। उनके साथ सड़क और परिवहन मंत्रालय के उच्च अधिकारियों ने भी विदेशी निवेशकों को भारत में सड़क निर्माण के बारे में अवगत कराया।</p>
<p><b>विकास की ऊर्जा : </b>ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे के अनुसार अगले 5 वर्षों में 80 हजार मेगावॉट ऊर्जा उत्पादन की योजना है। यानी पिछले 22 वर्षों में ऊर्जा उत्पादन को सिर्फ अगले 5 वर्षों में दोहराना है। इसके लिए परंपरागत और नए संयंत्रों का भारत में भविष्य उज्ज्वल है।</p>
<div class="simplePullQuoteRightPerpal">ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे के अनुसार अगले 5 वर्षों में 80 हजार मेगावॉट ऊर्जा उत्पादन की योजना है<span></span></div>
<p><b>विकास का मतलब :</b> प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव टीकेए नायर के अनुसार भारत में प्रगति का सबसे बड़ा मापदंड है कि वहाँ सकल विकास हो, जिसका प्रभाव और परिणाम समाज के हर तबके को महसूस हो। सिर्फ कुछ तबकों तक सीमित प्रगति और उन्नति से पूरे भारत का विकास संभव नहीं है।</p>
<p><b>नहीं है साख की समस्या :</b> सेबी के प्रमुख सीवी भावे ने बताया कि आर्थिक मंदी के बावजूद भारत के आर्थिक बाजार में साख की समस्या कभी नहीं आई।</p>
<p><b>निजी क्षेत्र में उत्साह :</b> मुख्य आयोजक और कोटक महिंद्रा के प्रमुख उदय कोटक के अनुसार वर्ष 2005 से 2008 तक भारत में वार्षिक विकास दर 9 से 10 प्रतिशत रही। इस वर्ष यह 6 से 7 प्रतिशत रहेगी। विकास दर 9 से 10 प्रश पहुँचाने के लिए सरकार व निजी क्षेत्र को प्रयास करना होगा।</p>
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		<title>एक करोड़ हिन्दुस्तानी 100 करोड़ लोगों की तकदीर बदल सकते हैं – मुकेश अंबानी</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Nov 2004 10:32:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारोबार की दुनिया]]></category>
		<category><![CDATA[अनिल अंबानी]]></category>
		<category><![CDATA[टाई वार्षिक सम्मेलन]]></category>
		<category><![CDATA[धीरूभाई अंबानी]]></category>
		<category><![CDATA[रिलायंस समूह]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदुस्तान]]></category>

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		<description><![CDATA[आने वाले 20 सालों में भारत का सकल राष्ट्रीय उत्पादन 500 मिलियन डॉलर से दोगुना बढ़ जाएगा। अगले 10 सालों में अगर 1 करोड़ भारतीय 15 डॉलर घंटे के हिसाब से 2000 घंटे साल के काम करेंगे, तो इससे देश का नक्शा ही बदल जाएगा। मुझे पूरा विश्वास है कि इक्कीसवीं शताब्दी ज्ञान, शक्ति और भारत की ही है।” यह विचार थे रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी के, जो उन्होंने शनिवार को न्यूयॉर्क में टाई के वार्षिक सम्मेलन में [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2061" alt="एक करोड़ हिन्दुस्तानी 100 करोड़ लोगों की तकदीर बदल सकते हैं – मुकेश अंबानी " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2004/11/115.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">आ</span>ने वाले 20 सालों में भारत का सकल राष्ट्रीय उत्पादन 500 मिलियन डॉलर से दोगुना बढ़ जाएगा। अगले 10 सालों में अगर 1 करोड़ भारतीय 15 डॉलर घंटे के हिसाब से 2000 घंटे साल के काम करेंगे, तो इससे देश का नक्शा ही बदल जाएगा। मुझे पूरा विश्वास है कि इक्कीसवीं शताब्दी ज्ञान, शक्ति और भारत की ही है।”</p>
<p>यह विचार थे रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी के, जो उन्होंने शनिवार को न्यूयॉर्क में टाई के वार्षिक सम्मेलन में दोपहर भोजन के समय मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए। सम्मेलन में भारतीय और अमेरिकी मूल के कई व्यावसायिक और प्रोफेसनल्स शरीक थे। अपने एक घंटे के ‍ओजस्वी भाषण और उसके बाद प्रश्नोत्तर में मुकेश अंबानी ने उनके छोटे भाई अनिल अंबानी से तथा कथित ‘<em>मतभेद</em>’ और उससे रिलायंस समूह के भविष्य पर होने वाले संभावित असर के बारे में कोई बात नहीं की।</p>
<p><strong>धीरूभाई अंबानी क्या सोचते थे &#8230;</strong></p>
<p>रिलायंस के शुरू से लेकर वर्तमान और भविष्य पर प्रकाश डालते हुए मुकेश अंबानी ने कई बार अपने पिता और रिलायंस के संस्थापक स्वर्गीय ‍धीरूभाई अंबानी को याद किया। उन्होंने कहा कि धीरूभाई का यही मानना था कि जो हिन्दुस्तान के लिए अच्छा है, वही रिलायंस समूह के लिए भी अच्छा है। अपने आपको एमएबीएफ (मैट्रिक एपियर्ड बट फेल्ड) कहलाने वाले धीरूभाई ने उन्हें सदा ही विशाल सपने देखना और फिर उन्हें साकार करने की रिलायंस समूह को प्रेरणा देता है। 22 वर्षों के सफर में रिलायंस समूह की वार्षिक बिक्री 22 बिलियन डॉलर हो गई है, लेकिन हर तीन-चार सालों में समूह का आकार दोगुना हो जाने की परम्परा आने वाले सालों में भी बरकरार रहेगी। प्रसार और सूचना प्रौद्योगिकी के संगम से रिलायंस इन्फोकॉम भारत में एक नई क्रांति ले आएगा। भारतीयों के दिमाग की क्षमता ही भारत का सबसे बड़ा धन है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">रिलायंस समूह की वार्षिक बिक्री 22 बिलियन डॉलर हो गई है, लेकिन हर तीन-चार सालों में समूह का आकार दोगुना हो जाने की परम्परा आने वाले सालों में भी बरकरार रहेगी<span></span></div>
<p>धर्म-अध्यात्म और व्यवसाय के संबंधों पर एक प्रश्न के जवाब में मुकेश अंबानी ने कहा कि भारत में सरस्वती और लक्ष्मी दोनों ही को पूजनीय माना जाता है, यही भारतीय परम्परा में ज्ञान और वैभव; दोनों ही पूज्य है। भारत में रोजगार बढ़ाने को भारत की प्राथमिक जरूरत बताते हुए श्री अंबानी ने कहा कि भारत से बाहर बसे 2 करोड़ प्रवासी भारतीय भी स्वदेश की प्रगति में महती भूमिका निभा सकते हैं। जिस प्रकार पिछली शताब्दी ने गांधी और नेहरू ने विदेशों से लौटकर देश में राजनीतिक स्वतंत्रता की लहर को जगाया, उसी प्रकार वर्तमान युग में प्रवासी भारतीय हिंदुस्तान में आर्थिक स्वतंत्रता की लहर के सूत्रधार बन सकते हैं। सम्मेलन की शुरुआत विश्व प्रसिद्ध वित्तीय संस्थान गोल्डमैन सैक्स के चेयरमैन हैंक पॉलसन के भाषण से हुई। अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ‘<em>सुदृढ़</em>’ करार देते हुए भी उन्होंने अमेरिकी डॉलर के और अधिक अवमूल्यन से इंकार नहीं किया। आने वाले सालों में चीन और भारत विश्व के दो महत्वपूर्ण आर्थिक शक्तियों के रूप में जरूर उभरकर आएंगे।</p>
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		<title>एलेक पद्‌मसी की &#8216;डबल लाइफ&#8217;</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Apr 2000 13:39:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारोबार की दुनिया]]></category>
		<category><![CDATA[ए डबल लाइफ]]></category>
		<category><![CDATA[एडवरटाइजिंग मैन आफ द सेंचुरी]]></category>
		<category><![CDATA[एलेक पद्‌मसी]]></category>
		<category><![CDATA[पद्‌मश्री]]></category>
		<category><![CDATA[विज्ञापन दुनिया]]></category>

