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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल &#187; बॉलीवुड की चुनिंदा फिल्में | प्रमुख बॉलीवुड फिल्मो का विश्लेषण</title>
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		<title>किंग&#8217; हो कोई, &#8216;शहँशाह&#8217; वही</title>
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		<pubDate>Fri, 15 Aug 2008 12:22:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[बॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[अमिताभ बच्चन]]></category>
		<category><![CDATA[ऐश्वर्या बच्चन]]></category>
		<category><![CDATA[प्रीति जिंटा]]></category>
		<category><![CDATA[विशाल शेखर]]></category>
		<category><![CDATA[शहँशाह]]></category>

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		<description><![CDATA[बॉलीवुड के कलाकारों के &#8216;स्टेज कार्यक्रम&#8216; अमेरिका में सदा ही चर्चित रहे हैं। सुनहरे पर्दे के बाहर स्टेज पर अपने चहेते &#8216;स्टार्स&#8216; को नाचते-गाते देखने के लिए लोग हमेशा लालायित रहते हैं। और इन कलाकारों, आयोजकों को अच्छी कमाई भी हो जाती है। ऐसे में बॉलीवुड के प्रथम परिवार- अमिताभ, अभिषेक, ऐश्वर्या बच्चन और अन्य कलाकारों के स्टेज प्रोग्राम &#8216;अनफॉरगेटेबल टूर&#8217; के अभी तक सभी सोपान अविस्मरणीय रहे हैं। 15 अगस्त को न्यूयॉर्क में हुए कार्यक्रम को तो खुद अमिताभ [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2008/08/JM_4_Unforgettable.jpg" alt="किंग' हो कोई, 'शहँशाह' वही" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-2878" /><span class="dropcap">बॉ</span>लीवुड के कलाकारों के &#8216;<em>स्टेज कार्यक्रम</em>&#8216; अमेरिका में सदा ही चर्चित रहे हैं। सुनहरे पर्दे के बाहर स्टेज पर अपने चहेते &#8216;<em>स्टार्स</em>&#8216; को नाचते-गाते देखने के लिए लोग हमेशा लालायित रहते हैं। और इन कलाकारों, आयोजकों को अच्छी कमाई भी हो जाती है। ऐसे में बॉलीवुड के प्रथम परिवार- अमिताभ, अभिषेक, ऐश्वर्या बच्चन और अन्य कलाकारों के स्टेज प्रोग्राम <em>&#8216;अनफॉरगेटेबल टूर&#8217;</em> के अभी तक सभी सोपान अविस्मरणीय रहे हैं। 15 अगस्त को न्यूयॉर्क में हुए कार्यक्रम को तो खुद अमिताभ ने अपने ब्लॉग पर &#8216;<em>सबसे सफल और ऐतिहासिक</em>&#8216; माना।</p>
<p><b>अनफॉरगेटेबल टूर</b></p>
<p>बच्चन परिवार, रितेश देशमुख, प्रीति जिंटा और विशाल शेखर जैसे कलाकरों को पेश करते हुए &#8216;<em>विजक्रॉफ्ट</em>&#8216; ने &#8216;<em>अनफॉरगेटेबल टूर</em>&#8216; (अविस्मरणीय यात्रा) का पूरा कार्यक्रम बनाया। अमेरिका, कनाडा, त्रिनिदाद और फिर इंग्लैंड, जर्मनी, हॉलैंड को मिलाकर इस यात्रा में 11 स्टेज प्रोग्राम होने वाले हैं। यात्रा का सफर 18 जुलाई को टोरंटो से शुरू हुआ। अमेरिका का आखिरी कार्यक्रम 15 अगस्त की रात न्यूयॉर्क में हुआ और इस यात्रा का अंतिम पड़ाव 30 अगस्त को यूरोप में होगा। पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा, स्टेज के सारे कलाकार और कोरियोग्राफी को अंजाम शामक डावर ने दिया। स्थानीय आकर्षण बढ़ाने के लिए टोरंटो में अक्षय कुमार, अमेरिका में माधुरी दीक्षित और लंदन में शिल्पा शेट्टी भी कार्यक्रम में शामिल हैं। सिर्फ अमेरिका में ही कोई 75-80 हजार लोगों ने इस कार्यक्रम को अलग-अलग शहरों में देखा है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">50 डॉलर से 500 डॉलर तक की टिकट कीमत के बावजूद हर टिकट दोगुने दाम पर खरीदने को कई लोग इंटरनेट पर तैयार थे<span></span></div>
<p>9 अगस्त को अटलांटिक सिटी में और 15 अगस्त को लांग आईलैंड में कार्यक्रम हुए। इन दो शहरों में सिर्फ 150 मील का फासला है, लेकिन न्यूयॉर्क, न्यूजर्सी में इतना बड़ा प्रवासी समुदाय है कि दोनों शो को मिलाकर लगभग 25000 लोग थे। हाल में एक भी सीट खाली नहीं थी। 50 डॉलर से 500 डॉलर तक की टिकट कीमत के बावजूद हर टिकट दोगुने दाम पर खरीदने को कई लोग इंटरनेट पर तैयार थे।</p>
<p><b>15</b><b> अगस्त को नसाऊ स्टेडियम</b><b>, </b><b>लांग आईलैंड</b><b>, </b><b>न्यूयॉर्क</b></p>
<p>न्यूयॉर्क में इन दिनों गर्मी का मौसम है। लेकिन गर्मी में जब यहाँ बारिश हो जाती है तो कम समय में भी झड़ी लग जाती है। 15 अगस्त की शाम को ऐसी ही झड़ी लग गई और कार पार्किंग से हाल में जाना भी मुश्किल हो रहा था। इस मूसलधार बारिश के बावजूद लोगों का जोश भरपूर था। रात 9 बजे कार्यक्रम शुरू होने के समय 11000 लोगों की क्षमता वाला स्टेडियम खचाखच भरा था। दृश्य-श्रव्य के बड़े उपकरण, विशाल टीवी स्क्रीन और अद्भुत स्टेज इफेक्ट, यह सभी कार्यक्रम में आकर्षण बने रहे।</p>
