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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल &#187; हॉलीवुड की चुनिंदा फिल्में | प्रमुख हॉलीवुड फिल्मो का विश्लेषण</title>
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		<title>यू &#8211; 571</title>
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		<pubDate>Thu, 05 May 2005 06:09:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[एक्शन फिल्म]]></category>
		<category><![CDATA[द्वितीय विश्वयुद्ध]]></category>
		<category><![CDATA[मैथ्यू मॉकोनी]]></category>
		<category><![CDATA[यू - 571]]></category>
		<category><![CDATA[हंट फॉर रेड अक्टोबर]]></category>

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		<description><![CDATA[एक लीडर कभी भी, किसी भी परिस्थिति में यह नहीं कह सकता कि उसे हर सवाल का जवाब नहीं पता। उसे जवाब मालूम हो या नहीं, उसकी टीम के लिए उसमें और उसके निर्णयों में पूर्ण विश्वास अति आवश्यक है। विपरीत परिस्थितियों में तो और भी।&#8217; यह ही है यूनिवर्सल पिक्चर्स की नई जोरदार एक्शन फिल्म &#8216;यू-571&#8216; की कहानी का निर्णायक मोड़, जब परिस्थिति से नायक की कमान संभाले एक लांसनायक &#8216;महानायक&#8216; बन जाता है। &#8216;यू-571&#8216; द्वितीय विश्वयुद्ध के कथानक [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1634" alt="यू - 571 " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2005/05/92.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">ए</span>क लीडर कभी भी, किसी भी परिस्थिति में यह नहीं कह सकता कि उसे हर सवाल का जवाब नहीं पता। उसे जवाब मालूम हो या नहीं, उसकी टीम के लिए उसमें और उसके निर्णयों में पूर्ण विश्वास अति आवश्यक है। विपरीत परिस्थितियों में तो और भी।&#8217; यह ही है यूनिवर्सल पिक्चर्स की नई जोरदार एक्शन फिल्म &#8216;<em>यू-571</em>&#8216; की कहानी का निर्णायक मोड़, जब परिस्थिति से नायक की कमान संभाले एक लांसनायक &#8216;<em>महानायक</em>&#8216; बन जाता है।</p>
<p>&#8216;<em>यू-571</em>&#8216; द्वितीय विश्वयुद्ध के कथानक पर आधारित एक तेज, जोशीली फिल्म है। जर्मन पनडुब्बियों ने एलीस की नाक में दम कर रखा था और उसके पीछे था उनका अत्यंत गुप्त रेडियो सिग्नल सिस्टम &#8216;<em>इंजिमा</em>&#8216;, जिसको अंग्रेज तोड़ नहीं पाए थे और जर्मन पनडुब्बियों की गतिविधियों पर वे बिल्कुल काबू नहीं कर पा रहे थे।</p>
<p>उस मिशन को पूरा करने एक खतरनाक तरीके से कुछ चुनिंदा अंग्रेज नौसैनिक एक पुरानी जर्मन पनडुब्बी में जर्मन फौजी बनकर मुश्किल में फंसी दूसरी जर्मन पनडुब्बियों को मदद करने के बहाने उसके क्र्यू और रेडियो कोड मशीन पर कब्जा करने निकल पड़ते हैं। मिशन लगभग कामयाब हो जाता है, लेकिन हालात के पलटते पुरानी जर्मन पनडुब्बियां ही उन नौ अंग्रेज फौजियों का आखिरी आसरा रह जाती हैं।</p>
<div class="simplePullQuoteRightPerpal">बचे हुए नौ आदमियों के नायक के रूप में मैथ्यू मॉकोनी ने प्रभावी प्रदर्शन किया है<span></span></div>
<p>बचे हुए नौ आदमियों के नायक के रूप में मैथ्यू मॉकोनी ने प्रभावी प्रदर्शन किया है। जब मौत सामने हो और कोई रास्ता नहीं, तब तो सिर्फ हौसला ही कई बार हार और जीत का फैसला बन जाता है। निर्देशक जोनाथन मास्टो ने पनडुब्बी के अंदर के घुंटे-फंसे माहौल में नाविकों की आपसी कशमकश और अपने से कहीं भारी शत्रु से लड़ने की हिम्मत को बड़े अच्छे ढंग से दिखाया है, क्योंकि रेडियो कोड को बचाना उनके जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण था। फिल्म के एक्शन सीन तो जोरदार हैं। इस तरह की सबमेरिन लड़ाई पर सीन कॉनेरी की &#8216;<em>हंट फॉर रेड अक्टोबर</em>&#8216; भी काफी अच्छी फिल्म थी पर अभी तो हाल ही में जारी &#8216;<em>यू-571</em>&#8216; ने सारे अमेरिका में चर्चे बांध रखे हैं और मैथ्यू मॉकोनी की एक्टिंग की पुरजोर तारीफ हो रही है।</p>
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		<title>द थॉमस क्राउन अफेयर</title>
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		<pubDate>Sat, 20 Jul 2002 06:31:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[इंश्योरेंस कंपनी]]></category>
		<category><![CDATA[थॉमस क्राउन]]></category>
		<category><![CDATA[द थॉमस क्राउन अफेयर]]></category>
		<category><![CDATA[पियर्स ब्रॉसनन]]></category>
		<category><![CDATA[फिल्म]]></category>

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		<description><![CDATA[उसके पास सब कुछ था- दौलत, शोहरत, एक आकर्षक व्यक्तित्व। गोल्फ और गाड़ियों के शौक। पर फिर भी उसके जीवन में एक कमी थी- किसी चुनौती, किसी उत्तेजना की। और फिर जब जीवन में चुनौती नहीं हो, तो फिर दूसरा हल है चुनौती खुद पैदा की जाए। ऐसी भूमिका पर बनी हैं अंग्रेजी फिल्म &#8216;द थॉमस क्राउन अफेयर&#8216;, जिसमें थॉमस क्राउन की मुख्य भूमिका में हैं वर्तमान युग के बॉण्ड पियर्स ब्रॉसनन। इसी उत्तेजना और धड़कन की तलाश में थॉमस [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1632" alt="'द थॉमस क्राउन अफेयर' " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2002/07/91.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">उ</span>सके पास सब कुछ था- दौलत, शोहरत, एक आकर्षक व्यक्तित्व। गोल्फ और गाड़ियों के शौक। पर फिर भी उसके जीवन में एक कमी थी- किसी चुनौती, किसी उत्तेजना की। और फिर जब जीवन में चुनौती नहीं हो, तो फिर दूसरा हल है चुनौती खुद पैदा की जाए। ऐसी भूमिका पर बनी हैं अंग्रेजी फिल्म &#8216;<em>द थॉमस क्राउन अफेयर</em>&#8216;, जिसमें थॉमस क्राउन की मुख्य भूमिका में हैं वर्तमान युग के बॉण्ड पियर्स ब्रॉसनन।</p>
<p>इसी उत्तेजना और धड़कन की तलाश में थॉमस क्राउन न्यूयॉर्क की एक कला दीर्घा से कड़ी सुरक्षा में आंखों में धूल झोंककर एक बहुमूल्य पेंटिंग चुरा लेते हैं। पर तब उनका पाला पड़ता है इंश्योरेंस कंपनी की अधिकारी क्रिस्टी मैनिन (रीनी रूसो) से, जो इस गुत्थी को सुलझाने के लिए हर कीमत अदा करने को तैयार थी।</p>