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		<description><![CDATA[भारत में विज्ञापन की दुनिया के बेताज सरताज एलेक पद्‌मसी को पिछले दिनों भारत सरकार ने पद्‌मश्री से सम्मानित किया। ठीक उसके बाद मुंबई के विज्ञापन जगत में चर्चित &#8216;ऐबी&#8217; अवॉर्ड्‌ज में एलेक पद्‌मसी को भारत का &#8216;एडवरटाइजिंग मैन आफ द सेंचुरी&#8216; के अलंकरण से पुरस्कृत किया गया। आखिर क्या शख्सियत हैं एलेक, जिनके साथ न जाने कितने तमगे, किस्से और उपनाम जुड़े हैं? काफी लंबे समय तक भारत की सबसे बड़ी एड एजेंसी &#8216;लिंटास&#8216; इंडिया में कर्ताधर्ता तीन महिलाओं [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1551" alt="एलेक पद्‌मसी की 'डबल लाइफ' " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/04/51.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">भा</span>रत में विज्ञापन की दुनिया के बेताज सरताज एलेक पद्‌मसी को पिछले दिनों भारत सरकार ने पद्‌मश्री से सम्मानित किया। ठीक उसके बाद मुंबई के विज्ञापन जगत में चर्चित <em>&#8216;ऐबी&#8217;</em> अवॉर्ड्‌ज में एलेक पद्‌मसी को भारत का &#8216;<em>एडवरटाइजिंग मैन आफ द सेंचुरी</em>&#8216; के अलंकरण से पुरस्कृत किया गया। आखिर क्या शख्सियत हैं एलेक, जिनके साथ न जाने कितने तमगे, किस्से और उपनाम जुड़े हैं?</p>
<p>काफी लंबे समय तक भारत की सबसे बड़ी एड एजेंसी &#8216;<em>लिंटास</em>&#8216; इंडिया में कर्ताधर्ता तीन महिलाओं के जीवनसाथी रह चुके, जिसमें वर्तमान पत्नी पॉप स्टार शेरॉन प्रभाकर भी हैं, थियेटर (नाटक-रंगमंच) की दुनिया में भी विज्ञापन जितना ही बड़ा नाम और काम, सर्फ की ललिताजी, लिरिल गर्ल और कामसूत्र जैसे अत्यंत मशहूर तथा सफल विज्ञापनों के प्रणेता और कुछ समय पहले बने चंद्रबाबू नायडू के सलाहकार- आइए आपकी मुलाकात करवाते हैं एलेक पद्‌मसी से जो आधारित है उनकी आत्मकथा &#8216;<em>ए डबल लाइफ</em>&#8216; (एक दोहरी ज़िंदगी) पर जो कुछ समय पहले उनके और अरुण प्रभु के मिले-जुले प्रयास से प्रकाशित हुई थी।</p>
<h3><b>कामयाब नुस्खों का जादू</b></h3>
<p>भारत में पश्चिमी विज्ञापनों की &#8216;नकल&#8217; करने से सफलता नहीं मिल सकती। हमारी सोच और सृजन भी पश्चिमी देशों जितना प्रबल है, पर वो हटकर है, क्योंकि हमारे विज्ञापन हमारे परिवेश और माहौल को ध्यान में रखकर सोचे और बनाए जाते हैं। हिंदुस्तान लीवर के विज्ञापन वर्षों से लिंटास ही बनाती आई है और उनके कई सुप्रसिद्ध ब्रांड भारत में ही बने हैं, जैसे डालडा, लिरिल, सर्फ, लाइफबॉय, और यह सब लिंटास इंडिया ने पूरी तरह भारतीय सोच के अनुरूप बनाए हैं। सर्फ-निरमा की टक्कर ने हिंदुस्तान लीवर और सर्फ की नाक में दम कर रखा था। निरमा की बिक्री 1 हजार टन से 250000 टन तक बढ़ती गई और सर्फ 45000 टन से 34000 टन पर गिर गया। सर्फ था भी निरमा से तीन गुना महंगा। मामला पेचीदा था, लेकिन अलग सोच से नतीजा निकला। बकौल पद्‌मसी, लीवर ने हमें लिंटास में सुझाव दिया कि हम उनकी अंतरराष्ट्रीय</p>
<div class="simplePullQuoteRightGolden">हमने सोचा एक ऐसी भारतीय गृहिणी के बारे में जो मोल-भाव तो खूब करती है, पर सिर्फ सस्ते के लिए नहीं, बल्कि &#8216;वैल्यू फॉर मनी&#8217; के लिए<span></span></div>
<p>&#8216;<em>कैम्पैन</em>&#8216; में से सफेदी तथा सर्फ के शक्तिशाली एक्शन की बात पुनः दोहराएं, पर मुझे लग रहा था कि यह सब बहुत &#8216;रेशनल&#8217; है। लोगों के दिमाग पर तो असर करेगा, मगर दिल नहीं जीतेगा। फिर हम सबने अपना दिमाग लगाया और पूर्णतः देसी तरीके से अपना विज्ञापन सोचा और जन्म हुआ ललिताजी का। हमने सोचा एक ऐसी भारतीय गृहिणी के बारे में जो मोल-भाव तो खूब करती है, पर सिर्फ सस्ते के लिए नहीं, बल्कि &#8216;<em>वैल्यू फॉर मनी</em>&#8216; के लिए। तभी वो कहती हैं कि &#8216;<em>सस्ती चीज और अच्छी चीज में फर्क होता है भाईसाब</em>।&#8217; बात तो वह भी वही कहती हैं कि आधा किलो सर्फ 1 किलो निरमा के बराबर कपड़े धोता है, पर बिलकुल अपने ढंग से। देसी परिवेश, देसी ढंग, बात कहने का देसी अंदाज और बात बन गई और पूरे भारत में छा गई रवि बेटे की मां ललिताजी और उनकी &#8216;<em>सर्फ की खरीददारी में ही समझदारी है</em>।&#8217; न सिर्फ यह विज्ञापन लोगों को पसंद आया, बल्कि उसने सर्फ की बिक्री में कई गुना बढ़ोतरी की।</p>
<p><b>लाइफबॉय-</b> 1960 के दशक में लीवर सारी दुनिया में लाइफबॉय बेच रहे थे, पर उनके विज्ञापन की &#8216;<em>थीम</em>&#8216; थी शरीर की दुर्गंध हटाने में सहायक। पर हमने भारत के लिए भी इसी थीम से अपनी सहमति जाहिर की। भारत में शरीर की गंध-दुर्गंध की ओर कोई इतना ध्यान नहीं देता। पश्चिम में घर, ऑफिस सब बंद होने से घुटन होती है। यहां तो खिड़की-दरवाजे सब खुले रहते हैं, पसीने की बदबू का एहसास इतना नहीं होता।</p>
<p>हमने तो इसके बजाय <em>&#8216;तंदुरुस्ती&#8217;</em> की धारा को थामकर, &#8216;<em>लाइफबॉय है जहां, तंदुरुस्ती है वहां</em>&#8216; का नारा बनाया और लाइफबॉय साबुन तो जैसे छा गया। लाइफबॉय &#8216;<em>वेस्ट</em>&#8216; में तो कभी का खत्म हो गया पर आज भी भारत में यह सर्वाधिक बिकने वाले साबुनों में से है। और एक समय तो लाइफबॉय दुनिया में सबसे अधिक बिकने वाला साबुन था।</p>
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		<title>अस्त होना यूं अपराह्न में &#8216;आदित्य&#8217; का</title>
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		<pubDate>Tue, 03 Oct 1995 13:37:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारोबार की दुनिया]]></category>
		<category><![CDATA[आदित्य विक्रम बिड़ला]]></category>
		<category><![CDATA[ग्रेसिम]]></category>
		<category><![CDATA[घनश्यामदासजी बिड़ला]]></category>
		<category><![CDATA[बसंतकुमार बिड़ला]]></category>
		<category><![CDATA[बिड़ला समूह]]></category>
		<category><![CDATA[हिंडाल्को]]></category>

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		<description><![CDATA[मां, आज पांच नवंबर है। 14 तारीख को मेरा जन्म दिवस है। पता नहीं क्यों, इन दिनों मेरी विचारधारा में बहुत परिवर्तन हो गया है। आज तक तो मैं सिर्फ पढ़ाई, पढ़ाई और पढ़ाई के ही बारे में सोचता था। पर अब लगता है कि पढ़ाई तो सात महीने में खत्म हो जाएगी। इसके बाद मुझे काम में लगना है। अब मुझे लगता है कि मुझे जल्द से जल्द व्यापार क्षेत्र में उतरना चाहिए- और कुछ बहुत ही बड़ा काम [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2017" alt="अस्त होना यूं अपराह्न में 'आदित्य' का  " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1995/10/501.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">मां</span>, आज पांच नवंबर है। 14 तारीख को मेरा जन्म दिवस है। पता नहीं क्यों, इन दिनों मेरी विचारधारा में बहुत परिवर्तन हो गया है। आज तक तो मैं सिर्फ पढ़ाई, पढ़ाई और पढ़ाई के ही बारे में सोचता था। पर अब लगता है कि पढ़ाई तो सात महीने में खत्म हो जाएगी। इसके बाद मुझे काम में लगना है। अब मुझे लगता है कि मुझे जल्द से जल्द व्यापार क्षेत्र में उतरना चाहिए- और कुछ बहुत ही बड़ा काम करके दिखाना चाहिए- सचमुच बहुत बड़ा। अब मेरा लक्ष्य है व्यापार के क्षेत्र में बहुत प्रगति करने का। मैं घर लौटकर उद्योग-व्यापार में सचमुच कोई बड़ी उपलब्धि चाहता हूं।</p>
