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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल&#187; अमेरिका</title>
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		<title>अरबों का फैसला, चित या पट! सिक्का उछालकर विशाल संपत्ति का बँटवारा</title>
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		<pubDate>Tue, 03 Nov 2009 11:06:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[अमेरिकी अर्थव्यवस्था]]></category>
		<category><![CDATA[अमेरिका]]></category>
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		<description><![CDATA[न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन में 8000 फ्लैट, 9 इमारतें और कई जगह चल रहीं नई योजनाएँ- ये हैं रॉकरोज समूह, जिसे 4 दशकों से भी अधिक समय से तीन भाई हेनरी, फ्रैड्रिक और थॉमस इलघानयन चला रहे थे। पूरे समूह की संपत्ति कोई 3 बिलियन डॉलर (14000 करोड़ रु.) से अधिक है। कारोबार की शुरुआत 50 के दशक में इनके पिता नौरोल्लाह इलघानयन ने की थी, जो ईरान से अमेरिका आए थे। कारोबार में तीनों भाइयों ने उत्तरोत्तर वृद्धि की और [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2083" alt="“अरबों का फैसला, चित या पट! सिक्का उछालकर विशाल संपत्ति का बँटवारा”" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2009/11/1361.jpg" width="311" height="307" />न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन में 8000 फ्लैट, 9 इमारतें और कई जगह चल रहीं नई योजनाएँ- ये हैं रॉकरोज समूह, जिसे 4 दशकों से भी अधिक समय से तीन भाई हेनरी, फ्रैड्रिक और थॉमस इलघानयन चला रहे थे।</p>
<p>पूरे समूह की संपत्ति कोई 3 बिलियन डॉलर (14000 करोड़ रु.) से अधिक है। कारोबार की शुरुआत 50 के दशक में इनके पिता नौरोल्लाह इलघानयन ने की थी, जो ईरान से अमेरिका आए थे। कारोबार में तीनों भाइयों ने उत्तरोत्तर वृद्धि की और न्यूयॉर्क के सबसे बड़े और नामी गिरामी &#8220;<em>बिल्डर्स</em>&#8221; में उनकी गिनती आती है।</p>
<p><b>अगली पीढ़ी&#8230; और मतभेद : </b>तीनों भाइयों के कार्य क्षेत्र बँटे हुए थे और उनकी शैली भी अलग थी। इसीलिए उन्होंने इतनी प्रगति की। हेनरी के बेटे जस्टिन के कारोबार में शामिल होने पर भाइयों को लगा कि अब शायद गाड़ी साथ में नहीं चल पाएगी। पर विवाद, मुकदमेबाजी से परे उन्होंने पारिवारिक वकील और सलाहकार माइकल कोरोत्किन की मदद से इतनी विशाल संपत्ति के बँटवारे को सरल बना दिया।</p>
<div class="simplePullQuoteRightPerpal">न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन में 8000 फ्लैट, 9 इमारतें और कई जगह चल रहीं नई योजनाएँ- ये हैं रॉकरोज समूह, जिसे 4 दशकों से भी अधिक समय से तीन भाई हेनरी, फ्रैड्रिक और थॉमस इलघानयन चला रहे थे<span></span></div>
<p><b>पहले ढेरी बनाई&#8230; : </b>आपसी सलाह के बाद फ्रेड को कारोबार को तीन ढेरियों में बाँटने का काम मिला। जो उसने दो महीनों में पूरा किया। उसके बाद मार्च महीने में हेनरी और फ्रेड-थॉमस के प्रतिनिधि माइकल के दफ्तर में मिले। माइकल ने एक लिफाफा घुमाकर ये तय किया कि सिक्के पर चित या पट कौन बोलेगा। नाम निकला हैनरी का। तय हुआ कि अगर उसने सही पुकारा तो तीन हिस्से में से पसंद वह चुनेगा। माइकल ने एक क्वार्टर उछाला, हेनरी ने पुकारा &#8220;<em>पट</em>&#8221; (टेल्स) और सिक्का गिरा &#8220;<em>पट</em>&#8220;। उसने ढेरी तीन चुनी, जिसमें समूह का नाम &#8220;<em>रॉकरोज</em>&#8221; और 2500 किराए के फ्लैट वाली 8 रहवासी इमारतें मिली।</p>
