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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल&#187; अटल बिहारी वाजपेयी</title>
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		<title>अटलजी दे सकते हैं श्री बुश को कुछ भीष्म उपदेश</title>
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		<pubDate>Sat, 16 Dec 2000 10:07:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[व्हाईट हाऊस]]></category>
		<category><![CDATA[अटल बिहारी वाजपेयी]]></category>
		<category><![CDATA[अटलजी]]></category>
		<category><![CDATA[जॉर्ज बुश]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रपति श्री जॉर्ज बुश]]></category>

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		<description><![CDATA[और अब मेरे ही शब्दों में, वक्त आ गया है कि मुझे चलना चाहिए, धन्यवाद और शुभरात्रि। इन लफ्जों के साथ श्री अल गोर ने कल रात राष्ट्र के नाम संदेश में अपनी हार औपचारिक रूप से स्वीकार कर श्री जॉर्ज बुश को अमेरिका के 43वें राष्ट्रपति बनने की बधाई दी। यहां यह कहना पड़ेगा कि न सिर्फ अमेरिका की चुनाव प्रणाली, वरन यहां की पार्टी व्यवस्था में भी देश को आगे ले जाने की कला में भारतीय प्रधानमंत्री अटलजी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1528" alt="अटलजी दे सकते हैं श्री बुश को कुछ भीष्म उपदेश  " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/12/40.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">औ</span>र अब मेरे ही शब्दों में, वक्त आ गया है कि मुझे चलना चाहिए, धन्यवाद और शुभरात्रि। इन लफ्जों के साथ श्री अल गोर ने कल रात राष्ट्र के नाम संदेश में अपनी हार औपचारिक रूप से स्वीकार कर श्री जॉर्ज बुश को अमेरिका के 43वें राष्ट्रपति बनने की बधाई दी। यहां यह कहना पड़ेगा कि न सिर्फ अमेरिका की चुनाव प्रणाली, वरन यहां की पार्टी व्यवस्था में भी देश को आगे ले जाने की कला में भारतीय प्रधानमंत्री अटलजी श्री बुश को जरूर कुछ भीष्म उपदेश दे सकते हैं।</p>
<p><strong>&#8220;श्री बुश को यह ताज बड़े बोझ के साथ मिला है&#8221;</strong> ये ही शब्द श्री गोर ने ठीक आठ साल पहले पूर्व राष्ट्रपति श्री जॉर्ज बुश के लिए कहे थे कि अब समय आ गया है और उन्हें चले जाना चाहिए। विडंबना और कीर्तिमानों की फेहरिस्त तो इस राष्ट्रपति चुनाव में बहुत लंबी है।<br />
<strong>(1)</strong> 271 वोट पाकर सिर्फ एक वोट से निर्वाचक मंडल में जीतकर राष्ट्रपति बनने वाले श्री जॉर्ज बुश पहले व्यक्ति हैं।<br />
<strong>(2)</strong> इतिहास में चौथी और इस शताब्दी में पहली बार बगैर जनमत हासिल किए भी 54 वर्षीय श्री जॉर्ज बुश राष्ट्रपति बन रहे हैं।<br />
<strong>(3)</strong> 1824 में जॉन क्विंसी एडम्स की तरह वे अमेरिकी इतिहास में दूसरे पुत्र हैं, जो पिता के बाद राष्ट्रपति बन रहे हैं। जॉन क्विंसी एडम्स भी जनमत हारकर जीते थे।<br />
<strong>(4)</strong> श्री गोर की तरह उन्होंने भी टेनिसी के नागरिक को ही हराया था।<br />
<strong>(5)</strong> शताब्दी में पहली बार कैलिफोर्निया के चुनाव हारकर भी कोई राष्ट्रपति बना है।<br />
<strong>(6)</strong> सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राष्ट्रपति बनने वाले भी श्री जॉर्ज बुश 1876 के बाद पहले राष्ट्रपति हैं।</p>