<p>न्यूयॉर्क के कार्यक्रम की शुरुआत हुई रितेश देशमुख से और फिर आईं प्रीति जिंटा। प्रीति की प्रसिद्ध फिल्में न्यूयॉर्क में ही फिल्माई गई हैं। फिर आए अभिषेक, जिन्होंने स्टेडियम के पीछे से दर्शकों के बीच में जोरदार &#8216;<em>इंट्री</em>&#8216; की। एक विशेष ट्रॉली में खड़े होकर अभिषेक दर्शकों के ऊपर से काफी करीब गए। अपनी चर्चित और आने वाली फिल्मों के गानों पर नाच-गाकर कलाकारों ने दर्शकों के बीच समा-सा बाँध दिया। अभिषेक ने स्टेज पर बुलाया ऐश्वर्या को और बॉलीवुड की इस चर्चित जोड़ी का स्टेज पर भरपूर अभिवादन हुआ। रितेश, अभिषेक, ऐश्वर्या और प्रीति के अकेले और एक-दूसरे के साथ नाच-गाने के सिलसिले ने पूरे हॉल में धूम मचा दी। इनके बाद विशाल-शेखर की जोशीली जोड़ी ने दर्शकों को अपने साथ मिलकर गाने और थिरकने का आह्वान किया।</p>
<p><b>और फिर&#8230;</b></p>
<p>जिस घड़ी का सबको बड़ी बेसब्री से इंतजार था, भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े महानायक को देखने, सुनने, अपने बीच में महसूस करने का। मंच पर आते ही अपनी पहली पारी की फिल्मों के गानों पर थिरकते हुए अमिताभ बच्चन ने महसूस ही नहीं होने दिया कि वह 65 वर्षीय नानाजी हैं, जिनकी नातिन हॉल में ही बैठी थी।</p>
<p>4 घंटों से अधिक चले अनवरत कार्यक्रम का अविस्मरणीय पल था- पर्दे के अमिताभ को मंच के अमिताभ की आवाज में सुनना। आजादी की लड़ाई के लिए लिखी बच्चनजी की &#8216;<em>अग्निपथ</em>&#8216; को 15 अगस्त को समर्पित करते हुए अमिताभ ने अपनी चिर-परिचित आवाज में दोहराया। उसके बाद अपनी दिवंगत माँ को याद करते हुए अमिताभ ने फिल्म &#8216;दीवार&#8217; के मंदिर वाले प्रसिद्ध दृश्य की पंक्तियाँ दोहराईं।</p>
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		<title>अमिताभ करीब से</title>
		<link>https://www.jmuchhal.com/amitabh-kareeb-se</link>
		<comments>https://www.jmuchhal.com/amitabh-kareeb-se#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 15 Oct 2007 11:35:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[बॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[अभिषेक बच्चन]]></category>
		<category><![CDATA[अमिताभ बच्चन]]></category>
		<category><![CDATA[गॉडफादर]]></category>
		<category><![CDATA[जया बच्चन]]></category>
		<category><![CDATA[टू बी ऑर नॉट बी]]></category>
		<category><![CDATA[बच्चन परिवार]]></category>

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		<description><![CDATA[पसंदीदा भोजन : भारतीय शाकाहारी पसंदीदा फूल : बेला पसंदीदा किताब : मुहम्मद अली की आत्मकथा &#8216;अली&#8217; पसंदीदा चित्रकार : सुभाष अवचट पसंदीदा पाश्चात्य पोशाक डिजाइनर : अरमानी पसंदीदा भारतीय पोशाक डिजाइनर : अबु संदीप पसंदीदा जूते : लोफर्स पसंदीदा गाड़ी : लांगिनेस पसंदीदा शौक : फोटोग्रॉफी पसंदीदा पोशाक : कुर्ता, पाजामा पसंदीदा भारतीय फिल्म : कागज के फूल पसंदीदा हॉलीवुड फिल्म : गॉडफादर पसंदीदा भारतीय गायक : शुभा मुदगल (जया बच्चन द्वारा प्रस्तुत अमिताभ की जीवन घटना “टू बी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><b><img class="alignleft size-full wp-image-1662" alt="अमिताभ करीब से" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2013/01/107.jpg" width="311" height="307" />पसंदीदा भोजन : </b>भारतीय शाकाहारी</p>
<p><b>पसंदीदा फूल :</b> बेला</p>
<p><b>पसंदीदा किताब</b> : मुहम्मद अली की आत्मकथा &#8216;अली&#8217;</p>
<p><b>पसंदीदा चित्रकार : </b>सुभाष अवचट</p>
<p><b>पसंदीदा पाश्चात्य पोशाक डिजाइनर :</b> अरमानी</p>
<p><b>पसंदीदा भारतीय पोशाक डिजाइनर :</b> अबु संदीप</p>
<p><b>पसंदीदा जूते :</b> लोफर्स</p>
<p><b>पसंदीदा गाड़ी :</b> लांगिनेस</p>
<p><b>पसंदीदा शौक : </b>फोटोग्रॉफी</p>
<p><b>पसंदीदा पोशाक :</b> कुर्ता, पाजामा</p>
<p><b>पसंदीदा भारतीय फिल्म : </b>कागज के फूल</p>
<p><b>पसंदीदा हॉलीवुड फिल्म : </b>गॉडफादर</p>
<p><b>पसंदीदा भारतीय गायक :</b> शुभा मुदगल</p>
<p style="text-align: center;" align="right">(जया बच्चन द्वारा प्रस्तुत अमिताभ की जीवन घटना “<em>टू बी ऑर नॉट बी</em>” पुस्तक से साभार)</p>
<p align="center"><b>एक सच्चे कलाकार की प्रतिबद्धता</b></p>
<p><b>शराबी :</b></p>
<p>1983 में दिवाली मनाते हुए दिल्ली में एक पटाखा मेरे बाएं हाथ में फट गया था। पूरी हथेली जल गई थी और चमड़ी में बहुत जलन थी। इसलिए मुझे शराबी की शूटिंग के दौरान काफी समय अपने बाएं हाथ को पेंट की जेब में मजबूरन रखना पड़ा था। &#8216;<em>मुझे नौलखा मंगा दे</em>&#8216; में पूरे समय नुकीले घुंघरू को अपने हाथ पर बजाना था, जो बहुत दर्दनाक था। उस गाने में मेरे हाथों से निकलता खून एकदम असली था- खुद मेरा।</p>
<p><b>डॉन : </b></p>
<p>उन दिनों मैं 2 शिफ्ट कर रहा था। सुबह <b>नास्तिक</b> और फिर दोपहर 1 से रात 10 बजे तक <b>डॉन</b>। इसके कारण दोनों पावों में छाले पड़ गए थे। मुझे &#8216;<em>खई के पान बनारस…</em>&#8216; के लिए नंगे पांव शूटिंग करनी थी और मैं तो ठीक से चल भी नहीं पा रहा था। डॉक्टरों को बुलाना पड़ा। और उन्होंने मुझे पांव की एड़ी को सुन्न करने के इंजेक्शन दिए। उसके बाद मैं वह डांस कर पाया।</p>
<p><b>कभी खुशी कभी गम : </b></p>