<p>इसके बाद की फिल्म तो दोनों के बीच गहराते रिश्ते और साथ ही साथ मैनिन द्वारा थॉमस क्राउन की जांच-पड़ताल कर उसे जाल में फंसाने की कहानी है। कुछ दृश्य तो सिर्फ <em>&#8216;वयस्क&#8217;</em> दर्शकों के लिए ही हैं, आखिर इतनी मुश्किल पहेली सुलझानी है। एलेक्स ट्रस्टमेन की कहानी पर आधारित फिल्म का अंत काफी रोमांचक है, ब्रॉसनन इस फिल्म के सह निर्माता भी हैं।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">एलेक्स ट्रस्टमेन की कहानी पर आधारित फिल्म का अंत काफी रोमांचक है, ब्रॉसनन इस फिल्म के सह निर्माता भी हैं<span></span></div>
<p>वैसे यह फिल्म कई वर्षों पहले इसी नाम की बनी फिल्म &#8216;<em>द थॉमस क्राउन अफेयर</em>&#8216; का पुनर्निर्माण है। पहली फिल्म में हीरो की भूमिका में थे स्टीव मक्वीन और उनके साथ थे फया ड्‌यूनावे (जिन्होंने वर्तमान फिल्म में भी क्राउन के सलाहकार डॉक्टर की भूमिका अदा की है)। पुरानी फिल्म का कथानक एक बैंक डकैती के इर्दगिर्द है, जिसमें स्टीव पांच लोगों की मदद से एक बैंक में डाका डालते हैं, अपने कमरे में बैठे-बैठे और मजे की बात यह है सारे चोरों ने डकैती के पहले और बाद में कभी भी आपस में या थॉमस क्राउन से मुलाकात नहीं की थी।</p>
<p>नई फिल्म तो मैंने सिनेमा हॉल में देखी और पुरानी डीवीडी पर। जहां पुरानी फिल्म बोस्टोन के जीवन पर आधारित है, नई फिल्म में न्यूयॉर्क छाया हुआ है। हैं तो दोनों ही देखने योग्य, पर ब्रॉसनन का &#8216;<em>आकर्षण</em>&#8216; स्टीव मक्वीन के सुनहरे बालों पर &#8216;<em>इक्कीस</em>&#8216; पड़ता है और नई फिल्म का अंत भी पुरानी फिल्म से ज्यादा रोमांचक है, भले ही दोनों में हीरोइन हीरो को अंत तक अपनी गिरफ्त में ले लेती है- हर तरह से।</p>
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		<title>डॉट कॉम युग की सुनहरी दास्तान अब रजत पटल पर &#8211; &#8216;स्टार्टअप डॉट कॉम&#8217;</title>
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		<pubDate>Sun, 20 May 2001 06:05:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[इंटरनेट]]></category>
		<category><![CDATA[गोवर्क्स डॉट कॉम]]></category>
		<category><![CDATA[डॉट कॉम]]></category>
		<category><![CDATA[स्टार्टअप डॉट कॉम फिल्म]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले 4 साल विश्व के औद्‌योगिक इतिहास में &#8216;डॉट कॉम&#8217; युग के नाम से ही जाने जाएंगे, जब &#8216;सपने सच हुए&#8217; वाली कहानियों ने सारे विश्व को अचंभित कर रखा था। इस पूरे आंदोलन पर दर्जनों किताबें, सैकड़ों पत्रिकाएं और हजारों कॉलम लिखे गए और पिछले सप्ताह इस डॉटकॉम युग पर बनी पहली फिल्म &#8216;स्टार्टअप डॉट कॉम&#8217; भी रिलीज हो गई। इस फिल्म का घटनाक्रम भी अजीबो-गरीब है। एक सच्ची डॉट कॉम कंपनी गोवर्क्स डॉट कॉम की प्रारंभिक पीड़ा और [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2001/05/jm_n2_startup.jpg" alt="डॉट कॉम युग की सुनहरी दास्तान अब रजत पटल पर - 'स्टार्टअप डॉट कॉम'" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3172" /><span class="dropcap">पि</span>छले 4 साल विश्व के औद्‌योगिक इतिहास में &#8216;डॉट कॉम&#8217; युग के नाम से ही जाने जाएंगे, जब &#8216;सपने सच हुए&#8217; वाली कहानियों ने सारे विश्व को अचंभित कर रखा था। इस पूरे आंदोलन पर दर्जनों किताबें, सैकड़ों पत्रिकाएं और हजारों कॉलम लिखे गए और पिछले सप्ताह इस डॉटकॉम युग पर बनी पहली फिल्म &#8216;स्टार्टअप डॉट कॉम&#8217; भी रिलीज हो गई।</p>
<p>इस फिल्म का घटनाक्रम भी अजीबो-गरीब है। एक सच्ची डॉट कॉम कंपनी गोवर्क्स डॉट कॉम की प्रारंभिक पीड़ा और फिर मिली सफलता को डायरेक्टर और क्रिस हेगडस अपने घरेलू वीडियो कैमरे में कैद करने लगे। देखते-देखते उनके पास इस कंपनी के बारे में 400 घंटे से ज्यादा की शूटिंग जमा हो गई। और सबसे विस्मयादि ये कि शूटिंग के चलते-चलते ही डॉट कॉम युग ने पलटी मारी। गोवर्क्स डॉट कॉम के दिन भी फिर गए और कंपनी बंद होने की कगार पर आ गई। लेकिन शूटिंग जारी रही और उसी प्रयास को पर्दे पर पेश किया गया है स्टार्टअप डॉट कॉम नामक 2 घंटे की डॉक्यूमेंट्री में।</p>
<p><strong>फिल्म के सारे पात्र गोवर्क्स कंपनी के&#8230;</strong></p>
<div class="simplePullQuoteRightGreen">कंपनी में सिर्फ 6 महीने में 5 से 250 कर्मचारी, काम का बेहद तनाव, बिगड़ते पारिवारिक संबंध और करोड़पति बनने का सच होता सपना<span></span></div>
<p>चूंकि सारी शूटिंग रीयल लाइफ है, इसलिए फिल्म के सारे पात्र गोवर्क्स कंपनी के संस्थापक और कर्मचारी ही हैं। प्रमुख भूमिका में हैं स्टार्ट अप डॉट कॉम के असली संस्थापक खलील इजा तुस्मान और टॉम हेरमान। ये दोनों गहरे दोस्त हैं जो कंपनी को एक कमरे से 250 लोगों तक बढ़ा ले जाते हैं और अंत में उनमें इतने मतभेद हो जाते हैं कि एक संस्थापक दूसरे संस्थापक को कंपनी से बर्खास्त कर देता है।</p>
<p>डॉट कॉम कंपनियों की दुनिया से थोड़ा भी संपर्क में आए लोगों को फिल्म में बहुत अपनापन लगेगा। शुरू में एक सपना, (इसी कंपनी का सपना था कि अमेरिका में नागरिकों से संबंधित सारे सरकारी काम इंटरनेट और कंप्यूटर पर ही हो जाएँ) उस सपने के कारण अच्छी खासी नौकरी को तिलांजलि, महीनों तक वेंचर केपिटलिस्ट के चक्कर, फिर पैसा, कंपनी में सिर्फ 6 महीने में 5 से 250 कर्मचारी, काम का बेहद तनाव, बिगड़ते पारिवारिक संबंध और करोड़पति बनने का सच होता सपना और फिर एकदम तीव्र गति से सब कुछ चंद महीनों में ताश के पत्तों की तरह ढह गया</p>
<p>फिल्म आधारित तो है गोवर्क्स डॉट कॉम पर लेकिन अमेरिका की अधिकांश डॉट कॉम कंपनियों के संस्थापक ओैर कर्मचारियों की कहानी खालिल तुस्मान जैसी ही है। शुरू होती है फिल्म खालिल द्वारा गोल्डमैन शख्स के बढ़िया नौकरी को छोड़कर एक कमरे में गोवर्क्स डॉट कॉम शुरू करने से और खत्म होती है गोवर्क्स डॉट कॉम का किसी और कंपनी द्वारा अधिग्रहण कर लेने पर।</p>
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		<title>एस्केप टू विक्टरी</title>
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		<pubDate>Wed, 12 Aug 1992 13:22:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल]]></category>
		<category><![CDATA[एस्केप टू विक्टरी]]></category>
		<category><![CDATA[फुटबॉल मैच]]></category>
		<category><![CDATA[माइकल कैन]]></category>
		<category><![CDATA[सिलवेस्टर]]></category>