<p>परसों रात को 10 बजे सुप्रीम कोर्ट के 5-4 वोट से फ्लोरिडा में पुनर्गणना रोकने के बाद यह तय था कि पिछले 36 दिनों की चुनावी रामायण का उत्तरकांड आ गया है। अमेरिकावासी भी कुछ-कुछ ऊब से गए थे, इस कभी न खत्म होने वाले मैच से। यह वह देश है जहां कुछ घंटे से ज्यादा तो कोई खेल स्पर्धा भी नहीं चलती। रात 9 बजे, आठ मिनट के अपने संदेश में श्री अल गोर ने ये स्पष्ट कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं हैं, पर उसका सम्मान और आदर करेंगे और श्री जॉर्ज बुश के राष्ट्रपति काल में उन्हें पूर्ण सहयोग देंगे। इसके बाद वे क्या करेंगे, उन्होंने नहीं सोचा, अपने गृह राज्य टेनिसी जाकर पुराने रिश्तों को ठीक-ठाक करेंगे। ज्ञात रहे कि श्री अल गोर अपने गृहराज्य में भी जीते नहीं। सबसे पहले उन्होंने श्री बुश को बधाई संदेश का फोन किया और यह भी कहा कि मैं आज आपको दोबारा फोन करके बधाई वापस नहीं लूंगा। सोचिए श्री गोर क्या महसूस कर रहे होंगे जब वे 17 महीनों से दिन-रात के इतने प्रचार के बाद और सिर्फ निर्वाचक मंडल में एक मत से सुप्रीम कोर्ट के फैसले से चुनाव हार गए। 24 वर्षों से लोकसेवा में रहे श्री गोर, जिस कुर्सी के आठ साल बहुत करीब रहे, परंतु वह उनके हाथ से दूर चली गई, तब उन्हें कैसा लगा होगा। हालांकि उन्होंने यह पन्ना खुला छोड़ दिया है कि वे फिर से चुनाव लड़ेंगे या नहीं।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">श्री बुश के नेतृत्व की परीक्षा रहेगी कि वे सारे देश को कैसे साथ लेकर चलते हैं। भारत के प्रति श्री बुश का रुख भी मैत्रीपूर्ण ही होना चाहिए<span></span></div>
<p>श्री बुश को यह ताज बड़े बोझ के साथ मिला है। सीनेट में बिलकुल 50-50 सदस्यों की बराबरी है और वीटो का वोट हमेशा उपराष्ट्रपति डिक चैनी को डालना पड़ेगा। आठ सालों से बढ़ती आर्थिक व्यवस्था और पूंजी बाजार भी कुछ थमते नजर आ रहे हैं। श्री गोर के भाषण के ठीक एक घंटे बाद अपने उद्‌बोधन में श्री बुश ने देश से यह वादा किया कि वे पार्टियों से ऊपर उठकर देश के हित में काम करेंगे। श्री बुश के साथ सकारात्मक पक्ष यह भी है कि उनके अधिकांश मंत्रिमंडलीय सदस्य उन्हें धरोहर में मिले हैं। सर्वश्री डिक चैनी, एन्ड्रयू कॉर्ड, जनरल कॉलिन पॉवेल (<strong>जिन्हें विदेश मंत्री बनाने की प्रबल संभावनाएं हैं</strong>) आदि सभी उनके पिता के साथ थे। ये सब अनुभवी हैं, लेकिन शीतयुद्ध से लेकर आज का विश्व और अमेरिका की राजनीति काफी अलग है।</p>
<p><strong>अमेरिकी क्या सोचते हैं श्री बुश के बारे में-और वह भी ऐसी स्थितियों में चुने जाने पर-</strong></p>
<p>काफी मिश्रित प्रतिक्रिया है। कुछ का मानना है कि ये ठीक हुआ, कुछ कहते हैं, बड़ा बुरा हुआ। निष्कर्ष में यह कि अब श्री बुश के नेतृत्व की परीक्षा रहेगी कि वे सारे देश को कैसे साथ लेकर चलते हैं। भारत के प्रति श्री बुश का रुख भी मैत्रीपूर्ण ही होना चाहिए। अंत में अवलोकन करते हुए यह लगता है कि श्री गोर ने अपने पार्टी के ब्रह्मास्त्र यानी श्री क्लिंटन का चुनाव प्रचार में उपयोग न करने की शायद कीमत चुकाई है। श्री क्लिंटन के व्यक्तिगत चरित्र के बाद भी श्रीमती क्लिंटन ने उनसे प्रचार कराया और जीती भीं। क्या श्रीमती हिलेरी तेज थीं और श्री गोर अति आदर्शवान और भावुक। ऐसा जवाब तो अब तारीख ही देगी। तो करिए इंतजार 20 जनवरी की सुबह का, जब श्री बुश का राज्याभिषेक होगा।</p>