<p><b>बँटवारे के बाद भी साथ :</b> फ्रेड और थॉमस ने बँटवारे के बाद भी एक साथ ही काम करने का फैसला किया। इत्तेफाक ऐसा कि मार्च महीने में फैसले के ठीक एक दिन पहले उनकी माँ चल बसी और अगले दिन उनके पिता। मुख्य निर्णय तो मार्च में हो गया, लेकिन कुछ मतभेदों के बाद बँटवारा अभी अक्टूबर में पूरी तरह हो गया। भाइयों में थोड़ा मनमुटाव तो है, लेकिन बँटवारे की इसी शालीन प्रक्रिया से न तो समूह का कारोबार बिग़ड़ा, न ही अखबारों में चर्चाओं-अफवाहों का बाजार गर्म हुआ।</p>
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		<title>हिलैरी क्लिंटन को भारतीय समुदाय का समर्थन</title>
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		<pubDate>Mon, 25 Jun 2007 11:53:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[अमेरिका में भारत]]></category>
		<category><![CDATA[अमेरिका]]></category>
		<category><![CDATA[डेमोक्रेटिक पार्टी]]></category>
		<category><![CDATA[न्यूयॉर्क]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रपति चुनाव]]></category>
		<category><![CDATA[हिलैरी क्लिंटन]]></category>

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		<description><![CDATA[रविवार की रात न्यूयॉर्क के आलीशान शेरटन होटल के बॉल रूम में अमेरिका में बसे भारतीय समुदाय के प्रमुख व्यवसायी, डॉक्टर और गणमान्य नागरिकों ने डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर राष्ट्रपति पद की दावेदार हिलैरी क्लिंटन के समर्थन में आयोजित भोज में हिस्सा लिया। अपने उद्‍बोधन में हिलैरी क्लिंटन ने अमेरिका में भारतीय समुदाय के योगदान और भारत-अमेरिका के बहुआयामी रिश्तों पर जोर दिया। इस कार्यक्रम के मुख्‍य आयोजक थे होटल व्यवसायी और क्लिंटन परिवार के घनिष्ठ मित्र संतसिंह चटवाल। [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1702" alt="हिलैरी क्लिंटन को भारतीय समुदाय का समर्थन" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2007/06/123.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">र</span>विवार की रात न्यूयॉर्क के आलीशान शेरटन होटल के बॉल रूम में अमेरिका में बसे भारतीय समुदाय के प्रमुख व्यवसायी, डॉक्टर और गणमान्य नागरिकों ने डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर राष्ट्रपति पद की दावेदार हिलैरी क्लिंटन के समर्थन में आयोजित भोज में हिस्सा लिया।</p>
<p>अपने उद्‍बोधन में हिलैरी क्लिंटन ने अमेरिका में भारतीय समुदाय के योगदान और भारत-अमेरिका के बहुआयामी रिश्तों पर जोर दिया। इस कार्यक्रम के मुख्‍य आयोजक थे होटल व्यवसायी और क्लिंटन परिवार के घनिष्ठ मित्र संतसिंह चटवाल। हालाँकि बिल क्लिंटन कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे।</p>
<p>अपने गरिमापूर्ण भाषण में हिलैरी ने अमेरिका के मुख्‍य आंतरिक विषय स्वास्थ्य सेवा, अर्थव्यवस्था और जनता के लिए प्रतिबद्ध शासन की चर्चा की। वहीं दूसरी ओर उन्होंने अमेरिका की विश्व में एक मित्र और मददगार राष्ट्र के रूप में छवि को वापस स्थापित करने के लिए अपना संकल्प दोहराया। उन्होंने भारत की महिला राष्ट्रपति बनने की संभावना का उल्लेख और स्वागत किया।</p>
<div class="simplePullQuoteRightGolden">कार्यक्रम में डेमोक्रेटिक पार्टी के कई प्रमुख नेता भी मौजूद थे। भारतीय अमेरिका समुदाय में दीपक चोपड़ा और डॉ. राणावत भी उपस्थित थे<span></span></div>
<p>हिलैरी के भाषण के शुरू और अंत में 1250 से अधिक भारतीय समुदाय के लोगों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया और भारत के नाम के उल्लेख पर बार-बार तालियों से स्वागत किया। हिलैरी रोधम क्लिंटन का स्वागत करते हुए संतसिंह चटवाल ने कहा कि क्लिंटन परिवार और भारतीय समुदाय तथा भारत के रिश्ते बहुत पुराने और गहरे हैं। किसी भी चुनाव प्रत्याशी के लिए भारतीय समुदाय की ओर से यह पहला और अपने आप में सबसे बड़ा आयोजन था।</p>