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		<description><![CDATA[अंग्रेजी में &#8216;एस्केप&#8216; शीर्षक से एक दर्जन से भी अधिक फिल्में अलग-अलग समय पर बनी हैं। इन फिल्मों में बेहतरीन फिल्में कुछ ही हैं, बाकी तो साधारण श्रेणी में ही रखी जा सकती हैं। उन चुनिंदा बेहतरीन फिल्मों में से एक है &#8216;एस्केप टू विक्टरी।&#8217; इस काल्पनिक फिल्म की कथा में दो बहुत ही वृहद विषयों की जुगलबंदी दिखाई गई है। युद्ध और खेलकूद। फिल्म में दर्शित काल द्वितीय विश्व युद्ध का है, परंतु उसका एक कथन बहुत ही दूरगामी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1608" alt="एस्केप टू विक्टरी " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/08/79.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">अं</span>ग्रेजी में <em>&#8216;एस्केप</em>&#8216; शीर्षक से एक दर्जन से भी अधिक फिल्में अलग-अलग समय पर बनी हैं। इन फिल्मों में बेहतरीन फिल्में कुछ ही हैं, बाकी तो साधारण श्रेणी में ही रखी जा सकती हैं। उन चुनिंदा बेहतरीन फिल्मों में से एक है &#8216;<em>एस्केप टू विक्टरी</em>।&#8217; इस काल्पनिक फिल्म की कथा में दो बहुत ही वृहद विषयों की जुगलबंदी दिखाई गई है। युद्ध और खेलकूद। फिल्म में दर्शित काल द्वितीय विश्व युद्ध का है, परंतु उसका एक कथन बहुत ही दूरगामी है।</p>
<p>जर्मनी के एक युद्धबंदी शिविर में इत्तफाकन जर्मनी और इंग्लैंड के दो पूर्व अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ियों की मुलाकात होती है। बातों-बातों में जर्मनी और युद्धबंदियों की संयुक्त टीम के बीच एक फुटबॉल मैच आयोजित करने का प्रस्ताव उभरता है। कुछ प्रारंभिक अड़चनों के बाद दोनों ही पक्ष इस मैच के लिए राजी हो जाते हैं। वैसे नाम के लिए तो फुटबॉल मैच ही था, परंतु पार्श्व में दोनों ही के अपने-अपने निहित उद्देश्य छिपे थे। उस वक्त पूरे योरप में छाए जर्मन इस मैच के द्वारा &#8216;<em>थर्ड रैख</em>&#8216; और नाजी साम्राज्य की प्रभुता को खेल के मैदान पर भी साबित करना चाहते थे, वहीं अंग्रेज, फ्रैंच, डच आदि खिलाड़ी पहले तो इस मैच को एक &#8216;<em>चैलेंज</em>&#8216; के रूप में स्वीकारते हैं, परंतु बाद में उन्हें इस मैच के द्वारा अपने फरार होने का रास्ता नजर आता है।</p>
<p><em>&#8216;एलाइड&#8217;</em> युद्धबंदियों की संयुक्त टीम के मैनेजर कप्तान हैं मेजर जॉन कल्बी (माइकल कैन) और फुटबॉल की &#8216;<em>अ ब स</em>&#8216; भी नहीं समझने वाला अत्यंत बातूनी मेर्विन हैच (सिलवेस्टर स्टैलोन) बनता है टीम का प्रशिक्षक और गोलकीपर। पेरिस के विख्यात कोलोन स्टेडियम पर होने वाले इस मैच का जर्मनी बहुत प्रचार-प्रसार करती है। संयुक्त टीम में वैसे तो कई नामी खिलाड़ी शामिल होते हैं, परंतु वर्षों से खेल के मैदान से दूर उन सबके शरीर को जंग लग गया था। पुनः अपने &#8216;फॉर्म&#8217; में आने के लिए उनके अभ्यास एवं प्रयास को फिल्म में अच्छे ढंग से दर्शाया गया है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">अगर राष्ट्र अपने मतभेदों का निर्णय युद्ध के मैदान के बजाय खेल के मैदान पर करेंगे तो दुनिया बहुत बदल जाएगी<span></span></div>
<p>मैच के दिन पेरिस का स्टेडियम स्थानीय दर्शकों से खचाखच भरा होता है, जो अपने चहेते खिलाड़ियों को खेलना और जीतना देखना चाहते हैं। वहीं पर जर्मनी के सभी उच्च सैनिक अधिकारी ग्यारह खिलाड़ी और एक अंपायर की मदद से अपनी विजय के प्रति आश्वस्त होते हैं। मैच के पूर्वार्द्ध में आशानुरूप अत्यंत पक्षपातपूर्ण अंपायरिंग और &#8216;<em>रफ-प्ले</em>&#8216; से जर्मन खिलाड़ी न सिर्फ महती बढ़त ले लेते हैं, बल्कि आधे विपक्षी खिलाड़ियों को घायल भी कर देते हैं। फिल्म का सबसे रोचक पक्ष मैच के मध्यांतर से शुरू होता है, जब संयुक्त टीम के सदस्यों के अंतःकरण का खिलाड़ी उनके अंदर मौजूद सैनिक पर हावी हो जाता है, और वे मैच से पीठ दिखाकर फरार हो जाने का सुरक्षित मार्ग छोड़कर खिलाड़ी भावना से पुनः मैदान पर खेलने लौट आते हैं। पेले के निर्देशन में फिल्माया गया फुटबॉल मैच उत्तरार्द्ध में हर दर्शक का मन मोह लेगा और फुटबॉल प्रेमी तो निश्चित उस पर फिदा हो जाएंगे। विश्व विख्यात खिलाड़ी पेले और बॉब मूर सहित पूरी टीम ने जो &#8216;<em>मेसमराइजिंग</em>&#8216; फुटबॉल का प्रदर्शन किया है, वह बहुत समय तक दर्शकों को याद रहेगा।</p>
<p><strong>फिल्म</strong> : &#8216;एस्केप टू विक्टरी&#8217;</p>
<p><strong>समय</strong> : 1 घंटा 50 मिनट</p>
<p><strong>निर्माण वर्ष</strong> : 1981</p>
<p><strong>निर्माता</strong> : के.डी. फील्ड्‌स</p>
<p><strong>निर्देशक</strong> : जॉन हस्टन</p>
<p><strong>पार्श्व संगीत</strong> : बिल कॉन्टी</p>
<p><strong>स्क्रीन प्ले</strong> : इवान जेम्स</p>
<div>
<p><strong>कलाकार</strong> : माइकल कैन/सिलवेस्टर/स्टेलौन/पेले/ मैक्स वॉन सिजेह</p>
</div>
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		<title>एअरपोर्ट 1975</title>
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		<pubDate>Wed, 12 Aug 1992 13:14:19 +0000</pubDate>
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				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[एअरपोर्ट 1975]]></category>
		<category><![CDATA[एअरपोर्ट 1975 फिल्म]]></category>
		<category><![CDATA[कैरेन ब्लैक]]></category>
		<category><![CDATA[कोलंबिया एअर लाइंस]]></category>
		<category><![CDATA[चार्ल्टन हस्टन]]></category>
		<category><![CDATA[विमान]]></category>

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		<description><![CDATA[कोलंबिया एअर लाइंस की उड़ान क्रमांक 409 देर रात डलास से लॉस एंजिल्स की उड़ान हेतु तैयार है। विमान में 125 लोग सवार हैं। यात्रियों में विभिन्न वर्गों के लोग हैं। दो &#8216;नन&#8217; हैं, धुत्त व्यवसायियों का समूह है, एक प्रेमी युगल है, एक प्रौढ़ अपनी विमान यात्रा पर &#8216;नर्वस&#8217; है तो उसकी पड़ोसी सहयात्री महिला सैक़ड़ों विमान-यात्राओं की अनुभवी है। एक प्यारी-सी किंतु रुग्णावस्था में बालिका है जिसकी किडनी का प्रत्यारोपण होना है। अनुभवी चालक दल के नेतृत्व में [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/08/jm_s2_airport1975.jpg" alt="एअरपोर्ट 1975" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3153" /><span class="dropcap">को</span>लंबिया एअर लाइंस की उड़ान क्रमांक 409 देर रात डलास से लॉस एंजिल्स की उड़ान हेतु तैयार है। विमान में 125 लोग सवार हैं। यात्रियों में विभिन्न वर्गों के लोग हैं। दो &#8216;नन&#8217; हैं, धुत्त व्यवसायियों का समूह है, एक प्रेमी युगल है, एक प्रौढ़ अपनी विमान यात्रा पर &#8216;नर्वस&#8217; है तो उसकी पड़ोसी सहयात्री महिला सैक़ड़ों विमान-यात्राओं की अनुभवी है। एक प्यारी-सी किंतु रुग्णावस्था में बालिका है जिसकी किडनी का प्रत्यारोपण होना है।</p>