<p>मां-बेटे के बीच ये अंतरंग संवाद एक पत्र के अंश हैं, जो आदित्य विक्रम बिड़ला ने बोस्टन (अमेरिका) में केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते वक्त 1963 में अपने पिता श्री बसंतकुमार बिड़ला और मां श्रीमती सरलादेवी बिड़ला को लिखा था। यह महत्वाकांक्षा जो युवा आदित्य ने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत में व्यक्त की थी, वही जैसे उनके जीवन का ध्रुव-वाक्य बन गई।</p>
<p><strong>बिड़ला समूह के उद्योग-व्यवसाय</strong></p>
<p>आदित्य विक्रम बिड़ला के निर्देशन में बिड़ला समूह के उद्योग-व्यवसाय की देश-विदेश में उत्तरोत्तर प्रगति और विकास तो अब जगजाहिर है- इस श्रद्धांजलि में न सिर्फ बिड़ला घराने वरन भारत के समूचे उद्योग जगत के इस दैदीप्यमान &#8216;<em>विक्रमादित्य</em>&#8216; के जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को प्रकाशमान करना है।</p>
<p>बिड़ला परिवार के आदित्य विक्रम पहले ऐसे सदस्य थे, जो विदेश में जाकर उच्च अध्ययन हासिल कर आए। लौटने के बाद पिता बसंतकुमार बिड़ला के शब्दों में, &#8216;जब आदित्य 1964 जून-जुलाई में हिंदुस्तान लौटा, तो 6-7 महीने का प्रोग्राम हिसाब-किताब सिखाने का बनाया। साथ ही साथ हिंदुस्तान गैस कंपनी उसके नीचे कर दी गई और स्पिनिंग मिल का एक &#8216;<em>लाइसेंस</em>&#8216;। उसे बताया, यह एक कागज मात्र है। तुम्हें दिलचस्पी हो तो यह काम कर लो। नहीं, तो इसे फाड़ दो। काम शुरू से अंत तक तुम करोगे। योजना बनाना, आदमी रखना, मशीनों का आर्डर देना- सभी तुम्हारी जिम्मेदारी है। गलती हो तो अपनी अक्ल से सुधारना। तुम अपना प्रयोग करो। असफल हो, तो फिर प्रयत्न करो, गलती सुधारो। इस तरह हुआ उद्योग-व्यवसाय के क्षेत्र में आदित्य विक्रम बिड़ला का पदार्पण- &#8216;<em>ईस्टर्न स्पिनिंग</em>&#8216; के नाम से कलकत्ता के पास लगा यह कारखाना आदित्य बिड़ला का पहला और &#8216;<em>स्वयं</em>&#8216; सृजन था।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">ऐसा लगता है मानो भारतीय उद्योग के इस &#8216;<em>सूर्य</em>&#8216; को 51 वर्ष की अल्पायु में ही &#8216;<em>खग्रास</em>&#8216; लग गया<span></span></div>
<p>एक चर्चा, जो कई बार आदित्य बिड़ला समूह के प्रारंभिक दिनों में की जाती थी, वह यह थी कि आदित्य बिड़ला को अपने &#8216;दादोजी&#8217; घनश्यामदासजी बिड़ला से बिड़ला समूह की &#8216;सर्वश्रेष्ठ&#8217; इकाइयां, जैसे हिंडाल्को और ग्रेसिम विरासत में मिलीं। यह बात तो परिवार और समूह के निकटस्थ मानते हैं कि आदित्य विक्रम अपने &#8216;<em>दादोजी</em>&#8216; के लाड़ले थे, लेकिन इस चाहत में ममत्व से अधिक काबिलियत का प्रभाव था।</p>
<p><strong>आदित्य बिड़ला समूह के दर्जनों उद्योग </strong></p>
<p>बचपन से ही आदित्य में घनश्यामदासजी को वे सभी गुण नजर आने लगे थे, जो इस विशाल उद्योग समूह को चलाने-बढ़ाने में आवश्यक थे और आदित्य विक्रम भी &#8216;<em>दादोजी</em>&#8216; के विश्वास की कसौटी पर खरे उतरे, जब उन्होंने न सिर्फ ग्रेसिम और हिंडाल्को को बढ़ाया, बल्कि इंडियन रेयान, मैंगलोर केमिकल्स, इंडो गल्फ फर्टिलाइजर्स जैसे कई औद्योगिक &#8216;<em>जायंट</em>&#8216; अपने समूह में बढ़ा लिए। यही नहीं, दक्षिण पूर्व एशिया के देश जैसे थाईलैंड, इंडोनेशिया, फिलीपींस आदि में भी आदित्य बिड़ला समूह के दर्जनों उद्योग स्थापित हैं।</p>
<p>घनश्यामदासजी की 1983 में मृत्यु और बिड़ला परिवार में विभाजन के बाद इन वर्षों में तो ऐसा ही हो गया था, जैसे आदित्य बिड़ला समूह ही &#8216;<em>बिड़ला</em>&#8216; शब्द का पर्याय बन गया था। क्या थी ऐसी विशेषता आदित्य बिड़ला के संचालन में? आदित्य बिड़ला समूह के उद्योगों के संचालन में भी वही &#8216;<em>पड़ता</em>&#8216; प्रणाली नींव का पत्थर थी जो सदैव ही से बिड़ला समूह की पहचान रही है। उसके अलावा स्वयं आदित्य विक्रम ने कहा था, &#8216;कोई सामान्य व्यक्ति यह सोच सकता है कि प्रगति और विस्तार के लिए हम सभी तरह के उद्योगों में हाथ डाल रहे हैं। पर ऐसा कदापि नहीं है। हमारा समूह एक अत्यंत ही &#8216;<em>केहोसिव</em>&#8216; परिवार का अंग है और उन सभी क्षेत्रों में बढ़ना चाहते हैं, जिनमें हमें महारथ हासिल है। हमारे अधिकांश विस्तार कार्यक्रम &#8216;<em>प्रोसेस इंडस्ट्री</em>&#8216; में रहे हैं, जैसे रसायन, सीमेंट, खाद, कागज, रेशा, एल्युमिनियम आदि। और इन सबके ऊपर भी आदित्य विक्रम बिड़ला की पैनी नजर और वृहद दूरदर्शिता का समागम, जो हर उद्योग के कार्यकलापों में होने वाली बैठकों में नजर आती थी, जिसमें उनके समूह के मुख्य प्रबंधक भाग लेते थे।</p>
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		<title>निवेशक की जेब तक पहुंचने का रास्ता उसके दिल से होकर है!</title>
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		<pubDate>Sun, 13 Sep 1992 07:30:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारोबार की दुनिया]]></category>
		<category><![CDATA[इश्यू एडरवरटाइजिंग]]></category>
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		<category><![CDATA[टाइम्स ऑफ इंडिया]]></category>
		<category><![CDATA[पूजा भट्‌ट]]></category>
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		<category><![CDATA[माधुरी दीक्षित]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले दिनों बहुचर्चित सिने-तारिका पूजा भट्‌ट के न्यूनतम परिधानों में विभिन्न आकर्षक मुद्राओं के विशाल रंगीन चित्रों की श्रृंखला देश के कई अखबारों के पन्नों और पाठकों के दिलो-दिमाग पर छाई रही। फिल्मों में अपने अभिनय के जरिये पूजा भट्‌ट द्वारा अर्जित &#8216;मासूमियत&#8216; की इमेज का तो इन &#8216;ग्लैमरस&#8216; चित्रों से दूर-दूर तक कोई वास्ता न था। परंतु चित्रों को देखने के बाद सबसे पहला सवाल जो पाठकों के मन में आया, वो यही था कि इन चित्रों को प्रकाशित [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/09/jm_s_pooja_bhatt.jpg" alt="निवेशक की जेब तक पहुंचने का रास्ता उसके दिल से होकर है!" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3117" /><span class="dropcap">पि</span>छले दिनों बहुचर्चित सिने-तारिका पूजा भट्‌ट के न्यूनतम परिधानों में विभिन्न आकर्षक मुद्राओं के विशाल रंगीन चित्रों की श्रृंखला देश के कई अखबारों के पन्नों और पाठकों के दिलो-दिमाग पर छाई रही। फिल्मों में अपने अभिनय के जरिये पूजा भट्‌ट द्वारा अर्जित &#8216;<em>मासूमियत</em>&#8216; की इमेज का तो इन &#8216;<em>ग्लैमरस</em>&#8216; चित्रों से दूर-दूर तक कोई वास्ता न था। परंतु चित्रों को देखने के बाद सबसे पहला सवाल जो पाठकों के मन में आया, वो यही था कि इन चित्रों को प्रकाशित करने का प्रयोजन क्या था? इन चित्रों के शीर्षक से ये तो स्पष्ट था कि वे संपादकीय प्रयोग न होकर किसी विज्ञापन का अंश थे, लेकिन विज्ञापन किस &#8216;<em>चीज</em>&#8216; का? जितने पाठक थे, उतनी ही अटकलें थीं- पूजा भट्‌ट की किसी आने वाली फिल्म का विज्ञापन। किसी &#8216;<em>बिकनी</em>&#8216; और महिलाओं के लिए अंतरवस्त्र बनाने वाली कंपनी के विज्ञापन। किसी रमणीय पर्यटन स्थल का विज्ञापन आदि-आदि। जी नहीं, सभी अटकलों को निराधार साबित करते हुए जब पाठकों को यह ज्ञात हुआ कि विज्ञापन बीयर और शराब बनाने जा रही एक कंपनी वेस्ट कोस्ट ब्रूअर्स एंड डिस्टलर्स लिमिटेड के पब्लिक इश्यू से संबंधित थे, तो वे स्तब्ध रह गए।</p>