<p>हिलैरी क्लिंटन का परिचय चटवाल के पुत्र विक्रम चटवाल ने दिया। पूरे अमेरिका से भारतीय इस कार्यक्रम के लिए आए थे। भारत से भी हिलैरी और क्लिंटन समर्थक गणमान्य व्यक्ति कार्यक्रम में शरीक थे। उनमें प्रमुख थे जी समूह के सुभाष चंद्रा, हिंदुजा और केन्द्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल। पटेल कार्यक्रम के कुछ पहले निकल गए थे। कार्यक्रम में डेमोक्रेटिक पार्टी के कई प्रमुख नेता भी मौजूद थे। भारतीय अमेरिका समुदाय में दीपक चोपड़ा और डॉ. राणावत भी उपस्थित थे।</p>
<p>पीले रंग की पोषाक और गले में बड़े मोतियों की माला पहने हिलैरी हर एक व्यक्ति से काफी आत्मीयता से हाथ मिला रही थीं और उनके समर्थन के लिए धन्यवाद व्यक्त कर रही थीं। बीच-बीच में संत चटवाल ‘<em>खास</em>’ मित्रों का हिलैरी को थोड़ा लंबा परिचय दे रहे थे। जिन चुनिंदा व्यक्तियों को हिलैरी क्लिंटन के साथ हाथ मिलाने और व्यक्तिगत तस्वरी खिंचवाने का भी अनूठा अवसर मिला, उस कतार में खड़े होकर बहुत करीब से हिलैरी क्लिंटन को चंद पलों के लिए देखने का अवसर मिला। अमेरिका में चुनाव प्रक्रिया के दौरान इस तरह के ‘<em>डोनेशन डिनर</em>’ का काफी प्रचलन है। कल रात के भोज में प्रति सीट 1000 डॉलर के अनुमान से भारतीय समुदाय के हिलैरी क्लिंटन के समर्थकों ने अपना ‘योगदान’ दिया था। आयोजन में लगभग 10 से 15 लाख डॉलर (4 से 5 करोड़ रुपए) हिलैरी क्लिंटन के चुनाव फंड के लिए जमा हुए।</p>
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		<title>इस धूल को तरसते हैं हम !</title>
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		<pubDate>Wed, 01 Dec 1999 06:11:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[इंदौर और इंदौरी]]></category>
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		<category><![CDATA[धूल]]></category>
		<category><![CDATA[धूल-मिट्टी]]></category>
		<category><![CDATA[ब्रज-वृंदावन]]></category>
		<category><![CDATA[मध्यप्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[मातृभूमि]]></category>

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		<description><![CDATA[धुआं उगलते टेम्पो, सड़क के नाम पर सिर्फ एक रास्ता, गड्‌ढों और &#8216;दचकों&#8217; भरा सफर (यानी सफर तय करना हो हिंदी में लेकिन यात्रा के अंत तक सफर हो अंग्रेजी का)। इंदौर और मध्यप्रदेश के क्या हाल हो गए हैं। &#8216;सड़क&#8216; तो जैसे भूगोल की किताब में मीलों तय करने के बजाय सीधे इतिहास की किताबों के पन्ने में खंडहरों की तरह दफन हो गई है। अभी तक तो सिर्फ दोपहिया वाहन चालक ही मुंह पर अंतरिक्षमय, जैन साधुसम कुछ [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1996" alt="इस धूल को तरसते हैं हम ! " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1999/12/15.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">धु</span>आं उगलते टेम्पो, सड़क के नाम पर सिर्फ एक रास्ता, गड्‌ढों और <em>&#8216;दचकों&#8217;</em> भरा सफर (यानी सफर तय करना हो हिंदी में लेकिन यात्रा के अंत तक सफर हो अंग्रेजी का)। इंदौर और मध्यप्रदेश के क्या हाल हो गए हैं। &#8216;<em>सड़क</em>&#8216; तो जैसे भूगोल की किताब में मीलों तय करने के बजाय सीधे इतिहास की किताबों के पन्ने में खंडहरों की तरह दफन हो गई है। अभी तक तो सिर्फ दोपहिया वाहन चालक ही मुंह पर अंतरिक्षमय, जैन साधुसम कुछ लगा कर रखते थे, परंतु यहां तो मैंने पलासिया चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस मैन को भी वह पहने हुए देखा। तो अब जनता ही नहीं, वरन्‌ प्रशासन के अंग भी इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर चुके हैं। और तो और, अपने मित्र जे.पी. से मिला, पांच मिनट की मुलाकात में ढेरों बार खांसी। पूछने पर हताश होकर बोला, ये तो यार अब इंदौर में रहने वाले हर व्यक्ति, जो स्कूटर-साइकिल पर घूमता हो, उसको होना तय है।</p>