<p>&#8216;<em>शावा शावा</em>&#8216; वाला डांस के लिए करण जौहर ने मुझे बहुत आग्रह किया। लेकिन मैं बहुत अशक्त महसूस कर रहा था। मेरी कमर में उस समय असहनीय दर्द था। लेकिन फिर भी फराह खान के साथ मैंने कई बार रिहर्सल की। वह मेरे दर्द से हो रही खामियों को नजरअंदाज करती रहीं। शाहरुख तो कुछ पल में ही सारे कदम समझ गए। लेकिन मुझे तो बहुत रिहर्सल करनी पड़ी। मुझे बहुत सारी दर्द निवारक गोलियां खानी पड़ी &#8216;शावा शावा&#8217; के लिए।</p>
<p><b>अमिताभ की जिंदगानी</b><b>, बच्चन परिवार की जुबानी&#8230;</b></p>
<p><b>अभिषेक : </b></p>
<p>&#8216;हमेशा दूर रहने के बावजूद पा हमेशा मेरे पास ही थे। उन्होंने कभी भी घर पर हमें उनकी कमी महसूस नहीं होने दी। कुछ समय पहले तक उन्हें मुझे चिट्‍ठियां लिखने का बड़ा शौक था &#8211; हर जगह से, आउटडोर शूटिंग, प्लेन के सफर, विदेशों से और मैं भी कोशिश करता था, उनके जवाब देने के लिए। वह बाहर इतने बड़े कलाकार थे, लेकिन घर में वह सिर्फ हमारा पा थे। किसी भी विषय पर पा मुझे बहुत गहराई से अपना दृष्टिकोण समझाते हैं, लेकिन मुझे अपना फैसला खुद करने के लिए प्रोत्साहन देते हैं। पा आज भी मानते हैं कि वह तो एक साधारण कलाकार हैं, लेकिन मेरी और दुनिया की नजर में वे शायद कुछ और हैं&#8217;</p>
<p><b>श्वेता : </b></p>
<p>अमिताभ बच्चन की बेटी होना कैसा लगता है। मैं आज भी इस सवाल का जवाब नहीं जानती। क्योंकि मुझे तो उनके साथ हमेशा एक पिता का ही रिश्ता मालूम है, एक &#8216;<em>स्टार</em>&#8216; का नहीं। शाम को शूटिंग से घर लौटने के बाद पापा दिन भर की कोई बात नहीं करते थे। शूटिंग अच्छी रही या नहीं, उनका दिन अच्छा रहा या नहीं, हमें वह दिन भर की फिल्मी दुनिया के माया जाल से हमेशा चाह कर अलग ही रखते थे। एबीसीएल और बोफोर्स के दिन उनके जीवन के सबसे विषम दिन थे। वे किसी से कोई बात नहीं करते थे। हमें इंतजार रहता था दिल्ली से अमर सिंहजी के आने का। जिनसे पापा खुलकर अपनी पीड़ा जाहिर कर पाते थे। और फिर &#8216;<em>कौन बनेगा करोड़पति</em>&#8216; के बाद उनका सितारा फिर बुलंद होने लगा।&#8217;</p>
<p><b>जया : </b></p>
<p>&#8216;सिलसिला में मेरे पात्र को लेकर कई चर्चे थे। मैं खुद भी यश चोपड़ाजी के ऑफर पर दो मन में थी &#8211; हां करूं या नहीं। फिर मैंने निर्णय किया, क्या फर्क पड़ता है। मुझे उस वक्त फिल्मों में रोल किए 4 साल हो गए थे। और कैमरा के सामने लौटने का यह अच्छा अवसर था। और मुझे कोई अफसोस नहीं है वह रोल करके। और उस फिल्म के दो सबसे चहेते सीन थे &#8211; एक जब वो मुझे कहकर घर छोड़कर जा रहे थे कि वह दूसरी औरत से प्यार करते हैं, और दूसरा अस्पताल में संजीव कुमार के साथ&#8230; आज अमितजी एक कलाकार के रूप में बहुत ही अलग मुकाम पर हैं। वे तरह-तरह के रोल और सिनेमा करने को तैयार हैं, तत्पर हैं। फैशन शो के कैटवॉक पर चढ़ने में भी वे बहुत उत्साहित नजर आ रहे थे। ऐसा लगता है कि उन्हें भी अनदेखे रोल और नई चुनौतियों में काम करने में आनंद आ रहा है।&#8217;</p>
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		<title>‘सरकार’, जन्मदिन मुबारक हो !!!</title>
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		<pubDate>Tue, 11 Oct 2005 07:42:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[बॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[अग्निपथ]]></category>
		<category><![CDATA[अमिताभ बच्चन]]></category>
		<category><![CDATA[अमिताभ बच्चन जन्मदिन]]></category>
		<category><![CDATA[‘सरकार’]]></category>

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		<description><![CDATA[सिर्फ भारत ही नहीं, वरन् पूरी दुनिया के फिल्म इतिहास में ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा कि किसी कलाकार ने अपनी उमर के 63वें साल में उस साल के चार सफलतम फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। बॉलीवुड में 2005 की सर्वाधिक ‘हिट’ रही चार फिल्मों- बंटी और बबली, ब्लैक, वक्त और सरकार, चारों ही में अमिताभ बच्चन के किरदार ने सदा की तरह अपनी अमिट छाप छोड़ दी है। आज 11 अक्टूबर को अपने बाबूजी का ‘अमित’, कुछ करीबी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2059" alt="‘सरकार’, जन्मदिन मुबारक हो!!!" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2013/01/112.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">सि</span>र्फ भारत ही नहीं, वरन् पूरी दुनिया के फिल्म इतिहास में ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा कि किसी कलाकार ने अपनी उमर के 63वें साल में उस साल के चार सफलतम फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। बॉलीवुड में 2005 की सर्वाधिक ‘<em>हिट</em>’ रही चार फिल्मों- बंटी और बबली, ब्लैक, वक्त और सरकार, चारों ही में अमिताभ बच्चन के किरदार ने सदा की तरह अपनी अमिट छाप छोड़ दी है। आज 11 अक्टूबर को अपने बाबूजी का ‘<em>अमित</em>’, कुछ करीबी रिश्तों के लिए ‘<em>अमितजी</em>’ और करोड़ों चाहने वालों के लिए सिर्फ अमिताभ या ‘<em>बीग बी</em>’ अपने जीवन के 64वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। जन्मदिन तो