<p><strong>वे टू ए मेन्स हार्ट इज थ्रू हिज स्टमक</strong></p>
<p>अंग्रेजी में गृहिणियों के लिए एक प्रचलित कहावत है &#8216;<em>वे टू ए मेन्स हार्ट इज थ्रू हिज स्टमक</em>&#8216; (जिसका भावार्थ यह है कि किसी आदमी का दिल जीतने का सबसे सुगम मार्ग उसे स्वादिष्ट भोजन कराकर यानी उसके पेट के जरिये है)। किंतु, कड़ी प्रतिस्पर्धा के वर्तमान युग में पब्लिक इश्यू लेकर आ रही वेस्ट कोस्ट ब्रूअरी (वेस्ट कोस्ट पेपर कंपनी से कोई संबंध नहीं) ने तो इस पुरातन घरेलू कहावत को एक नया रूप देकर कुछ ऐसा बना दिया कि, &#8216;<em>वे टू द इन्वेस्टर्स पॉकेट एंड पर्स इज थ्रू हिज हार्ट</em>।&#8217;</p>
<p>इस &#8216;<em>हाई-प्रोफाइल</em>&#8216; विज्ञापन अभियान से जुड़े तीन-चार महत्वपूर्ण प्रश्नों का जवाब तलाशने का मैंने प्रयास किया- क्या कंपनी द्वारा इस विज्ञापन श्रृंखला पर किए गए खर्च ने &#8216;<em>सेबी</em>&#8216; द्वारा पब्लिक इश्यू के लिए निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया? पब्लिक इश्यू में कंपनी के कार्मिक और वित्तीय विषयों को प्राथमिकता देने के बजाय सिर्फ किसी &#8216;<em>मॉडल</em>&#8216; को दिखाना कहां तक सही है? क्या यह लोकप्रिय या चर्चित व्यक्तियों के आभामंडल के जरिये निवेशकों को लुभाने की एक नई प्रथा की शुरुआत नहीं है?</p>
<div class="simplePullQuoteRightPerpal">जब पाठकों को यह ज्ञात हुआ कि विज्ञापन बीयर और शराब बनाने जा रही एक कंपनी वेस्ट कोस्ट ब्रूअर्स एंड डिस्टलर्स लिमिटेड के पब्लिक इश्यू से संबंधित थे, तो वे स्तब्ध रह गए<span></span></div>
<p>खैर, सबसे पहली नजर इस कंपनी, इसके प्रवर्तकों और उसकी योजनाओं पर। कंपनी द्वारा जारी &#8216;प्रॉस्पेक्ट्‌स&#8217; के अनुसार वेस्ट कोस्ट ब्रूअर्स को सन्‌ 1971 में ही एक कंपनी के रूप में वैधानिक मान्यता प्राप्त हो गई थी, और 1975 में उसे बीयर-शराब बनाने का लाइसेंस भी प्राप्त हो गया था। किंतु, विभिन्न कारणों से कुछ समय पहले तक कामकाज शुरू हुआ ही नहीं। गत वर्ष सरलक्स डायग्नोस्टिक कंपनी समूह के प्रबंधकों श्री दीपक गोयल-श्री लाल गोयल ने वेस्ट कोस्ट का अधिग्रहण कर लिया। इसी 1 सितंबर को कंपनी का 10 करोड़ 86 लाख रुपए का सामान्य अंशों के लिए सार्वजनिक निर्गम खुला था, जो कि इश्यू बंद होने की प्रथम तारीख 4 सितंबर को बंद हो गया था।</p>
<p><strong>पानी की तरह बहाया पैसा</strong></p>
<p>कंपनी ने अपने प्रॉस्पेक्टस में इस पब्लिक इश्यू से संबंधित सभी खर्चों (इश्यू प्रबंधक, सह प्रबंधक, रजिस्ट्रार, दलाल, हामीदारी मुद्रण, वितरण, विज्ञापन आदि) का अनुमान 1 करोड़ रुपए दर्शाया है। यदि इश्यू से जुड़े अन्य खर्चों को कम से कम आंकने के बाद भी इश्यू के विज्ञापन के लिए कंपनी &#8216;<em>प्रॉस्पेक्टस</em>&#8216; के अनुसार 20-25 लाख रुपए से अधिक खर्च करने की स्थिति में कदापि नहीं थी। लेकिन, विज्ञापन दरों की बारीकियों से अनभिज्ञ सामान्य पाठक भी यह अनुमान लगा सकते हैं कि कंपनी ने पूजा भट्‌ट के विज्ञापनों से पैसा खर्चा नहीं किया वरन्‌ पानी की तरह बहाया है।</p>
<p>पिछले चंद हफ्तों से वेस्ट कोस्ट- पूजा भट्‌ट के आधे पेज के सिर्फ रंगीन विज्ञापन कई क्षेत्रीय, राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं। राष्ट्रीय दैनिक जैसे- &#8216;<em>टाइम्स ऑफ इंडिया</em>&#8216;, के रविवारीय रंगीन संस्करण में विज्ञापनदर 1600 रुपए प्रति कॉलम सेंटीमीटर की है। अर्थात्‌ आधे पेज (लगभग 200 सेंटीमीटर) की कीमत हो गई तीन लाख रुपए से अधिक। और, यह सिर्फ एक राष्ट्रीय अखबार में एक बार विज्ञापन देने का खर्च है, फिर जिस प्रकार वेस्ट कोस्ट ने विज्ञापनों की &#8216;<em>झड़ी</em>&#8216; लगा दी, उसकी लागत निश्चित करो़ड़ों रही होगी। यही नहीं, इस लेखक ने इश्यू-अवधि के दौरान बंबई में पूजा भट्‌ट- वेस्ट कोस्ट की जो छटा विज्ञापन-होर्डिंग्स पर देखी, वह तो शब्दों में वर्णन से परे है। बंबई में, जहां होर्डिंग्स पर विज्ञापन की दर 20,000 से लेकर 1,50,000 रुपए प्रति माह तक की है, वहां वेस्ट कोस्ट के छोटे-बड़े मिलाकर इतने होर्डिंग्स थे कि बंबई की सड़कों पर चल रहा कोई भी व्यक्ति पूजा भट्‌ट और वेस्ट कोस्ट को चाहकर भी अनदेखा नहीं कर सकता था। इसके अलावा, कंपनी ने &#8216;<em>कार-स्टिकर</em>&#8216; पोस्टर आदि और भी कई विज्ञापन माध्यमों का जमकर प्रयोग किया।</p>
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		<title>हर्षद मेहता-हरिदास मूंदड़ा : पंछी एक डाल के?</title>
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		<pubDate>Sat, 13 Jun 1992 06:19:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[प्रतिभूति शेयर कांड]]></category>
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		<category><![CDATA[शेयर बाज़ार]]></category>
		<category><![CDATA[हरिदास मूंदड़ा]]></category>
		<category><![CDATA[हर्षद मेहता]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ दिनों पहले तक, जब हर्षद मेहता का सितारा बीएसई इंडेक्स के कदम से कदम मिलाकर निरंतर बुलंदी के नए क्षितिज छू रहा था, तब हर ओर हर्षद के विवरण के लिए एक ही जुमला था- &#8216;न भूतो न भविष्यति&#8216; (न कभी पहले ऐसा हुआ, न भविष्य में होगा)। दूसरे शब्दों में, हर्षद की बिजली-सी चपल किंतु &#8216;जी.जी. भाई टॉवर&#8216; से आंखें मिलाती वित्तीय सफलता की तुलना सिर्फ एक ही व्यक्ति से की जा सकती थी, खुद हर्षद से। कॉन-मैन [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="https://www.jmuchhal.com/harshad-mehta-haridas-moondra/521-2" rel="attachment wp-att-3741"><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/06/5212.jpg" alt="हर्षद मेहता-हरिदास मूंदड़ा : पंछी एक डाल के?" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3741" /></a><span class="dropcap">कु</span>छ दिनों पहले तक, जब हर्षद मेहता का सितारा बीएसई इंडेक्स के कदम से कदम मिलाकर निरंतर बुलंदी के नए क्षितिज छू रहा था, तब हर ओर हर्षद के विवरण के लिए एक ही जुमला था- &#8216;<em>न भूतो न भविष्यति</em>&#8216; (न कभी पहले ऐसा हुआ, न भविष्य में होगा)। दूसरे शब्दों में, हर्षद की बिजली-सी चपल किंतु &#8216;<em>जी.जी. भाई टॉवर</em>&#8216; से आंखें मिलाती वित्तीय सफलता की तुलना सिर्फ एक ही व्यक्ति से की जा सकती थी, खुद हर्षद से।</p>
<h3><strong>कॉन-मैन या विजार्ड</strong></h3>