<p>अनुभवी चालक दल के नेतृत्व में विमान निर्धारित समय पर डलास से प्रस्थान करता है। आगे मौसम खराब होने के कारण वह सॉल्ट लेक सिटी में ही उतरने की तैयारी करता है। कोलंबिया 409 के ठीक बाद एक छोटा प्लेन भी खराब मौसम के कारण सॉल्ट लेक सिटी में आकस्मिक लैंडिंग की तैयारी कर रहा था। उस छोटे-से वायुयान को एक व्यवसायी उड़ा रहा था, जो कि उसका यात्री भी था।</p>
<p>छोटे विमान के चालक को अचानक हृदयाघात हो जाता है, जिसके फलस्वरूप यह विमान हवा में कलाबाजियां खाने लगता है। इसी दौर में वह जंबो 747 के &#8216;<em>काकपिट</em>&#8216; को चीरता हुआ आर-पार निकल जाता है। उतरने की तैयारी कर रहे विमान कोलंबिया 409 में अचानक आए असंतुलन की जांच करने वरिष्ठ परिचारिका नेंसी (कैरेन ब्लैक) &#8216;कॉकपिट&#8217; में जाती है, तो वहां का दृश्य उसके होश उड़ा देता है। &#8216;कॉकपिट&#8217; की सभी सीलबंद खिड़कियां ध्वस्त हो चुकी थीं। यंत्र प्रणाली तहस-नहस हो चुकी थी। तीन चालकों में से एक &#8216;<em>कॉकपिट</em>&#8216; से खुले आसमान में विलीन हो गया था, एक की अपनी सीट पर ही मृत्यु हो गई थी। प्रमुख चालक को गहरी चोटें आई थीं, जिसके कारण उसकी नेत्रज्योति चली गई। इस दृश्य को पर्दें पर देखकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।</p>
<div class="simplePullQuoteRightPerpal">चारों तरफ खुला आसमान, बर्फीली हवाएं, पहाड़ों की भयावह चोटियां, तेजी से बढ़ता हुआ जंबो 747 विमान, जिसको उड़ाने वाला कोई नहीं<span></span></div>
<p>नेंसी बड़ी मुश्किल से अपने थोड़े बहुत ज्ञान का उपयोग कर &#8216;कंट्रोल-टॉवर&#8217; से संपर्क कर स्थिति का बयान करती है, तो वे भी हतप्रभ रह जाते हैं। स्थिति का पूरा नियंत्रण सौंप दिया जाता है अनुभवी पाइलट कैप्टन मर्डोक को, जो कि कोलंबिया एअर लाइंस के वरिष्ठ कर्मी होने के अलावा नेंसी को बेहद प्यार भी करते थे। जुड़ते-टूटते रेडियो संबंधों से मर्डोक अत्यंत विचलित और स्तब्ध नेंसी को हौसला बंधाते हैं कि वह उड़ान की कमान संभाले। नेंसी साहस करती है। बमुश्किल सिर्फ रेडियो सहायता के द्वारा विमान को नियंत्रण प्रदान करती है। एक बारगी तो रेडियो संबंध भी टूट जाता है, और सामने ऊंची चोटियां विमान को ललकार रही होती हैं। ऐसे में अत्यंत असहाय नेंसी अकेले उस विमान को सुरक्षित रख पाती है। नेंसी विमान को अधिक समय तक आसमान में नहीं रख सकती है और उसकी लैंडिंग अकेले नेंसी के लिए असंभव है। इस भीषण समस्या का सिर्फ एक पागल-सा लगने वाला उपाय था। किसी दूसरे विमान से इस ध्वस्त विमान में &#8216;पायलट&#8217; को जमीन से दस हजार फुट ऊपर पहुंचाया जाए।</p>
<p>दूसरी ओर विमान के यात्रियों में खलबली थी। इस घोर विपत्ति के समय में उनके हाव-भाव का चित्रण बहुत ही वास्तविक है। दूसरे विमान से पायलट 409 के &#8216;कॉकपिट&#8217; तक पहुंच भी जाता है, अंतिम समय रस्सी का छोर खुल जाने से वह आकाश में गिर जाता है। अब तो फ्लाइट 409 का खुदा ही रखवाला है। किंतु नहीं, कैप्टन मर्डोक अपनी प्रेयसी और संस्था की खातिर ध्वस्त विमान के &#8216;कॉकपिट&#8217; में उतरने का खतरनाक फैसला करते हैं। क्या वे विमान को सकुशल उतारने में सफल होते हैं?</p>
<p><strong>फिल्म</strong> : एअरपोर्ट 1975</p>
<p><strong>समय</strong> : 1 घंटा 45 मिनट</p>
<p><strong>निर्देशकः</strong> जैक स्माइट</p>
<p><strong>पार्श्व संगीत</strong> : जॉन काकावस</p>
<p><strong>निर्माता</strong> : विलियम फ्रेय</p>
<p><strong>कलाकार</strong> : चार्ल्टन हस्टन/कैरेन ब्लैक/जॉर्ज कैनेडी/सुसान क्लार्क/ प्रदर्शन वर्ष : 1974</p>
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		<title>इट्‌स अ मैड मैड मैड मैड वर्ल्ड</title>
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		<pubDate>Wed, 17 Jun 1992 06:00:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[इंग्लिश मूवी]]></category>
		<category><![CDATA[इट्‌स अ मैड मैड मैड मैड वर्ल्ड]]></category>
		<category><![CDATA[एर्नेस्ट गोल्ड]]></category>
		<category><![CDATA[तीसमार खाँ]]></category>
		<category><![CDATA[स्पेन्सर ट्रेसी]]></category>

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		<description><![CDATA[आदम-हव्वा के जमाने से आज तक मानवता का पूरा स्वरूप ही बदल गया है। सभ्यता पनपी है। और न जाने क्या क्या । परंतु, तब और अब में जो भी सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, उनके मूल में अधिकांशतः सिर्फ दो अक्षर का एक छोटा-सा शब्द है &#8216;पैसा।&#8217; इसे नाम चाहे आप समृद्धि का दें, संपदा-संपत्ति का, धन या सिर्फ पैसा। प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से इसी की चाह ने मानव को बहुत उठाया व गिराया है। इसी अनन्त पिपासा और तृष्णा [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1624" alt="इट्‌स अ मैड मैड मैड मैड वर्ल्ड  " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2012/12/87.jpg" width="311" height="307" />आदम-हव्वा के जमाने से आज तक मानवता का पूरा स्वरूप ही बदल गया है। सभ्यता पनपी है। और न जाने क्या क्या । परंतु, तब और अब में जो भी सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, उनके मूल में अधिकांशतः सिर्फ दो अक्षर का एक छोटा-सा शब्द है &#8216;<em>पैसा</em>।&#8217; इसे नाम चाहे आप समृद्धि का दें, संपदा-संपत्ति का, धन या सिर्फ पैसा। प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से इसी की चाह ने मानव को बहुत उठाया व गिराया है।</p>