हर साल आता है, और विशिष्ट लोगों का हर जन्मदिन ‘<em>खास</em>’ ही होता है, लेकिन आज अमिताभ बच्चन के जन्मदिन पर दुआएं और बधाइयां देने का एक खास मकसद है- पिछले 365 दिनों में – चाहे वह विज्ञापन का होर्डिंग हो, या सिनेमा का बड़ा पर्दा, या फिर टीवी का छोटा परदा और मोबाइल फोन के छोटा सा झरोखा- अमिताभ ने अपने हर रूप और रोल में पूरी दुनिया में बसे भारतवासियों के दिलों को बार-बार छुआ है। और यह झंकार सिर्फ एक कलाकार की बेजोड़ कला पर नहीं है, यह तालियां सिर्फ उस गहरी आवाज और विलक्षण व्यक्तित्व तक सीमित नहीं है; अपितु यह अभिवादन है हमारे उन अक्षुण्ण मूल्यों का, जो अमिताभ ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व में जीवंत कर दिया है। यह आदर है पिता हरिवंश राय बच्चन के लिखे ‘अग्निपथ का, जिसे अमिताभ ने हर पल जिया है मानो ‘<em>तू ना रूकेगा कभी, तू ना थमेगा कभी, तू ना थकेगा कभी, कर शपथ!!!</em>’</p>
<p>प्रौढ़ावस्था में भी अपनी कुर्सी या काम से ‘<em>चिपके</em>’ रहने की परेशानी तो बहुतों को होती हैं और फिल्म जगत में तो विशेषकर। वहीं दूसरी ओर 1970 से शुरू हुए अपने 36 वर्षीय फिल्मी सफर में गोया अमिताभ ने सिर्फ पिछले 36 महीने ही गुजारे होते, तो भी वह कलाकार के रूप में अपनी अमित छाप छोड़ देते।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">अमिताभ ने हर पल जिया है मानो ‘तू ना रूकेगा कभी, तू ना थमेगा कभी, तू ना थकेगा कभी, कर शपथ!!!’<span></span></div>
<p><strong>सिर्फ पलभर के लिए आंखें मूंदकर अपने सामने गुजरने दीजिए-</strong> ‘<em>बागबान</em>’ के राज मल्होत्रा का माँ-बाप और आज की पीढ़ी को पहचान बताने वाले आत्सम्मान से भरे मार्मिक विचार, ‘<em>सरकार</em>’ में पूरी फिल्म में चुनिंदा संवाद बोलकर भी चाय की प्याली में से उनकी बोलती हुई निगाहें, ‘<em>वीर जारा</em>’ और ‘<em>पहेली</em>’ में छोटी सी गेस्ट एपियरेंस लेकिन सशक्त। वहीं दूसरी और ‘<em>विरूद्ध</em>’, ‘देव’ और ‘खाकी’ जैसी फिल्मों में लड़ाई और मुकाबला करने और सच साबित करने के संघर्ष में एक आंतरिक शक्ति। और सिर्फ अभिनय नहीं, लेकिन डांसेज में भी अमिताभ आज की पीढ़ी से कदम से कदम मिला कर थिरक रहे हैं। ‘<em>वक्त</em>’ और ‘<em>बागबान</em>’ में उनके जोशीले डांसेज के बाद ‘<em>कजरारे</em>’ में तो उन्होंने कमाल ही कर दिया। ‘<em>आइटम नंबर</em>’ जैसे ही एक देसी गाने में अपने बेटे और ऐश्वर्या राय के साथ उन्होंने होश में रहते हुए भी जिस मदहोशी को परदे पर उतारा, वह जादू सारे हिंदुस्तान के मोबाइल्स की रिंगटोन पर सुनाई दे रहा है। लेकिन अमिताभ-2 का अधिकांश रोल अपने आप में बेमिसाल है। और फिर है ‘<em>ब्लैक</em>’ – जो खुद अमिताभ भी अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ रोल में गिनाते हैं। सिनेमा जगत की दूसरी विभूति लताजी ‘<em>ब्लैक</em>’ देखकर इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने अमिताभ को ‘<em>ब्लैक</em>’ में उनके अभिनय पर बधाई देते हुए एक पत्र लिखा।</p>
<p><strong>अमिताभ के करियर को तीन भागों में देखा जा सकता है -</strong> ‘<em>स्टार</em>’ से ‘सुपरस्टार’ बनते हुए ‘एंग्री यंगमैन’ के रूप में अमिताभ; जिस तक सिर्फ सलीम-जावेद, मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और यश चोपड़ा जैसे चुनिंदा फिल्मकार ही पहुंच सकते थे, और उसकी ‘<em>स्टारडम</em>’ में इनका भी बड़ा योगदान था। फिर आया दौर बीमारी, बोफोर्स और एबीसीएल का, जिसने अमिताभ जैसे हर दिल अजीज के घर को भी नीलामी की कगार तक पहुंचा दिया। यह दिन अमिताभ के जीवन के सबसे विषम दिन थे। अमिताभ चाहते तो उन सब जिम्मेदारियों से अपने आपको बड़े आराम से विलग कर सकते थे, दुनिया में अधिकांश लोग वैसा ही करते हैं, और उसके बावजूद फिल्म और इतिहास में उनका नाम सदा के लिए दर्ज तो हो चुका था। लेकिन यह अमिताभ के लिए काफी नहीं था। अपने कुल और पिता हरिवंश राय बच्चन के नाम और प्रतिष्ठा पर लगा एक भी संदेह या दाग अमिताभ को चैन से जीने नहीं दे रहा था। सौ साल बाद भी कोई बच्चन नाम के साथ किसी विवाद का भी जिक्र करे, यह उन्हें बर्दाश्त नहीं था। यही थे उनकी खानदानी गुण। मूल्य और ‘<em>संस्कार</em>’ जिन्होंने उनके जीवन के तीसरे और अविस्मर्णीय सोपान को जन्म दिया ‘<em>कौन बनेगा करोड़पति</em>’ और अपनी सुनहरी फ्रेंच कट ‘<em>दाढ़ी</em>’ के द्वारा। इसी अग्निपरीक्षा में उत्तीर्ण होकर अमिताभ मानव से महामानव और भारत के असली रत्न बन गए।</p>
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		<title>राजनीति का भावना से कोई संबंध नहीं</title>
		<link>https://www.jmuchhal.com/rajniti-ka-bhawna-se-koi-sambandh-nahi</link>
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		<pubDate>Sat, 08 Mar 2003 05:42:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[बॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[अमिताभ बच्चन न्यूयॉर्क]]></category>
		<category><![CDATA[अमिताभ बच्चन वीडियो]]></category>
		<category><![CDATA[जया बच्चन]]></category>