<p>सिर्फ दो ही इलाज हैं। या तो दिनभर ऑफिस के बाहर निकलो नहीं या फिर सिर्फ एयरकंडीशंड गाड़ी में घूमो, अमूमन यह नामुमकिन है। यह तो रहा रहवासी होने के दुःख-दर्द का नजारा। वहीं अमेरिका के &#8216;<em>स्वस्थ</em>&#8216; माहौल से आते ही परिवार सहित शादी के चल समारोह में मैं जब शरीक हुआ, तो बरात और घोड़ी और &#8216;<em>राष्ट्रीय नौशाद</em>&#8216; बैंड के साथ-साथ &#8216;थिरकने&#8217; का भी अवसर प्राप्त हुआ- &#8216;<em>मेरे देश की धरती सोना उगले&#8217;, &#8216;होहोऽऽ&#8230;.निंबुड़ा निंबुड़ा</em>&#8216; और फिर तोरण द्वार पर बजने वाला वो गीत, जिसका कॉपीराइट पूरे भारत के हर बैण्ड के पास है- &#8216;<em>बहारों फूल बरसाओ</em>&#8216;- इन धुनों को सुन कर जो दिल को ठंडक पहुंचती है, उसका अंदाजा सिर्फ अनिवासी ही लगा सकते हैं, जिन्हें ये बैंड, बरात, घोड़ी नसीब ही नहीं होते।</p>
<div class="simplePullQuoteLeftOrange">न्यूयॉर्क में महीने में सिर्फ एक बार औपचारिकतावश जूते साफ करने की आदत से मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया। जीजाजी शायद समझ नहीं पाएंगे। पर ‘इस धूल को कितना तरसते हैं हम।’<span></span></div>
<p><strong>इस धूल को कितना तरसते हैं हम !</strong></p>
<p>अपने भाई, जीजी-जीजाजी के साथ बरात चलने के पहले आधा-पौन घंटा <em>&#8216;डांस&#8217;</em> और &#8216;<em>फुगड़ी</em>&#8216; करने के बाद जब औरों की तरह मैंने भी अपने जूतों को देखा, जो श्यामवर्ण होकर भी धूल-मिट्टी की परत से श्वेतमय हो चले थे तो अनायास ही दूसरों के मुंह से निकल पड़ा &#8216;<em>उफ</em>&#8216; कितनी धूल उड़ती है यहां पर, जूते की पॉलिश खराब हो गई। वहीं न्यूयॉर्क में महीने में सिर्फ एक बार औपचारिकतावश जूते साफ करने की आदत से मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया। जीजाजी शायद समझ नहीं पाएंगे। पर &#8216;<em>इस धूल को कितना तरसते हैं हम।</em>&#8216;</p>
<p>ये वो धूल-मिट्टी है, जिसने अमेरिका में साफ मोजे-जूते पहनने वाले मेरे पांवों से पिछले साल सीधे न्यूयॉर्क के प्लेन से उतरकर ब्रज-वृंदावन में पांच-सात कोस की गिरिराज परिक्रमा लगवा दी, जबकि पूरा मार्ग कंकड़, कीचड़, गोबर और धूल-मिट्टी से सराबोर था। एक नजर में वही धूल-मिट्टी है जो पांव में छाले और फेफड़े में दमा कर देती है और दूसरी नजर में वही ब्रज रज और मातृभूमि की मिट्टी आस्था और श्रद्धाभरे पांवों को कोमल मरहम-सा सहला देती है। शायद फर्क इसीलिए है कि &#8216;<em>इस धूल को बहुत तरसते हैं हम।</em>&#8216; सहस्राब्दी की ढलान पर खड़े हुए कभी-कभी डर भी लगता है कि कहीं यह मिट्टी गरीबी और गड़बड़ी की &#8216;<em>गर्द</em>&#8216; में न बदल जाए। वैसे, अपने राग और रस को बरकरार रख पाए तो इस &#8216;<em>रज</em>&#8216; को, सारी दुनिया को अपने बस में करने की अद्‌भुत क्षमता है। तभी तो हम जैसे गृहविरही अनिवासी पुलक और श्रद्धा से यह कह पाते हैं कि &#8216;<em>इस धूल को बहुत तरसते हैं हम!</em>&#8216;</p>
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		<title>टोरा टोरा टोरा</title>