<p>इसी अनन्त पिपासा और तृष्णा को अत्यन्त विनोदप्रिय और व्यंग्यात्मक रूप में पेश किया गया है फिल्म &#8216;<em>इट्‌स अ मैड मैड मैड मैड वर्ल्ड</em>&#8216; में। इस हास्य फिल्म की एक विशेषता यह भी है कि तत्कालीन अमेरिकी सिनेमा के सभी &#8216;<em>दिग्गज</em>&#8216; हास्य कलाकार इसमें एक साथ मौजूद हैं। संक्षिप्त में फिल्म की कथा बहुत ही सीधी और सरल है। &#8216;<em>हाई-वे</em>&#8216; पर एक खतरनाक मोड़ पार करते हुए एक गाड़ी गहरी खाई में गिर जाती है। उस गाड़ी की सवारियों की हालत का अता-पता लगाने चार अन्य गाड़ियों के चालक नीचे उतरते हैं। वहीं दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी का मरणासन्न चालक उन्हें एक उद्यान में गड़े खजाने का अधूरा पता देकर मर जाता है।</p>
<p>बस, अब पूरी फिल्म उस खजाने की खोज का ही बहुत मजेदार और रोचक वृत्तांत है। हल्के-फुल्के तौर पर फिल्म देखें तो पेट में मारे हंसी के बल पड़ने लगते हैं, किन्तु थोड़ा गौर करें तो फिल्म में हर दृश्य में इस बात को बखूबी पेश किया गया है कि पैसे के पागलपन में मानव अपनी मानवता को कितनी जल्दी तिलांजलि दे देता है। खजाने को ढूंढना तो दूर, उसके मिलने पर प्रस्तावित बंटवारे और उस तक पहुंचने के साधनों को लेकर ही आपस में फूट पड़ जाती है। एक ओर तो गाड़ी चालक अकेले पूरा पैसा पाने के लिए अपने जिगरी दोस्त एवं रिश्तेदारों का भी साथ छोड़ देता है, वहीं जरूरत पड़ने पर वह अनजान लोगों से भी घनिष्ठ मित्रता कायम करने का ढोंग रचता है। सच ही कहा गया है &#8216;<em>माया महा ठगिनी, हम जानी।</em>&#8216;</p>
<div class="simplePullQuoteRight">फिल्म में हर दृश्य में इस बात को बखूबी पेश किया गया है कि पैसे के पागलपन में मानव अपनी मानवता को कितनी जल्दी तिलांजलि दे देता है<span></span></div>
<p>एक ओर तो साइकल, मोटर, प्लेन, यहां तक कि पैदल काफिला गंतव्य की ओर बढ़ रहा था, वहीं दूसरी ओर पुलिस का पूरा लवाजमा उनमें से हर एक की प्रगति पर पूरी नजर रखे हुए था। पुलिस को भी उसी खजाने की तलाश थी। मारपीट, छलकपट, तोड़फोड़ आदि का पूरा सिलसिला खत्म होने के बाद अंत वही निकलता है कि सब एक साथ गंतव्य उद्यान में पहुँच जाते हैं। अपने आप को &#8216;<em>तीसमार खाँ</em>&#8216; और दूसरों को &#8216;गोबर गणेश&#8217; समझने की वृत्ति में कोई खजाने के सुराग को नहीं पहचान पाता, जबकि वह सबके सामने साफ-स्पष्ट नजर आ रहा था। भारी दौड़-धूप के बाद जब अंततः तीन लाख पचास हजार डॉलर का खजाना मिलता भी है, तो इन सब की सारी भागदौड़ को विफल करते हुए पुलिस बड़े इत्मीनान से आकर खजाना जब्त कर लेती है और वे सब हाथ पर हाथ धरे खड़े रह जाते हैं। परंतु धन -लोलुपता से पुलिस कहाँ अछूती है। पुलिस चीफ सारा पैसा हड़पकर ले जाने की फिराक में रहता है। फिर सभी उसके पीछे लग जाते हैं। अंत में तो हर एक की जान पर बन आती है। मोह का परिणाम तो शाश्वत तौर पर कटु ही होता रहा है। फिल्म का अंत भी उसी तर्ज पर है। बिना परिश्रम किए सरलता से पैसा प्राप्त करने की चाह का क्या नतीजा होता है- इस में वही दोहराया गया है। &#8216;<em>खजाने की खोज</em>&#8216; विषय पर एक और बेहतरीन फिल्म &#8216;<em>मेकन्नास गोल्ड</em>&#8216; भी बनी है। परंतु उस फिल्म में संदेश हिंसा से ओतप्रत है, मैड मैड वर्ल्ड में जोर हास्य पर है।</p>
<p><strong>फिल्म</strong> : इट्‌स अ मैड मैड मैड मैड वर्ल्ड</p>
<p><strong>अवधि</strong> : 2 घंटे 30 मिनट</p>
<p><strong>निर्माता</strong>-निर्देशक : स्टेनली क्रेमर</p>
<p><strong>पार्श्व संगीत</strong> : एर्नेस्ट गोल्ड</p>
<p><strong>पटकथा</strong> : विलियम व तानिया कोज</p>
<p><strong>कलाकार</strong> : स्पेन्सर ट्रेसी/मिल्टन वर्ली/सिड सीजर/इथल मर्मन</p>
<p><strong>प्रदर्शन वर्ष</strong> : 1963</p>
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		<title>द थर्टी सिक्स्थ चेम्बर ऑव द शॉओलिन</title>
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		<pubDate>Mon, 30 Mar 1992 11:25:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[कराटे]]></category>
		<category><![CDATA[द थर्टी सिक्स्थ चेम्बर ऑव द शॉओलिन]]></category>
		<category><![CDATA[मार्शल आर्ट्‌स]]></category>

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		<description><![CDATA[विदेशी &#8216;एक्शन&#8216; फिल्मों की श्रृंखला में &#8216;मार्शल आर्ट्‌स&#8216; फिल्मों का विशिष्ट स्थान है। कठोर जीवन, कड़ी मेहनत और एकाग्र चित्त से वर्षों अभ्यास कर अपने शरीर और मन पर पूर्ण नियंत्रण पाना और फिर निहत्थे शरीर के हर अंग को ही घातक हथियार का रूप दे देना- अधिकांश &#8216;मार्शल आर्ट्‌स&#8216; फिल्मों में यही बेहतरीन अथवा कमजोर ढंग से पेश किया जाता है। साधारण कुंग-फू, जूडो, कराटे आदि &#8216;मार्शल आर्ट्‌स&#8216; के कई प्रकार हैं। शॉओलिन के गुरुकुल में कुंग-फू की शिक्षा [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1600" alt="द थर्टी सिक्स्थ चेम्बर ऑव द शॉओलिन" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/03/75.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">वि</span>देशी &#8216;<em>एक्शन</em>&#8216; फिल्मों की श्रृंखला में &#8216;<em>मार्शल आर्ट्‌स</em>&#8216; फिल्मों का विशिष्ट स्थान है। कठोर जीवन, कड़ी मेहनत और एकाग्र चित्त से वर्षों अभ्यास कर अपने शरीर और मन पर पूर्ण नियंत्रण पाना और फिर निहत्थे शरीर के हर अंग को ही घातक हथियार का रूप दे देना- अधिकांश &#8216;<em>मार्शल आर्ट्‌स</em>&#8216; फिल्मों में यही बेहतरीन अथवा कमजोर ढंग से पेश किया जाता है। साधारण कुंग-फू, जूडो, कराटे आदि &#8216;<em>मार्शल आर्ट्‌स</em>&#8216; के कई प्रकार हैं।</p>
<p>शॉओलिन के गुरुकुल में कुंग-फू की शिक्षा पर आधारित है फिल्म &#8216;<em>द थर्टी सिक्स्थ चेम्बर ऑव द शॉओलिन।</em>&#8216; फिल्म में प्रदर्शित सामंतवादी चीन में मंचू साम्राज्य की प्रताड़ना और अत्याचार से पूरा समाज त्राहि-त्राहिकर रहा था। ऐसे में कुछ विद्यार्थी अपनी पाठशाला के शिक्षक के साथ मिलकर विद्रोह करने की योजना बनाते हैं। अत्यंत शक्तिशाली शासक अपने दमन चक्र से पूरे समूह को परिवार सहित मौत के घाट उतार देते हैं। बच जाता है सिर्फ एक युवक, जो मरणासन्न हालत में भी प्रबल आत्मशक्ति के सहारे पहुंच जाता है कुंग-फू के श्रेष्ठतम गुरुकुल शॉओलिन।</p>