		<category><![CDATA[टू बी आर नॉट टू बी]]></category>
		<category><![CDATA[सुपर स्टार अमिताभ बच्चन]]></category>

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		<description><![CDATA[राजनीति में भावना के लिए कोई स्थान नहीं होता, मुझे राजनीति में जाने के बाद यह समझ में आया। नेहरू परिवार से करीबी रिश्ता होने के कारण राजनीति में प्रवेश मेरे लिए एक भावनात्मक निर्णय था। उस नाजुक समय में देश के नेतृत्व को संभाल रहे व्यक्ति को अपना सहयोग देने के लिए मैंने राजनीति में प्रवेश किया था। उसके बाद मेरे और मेरे परिवार पर बोफोर्स मामले में हर तरह के लांछन लगाए गए। मीडिया ने भी बहुत कुछ [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-3033" title="राजनीति का भावना से कोई संबंध नहीं" alt="" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2003/03/jm_c_AB_tobenottobe.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">रा</span>जनीति में भावना के लिए कोई स्थान नहीं होता, मुझे राजनीति में जाने के बाद यह समझ में आया। नेहरू परिवार से करीबी रिश्ता होने के कारण राजनीति में प्रवेश मेरे लिए एक भावनात्मक निर्णय था। उस नाजुक समय में देश के नेतृत्व को संभाल रहे व्यक्ति को अपना सहयोग देने के लिए मैंने राजनीति में प्रवेश किया था। उसके बाद मेरे और मेरे परिवार पर बोफोर्स मामले में हर तरह के लांछन लगाए गए। मीडिया ने भी बहुत कुछ छापा, मैंने उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। लेकिन एक दिन जब मेरे बाबूजी ने बुलाकर मुझसे पूछा कि बेटा, तुम कोई गलत काम तो नहीं कर रहे हो? तब मुझे लगा कि इसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। ये उद्‌गार सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के थे, जो 8 मार्च की शाम न्यूयॉर्क में आयोजित एक विशेष समारोह में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में व्यक्त कर रहे थे।</p>
<p><strong>&#8216;टू बी आर नॉट टू बी&#8217; किताब का विमोचन</strong></p>
<p>आयोजन था अमिताभ के 60वें जन्मदिन पर &#8216;<em>टू बी आर नॉट टू बी</em>&#8216; किताब का अमेरिका में अमिताभ-जया के हाथों विमोचन। साथ ही अमिताभ द्वारा शुरू किए गए टीवी एशिया न्यूज चैनल की 10वीं सालगिरह का कार्यक्रम। इस अवसर उपस्थित थे न्यूयॉर्क में भारतीय उच्चायुक्त व संयुक्त रक्षा में भारत के पदाधिकारी और न्यूयॉर्क में भारतीय समुदाय के गणमान्य सदस्य।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">एक दिन जब मेरे बाबूजी ने बुलाकर मुझसे पूछा कि बेटा, तुम कोई गलत काम तो नहीं कर रहे हो? तब मुझे लगा कि इसका डटकर मुकाबला करना चाहिए<span></span></div>
<p>मंच पर जैसे ही सूट पहने अमिताभ और काली पोशाक में जया बच्चन ने पदार्पण किया, पूरे हॉल में उत्तेजना की लहर फैल गई। दोपहर ही हवाई यात्रा से अमेरिका पहुंचे अमिताभ और जया थके-थके से अवश्य लग रहे थे। इसके बाद भी वे पूरे कार्यक्रम में शरीक हुए, सवाल-जवाब में पूरे ध्यान से जवाब दिए और देर रात तक एक लम्बी कतार में खड़े हार पहनाने वाले अपने प्रशंसकों के साथ मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाए। किताब की हर प्रति पर अमिताभ-जया ने हस्ताक्षर किए। पूरे हॉल में सबसे छोटे, लेकिन उनको बेहद चाहने वाले तीन वर्षीय सिद्धार्थ मुछाल से मिलकर तो अमिताभ-जया बहुत ही प्रसन्न हुए और उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। आज अमिताभ के चेहरे पर उनकी फेमस दाढ़ी की जगह सिर्फ सफेद मूंछें थीं। उन्होंने वादा किया कि दाढ़ी जल्दी ही उनके व्यक्तित्व में फिर शामिल हो जाएगी।</p>
<div class="simplePullQuoteLeftOrange">ये उद्‌गार सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के थे, जो 8 मार्च की शाम न्यूयॉर्क में आयोजित एक विशेष समारोह में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में व्यक्त कर रहे थे<span></span></div>
<p>अमिताभ पर प्रकाशित पुस्तक के आगे-पीछे दो चित्र हैं, एक अमिताभ के लड़कपन और एक हाल ही का चित्र है। जयाजी ने अमिताभ के विशाल पोस्टर को अपने पति के लिए अपने प्यार का इजहार बताया, साथ ही चुटकी लेते हुए कहा कि अमिताभ के जीवन की कई और अंतरंग बातें वे 20 साल बाद अमिताभ के 80वें जन्मदिन पर तोहफे के रूप में दूसरी किताब में लिखेंगी। 400 पेज की इस नायाब पुस्तक में 850 से अधिक चित्र हैं। किताब के लेखक हैं खालिद मुहम्मद। भारत में इसका मूल्य 2500 रुपए है। संक्षिप्त उद्‌बोधन में अमिताभ ने सभी चाहने वालों से वादा किया कि जब तक उनका तन-मन साथ देगा, तब तक वे अदाकारी से पूरी तरह जुड़े रहेंगे। प्रश्नों के उत्तर देते हुए अमिताभ के शब्दों से अपने माता-पिता के प्रति समर्पण, आदर और कृतज्ञता साफ महसूस की जा सकती थी। अपनी सफलताओं को वे माता-पिता का आशीर्वाद ही मानते हैं। बचपन से ही उन्हें पिता की सरलता और मूल्यों के साथ-साथ माता से पश्चिमी तौर-तरीके का भी ज्ञान मिला और ये दोनों ही उनके जीवन के सम्बल हैं। सभी प्रश्न-उत्तर अंगरेजी में होने पर मैंने नईदुनिया तथा वेबदुनिया के लिए प्रश्न करते हुए हुए अमिताभ से हिन्दी में जवाब देने के लिए विशेष अनुरोध किया, तो उन्होंने पूरा जवाब शुद्ध हिन्दी में दिया। बोफोर्स मामले पर बोलते हुए सही शब्द की तलाश में वे एक पल रुके भी और फिर &#8216;षड्‌यंत्र&#8217; शब्द कहा तो पास बैठी जया बच्चन भी उनकी इतनी सही शब्दावली से दंग रह गईं।</p>