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		<title>आपके चेहरे की चमक देखकर खुशी होती है</title>
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		<pubDate>Sat, 09 Sep 2000 05:54:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[अमेरिका में भारत]]></category>
		<category><![CDATA[अटल बिहारी वाजपेयी]]></category>
		<category><![CDATA[अटलजी भाषण]]></category>
		<category><![CDATA[जसवंतसिंह]]></category>

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		<description><![CDATA[ये उद्‌गार व्यक्त किए भारत के विदेशमंत्री जसवंतसिंह ने और फिर उनका हार्दिक अनुमोदन किया प्रधानमंत्री अटलजी ने। उन्होंने कहा कि वे अमेरिका और यूएन जनरल असेम्बली में 40 वर्षों से आ रहे हैं, लेकिन यहां बसे भारतीयों के चेहरे की चमक इस बार सर्वाधिक है। सभी की मातृभूमि तो भारत है, लेकिन इस कर्मभूमि पर भारतीयों ने जो प्रगति की है वह उल्लेखनीय है। अवसर था प्रधानमंत्री के ऑनर का। शुक्रवार 8 सितंबर की शाम अमेरिका में भारत के [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1990" alt="आपके चेहरे की चमक देखकर खुशी होती है" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/09/05.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">ये</span> उद्‌गार व्यक्त किए भारत के विदेशमंत्री जसवंतसिंह ने और फिर उनका हार्दिक अनुमोदन किया प्रधानमंत्री अटलजी ने। उन्होंने कहा कि वे अमेरिका और यूएन जनरल असेम्बली में 40 वर्षों से आ रहे हैं, लेकिन यहां बसे भारतीयों के चेहरे की चमक इस बार सर्वाधिक है। सभी की मातृभूमि तो भारत है, लेकिन इस कर्मभूमि पर भारतीयों ने जो प्रगति की है वह उल्लेखनीय है। अवसर था प्रधानमंत्री के ऑनर का। शुक्रवार 8 सितंबर की शाम अमेरिका में भारत के राजदूत नरेश चंद्रा द्वारा एक स्वागत समारोह रखा गया था, जिसमें यहां बसे भारतीय समुदाय के गणमान्य प्रतिनिधि आमंत्रित थे। कार्यक्रम का आयोजन वाल्डोर्फ एस्टोरिया होटल के हिल्टन रूम में किया गया। वाल्डोर्फ न्यूयॉर्क का सर्वाधिक प्रतिष्ठित होटल है।</p>
<p>शाम छह बजे से ही होटल के प्रांगण में कांजीवरम और सिल्क की साड़ियां पहने और कुछेक कुर्ता-पायजामा या अचकन में आए भारतीय अनिवासियों ने माहौल में भारत के रंग भर दिए थे। अटलजी ने शाम 7 बजे के बाद हॉल में प्रवेश किया। इस वक्त तक हॉल लगभग भर चुका था। इसमें अनिवासी भारतीयों के सभी प्रतिनिधि थे- व्यवसायी, डॉक्टर, सॉफ्टवेयर व्यवसायी आदि।</p>
<div class="simplePullQuoteRightGreen">अटलजी ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि क्लिंटन की भारत यात्रा के बाद दोनों राष्ट्रों के संबंधों में एक नया पन्ना खुल जाएगा<span></span></div>
<p>बंद गले के जोधपुरी कोट में अटलजी ने अपना भाषण बैठकर दिया। उनके चलने में उनके घुटने की तकलीफ साफ झलक रही थी। बगैर किसी कागज के हिंदी में बोलते हुए अटलजी ने कहा कि भारत-अमेरिका संबंधों की जब भी चर्चा होगी, यहां बसे अनिवासी भारतीयों का उल्लेख जरूर होगा।</p>