<p>प्रारंभिक आनाकानी के बाद शॉओलिन के पीठाधिपति उसे स्वीकार कर लेते हैं। फिर शुरू होता है सिलसिला अत्यंत कठिन और कठोर शिक्षा का, जिसमें केवल मानव शरीर को ही आधार मानकर उसे वज्र-सा कठोर, बिजली-सा चपल, रबर-सा लोचदार और तीक्ष्ण जहर-सा प्रहारक बनाया जाता है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">फिर शुरू होता है सिलसिला अत्यंत कठिन और कठोर शिक्षा का<span></span></div>
<p>फिल्म की केंद्रीय कथा भी शॉओलिन विद्यालय के 35 चेम्बर (गृहों) पर ही है, जिसमें हर चेम्बर में अलग-अलग विधा में विद्यार्थी को पूर्णतः पारंगत कर दिया जाता है। कहीं पर पानी में तैर रहे लकड़ी के टुकड़ों पर पांव रखकर बिना किसी पुल से पानी लांघना है, तो कहीं पर खुले सिर से भारी-भरकम थैलों को अनवरत धक्का देना है।</p>
<p>निर्धारित समयावधि से बहुत कम समय में जब वह छात्र पाठ्‌यक्रम में पारंगत हो जाता है तो उसे वहां के किसी भी 35 गृहों में से एक का संचालक बनने के लिए आमंत्रित किया जाता है। परंतु उसका ध्येय तो शॉओलिन के &#8216;<em>बंद वातावरण</em>&#8216; के बाहर व्याप्त तानाशाही से लड़ना था। इस हेतु वह सामान्यजनों को कुंग-फू की शिक्षा देने हेतु एक नए छत्तीसवें चेम्बर को शुरू करने की मांग करता है। इस प्रकार की अनुशासनहीनता से उसे शॉओलिन से निष्कासित कर दिया जाता है। बाहर पहुंचकर किसी तरह वह अकेला साधारण नागरिकों को शिक्षित कर अत्याचारियों से बदला लेता है, वही फिल्म का अंत है। वैसे फिल्म का प्रमुख आकर्षण शॉओलिन विद्यापीठ के अलावा हीरो का निहत्थे कई लोगों से अकेले मुकाबला करने की &#8216;<em>वास्तविक</em>&#8216; क्षमता और एक साधारण, कमजोर शरीर का घातक शस्त्र में परिवर्तन है। और, अत्यंत फुर्ती से अंग-प्रत्यंग द्वारा हवा को चीरने का स्वर और उस पर मुंह से अलग आवाजें निकालना- कुल मिलाकर माहौल बढ़िया बन जाता है।</p>
<p><strong>फिल्म</strong> &#8211; द थर्टी सिक्स्थ चेम्बर ऑफ द शॉओलिन</p>
<p><strong>निर्माता</strong> &#8211; मोना फंग</p>
<p><strong>पार्श्व संगीत</strong> &#8211; चेन युंग यू</p>
<p><strong>निर्देशक</strong> &#8211; लीन चिया लियांग</p>
<p><strong>कलाकार</strong> &#8211; लीन चिया हुई/लो लियाह/चियांग हान</p>
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		<title>जॉज</title>
		<link>https://www.jmuchhal.com/jaws</link>
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		<pubDate>Mon, 16 Mar 1992 13:28:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[जॉज]]></category>
		<category><![CDATA[जॉज फिल्म]]></category>
		<category><![CDATA[जॉज फिल्म की कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[शुगरलैंड एक्सप्रेस]]></category>

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		<description><![CDATA[होनहार बिरवान के होत चिकने पात&#8217; यह कहावत राजनीति में इंदिरा गांधी और क्रिकेट में सचिन तेंडुलकर जैसे लोगों तक ही सीमित नहीं है। मनोरंजन और सिनेमा की दुनिया में भी कई जीवंत उदाहरण हैं उन फनकारों के जिन्होंने अपने सिनेमाई जीवन के शैशवकाल में ही कुछ ऐसा कर दिखाया जिससे उनके भविष्य का अंदजा लग गया था। अगर निर्देशकों की बात करें तो जहां भारतीय परिप्रेक्ष्य में शायद सबसे पहला नाम राजकपूर का आता है, वहीं अमेरिकी सिनेमा में [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/03/jm_r2_jaws.jpg" alt="जॉज" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3161" /><span class="dropcap">हो</span>नहार बिरवान के होत चिकने पात&#8217; यह कहावत राजनीति में इंदिरा गांधी और क्रिकेट में सचिन तेंडुलकर जैसे लोगों तक ही सीमित नहीं है। मनोरंजन और सिनेमा की दुनिया में भी कई जीवंत उदाहरण हैं उन फनकारों के जिन्होंने अपने सिनेमाई जीवन के शैशवकाल में ही कुछ ऐसा कर दिखाया जिससे उनके भविष्य का अंदजा लग गया था। अगर निर्देशकों की बात करें तो जहां भारतीय परिप्रेक्ष्य में शायद सबसे पहला नाम राजकपूर का आता है, वहीं अमेरिकी सिनेमा में स्टवीन स्पीलबर्ग ने भी कुछ ऐसा ही कर दिखाया था। 1974-75 में &#8216;ई.टी.&#8217;, &#8216;इंडियाना&#8217;, &#8216;<em>जोन्स</em>&#8216; व <em>&#8216;शुगरलैंड एक्सप्रेस&#8217;</em> जैसी फिल्मों के निर्देशक स्पीलबर्ग ने सिर्फ 27 वर्ष की उम्र में अपनी पहली फिल्म निर्देशित की थी। इस पहली ही फिल्म ने उनका नाम फिल्म इतिहास में अंकित कर दिया। यह फिल्म थी- जॉज!</p>
<p>फिल्म की कहानी अमेरिका में समुद्र तट पर बसे एक छोटे से शहर अमेटी आईलैंड के इर्द-गिर्द घूमती है। इस शहर के निवासियों की आजीविका का प्रमुख साधन समुद्र तट और समुद्र को देखने-घूमने आए सैलानियों से जुड़ा है। इसलिए जब तट के निकट शार्क के आक्रमण से एक महिला मृत पाई जाती है और क्षेत्र का पुलिस चीफ सुरक्षा की दृष्टि से समुद्र में प्रवेश प्रतिबंधित करने का प्रयास करता है तब पूरा शहर उसके विरोध में खड़ा हो जाता है।</p>
<p>फिल्म का अधिकांश भाग शार्क के आक्रमण के प्रति पुलिस चीफ की &#8216;<em>सीरियसनेस</em>&#8216; और पूरे शहर की &#8216;<em>केजुअलनेस</em>&#8216; के द्वंद्व में ही गुजरा है। बार-बार शार्क आक्रमण से अंततः पूरा शहर भयभीत हो जाता है और फिर छिड़ती है मुहिम इस शार्क को पकड़ने की।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">पूरी फिल्म में शार्क का विशालकाय खूंखार शरीर और मुंह तो तीन-चार बार ही दिखाया है, परंतु हर बार शार्क इतनी अनपेक्षित रूप से &#8216;स्क्रीन&#8217; पर आ जाती है कि हर दर्शक के रोंगटे खड़े हो जाते हैं<span></span></div>
<p>फिल्म का &#8216;क्लाइमेक्स&#8217; इसी समुद्री दानव व मानव की भिड़ंत की रोमांचक दास्तां है। एक नाव पर साजो सामान से लैस होकर शार्क से लड़ने जाते हैं इस क्षेत्र के पुलिस चीफ (राय स्कनेडर), एक दंभी किंतु अनुभवी शार्क पकड़ने वाला (रॉबर्ट शॉ) एवं एक समुद्री जीव वैज्ञानिक (रिचर्ड ड्रेफस)। पलड़ा कभी मानव की ओर झुक जाता है तो कभी दानव की ओर। एक समय तो ऐसा आता है जब नाव पानी में डूबने को होती है। तट से वायरलेस का संबंध कट जाता है। तीन आदमियों में से सिर्फ एक बचता है और सामने होती है भयावह शार्क।</p>