<div class="simplePullQuoteRightPerpal">तुम एक कलाकार हो, तुम्हें एक्टिंग आती है, तुम सिर्फ वही करो और उसी पर ध्यान दो<span></span></div>
<p><strong>जीवन का सर्वश्रेष्ठ अभिनय</strong></p>
<p>इसी संदर्भ में धीरूभाई अम्बानी से हुए वार्तालाप पर अमिताभ ने कहा कि धीरूभाई ने उन्हें समझाया कि अगर &#8216;सच&#8217; तुम्हारे साथ है तो तुम्हें किसी बात की फिक्र नहीं होना चाहिए। तुम एक कलाकार हो, तुम्हें एक्टिंग आती है, तुम सिर्फ वही करो और उसी पर ध्यान दो, बोफोर्स आदि राजनीतिक मामले धीरे-धीरे अपने आप हल हो जाएंगे। जीवन के सर्वश्रेष्ठ अभिनय के विषय पर अमिताभ बोले कि &#8216;बाबूजी कहते थे कि संतुष्टि तो संत-महात्माओं को ही होती है, कलाकार जिस दिन संतुष्ट हो जाएगा, उसी दिन से उसकी कला में कमी आ जाएगी।&#8217; फिल्म इंडस्ट्री में नई पीढ़ी के लिए उन्होंने कहा कि यह दुष्कर और कठोर परिश्रम का मार्ग है। दूर से दिखने वाली &#8216;चकाचौंध&#8217; वर्षों की कड़ी मेहनत और समर्पण के बाद ही नसीब होती है। पारिवारिक जीवन पर बल देते हुए वे कहने लगे कि अगर व्यक्ति का पारिवारिक जीवन सुखी और परिपूर्ण है, तो उसका सारा जीवन सुखद होगा। कविता की फरमाइश पर अमिताभ ने तुरंत कभी-कभी की मशहूर पंक्तियां भी सुनाईं। हर प्रश्न को ध्यान से सुनकर अमिताभ ने उसका गंभीरता से जवाब दिया। इस बात ने सभी के मन में उनके प्रति आदर-सम्मान और बढ़ा दिया। न्यूयॉर्क में एक सुपर स्टार के अलावा एक बहुत ही संस्कारित, खानदानी और विनम्र &#8216;सुपरमैन&#8217; के सानिध्य में गुजारी ये शाम हमेशा सभी को याद रहगी।</p>
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		<title>लड़ भैया, जीते लगान!</title>
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		<pubDate>Fri, 22 Mar 2002 06:12:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[बॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[आमिर खान प्रोडक्शंस]]></category>
		<category><![CDATA[आशुतोष गोवारीकर]]></category>
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		<description><![CDATA[अब जबकि &#8216;ऑस्कर&#8216; के पटल पर &#8216;लगान&#8216; के फैसले के उद्‌घोष में कुछ ही घंटे शेष हैं- क्योंकि निर्णायक मंडल के 5000 से अधिक सदस्यों ने अपना फैसला तो 19 मार्च को ही प्राइस वाटर हाउस के 2 ऑडिटरों को गुप्त रूप से बता दिया है- निर्णायक घड़ी से चंद लम्हे पहले &#8216;लगान&#8216; की तारीफ और उसकी संभावनाओं के बारे में क्या अभी भी कुछ कहना और लिखना बाकी रह गया है? आशुतोष गोवारीकर के एक सपने को, जिसे आमिर [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2043" alt="‘लड़ भैया, जीते लगान!’" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2002/12/95.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">अ</span>ब जबकि &#8216;<em>ऑस्कर</em>&#8216; के पटल पर &#8216;<em>लगान</em>&#8216; के फैसले के उद्‌घोष में कुछ ही घंटे शेष हैं- क्योंकि निर्णायक मंडल के 5000 से अधिक सदस्यों ने अपना फैसला तो 19 मार्च को ही प्राइस वाटर हाउस के 2 ऑडिटरों को गुप्त रूप से बता दिया है- निर्णायक घड़ी से चंद लम्हे पहले &#8216;<em>लगान</em>&#8216; की तारीफ और उसकी संभावनाओं के बारे में क्या अभी भी कुछ कहना और लिखना बाकी रह गया है?</p>
<p>आशुतोष गोवारीकर के एक सपने को, जिसे आमिर और उनकी अर्द्धांगिनी रीना दत्ता के आमिर खान प्रोडक्शंस ने 25 करोड़ से अधिक की लागत से जीवंत और अमर कर दिया, हर बार देखकर ऐसा लगता है कि यह महज कोई फिल्म है या निपुण नेतृत्व और &#8216;<em>टीम बिल्डिंग</em>&#8216; के सारे अध्यायों पर एक जीती-जागती किताब या फिर फिरंगी अत्याचार और दमन के विरोध में भगतसिंह की पिस्तौल और गांधी की लाठी की ही तरह एक जुझारू &#8216;<em>भुवन</em>&#8216; के बल्ले की दास्तान, जो &#8216;<em>एकला चलो रे</em>&#8216; से शुरू होकर पूरे चांपानेर प्रांत की &#8216;<em>डांडी यात्रा</em>&#8216; बन गई या फिर कर्म के प्रति संपूर्ण समर्पण एवं आस्था और &#8216;<em>कर्मफल</em>&#8216; के लिए &#8216;<em>पालनहारे</em>&#8216; पर उतनी ही अटूट &#8216;<em>भक्ति की शक्ति</em>&#8216; में विश्वास का गीता-ज्ञान या फिर अपने सच और सिद्धांतों पर अडिग अदम्य बने रहने वाले एक ऐसे सपने देखने वाले &#8216;<em>वामन</em>&#8216; की कहानी जिसने अछूत कचरा की अपाहिज उंगलियों में भी अपने &#8216;<em>एकलव्य</em>&#8216; को भांप लिया और सिर्फ अपने ग्वालों की टोली को उत्साहित करके हर विपदा में भी आशा को तलाश कर कैप्टन रसेल के घमंड के तीनों विकेट गिरा दिए!</p>
<div class="simplePullQuoteRight">भारतीय सिनेमा को भी विश्व में उसका सही सम्मान मिलेगा<span></span></div>