<p>परंतु जैसे ही पासे उलटे पड़ने लगे, हर्षद के सितारे धूमिल होने लगे, प्रतिभूति शेयर कांड में उनका नाम प्रमुख <em>&#8216;कर्ता-धर्ता&#8217;</em> के रूप में उछलने लगा और उन्हें &#8216;<em>फाइनेंशियल विजार्ड</em>&#8216; के बजाय <em>&#8216;कॉन-मैन&#8217;</em> कहा जाने लगा, तभी से &#8216;<em>किंग-बुल</em>&#8216; को &#8216;<em>डिस्क्राइब</em>&#8216; करने के तरीके में थोड़ा फर्क आ गया है। बदले माहौल में लोग कहने लगे हैं, &#8216;इस एच.एम. (हर्षद मेहता) ने तो 35 वर्षों पूर्व के एच.एम. (हरिदास मूंदड़ा) की यादें ताजा कर दी हैं। हां, तब मामला सिर्फ डेढ़ करोड़ रुपए का था और आज बात हजारों करोड़ रुपए की है।&#8217;</p>
<h3><b>हरिदास-हर्षद </b></h3>
<p>तुरंत एक अत्यंत स्वाभाविक-सा सवाल उभरता है कि आखिर ये हरिदास मूंदड़ा ऐसी क्या शख्सियत थी जिनकी तुलना हर्षद मेहता से की जा रही है?</p>
<p>चूंकि यह मामला सन्‌ 1957-58 से संबंधित है, इसलिए आजाद भारत में जन्मे चुनिंदा नागरिकों को ही इसकी विस्तृत जानकारी होगी। हां, इतना जरूर है कि व्यापार-व्यवसाय-वाणिज्य से प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जुड़े लोगों ने कभी न कभी तो इस नाम का जिक्र सुना ही होगा। जिनकी जानकारी सामान्य से कुछ अधिक होगी, वे यहां तक बता देंगे कि हरिदास मूंदड़ा ने एलआईसी (जीवन बीमा निगम) से शेयरों की खरीद-फरोख्त में कुछ घोटाला किया था, जिनकी जांच बंबई उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एम.सी. चागला ने की थी, जिसके परिणामस्वरूप हरिदास मूंदड़ा को जेल हो गई थी। किसी भी व्यक्ति की याददाश्त में इस घटना में विशिष्ट तौर पर दर्ज होने का प्रमुख कारण यह है कि जांच आयोग की सिफारिशों के फलस्वरूप तत्कालीन केंद्रीय वित्तमंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा था।</p>
<div class="simplePullQuoteRightPerpal">तुरंत एक अत्यंत स्वाभाविक-सा सवाल उभरता है कि आखिर ये हरिदास मूंदड़ा ऐसी क्या शख्सियत थी जिनकी तुलना हर्षद मेहता से की जा रही है?<span></span></div>
<p>परंतु, इससे अधिक 35 वर्षों पुराना वह मामला किसी को ध्यान हो, ऐसे बिरले ही होंगे। वर्तमान आर्थिक परिप्रेक्ष्य के चलते &#8216;<em>हरिदास मूंदड़ा कांड</em>&#8216; के विस्मृत पहलुओं को उजागर करने के दो मुख्य उद्देश्य हैं। पहला और स्वाभाविक कारण तो लोगों की हरिदास मूंदड़ा से संबद्ध मामले की विस्तृत जानकारी की जिज्ञासा को यथासंभव पूरी करना है। किंतु, दूसरा और महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि उस समय किन परिस्थितियों में एक व्यक्ति ने सरकार और उसके द्वारा नियंत्रित निगम को इच्छानुसार &#8216;<em>मना</em>&#8216; लिया, मामला कैसे सामने आया, उसकी जांच प्रक्रिया के दौरान किन खामियों और कमजोरियों पर प्रकाश डाला गया और क्या वे सभी आवश्यक कदम उठाए गए जिससे ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति संभव न हो। अन्य सभी सवालों का जवाब तो लेख में मिल जाएगा, किंतु अंतिम और &#8216;<em>इतिहास की पुनरावृत्ति</em>&#8216; के अहम सवाल का प्रश्नचिह्न अभी भी बरकरार है। वर्तमान प्रतिभूति कांड से यह तो स्पष्ट झलक रहा है कि &#8216;सिस्टम&#8217; पूर्णतः दोषरहित और &#8216;लीक-प्रूफ&#8217; अब भी नहीं है। अब विचारणीय पहलू यह है कि या तो हरिदास मूंदड़ा मामले के बाद भी सरकार ने प्रणाली सुधार के कारगर कदम नहीं उठाए थे, अथवा उस एच.एम. से इस एच.एम. तक के लंबे अंतराल और बदलती कार्य-शैलियों से नियंत्रण प्रणाली पिछड़ गई है।</p>
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		<title>हताश हर्षद की हवालात में जूतों के सिरहाने पहली रात</title>
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		<pubDate>Sun, 07 Jun 1992 13:41:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[बंबई]]></category>
		<category><![CDATA[बंबई शेयर सूचकांक]]></category>
		<category><![CDATA[शेयर घोटाला]]></category>
		<category><![CDATA[शेयर मार्केट]]></category>
		<category><![CDATA[सीबीआई]]></category>
		<category><![CDATA[हर्षद मेहता]]></category>

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		<description><![CDATA[समय बड़ा बलवान रे भैया, समय बड़ा बलवान&#8217;। दो दिन पहले तक जो हर्षद मेहता &#8216;तथाकथित&#8216; रूप से भारत का सर्वोच्च आयकरदाता था, जिसकी अरबों रुपए की निजी संपदा और आलीशान बंगला, गाड़ी हर ओर चर्चा का विषय था और जो लाखों बच्चे-बूढ़े-जवानों का &#8216;आदर्श&#8216; बन चुका था, वही हर्षद मेहता 4-5 जून की रात बंबई के आजाद मैदान पुलिस थाने के लॉक-अप की अंधियारी कोठरी में अपने जूतों को &#8216;सिरहाने का तकिया&#8216; बनाकर पथरीली, कठोर फर्श पर कोने में [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1555" alt="हताश हर्षद की हवालात में जूतों के सिरहाने पहली रात  " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/06/53.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">स</span>मय बड़ा बलवान रे भैया, समय बड़ा बलवान&#8217;। दो दिन पहले तक जो हर्षद मेहता &#8216;<em>तथाकथित</em>&#8216; रूप से भारत का सर्वोच्च आयकरदाता था, जिसकी अरबों रुपए की निजी संपदा और आलीशान बंगला, गाड़ी हर ओर चर्चा का विषय था और जो लाखों बच्चे-बूढ़े-जवानों का &#8216;<em>आदर्श</em>&#8216; बन चुका था, वही हर्षद मेहता 4-5 जून की रात बंबई के आजाद मैदान पुलिस थाने के लॉक-अप की अंधियारी कोठरी में अपने जूतों को &#8216;<em>सिरहाने का तकिया</em>&#8216; बनाकर पथरीली, कठोर फर्श पर कोने में दुबका सो रहा था।</p>
<h3><b>निर्देश कुछ और ही थे!</b></h3>
<p>हर्षद की कहानी का पटाक्षेप इतना त्वरित हो जाएगा- इसका किसी को सपने में भी गुमान नहीं था। अकेले अपनी &#8216;<em>वित्तीय चपलताओं</em>&#8216; के दम पर बंबई शेयर सूचकांक को 4500 की ऊंचाइयों तक ले जाने वाले इस &#8216;<em>अजूबे</em>&#8216; के विषय में हर कोई कह रहा था कि भले ही प्रतिभूति शेयर घोटाला कितना ही बड़ा और पेचीदा क्यों न हो, हर्षद खुद को साफ बचा निकाल ले जाएगा। किंतु शायद के. माधवन के नेतृत्व में सीबीआई जांच दल को &#8216;<em>निर्देश</em>&#8216; कुछ और ही थे।</p>
<h3><b>किताब-महल की वह रात</b></h3>
<p>4 जून को तड़के हर्षद मेहता और उससे संबंधित सभी व्यक्तियों के घरों, दफ्तरों पर सीबीआई ने छापा मारकर भारी मात्रा में दस्तावेज आदि जब्त कर लिए थे। 4 जून को ही देर रात हर्षद और 7 अन्य व्यक्तियों को पूछताछ के लिए <em>&#8216;किताब-महल&#8217;</em> स्थित सीबीआई की आर्थिक अपराध शाखा ले जाया गया।</p>
<h3><b>आधी रात की हलचल</b></h3>