<p><strong>अटलजी के प्रभावी नेतृत्व की भूमिका</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि हमें आप सब पर गर्व है। अमेरिका और भारत के पिछले 40 वर्षों के संबंधों का उल्लेख करते हुए अटलजी ने कहा कि इसमें काफी बदलाव आ गया है। दोनों लोकतंत्रों में इतनी समानता है कि दोस्ती तो स्वाभाविक है। मतभेद तो किसी और के कारण था। भाषण के दौरान कई बार अटलजी के उद्‌घोष का करतल ध्वनि से स्वागत किया गया। अटलजी ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि क्लिंटन की भारत यात्रा के बाद दोनों राष्ट्रों के संबंधों में एक नया पन्ना खुल जाएगा, पर मुझे बड़ी खुशी है कि यहां तो किताब का नया अध्याय ही प्रारंभ हो गया । भारत लौटते वक्त एयरपोर्ट पर कस्टम्स की समस्या और भारत में अमेरिका के दूतावासों में वीसा लेने के लिए कठिनाइयों पर चुटकी लेते हुए अटलजी ने कहा कि अब तो यह सब पहले से बहुत कम है। अब तो कई राष्ट्रों ने थोक में हमारे लिए वीसा खोल दिए हैं। भाषण के दौरान अटलजी ने भारत की साझा सरकार, अक्षुण्ण राष्ट्र, आर्थिक प्रगति और अनाज में आत्मनिर्भरता और खुली अर्थव्यवस्था की भी चर्चा की। कार्यक्रम के प्रारंभ में न्यूयॉर्क में भारत की उच्चायुक्त शशि त्रिपाठी और राजदूत नरेश चंद्रा ने अटलजी का स्वागत किया। जसवंतसिंह ने कहा कि अमेरिका की आबादी का सिर्फ एक प्रतिशत होने के बावजूद भारतीय यहां की 5 प्रतिशत राष्ट्रीय संपत्ति के मालिक हैं और अमेरिका में बसे 80 देशों के अनिवासियों में शिक्षा, आय और व्यवसाय के मान से सर्वोधा हैं, जो काबिले तारीफ है। अटलजी के भाषण के बाद सभी उपस्थित लोगों ने कतारबद्ध होकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जाकर उनसे हाथ मिलाए और अभिवादन किया। अटलजी ने भी 500-600 लोगों में हरेक से बड़ी आत्मीयता से अभिवादन स्वीकार किया। प्रधानमंत्री के साथ आए पत्रकार दल में भारत के पत्रकार जगत के अमूमन सारे दिग्गज आए हैं। इससे अमेरिका यात्रा के महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां इलाज के लिए आए सुप्रसिद्ध गायक पं. जसराज से भाषण से पूर्व मैंने कहा कि पंडितजी भारतीयों की यहां तादाद भी बढ़ी है और प्रतिष्ठा भी, तो वे गद्‌गद्‌ हो गए और कहा कि यह सोलह आने सच है। इसमें अटलजी के प्रभावी नेतृत्व की भी महती भूमिका है।</p>
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		<title>अखर गया अटलजी का देर से आना</title>
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		<pubDate>Fri, 08 Sep 2000 05:44:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[अमेरिका में भारत]]></category>
		<category><![CDATA[अटल बिहारी वाजपेयी]]></category>
		<category><![CDATA[अटल बिहारी वाजपेयी भाषण]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय प्रधानमंत्री]]></category>
		<category><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन]]></category>

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		<description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन अपने पूरे जोर पर है। अटलजी गुरुवार की दोपहर (अमेरिकी समय के अनुसार) यहां देरी से पहुंचे जबकि विश्व के सभी महत्वपूर्ण नेता कल से यहां मौजूद हैं। सम्मेलन बुधवार से शुरू हो चुका है। पर अटलजी विलंब से यहां पहुंचे हैं। शहर के पूर्वी भाग में जहां सम्मेलन चल रहा है, लिमोसिन गाड़ियों का काफिला नजर आता है। अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन, रूसी राष्ट्रपति पुतिन, चीन के जियांग जेमिन, इसराइल के एहुद बराक, फिलिस्तीनी नेता यासेर अराफात [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1450" alt="अखर गया अटलजी का देर से आना" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/09/4.