<p>ये संभव है कि कई लोगों के लिए &#8216;लगान&#8217; 3 घंटे 40 मिनट लंबी काल्पनिक क्रिकेट मैच पर बनी मधुर संगीत से सजी एक साधारण फिल्म के सिवा और कुछ नहीं लगे और वे उनकी जगह सही हैं। पर मुझे तो आज तक याद है कि पिछले साल न्यूयॉर्क में फिल्म के पहले दिन का शो देखने के बाद ही सबसे पहले मैंने इंदौर में अपने दादाजी को फोन किया था कि उन्हें &#8216;<em>लगान</em>&#8216; जरूर देखना चाहिए जबकि उन्होंने कई सालों में कोई फिल्म नहीं देखी होगी। मैं तो तबसे लगान के &#8216;<em>कर</em>&#8216; से मुक्त नहीं हो पाया हूं और आज उसी यज्ञ की पूर्णाहुति है। आमिर ने कुछ दिनों पहले एक प्रेस संदेश में कहा था कि वे चाहेंगे कि सारे भारतवासी &#8216;<em>लगान</em>&#8216; के ऑस्कर विजय के लिए जरूर प्रार्थना करें और मालवा की धर्म बहुल जनता की पुकार तो &#8216;<em>निर्गुण और न्यारे</em>&#8216; जरूर सुनेंगे! <em>&#8216;कर्म और धर्म&#8217;</em> के धागे का &#8216;<em>लगान</em>&#8216; में बड़ा ही अद्‌भुत ताना-बाना है।</p>
<p>&#8216;<em>लगान</em>&#8216; को ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म की अंतिम पंक्ति में नामजद किया जाना सिर्फ एकाकी &#8216;<em>इवेंट</em>&#8216; नहीं, लेकिन भारतीय कला के सभी अवयवों के संगम बॉलीवुड और उसकी फिल्मों के लिए एक <em>&#8216;ट्रेंड&#8217;</em> की शुरुआत है। खासकर अमेरिका में तो भारतीय संगीत और उसके रविशंकर, भारतीय ज्ञान और उसके डॉ. राणावत, भारतीय उद्योग और उसके नारायण मूर्ति ने अमेरिका की &#8216;<em>मुख्यधारा</em>&#8216; में अपने-अपने <em>&#8216;वंश&#8217;</em> की पहचान स्थापित कर दी है, लेकिन भारतीय, विशेषकर बॉलीवुड की फिल्मों को अभी अमेरिका की &#8216;<em>मैनस्ट्रीम</em>&#8216; में कोई खास जगह नहीं मिली है। मीरा नायर और सत्यजीत राय की कुछ अपनी पहचान जरूर है, लेकिन अब &#8216;<em>मानसून वेडिंग</em>&#8216; और उसके बाद &#8216;<em>लगान</em>&#8216; अमेरिका में जब टाइम्स स्क्वेयर पर मुख्य सिनेमाघरों में प्रदर्शित होंगी; ये बॉलीवुड उद्योग के लिए बहुत अच्छा है। लगान के लिए &#8216;<em>ऑस्कर</em>&#8216; इसी पहचान को और गहरा कर देगा, जिससे बॉलीवुड की फिल्में हॉलीवुड के सिनेमाघरों में दिखने लगीं। &#8216;<em>एमली</em>&#8216; और &#8216;<em>नो मैंस लैंड</em>&#8216; भी अपने आप में बहुत अच्छी विदेशी फिल्में हैं इसलिए &#8216;<em>लगान</em>&#8216; के लिए टक्कर कांटे की है, लेकिन आमिर-आशुतोष को तो एक ही धुन याद है &#8216;<em>बार-बार हां ,बोले यार हां, अपनी जीत हो&#8230;</em>&#8216;; आखिर 323 रन के लक्ष्य की दुर्गमता, बिछड़ते हुए साथियों का छूटता साथ और यार्डली की &#8216;<em>बॉडीलाइन</em>&#8216; गेंदों से पर्दे का &#8216;भुवन&#8217; भी कब घबराया था, उसके लिए तो सिर्फ यही था कि &#8216;<em>मिटना है तो मिट जाएं, बढ़े चलो!</em>&#8216; कितना सुखद संयोग है कि &#8216;<em>लगान</em>&#8216; की ऑस्कर यात्रा में भारतीय चित्रपट की दो सबसे &#8216;<em>बुलंद</em>&#8216; आवाजें और मूर्धन्य शिखर भी शरीक हैं, लता मंगेशकर के स्वर और अमिताभ बच्चन के बोल। यही नहीं, एकमात्र भारतीय ऑस्कर विजेता भानु अथैया ने ही इस फिल्म में पोशाकें रची हैं।</p>
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		<title>कमाल के महानायक कमल हासन &#8211; नायक-महानायक विशेषांक</title>
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		<pubDate>Thu, 31 Dec 1992 06:29:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[बॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[कमल हासन]]></category>
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		<category><![CDATA[नायकन]]></category>
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		<category><![CDATA[सागर संगमम्‌]]></category>
		<category><![CDATA[सोलहवां सावन]]></category>

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		<description><![CDATA[कोई भी कलाकार अभिनय-विधा के विशाल क्षितिज के चरमोत्कर्ष को उस वक्त छू लेता है, जब उसके अभिनय का रसास्वादन करता हुआ दर्शक यह भूल जाता है कि जो कुछ उसके सामने चल रहा है, वह महज &#8216;फंतासी&#8216; है, वास्तविक नहीं। अभिनय की यही नैसर्गिक अभिव्यक्ति उसकी सोलह कलाओं का उत्कृष्टतम स्वरूप है। यही वह शिखर है जिस पर अपने किरदार को निभाते हुए कलाकार उसमें इतना विलीन और तल्लीन हो जाता है कि किरदार और कलाकार एक हो जाते [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1650" alt="कमाल के महानायक कमल हासन! " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/12/101.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">को</span>ई भी कलाकार अभिनय-विधा के विशाल क्षितिज के चरमोत्कर्ष को उस वक्त छू लेता है, जब उसके अभिनय का रसास्वादन करता हुआ दर्शक यह भूल जाता है कि जो कुछ उसके सामने चल रहा है, वह महज &#8216;<em>फंतासी</em>&#8216; है, वास्तविक नहीं।</p>