<p>प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सबसे ऊपरी मंजिल के अलावा पूरी &#8216;<em>किताब-महल</em>&#8216; बिल्डिंग में अंधेरा छाया हुआ था। इमारत के चारों ओर सशस्त्र पुलिस ने घेराबंदी कर रखी थी। 4-5 जून की रात सवा बजे एक टैक्सी <em>&#8216;किताब-महल&#8217;</em> के पास आकर रुकी। हाथ में ढेरों कागजात लिए उसमें से उतरा व्यक्ति बिल्डिंग में गया। फिर 2 बजे एक बड़ी पुलिस वैन इमारत के पास वाली गली में आकर रुकी, जिससे वहां एकत्रित पत्रकार, फोटोग्राफर एकदम चौकन्ने होकर बिल्डिंग के आसपास मंडराने लगे। रात के लगभग ढाई बजे वहां उपस्थित फोटोग्राफरों के &#8216;<em>फ्लैश-बल्व</em>&#8216; ने पूरा इलाका प्रकाशमान कर दिया, जब हर्षद मेहता और अन्य अभियुक्तों को पुलिस वैन में बैठाकर &#8216;<em>किताब-महल</em>&#8216; से आजाद मैदान पुलिस थाना ले जाया गया। पुलिस वैन के पीछे पत्रकारों, फोटोग्राफरों का काफिला बढ़ रहा था।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">जिस समय हर्षद आदि ने कोर्ट रूम में प्रवेश किया, पूरा कमरा वकीलों, हर्षद के मित्र-सहयोगियों आदि से खचाखच भरा हुआ था<span></span></div>
<h3><b>बंद होने के पूर्व पत्नी से मुलाकात </b></h3>
<p>सीबीआई और सशस्त्र पुलिस के कड़े बंदोबस्त के बीच देर रात हर्षद और तीन अन्य अभियुक्तों को आजाद मैदान पुलिस &#8216;<em>लॉक-अप</em>&#8216; में बंद कर दिया गया। कोठरी में &#8216;बंद&#8217; करने से पूर्व हर्षद को उनकी पत्नी ज्योति मेहता से एक मुलाकात की इजाजत दी गई।</p>
<h3><b>हताशा में जूतों का सिरहना</b></h3>
<p>एकदम हताश, थके-हारे से दिखाई दे रहे हर्षद ने सामान्य मुजरिमों को हिरासत में बंद कर रखी जाने वाली अंधियारी-सी कोठरी और अपनी &#8216;<em>रात के अनूठे आशियाने</em>&#8216; पर एक नजर डाली, अपने जूते उतारे और एक कोने में जाकर बैठ गए। कुछ देर तो वे सामान्य तौर पर बैठे रहे, फिर &#8216;<em>आलती-पालती</em>&#8216; लगाकर बैठने का प्रयास किया और अंततः अपने जूतों का तकिया बनाकर नंगी, ठंडी फर्श पर कोने में दुबककर सो गए।</p>
<h3><b>ठेले की चाय और ब्रेड का नाश्ता </b></h3>
<p>सुबह हर्षद सात बजे के करीब नींद से जाग गए थे। उसके बाद वे वहां कोठरी में सभी पुलिसकर्मियों, अभियुक्तों के कौतूहल और उत्सुकता का केंद्र बने बैठे रहे। सुबह हवालात में बंद सभी अन्य अभियुक्तों की तरह हर्षद को भी थाने के सामने बनी चाय की छोटी-सी गुमटी से लेकर चाय और ब्रेड के टुकड़े &#8216;<em>नाश्ते</em>&#8216; के रूप में दिए गए।</p>
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		<title>बजट बाद बीएसई इंडेक्स 3000 पार कर जाएगा?</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Feb 1992 07:33:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[केपिटल मार्केट]]></category>
		<category><![CDATA[डॉ. मनमोहनसिंह]]></category>
		<category><![CDATA[बीएसई इंडेक्स]]></category>
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		<category><![CDATA[सेंसेक्स]]></category>

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		<description><![CDATA[चौंकिए नहीं- क्या आप दो वर्ष पूर्व यह कल्पना भी कर सकते थे कि विश्व की महाशक्ति सोवियत संघ निकट भविष्य में अस्तित्वहीन हो जाएगी? या फिर बीसवीं शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण राजनयिक के रूप में पहचाने जाने वाले गोर्बाचेव विश्व पटल से पूर्णतः ओझल हो जाएंगे? इसी तर्ज में भारतीय मानस में सदा ही से &#8216;डर&#8216; और &#8216;खौफ&#8217; की दृष्टि से देखे जाने वाले वार्षिक बजट से शेयर बाजार जैसे संवेदनशील व्यवसाय में और तेजी आएगी, इस कल्पना का [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1562" alt="बजट बाद बीएसई इंडेक्स 3000 पार कर जाएगा?" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/02/56.jpg" width="311" height="307" /><strong><span class="dropcap">चौं</span>किए नहीं</strong>- क्या आप दो वर्ष पूर्व यह कल्पना भी कर सकते थे कि विश्व की महाशक्ति सोवियत संघ निकट भविष्य में अस्तित्वहीन हो जाएगी? या फिर बीसवीं शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण राजनयिक के रूप में पहचाने जाने वाले गोर्बाचेव विश्व पटल से पूर्णतः ओझल हो जाएंगे? इसी तर्ज में भारतीय मानस में सदा ही से &#8216;<em>डर</em>&#8216; और &#8216;खौफ&#8217; की दृष्टि से देखे जाने वाले वार्षिक बजट से शेयर बाजार जैसे संवेदनशील व्यवसाय में और तेजी आएगी, इस कल्पना का प्रस्फुटित होना ही अपने आप में एक घटना है।</p>
<p>किंतु पूर्वाग्रहों से परे होकर अगर हम वर्तमान सरकार और उसके द्वारा निरंतर किए जा रहे आर्थिक परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए भविष्य का अंदाज लगाने का प्रयास करें, तो शेयर बाजार में तेजड़ियों की मजबूत गिरफ्त में कोई ढील अभी कहीं नजर नहीं आती है। लगता है कि इंडेक्स के 3000 पर पहुंचने की भूमिका तैयार है।</p>
<p>नरसिंहराव सरकार के सत्ता संभालने के बाद बीएसई इंडेक्स लगभग 1000 बिंदु ऊंचा हुआ है। जनवरी 92 में एक ही महीने में इंडेक्स में लगभग 400 बिंदुओं की तेजी आई है और वर्तमान 2500 का स्तर संभावित 3000 से सिर्फ 500 बिंदु ही दूर है। आज जब युवा वर्ग के &#8216;<em>हीरो</em>&#8216; गावसकर-कपिल देव या अनिल कपूर-सलमान खान से हटकर हर्षद मेहता-निमेष शाह हो गए हैं, तब तो लगता है कि इस वर्ष इंडेक्स चढ़ाई 3000 अंतिम लक्ष्य नहीं, वरन 3500 तक की यात्रा में एक उल्लेखनीय पड़ाव पर सिद्ध हो सकता है। पिछली 24 जुलाई को जब डॉ. मनमोहनसिंह का बजट आया था, तब बीएसई इंडेक्स 1500 के लगभग था। इस बजट के समय इंडेक्स 1000 पाइंट बढ़कर 2500 के इर्दगिर्द पहुंच गया है।</p>
<div class="simplePullQuoteRightGolden">उस दिन हुई महत्वपूर्ण घटना/घोषणा; महत्वपूर्ण भावों सहित उस दिन का सेन्सेक्स उच्चांक; (विगत बंद सूचकांक से उच्चांक का फर्क)<span></span></div>
<p>बजट के बाद भी सरकार इंडेक्स को और सुदृढ़ देखना चाहेगी, इसका सीधा अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले बजट में इस बजट तक की अवधि में लगभग हर हफ्ते अर्थव्यवस्था के सुधार और उदारीकरण के हेतु सरकार कोई न कोई ऐसी घोषणा करती रही, जिससे कि बाजार का रुख अनुकूल बना रहा। इससे साफ जाहिर होता है कि वर्तमान सरकार केपिटल मार्केट को अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान देना चाहती है, जिसके लिए अत्यावश्यक है कि सेंसेक्स ठोस बना रहे।</p>
<p>यह तथ्य तीन आंकड़ों से और भी स्पष्ट हो जाता है। पहला, 1992 में अब तक सेंसेक्स में लगभग 500 पाइंट की वृद्धि हो चुकी है। दूसरा, पिछले बजट से इस बजट की समयावधि में ऐसा 12 बार हुआ है कि बी.एस.ई. इंडेक्स में विगत दिन में बंद सूचकांक से 5 प्रतिशत से भी अधिक की वृद्धि अगले दिन आई है। दूसरे शब्दों में जुलाई से अब तक ऐसा लगभग 20 बार हुआ है कि सेंसेक्स में किसी दिन के उच्चांक और पिछले बंद सूचकांक में 40 से अधिक पाइंट की उल्लेखनीय तेजी आई हो। ये बढ़त एक्सचेंज अधिकारियों द्वारा समय-समय पर लगाई गई कड़ी पाबंदियों और शर्तों, म्युचुअल फंड व वित्तीय संस्थाओं द्वारा भारी बेचान, &#8216;प्राफिट बुकिंग&#8217; और &#8216;<em>टेक्नीकल करेक्शन</em>&#8216; के बाद भी अनवरत बनी रही है, यही इसकी सुदृढ़ता का सबसे बड़ा परिचायक है।</p>