<p>पूरी फिल्म में शार्क का विशालकाय खूंखार शरीर और मुंह तो तीन-चार बार ही दिखाया है, परंतु हर बार शार्क इतनी अनपेक्षित रूप से &#8216;<em>स्क्रीन</em>&#8216; पर आ जाती है कि हर दर्शक के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। भूमिका बांधने के लिए पूरी फिल्म में शार्क के आगमन का पूर्वाभास कराने के लिए एक ही उत्तेजनात्मक धुन बजाई गई है, जिससे रोमांच द्विगुणित हो जाता है। यह तो दोहराना निरर्थक है कि इस समुद्र आधारित फिल्म में &#8216;<em>वॉटर फोटोग्रॉफी</em>&#8216; लाजवाब है। &#8216;जॉज&#8217; बनने के बाद &#8216;<em>जॉज-1</em>&#8216; और &#8216;<em>जॉज-2</em>&#8216; भी बनी है, परंतु उनमें इतनी कसावट नहीं है। निःसंदेह ही इस फिल्म का असली मजा बड़े पर्दे पर ही है, परंतु वीडियो पर भी उस एहसास का आभास हो जाता है। फिल्म कमजोर हृदय तथा छोटे बच्चों के देखने योग्य नहीं है।</p>
<p><strong>फिल्म</strong> : जॉज</p>
<p><strong>समयावधि</strong> : 115 मिनट</p>
<p><strong>निर्माता</strong> : रिचर्ड झानुक और डेविड ब्राउन</p>
<p><strong>निर्देशक</strong> : स्टीवन स्पीलबर्ग</p>
<p><strong>संपादक</strong> : वर्ना फील्डस</p>
<p><strong>फोटोग्राफी</strong> : बिल बुलर</p>
<p><strong>कलाकार</strong> : रॉय स्कनेडर, रॉबर्ट शॉ, लोरेन ग्रे</p>
<p><strong>निर्माण संस्था</strong> : यूनिवर्सल प्रोडक्शंस</p>
<p><strong>पार्श्व संगीत</strong> : जॉन विलियम्स</p>
<p><strong>वर्ष</strong> : 1975</p>
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		<title>ब्रिज ऑन द रिवर क्वाई</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Feb 1992 13:15:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[अंग्रेजी फिल्म]]></category>
		<category><![CDATA[ऑस्कर सम्मान]]></category>
		<category><![CDATA[डेविड लीन]]></category>
		<category><![CDATA[ब्रिज ऑन द रिवर क्वाई]]></category>

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		<description><![CDATA[अंग्रेजी फिल्मों के विख्यात निर्देशकों में डेविड लीन का अलग ही स्थान है। किसी एक पात्र के बहुआयामी चरित्र को पर्दे पर उभारने की कला में वे बेजोड़ थे। इसीलिए उनकी कई फिल्में जैसे &#8216;ग्रेट एक्स्पेक्टेशन्स&#8216;, &#8216;डॉ. जिवागो&#8217;, &#8216;लॉरेन्स ऑफ अरेबिया&#8216; और &#8216;पैसेज टू इंडिया&#8217; फिल्म इतिहास की बहुमूल्य धरोहर हैं। किन्तु जानकारों का मानना है कि डेविड लीन की सर्वश्रेष्ठ कृति थी फिल्म &#8216;द ब्रिज ऑन द रिवर क्वाई।&#8216; वर्ष 1957 के अकादमी पुरस्कारों में इस फिल्म ने धूम [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/02/jm_t2_bridge_riverkwai.jpg" alt="ब्रिज ऑन द रिवर क्वाई" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3155" /><span class="dropcap">अं</span>ग्रेजी फिल्मों के विख्यात निर्देशकों में डेविड लीन का अलग ही स्थान है। किसी एक पात्र के बहुआयामी चरित्र को पर्दे पर उभारने की कला में वे बेजोड़ थे। इसीलिए उनकी कई फिल्में जैसे &#8216;<em>ग्रेट एक्स्पेक्टेशन्स</em>&#8216;, &#8216;डॉ. जिवागो&#8217;, &#8216;<em>लॉरेन्स ऑफ अरेबिया</em>&#8216; और &#8216;पैसेज टू इंडिया&#8217; फिल्म इतिहास की बहुमूल्य धरोहर हैं। किन्तु जानकारों का मानना है कि डेविड लीन की सर्वश्रेष्ठ कृति थी फिल्म &#8216;<em>द ब्रिज ऑन द रिवर क्वाई।</em>&#8216; वर्ष 1957 के अकादमी पुरस्कारों में इस फिल्म ने धूम मचा दी। सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ फिल्म एवं सर्वश्रेष्ठ कलाकार (अलेक गिनीस) के तीनों प्रतिष्ठित &#8216;ऑस्कर&#8217; सम्मान इसी फिल्म को प्राप्त हुए थे।</p>
<p>फिल्म के कथानक का केन्द्र है एक युद्धबंदी ब्रिटिश सैनिक अधिकारी निकलसन (अलेक गिनीस), जो कि बंदी होने के बावजूद ठीक उसी तरह से बर्ताव करता है जैसा कि ब्रिटिश सेना के एक जिम्मेदार अफसर से अपेक्षित होता है। जापानी सेना के अधीनस्थ एक युद्धबंदी कैम्प बर्मा के अत्यन्त घने जंगलों में स्थित है, जहां तपती धूप, बेमौसम बारिश और संक्रामक रोगों का ही साम्राज्य है। अत्यन्त विषम परिस्थितियों में रह रहे &#8216;<em>कैम्प 16</em>&#8216; में ब्रिटिश अमेरिकी युद्ध बंदियों द्वारा क्वाई नदी पर एक रेल-पुल का निर्माण किया जाना था, जिससे कि रंगून को बैंकॉक तक जोड़ने वाला रेल मार्ग पूरा हो सके। इस कार्य को निष्पादित करने का जिम्मा दिया जाता है जापानी कैम्प कमांडर कर्नल साइटो को। किन्तु कर्नल साइटो का सामना होता है निकलसन से, जो जिनेवा संधि के अनुसार बंदी अफसरों द्वारा शारीरिक श्रम पर पाबंदी का कानून दोहराता है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">युद्ध तो किसी न किसी दिन समाप्त हो जाएगा, परन्तु वह पुल सदा के लिए सैनिकों द्वारा बंदीकाल में निर्मित एक बेजोड़ मिसाल बन जाएगा<span></span></div>
<p>युद्ध के &#8216;<em>तथाकथित</em>&#8216; नियमों को ताक पर रखते हुए कर्नल साइटो निकलसन की आत्मशक्ति तोड़ने के लिए उसे कठोरतम शारीरिक व मानसिक यंत्रणा देता है। एक &#8216;अप-राइट&#8217; ब्रिटिश अफसर की अविस्मरणीय भूमिका अदा करते हुए निकलसन टस से मस नहीं होता। अंत में पुल की तैयारी की तारीख को नजदीक आता देखकर कर्नल साइटो को निकलसन के आत्मबल के सामने घुटने टेक कर लगभग यह प्रार्थना करनी पड़ती है कि वह किसी भी तरह उस पुल को निर्धारित समयावधि में पूरा करवाने में मदद करे।</p>
<p>यहीं पर उस आदर्श ब्रिटिश अफसर के चरित्र का दूसरा आयाम सामने आता है, जब वह युद्ध बंदी होने के बावजूद खुद अपने सैनिकों के साथ दिन-रात मेहनत कर उस पुल को पूरा करवाने का प्रयास करता है। इस मुहिम में वे सभी जापानी सैनिकों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं। इसके पीछे निकलसन की एक अद्वितीय भावना झलकती है कि युद्ध तो किसी न किसी दिन समाप्त हो जाएगा, परन्तु वह पुल सदा के लिए सैनिकों द्वारा बंदीकाल में निर्मित एक बेजोड़ मिसाल बन जाएगा। एक ओर जहां पुल के निर्माण का कार्य निश्चित तारीख तक समाप्ति की ओर अग्रसर था, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश अधिकारी उसके सामरिक महत्व को मद्देनजर रखते हुए उसे ध्वस्त करने हेतु एक दस्ता भेजते हैं।</p>