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">सं</span>युक्त राष्ट्र सम्मेलन अपने पूरे जोर पर है। अटलजी गुरुवार की दोपहर (अमेरिकी समय के अनुसार) यहां देरी से पहुंचे जबकि विश्व के सभी महत्वपूर्ण नेता कल से यहां मौजूद हैं। सम्मेलन बुधवार से शुरू हो चुका है। पर अटलजी विलंब से यहां पहुंचे हैं। शहर के पूर्वी भाग में जहां सम्मेलन चल रहा है, लिमोसिन गाड़ियों का काफिला नजर आता है। अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन, रूसी राष्ट्रपति पुतिन, चीन के जियांग जेमिन, इसराइल के एहुद बराक, फिलिस्तीनी नेता यासेर अराफात पहले दिन अपना भाषण दे चुके हैं। जब भारत का अवसर शुक्रवार को आएगा तब तक सम्मेलन का खुमार उतार पर होगा। बुधवार को दुनियाभर के नेताओं ने एक ऐतिहासिक तस्वीर खिंचवाई। इन्हीं में से एक नेता का कहना था- सहस्राब्दी सम्मेलन एक हजार वर्ष में एक बार होते हैं। करीब 150 देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राजा आदि यहां मौजूद हैं। यहां के वॉड्रोफ एस्टोरिया होटल में 30 से अधिक नेता रुके हैं। इसमें क्लिंटन, अराफात, बराक शामिल हैं। अटलजी भी यहीं रुके हैं।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">इन्हीं में से एक नेता का कहना था- सहस्राब्दी सम्मेलन एक हजार वर्ष में एक बार होते हैं<span></span></div>
<p>पर अफसोस इस बात का है कि अटलजी के देर से आगमन से कुछ ऐसा लग रहा है जैसे &#8216;वर निकासी&#8217; की बजाय &#8216;कन्या बिदाई&#8217; के समय किसी शादी में शरीक होना। हालांकि उनका स्वास्थ्य सर्वोपरि है। लेकिन हमारे प्रशासकों ने कहीं न कहीं चूक की जो तीन दिन की अहमियत को पूरी तरह भुना न सके।</p>
<p><strong>अटलजी एक जबर्दस्त प्रतिनिधि :</strong></p>
<p>बुधवार को न्यूयॉर्क टाइम्स में पाक सैन्य शासक मुशर्रफ का काफी बड़ा साक्षात्कार था। ऐसे में अटलजी की कमी खलती है। वे दुनिया की कुल आबादी के 1/6 भाग का प्रतिनिधित्व करते हैं। संयुक्त राष्ट्र में अटलजी की व्यक्तिगत धाक भी जबर्दस्त है। वर्षों पहले हिंदी में उनके ओजस्वी भाषण और कुछ वर्षों पूर्व विपक्ष में रहकर भी संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान को दी करारी हार सबके मानस पटल पर अभी भी है। संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए आवाज उठाने का यह सुनहरा अवसर है।</p>
<div class="simplePullQuoteLeftRed">लेकिन हमारे प्रशासकों ने कहीं न कहीं चूक की जो तीन दिन की अहमियत को पूरी तरह भुना न सके<span></span></div>
<p>पर जैसा यहां पता चला है कि अटलजी की विश्व के राजनीतिज्ञों और सामरिक महत्व के देशों के नेताओं से कोई खास मुलाकात तय नहीं है। अमेरिका से भी चर्चा का दौर 13 सितंबर के बाद ही है। आशा है कि आने वाले दस दिनों में अटलजी की उपस्थिति और उनके उद्‌गारों से हमारा ये गिला दूर हो जाएगा। प्रेट्र के अनुसार इतिहास का आज दूसरा अवसर था जबकि सुरक्षा परिषद की बैठक विभिन्न देशों और सरकारों के प्रमुखों की उपस्थिति में हुई। इसमें संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों पर विचार किया गया। बैठक में परिषद के सभी 15 सदस्य उपस्थित थे।</p>
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