<p>नीचे क्रमानुगत पिछले बजट से अभी तक सेन्सेक्स की चुनिंदा छलांगों का वर्णन दिया हुआ है, जो कि इस प्रकार है : दिनांक उस दिन हुई महत्वपूर्ण घटना/घोषणा; महत्वपूर्ण भावों सहित उस दिन का सेन्सेक्स उच्चांक; (विगत बंद सूचकांक से उच्चांक का फर्क)।</p>
<p><strong>19 जुलाई 91</strong> : अवमूल्यन का अंतिम दौर व बैंक ऑफ इंग्लैंड को गिरवी रखे सोने की चौथी और अंतिम खेप रवाना; एसीसी 2580, एल.एंडटी. 110, टिस्को 214, 1455.75 (+13.22)</p>
<p><strong>24 जुलाई</strong> : 7719 करोड़ के घाटे का बजट पेश एवं नई औद्योगिक नीति के अंतर्गत लाइसेंस राज का अंत; 1561.08 ( 75.32)</p>
<p><strong>26 जुलाई</strong> : सरकार द्वारा कंपनियों में निवेश हेतु विदेशी पूंजी की अंश सीमा ५१ प्रतिशत तक बढ़ा देने का विचार; 1630.27 ( 74.74)</p>
<p><strong>29 जुलाई</strong> : बजट के बाद स्टॉक एक्सचेंज में भारी तेजी; एसीसी 3200, अपोलो टॉयर 105, 1679.95 ( 79.79)</p>
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		<title>हर्षद मेहता : बी.एस.ई. के दलालों में सरताज</title>
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		<pubDate>Tue, 04 Feb 1992 06:17:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारोबार की दुनिया]]></category>
		<category><![CDATA[बंबई स्टॉक एक्सचेंज]]></category>
		<category><![CDATA[बी.एस.ई. के दलाल]]></category>
		<category><![CDATA[शेयर दलाल]]></category>
		<category><![CDATA[शेयर बाजार]]></category>
		<category><![CDATA[स्टॉक एक्सचेंज]]></category>
		<category><![CDATA[हर्षद मेहता]]></category>

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		<description><![CDATA[वर्ष 1991-92 के लिए 26 करोड़ का एडवांस इन्कम टैक्स जमा करवाने वाले हर्षद मेहता का आखिर इतिहास क्या है? इतनी कम समयावधि में यह व्यक्ति शीर्ष तक कैसे पहुंचा, यह सवाल सभी के मन में कौंध रहा है? दिनांक 10 फरवरी की सुबह राष्ट्र के प्रमुख वित्तीय अखबारों में आधे पृष्ठ का एक ध्यानाकर्षक विज्ञापन प्रकाशित हुआ था। विज्ञापन का शीर्षक था, &#8216;हर्षद मेहता झूठ बोलता है।&#8217; हर्षद मेहता की ही कंपनी ग्रोमोर रिसर्च एंड एसेट्‌स मैनेजमेंट लि. द्वारा [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1557" alt="हर्षद मेहता : बी.एस.ई. के दलालों में सरताज" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/02/54.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">व</span>र्ष 1991-92 के लिए 26 करोड़ का एडवांस इन्कम टैक्स जमा करवाने वाले हर्षद मेहता का आखिर इतिहास क्या है? इतनी कम समयावधि में यह व्यक्ति शीर्ष तक कैसे पहुंचा, यह सवाल सभी के मन में कौंध रहा है? दिनांक 10 फरवरी की सुबह राष्ट्र के प्रमुख वित्तीय अखबारों में आधे पृष्ठ का एक ध्यानाकर्षक विज्ञापन प्रकाशित हुआ था। विज्ञापन का शीर्षक था, &#8216;<em>हर्षद मेहता झूठ बोलता है</em>।&#8217; हर्षद मेहता की ही कंपनी ग्रोमोर रिसर्च एंड एसेट्‌स मैनेजमेंट लि. द्वारा जारी इस विज्ञापन में विगत कुछ महीनों से चर्चित शेयर दलाल, हर्षद मेहता के कार्यकलापों का विस्तृत बयान दिया गया। इसी के साथ अब तक सिर्फ &#8216;<em>लीडिंग बुल</em>&#8216; या &#8216;<em>बिग बुल</em>&#8216; के नाम से पहचाने जाने वाले व्यक्ति से सभी परिचित हो गए। और वह व्यक्ति है- हर्षद मेहता। शेयर बाजार के प्रति बढ़ते आकर्षण और इसमें छुपी द्रुतगामी कमाई ने असंख्य लोगों को इस ओर आकृष्ट किया है। इस बढ़ती हुई रुचि का सबसे अधिक फायदा स्टॉक एक्सचेंज के सदस्य, शेयर दलालों को मिला।</p>
<p>इसकी सीधा-सा उदाहरण यह है कि आज एक मोटे अनुमान से सिर्फ बंबई स्टॉक एक्सचेंज में प्रतिदिन औसतन 500 करोड़ रुपए का कामकाज होता है। एक प्रतिशत की दलाली के हिसाब से रोजाना सिर्फ बीएसई के दलाल 5 करोड़ रुपए की कमाई कर लेते हैं। परंतु सभी दलालों की दिलचस्पी महज दलाली से नहीं होती। कुछेक ऐसे भी हैं, जो दूसरों का नाम भर लेकर वास्तव में खुद ही के लिए व्यवसाय करने लगते हैं। विगत वर्ष में तेजी में आया एक ऐसा नाम उभरा था 29 वर्षीय निमेष शाह का, जिसने सेंचुरी और हेक्स्ट के शेयरों की करोड़ों की खरीद की थी और उसका नाम भारत के सर्वोच्च व्यक्तिगत आयकरदाता के रूप में प्रसिद्ध हो गया था।</p>
<p><strong>दलालों में सरताज&#8230;</strong></p>
<div class="simplePullQuoteRight">एक प्रतिशत की दलाली के हिसाब से रोजाना सिर्फ बीएसई के दलाल 5 करोड़ रुपए की कमाई कर लेते हैं<span></span></div>
<p>गत वर्ष के प्रमुख तेजड़िए अगर निमेष शाह थे, तो इस साल वह निस्संदेह हर्षद मेहता हैं। इनकी नजरें जा टिकीं एसीसी और अपोलो टायर के शेयरों पर और फिर जो राष्ट्रव्यापी खरीद शुरू हुई कि 12 दिसंबर 91 से 2 जनवरी 92 तक की सेटलमेंट अवधि में एसीसी के भाव 2955 से 3300 और अपोलो टायर के भाव 111 से 174 तक पहुंच गए। यह लेख लिखे जाने के दिन एसीसी 4110 और अपोलो टायर 212 के शीर्ष पर पहुंच चुका है और अभी भी तेजी सभी प्रतिबंधों के बावजूद अविरल जारी है। तेज भाव वृद्धि को देखते हुए हर स्टॉक एक्सचेंज में दलालों ने जमकर एसीसी-अपोलो टायरों को <em>&#8216;माथे मार दिया&#8217;</em>। (शार्ट सेल किया-बिना डिलीवरी का माल बेचना इस आशा से कि भाव घटने पर खरीद कर लेंगे)। परंतु उन दलालों को शायद यह ज्ञात नहीं था कि यह तेजड़िया वाकई <em>&#8216;तेज&#8217;</em> है। 3 जनवरी को &#8216;<em>पटावत</em>&#8216; (सेटलमेंट) के दिन हर्षद मेहता ने जब दोनों शेयरों की डिलीवरी मांगी, तो सभी स्तंभित रह गए। सभी को आशा थी कि भारी खरीदी का भुगतान न कर पाने की स्थिति में हर्षद मेहता सौदों का &#8216;<em>बदला</em>&#8216; देकर उन्हें अगले सेटलमेंट पर &#8216;<em>केरी-ओवर</em>&#8216; कर देगा। परंतु हुआ इसका ठीक विपरीत। हर्षद मेहता ने दलालों और बीएसई अधिकारियों के &#8216;<em>सट्‌टात्मक खरीद</em>&#8216; के आरोप को गलत सिद्ध करते हुए अपनी पूरी खरीद का एक चेक से भुगतान कर एसीसी और अपोलो टायर के लाखों शेयरों की डिलीवरी मांग ली। इस पर दोनों ही शेयरों में बेचवाल दलालों को &#8216;ऊंधा बदला&#8217; या &#8216;<em>बेकवर्डेशन चार्ज</em>&#8216; जमा करना पड़ा, जिसकी नौबत स्टॉक एक्सचेंज में बहुत कम आती है।</p>
<p>&#8216;<em>सट्‌टे</em>&#8216; के आरोप के अलावा मेहता पर यह भी आरोप लगाया गया कि एक ओर तो उन्होंने लाखों शेयरों की डिलीवरी मांगी, दूसरी ओर &#8216;<em>शॉर्ट सेल</em>&#8216; वाले दलालों को &#8216;<em>ऊंधा बदला</em>&#8216; भरने के लिए रुपए भी उन्होंने ने ही दिए। इसके अलावा एसीसी में ग्रोमोर की &#8216;<em>होल्डिंग</em>&#8216; 5.4 प्रतिशत और अपोलो टायर में 5 प्र.श. के लगभग हो गई, जिससे इन कंपनियों के टेक ओवर की आशंका व्यक्त की जाने लगी है। इन्हीं विवादों का स्पष्टीकरण करने के लिए ग्रोमोर ने 10 जनवरी के अपने विज्ञापन में लिखा कि &#8216;हर्षद मेहता और ग्रोमोर की एसीसी और अपोलो टायर में रुचि सिर्फ आकर्षक वित्तीय निवेश हेतु है, न कि कंपनी हथियाने के लिए। ग्रोमोर के सभी निवेश गहन अध्ययन और विश्लेषण पर आधारित रहते हैं और 90 प्र.श. खरीद का डिलीवरी लेकर भुगतान किया जाता है। ग्रोमोर की एसीसी पर नजर अगस्त 89 में 300 के भाव से और अपोलो टायर पर सितंबर 89 में 62 के भाव से है। ग्रोमोर का अगर कंपनी टेक ओवर का इरादा हो, तो वह संबंधित मैनेजमेंट की पूर्ण जानकारी में रहता है, जैसा कि मजदा इंडस्ट्री और मजदा पैकेजिंग के मामले में हुआ है। इन दोनों कंपनियों का ग्रोमोर ने अधिग्रहण कर लिया है।</p>