<p>अभिनय की यही नैसर्गिक अभिव्यक्ति उसकी सोलह कलाओं का उत्कृष्टतम स्वरूप है। यही वह शिखर है जिस पर अपने किरदार को निभाते हुए कलाकार उसमें इतना विलीन और तल्लीन हो जाता है कि किरदार और कलाकार एक हो जाते हैं। यही वह सपना है, जो हर कलाकार अपने दिल में संजोए रखता है। यही वह स्तर है, जहां &#8216;<em>जीरो</em>&#8216; &#8216;<em>हीरो</em>&#8216; बन जाता है और <em>&#8216;नायक&#8217;</em> &#8216;<em>महानायक</em>।&#8217; अपने विस्तृत एवं संपूर्ण अभिनय जीवन में अगर कोई कलाकार ऐसे कुछ चुनिंदा दृश्य भी निभा पाए तो वह अपने-आपको धन्य-धन्य समझता है। तो फिर अगर कोई ऐसे कलाकार का जिक्र आ जाए, जिसके पूरे फिल्मी जीवन में कुछेक दृश्य ही ऐसे हों जो इस कसौटी पर खरे न उतरें तो फिर उसे क्या कहा जाए? जवाब है कमल हासन। पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय में फिल्मों में अभिनयरत कमल हासन को अगर भारत का &#8216;सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता&#8217; कहा जाए तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी। अपनी उम्र के चालीसवें बसंत को पार करने तक कमल हासन सौ से अधिक तमिल फिल्मों को मिलाकर दो सौ से अधिक फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं, जिनमें हिंदी, मलयालम, तेलुगु व कन्नड़ भाषाओं की फिल्में शामिल हैं।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">यही वह सपना है, जो हर कलाकार अपने दिल में संजोए रखता है। यही वह स्तर है, जहां &#8216;जीरो&#8217; &#8216;हीरो&#8217; बन जाता है और <em>&#8216;नायक&#8217;</em> &#8216;महानायक<span></span></div>
<p>इसी क्षण मन में विचार कौंधता है कि क्या सिर्फ फिल्मों की संख्या के आधार पर कमल हासन के अभिनय को इतना महिमामंडित किया जा रहा है। अगर सिर्फ ऐसा है तो अनेक कलाकार गिनाए जा सकते हैं, जिन्होंने विभिन्न भारतीय भाषाओं में कमल हासन से कहीं अधिक फिल्मों में कार्य किया है। अगर महज संख्या नहीं तो फिर श्रेष्ठता का परिमाण क्या? वह है कमल हासन के अभिनय की नैसर्गिकता। अपने पात्र में पूरी तरह डूब जाने की क्षमता। नित नए मुखौटे बल की निर्भीकता। अपने-आप को किसी भी &#8216;इमेज&#8217; में कैद न होने देने की स्वच्छंदता और हर बार एक नए रोल को चुनौती के रूप में स्वीकार करने की उत्कंठा।</p>
<p>कमल हासन के अभिनय को अगर सिर्फ एक शब्द में बयान करना हो, तो सबसे उपयुक्त शब्द है &#8216;वर्सेटाइल&#8217;। भारतीय फिल्मों के विशेषकर हिंदी फिल्मों के अधिकांश महानायकों में एक सामान्य कमजोरी कमोबेश सदैव रही है। इसे कमजोरी कहें अथवा &#8216;लिमिटेशन&#8217; यह एक अलग चर्चा का विषय है, लेकिन थोड़े-से फिल्मी सफर के बाद ही लगभग हर नायक-महानायक एक विशिष्ट &#8216;टाइपकास्ट इमेज&#8217; की गिरफ्त में चाहते या न चाहते हुए बंध जाता है।</p>
<p>इसका एक सीधा-सा उदाहरण है। अमिताभ बच्चन, दिलीप कुमार, राजेश खन्ना ने अपने दैदीप्यमान फिल्मी जीवन में अनेक पात्रों का रूप लिया है और बखूबी निभाया है। फिर भी अगर कोई कहे कि तुरंत अपने मस्तिष्क के दृश्य पटल पर अमिताभ की जो सबसे स्पष्ट छवि उभरती है, उसका उल्लेख करें तो जवाब &#8216;<em>एग्री यंगमैन</em>&#8216; ही रहेगा। ठीक उसी तरह दिलीप कुमार अभिनय के बेताज बादशाह होने के बावजूद &#8216;<em>ट्रेजेडी किंग</em>&#8216; और राजेश खन्ना <em>&#8216;रोमांटिक&#8217;</em> की &#8216;इमेज&#8217; में कैद हो गए। अब यही सवाल कमल हासन के बारे में पूछिए, जितने जवाब देने वाले, उतने जवाब हाजिर हो जाएंगे। कोई &#8216;<em>नायकन</em>&#8216; के वरदा दादा का जिक्र करेगा तो कोई अप्पू राजा के बौने का और कोई एक दूजे के लिए के प्रेमी का। यही है इस कलाकार की वर्सेटाइलिटी कि इसने अपने हर रोल को इतना जीवंत कर दिया कि उसका हर रोल उसकी अलग पहचान हो गई।</p>
<p>&#8216;मैं हर बार एक नया चेहरा पेश करने की कोशिश करता हूं। हालांकि मेरे हर परिवर्तन पर लोग डरकर पूछते हैं कि अब दर्शक कमल हासन को कैसे पहचानेंगे? तब मैं जवाब देता हूं कि &#8216;<em>दर्शक एक किरदार को देखने आए हैं, कमल हासन को नहीं</em>।&#8217; खुद कमल के ये उद्‌गार उनकी अभिनय शैली की विवेचना कर देते हैं। परंतु क्या सिर्फ कहने भर से पात्र जीवंत हो उठता है? अपने अभिनय को वास्तविकता के करीब लाने के लिए कमल ने तैयारी में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी है। पात्र की मांग के अनुसार उन्होंने अपना वजन घटाया है, बढ़ाया है, बाल मुंडवाए हैं, शास्त्रीय गायन, वादन और नृत्य में निपुणता हासिल की है, विभिन्न भाषाएं सीखी हैं, <em>&#8216;वेन्ट्रोलोरिजम&#8217;</em> (दूर तक ध्वनि संप्रेषण की कला) में महारत हासिल की है, और न जाने क्या-क्या! अपने इस फितूर के बारे में कमल के विचार बिलकुल स्पष्ट हैं, &#8216;मैं किसी फिल्म के लिए भूमिका के हिसाब से अपने चरित्र का कैसा भी मेकअप करवा सकता हूं। अपने शरीर का डील-डौल कैसा भी बदल सकता हूं और कोई भी कला-विद्या सीखने को तैयार हूं। बस ख्वाहिश सिर्फ यही है कि वह पात्र दर्शकों को पूर्णतः वास्तविक लगना चाहिए।</p>
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