<p>क्या निकलसन का पुल को एक मिसाल बनाने का सपना सच होगा? क्या ब्रिटिश सेना के हाईकमान का उद्देश्य उसी के एक अफसर के लक्ष्य से टकराव पैदा कर देगा? इन प्रश्नों का उत्तर तो इस फिल्म में ही मिलेगा, जो युद्ध बंदियों के जीवन की एक अनूठी कहानी है और जिसने एक आदर्श सैनिक अधिकारी की परिभाषा को चिरकालीन व्याख्या दी है। इस फिल्म के रिलीज के समय सैनिकों द्वारा बजाई गई सीटी दुनिया भर की गलियों में गूंजी थी।</p>
<p><strong>फिल्म</strong> : द ब्रिज ऑन द रिवर क्वाई</p>
<p><strong>समय</strong> : 2 घंटा 30 मिनट</p>
<p><strong>संपादक</strong> : पीटर टेलर</p>
<p><strong>पार्श्व संगीत</strong> : माल्कम अर्नोल्ड</p>
<p><strong>लेखक</strong> : पियरे बुले</p>
<p><strong>कलाकार</strong> &#8211; अलेक गिनीस/विलियम होल्डन/जैक हॉकिन्स/स्टीव काल्वर्ट</p>
<p><strong>निर्माता</strong> : सैन स्पीगल</p>
<p><strong>निर्देशक</strong> : डेविड लीन</p>
<p><strong>निर्माण संस्थान</strong> : कोलंबिया पिक्चर्स</p>
<p><strong>निर्माण वर्ष</strong> : 1957</p>
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		<title>लॉयन ऑव द डेजर्ट</title>
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		<pubDate>Mon, 23 Dec 1991 05:52:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[इंग्लिश मूवी]]></category>
		<category><![CDATA[मूवी रिव्यू]]></category>
		<category><![CDATA[लॉयन ऑव द डेजर्ट]]></category>

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		<description><![CDATA[किसी भी व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र की बौद्धिक या भौगोलिक स्वतंत्रता पर बाह्य अतिक्रमण आधारभूत मानवीय मूल्यों के खिलाफ है। दूसरों पर जायज-नाजायज सत्ता की लोलुपता सदैव से मानव की कमजोरी और महत्वाकांक्षा रही है। मानवता के इतिहास का लगभग हर पन्ना स्वायत्त एवं स्वच्छंद विचार-व्यवहार की व्यवस्था पर आक्रमण और उसके विरोध की गाथाओं से सना हुआ है। ऐसे ही एक संघर्ष का जीवंत चित्रण है फिल्म &#8216;ओमर मुख्तार&#8216; (यह फिल्म एक और नाम से भी प्रचलित है- &#8216;लॉयन [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1618" alt="लॉयन ऑव द डेजर्ट " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1991/12/84.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">कि</span>सी भी व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र की बौद्धिक या भौगोलिक स्वतंत्रता पर बाह्य अतिक्रमण आधारभूत मानवीय मूल्यों के खिलाफ है। दूसरों पर जायज-नाजायज सत्ता की लोलुपता सदैव से मानव की कमजोरी और महत्वाकांक्षा रही है। मानवता के इतिहास का लगभग हर पन्ना स्वायत्त एवं स्वच्छंद विचार-व्यवहार की व्यवस्था पर आक्रमण और उसके विरोध की गाथाओं से सना हुआ है।</p>
<p>ऐसे ही एक संघर्ष का जीवंत चित्रण है फिल्म &#8216;<em>ओमर मुख्तार</em>&#8216; (यह फिल्म एक और नाम से भी प्रचलित है- &#8216;<em>लॉयन ऑव द डेजर्ट</em>&#8216;)। फिल्म का कथानक बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में इटली के फासिस्ट तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी द्वारा उत्तरी अफ्रीका के राष्ट्र लीबिया पर सत्ता कायम करने के प्रयत्नों का एक सच्चा वृत्तांत है। बीस वर्षों के अनवरत प्रयासों के बावजूद असीम सैन्य शक्ति से लैस इटली के इन मंसूबों को अंजाम नहीं मिल पाया और उनके मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा था- ओमर मुख्तार।</p>
<p>एक अधेड़, धर्मपरायण, सरल मौलवी, जिसने अपनी मातृभूमि पर आए संकट का डटकर सामना करने के लिए अपनी पूरी जाति को संगठित कर नेतृत्व प्रदान किया। उम्र के तकाजे को नजरअंदाज करते हुए हर मुठभेड़ में अपने लोगों के कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध किया। ऐसे ऐतिहासिक किरदार को कलाकार एंथनी क्वीन ने पर्दे पर सजीव कर दिया है।</p>
<div class="simplePullQuoteRightPerpal">उम्र के तकाजे को नजरअंदाज करते हुए हर मुठभेड़ में अपने लोगों के कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध किया<span></span></div>
<p>मुकाबला किसी भी मापदंड पर बराबर नहीं था। आधुनिक हथियारों से सुसज्जित, युद्ध में निपुण, तंदुरुस्त सेना के विरोध में अनपढ़, अप्रशिक्षित कबीले के लोग- जिनके पास अपने घोड़े की रकाब और पुरानी बंदूकों के सिवा कोई आसरा न था। अगर थी, तो अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता की चाह, जिसके लिए वे हर कुर्बानी देने को तत्पर थे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल रहे इस संघर्ष को एंथनी क्वीन के संवाद ने चरितार्थ कर दिया था, जिसका हिंदी रूपांतरण एक राष्ट्रभक्ति गीत है- <em>&#8216;अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं। सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं।&#8217;</em></p>
<p>मुख्तार को जिंदा या मुर्दा पकड़ने की मुहिम अंततः जनरल गत्जियाली (ओलिवर रीड) को सौंपी जाती है, जो कि मुख्तार तक पहुंचने के लिए किसी भी हथकंडे को बाकी नहीं छोड़ता। किंतु, शुरुआत में मुख्तार को बुड्‌ढा नौसिखिया समझने वाला जनरल भी आखिरकार उसका लोहा मान ही लेता है। फिल्म को देखते हुए बार-बार भारत की आजादी की लड़ाई, अंग्रेजों द्वारा किए गए अत्याचार और महात्मा गांधी की याद आती है। अपने सिद्धांतों के कार्यान्वयन के लिए हिंसा और अहिंसावादी तरीके से फर्क के बावजूद मुख्तार और बापू की लड़ाई का लक्ष्य एक ही था। एक ओर जहां आजादी पूर्व के भारतीयों को इस फिल्म से बीती यादें ताजा हो जाएंगी, वहीं वर्तमान पीढ़ी स्वतंत्रता के नाम पर हो रहे मखौल के वातावरण में यह सोचने को बाध्य हो जाएगी कि इस आजादी की असली कीमत क्या है। अत्यंत मर्मस्पर्शी और रोचक इस फिल्म में और निखार आ जाता, अगर इसका पार्श्व संगीत कथा की गति और &#8216;सिचुएशन&#8217; से थोड़ी और अंतरंग जुगलबंदी स्थापित कर लेता।</p>
<p><strong>फिल्म</strong> : ओमर मुख्तार (लॉयन ऑफ द डेजर्ट)</p>
<p><strong>समय</strong> : 162 मिनट</p>
<p><strong>कलाकार</strong> : एंथनी क्वीन/ओलिवर रीड/आरीन पापास/रैफ वालीलोन</p>
<p><strong>संपादक</strong> : जॉन शर्ली</p>
<p><strong>संगीत</strong> : मोरिस</p>
<p><strong>लेखक</strong> : हॉल क्रैग</p>
<p><strong>निर्माता</strong>-निर्देशक : मुस्तफाअकाड़</p>
<p><strong>निर्माण</strong> : फाल्कन इंटरनेशनल (1981)</p>
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