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		<title>सिनेमा हॉल में गहने एवं पैकेट में गंगाजल</title>
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		<pubDate>Mon, 08 Jul 1991 06:55:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[ईरोस]]></category>
		<category><![CDATA[गंगाजल]]></category>
		<category><![CDATA[प्रिटी वूमन]]></category>
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		<category><![CDATA[सिनेमा में बाजार]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा हॉल]]></category>

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		<description><![CDATA[किसी ने शायद सच ही कहा था &#8216;एक जुझारु विक्रेता (सेल्समैन) तो रेत के टीले के गुणों का बखान कर उसे भी बेच सकता है।&#8216; संभवतः इसी तर्ज के &#8216;इनोवेटिव&#8216; विज्ञापन-विपणन-विक्रय की सख्त जरूरत वर्तमान समय में जितनी पहले कभी महसूस नहीं हुई है। आज प्रदेश-देश-विदेश के बाजारों में वस्तुओं और सेवाओं की सुगम उपलब्धि की इतनी बहुतायत है कि ग्राहक को आकर्षित करने हेतु हर संभव-असंभव प्रयास करना पड़ता है। इस अत्यंत प्रतिस्पर्धी माहौल में अंततः बाजी वही मार [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2119" alt="100" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1991/07/100.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">कि</span>सी ने शायद सच ही कहा था &#8216;<em>एक जुझारु विक्रेता (सेल्समैन) तो रेत के टीले के गुणों का बखान कर उसे भी बेच सकता है।</em>&#8216; संभवतः इसी तर्ज के &#8216;<em>इनोवेटिव</em>&#8216; विज्ञापन-विपणन-विक्रय की सख्त जरूरत वर्तमान समय में जितनी पहले कभी महसूस नहीं हुई है। आज प्रदेश-देश-विदेश के बाजारों में वस्तुओं और सेवाओं की सुगम उपलब्धि की इतनी बहुतायत है कि ग्राहक को आकर्षित करने हेतु हर संभव-असंभव प्रयास करना पड़ता है।</p>
<p>इस अत्यंत प्रतिस्पर्धी माहौल में अंततः बाजी वही मार लेता है, जो या तो नित नए लुभावने ढंग से ग्राहकों तक अपना संदेश पहुंचाता है अथवा कोई ऐसी वस्तु सेवा का &#8216;<em>अनछुआ क्षेत्र</em>&#8216; खोजने और विकसित करने का जोखिमभरा बीड़ा उठाता है, जो ग्राहक की किसी आवश्यकता की आपूर्ति करता हो। इन्हीं दोनों आयामों को आधार स्तंभ मानते हुए पिछले दिनों दो बिलकुल भिन्न श्रेणी के &#8216;<em>कैम्पेन</em>&#8216; ने सभी को अचंभित कर दिया। दोनों ही के बाजार निर्माता, विक्रेता, ग्राहक और विज्ञापन के तौर-तरीके में कोई समानता नहीं थी। अगर समानता थी तो सिर्फ यही कि दोनों ही ने एकदम ताजी नवीन शैली का प्रयोग किया और प्रशंसनीय सफलता अर्जित की।</p>
<p><strong>सिनेमा में बाजार</strong></p>
<p>टीवी-वीडियो के आक्रमण के पश्चात छबिगृहों में दर्शकों की लंबी कतारें (सप्ताहांत के अलावा) अब एक दुर्लभ दृश्य बन गई हैं। फिल्म चाहे कितनी ही अच्छी क्यों न हो, 3-4 सप्ताह में तो टिकट खिड़की पर सन्नाटा छा ही जाता है। लेकिन दक्षिण बंबई में स्थित &#8216;<em>ईरोस</em>&#8216; सिनेमागह में तो यह दुर्लभ दृश्य लगभग 22 हफ्तों तक लगातार देखने को मिला। छबिगृह में उस समय प्रदर्शित अंग्रेजी फिल्म &#8216;प्रिटी वूमन&#8217; ने निःसंदेह हर जगह धूम मचा दी थी, परंतु <em>&#8216;ईरोस&#8217;</em> में उमड़ पड़ी अपार भीड़ का कारण महज फिल्म की लोकप्रियता नहीं था।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">अगर समानता थी तो सिर्फ यही कि दोनों ही ने एकदम ताजी नवीन शैली का प्रयोग किया और प्रशंसनीय सफलता अर्जित की<span></span></div>
<p>यह अजीबो-गरीब सा प्रतीत होने वाला कारण था सिनेमा में घटती दर्शक संख्या और जेवरात के बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा से उभर पाने हेतु की गई एक अनूठी जुगलबंदी, जिसने संगत कर रहे दोनों ही सहभागियों को बहुत लाभ पहुंचाया। <em>&#8216;ईरोस&#8217;</em> सिनेमा हॉल के मालिक और फिल्म &#8216;<em>प्रिटी वूमन</em>&#8216; के वितरक वॉर्नर ब्रदर्स (सुदूर पूर्व) एवं &#8216;<em>एस्टैल</em>&#8216; ब्रांड के फैशनेबल गहनों के निर्माता नोर्मेक फैशंस, दोनों ही का ग्राहक वर्ग नौजवान पीढ़ी थी। इस ग्राहक वर्ग को एक ही समय में कारगर ढंग से आकर्षित करने के लिए इन दोनों ने आपस में अनुबंध कर लिया।</p>
<p>सिनेमा हॉल के समूचे प्रांगण, अहाते, गलियारे को जैसे एस्टैल जेवरात के एक वृहद &#8216;<em>शो रूम</em>&#8216; में परिवर्तित कर दिया गया था। युवा वर्ग को लुभाने हेतु बहुत प्रचार-प्रसार कर &#8216;<em>एस्टैल फेस 91</em>&#8216; नामक सौंदर्य प्रतियोगिता की घोषणा की गई। प्रत्येक सप्ताह फिल्म देखने आई युवतियों में से सबसे सुंदर का चुनाव &#8216;<em>सप्ताह सुंदरी</em>&#8216; के रूप में किया जाने लगा। फिर &#8216;<em>एस्टैल जेवरात</em>&#8216; में सजी-धजी उस युवती का चित्र परिसर में कई स्थानों पर प्रदर्शित किया गया। बस, बंबई शहर के सभी कॉलेजों में मानो होड़-सी लग गई कि किस कॉलेज की छात्राएं सर्वाधिक बार &#8216;<em>सप्ताह सुंदरी</em>&#8216; का खिताब हासिल करती हैं। टिकट खिड़की पर युवा दर्शकों की कतारें घंटों पहले लगने लग गईं और एस्टैल जेवरात सभी जगह चर्चा का विषय बन गए।</p>
<p>इस अनोखी स्कीम की आशातीत सफलता ने सिनेमा मालिकों और जेवरात निर्माताओं दोनों ही को स्तंभित कर दिया। वॉर्नर ब्रदर्स (सुदूर पूर्व) के अनुसार टिकटों की बिक्री ने बॉक्स ऑफिस के कई नए कीर्तिमान स्थापित किए और तीसरे सप्ताह का 1,68,830 रुपए का &#8216;क्लेक्शन&#8217; भारत में वॉर्नर ब्रदर्स की सर्वकालिक सर्वाधिक कमाई है। वहीं दूसरी ओर नोर्मेक फैशंस की सिनेमा परिसर में जेवरात बिक्री 9,000 रुपए प्रतिदिन तक पहुंच गई। अनुबंध के तहत नोर्मेक फैशंस ने फिल्म का पूरा विज्ञापन का खर्च एवं 15,000 रुपए प्रति सप्ताह का प्रायोजन शुल्क वहन किया। बदले में &#8216;<em>ईरोस</em>&#8216; सिनेमागृह ने उन्हें सिनेमा परिसर में जेवरात के भरपूर प्रचार-प्रसार एवं बिक्री की अनुमति दी थी। इस स्कीम का चरमोत्कर्ष सौ दिनों के पश्चात <em>&#8216;सप्ताह सुंदरी&#8217;</em> में से सर्वश्रेष्ठ को &#8216;<em>एस्टैल फेस 91</em>&#8216; का खिताब देकर हुआ॥ &#8216;<em>ईरोस</em>&#8216; सिनेमा में पहले भी इस प्रकार का प्रयोग किया जा चुका है। अंग्रेजी फिल्म &#8216;<em>हू फ्रेम्ड रोजर रेबिट</em>&#8216; के समय एक घड़ी निर्माता के साथ ऐसा ही अनुबंध हुआ था। स्कीम की सफलता को देखते हुए उसके भविष्य में भी दोहराए जाने की संभावना है।</p>
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