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		<pubDate>Wed, 23 Jan 1991 05:55:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[20 सैन्चुरी फॉक्स]]></category>
		<category><![CDATA[अमेरिका]]></category>
		<category><![CDATA[टोरा टोरा टोरा]]></category>
		<category><![CDATA[विश्वयुद्ध]]></category>

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		<description><![CDATA[17 जनवरी 1991 को बहुराष्ट्रीय वायुसेना द्वारा इराक पर किया गया हमला पारंपरिक युद्ध के इतिहास में निःसंदेह गहन और पैने आक्रमण के रूप में किया गया अब तक का सबसे विस्तृत आक्रमण था, किन्तु ठीक पचास वर्षों पूर्व द्वितीय विश्वयुद्ध में भी एक ऐसा ही हवाई आक्रमण हुआ था, जो कि युद्ध इतिहास में अविस्मरणीय रहेगा। 1941 के उत्तरार्द्ध में जर्मनी, इटली और जापान का त्रिगुट विश्व में सत्ता के नए केन्द्र के रूप में उभर रहा था। इंग्लैंड [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1991/01/jm_k2_toratoratora.jpg" alt="टोरा टोरा टोरा" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3167" /><span class="dropcap">17</span> जनवरी 1991 को बहुराष्ट्रीय वायुसेना द्वारा इराक पर किया गया हमला पारंपरिक युद्ध के इतिहास में निःसंदेह गहन और पैने आक्रमण के रूप में किया गया अब तक का सबसे विस्तृत आक्रमण था, किन्तु ठीक पचास वर्षों पूर्व द्वितीय विश्वयुद्ध में भी एक ऐसा ही हवाई आक्रमण हुआ था, जो कि युद्ध इतिहास में अविस्मरणीय रहेगा।</p>
<p>1941 के उत्तरार्द्ध में जर्मनी, इटली और जापान का त्रिगुट विश्व में सत्ता के नए केन्द्र के रूप में उभर रहा था। इंग्लैंड और फ्रांस सहित संधि देश युद्ध की लगातार मार से पस्त हो चुके थे, परन्तु एक देश जो कि सभी समीकरण बदलने में सफल हो सकता था, उस समय तक युद्ध से तटस्थ था- अमेरिका।</p>
<p>अति महत्वाकांक्षा और जीत के उन्माद में जापान ने विचार किया कि अगर वह हवाई में पर्ल बंदरगाह पर बेड़ा डाले, प्रशांत महासागर के अमेरिकी समुद्री बेड़े को बंदरगाह पर ही हवाई आक्रमण से ध्वस्त कर दे, तो शायद अमेरिका फिर युद्ध में सक्रिय हो ही नहीं पाएगा। फिल्म में इसी घटनाक्रम को अत्यन्त जीवंत और रोमांचक ढंग से पेश किया गया है। अमेरिका और जापान के थल-जल मुख्यालय, व्हाइट हाउस, जापानी समुद्री जहाज आदि पर तेज रफ्तार से बदलते हुए घटनाक्रम के फिल्मांकन ने इस फिल्म को और गति प्रदान की है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">दो घंटे से भी कम के अंतराल में इन विमानों ने ऐसी तबाही मचाई कि अमेरिकी जलसेना लगभग पंगु हो गई<span></span></div>
<p><strong>रविवार 7 दिसंबर 1941</strong> को जब पर्ल बंदरगाह पर छुट्‌टी का सा आलम था और नौसैनिक शनिवार रात्रि की सुरा-सुंदरी की खुमारी से भी नहीं उबर पाए थे, जापान के लगभग 200 लड़ाकू विमान, बमवर्षक और टॉर्पिडो विमानों ने प्रातः 8 बजे पर्ल हार्बर पर हमला बोल दिया। दो घंटे से भी कम के अंतराल में इन विमानों ने ऐसी तबाही मचाई कि अमेरिकी जलसेना लगभग पंगु हो गई। &#8216;लगभग&#8217; इसलिए कि अमेरिका के अति महत्वपूर्ण वायुयान कैरियर जल पोतों का बेड़ा उस वक्त पर्ल बंदरगाह पर नहीं था, जिसने कि बाद में इस लड़ाई का पूरा बदला लिया। आक्रमण के फलस्वरूप अमेरिका पूरी तरह से विश्व युद्ध में शरीक हो गया, शेष तो अब इतिहास है।</p>
<p>फिल्म में इस एकतरफा हवाई आक्रमण को देखकर अमेरिका द्वारा मौजूदा वक्त में इराक पर किए जा रहे हमलों का एक अंदाजभर लगाया जा सकता है। &#8216;टोरा-टोरा-टोरा&#8217; में युद्ध दृश्यांकन के अतिरिक्त सेना के विभिन्न अंगों एवं राजनयिकों- सेना के बीच तनाव और उससे उत्पन्न जटिलताओं पर भी बहुत अच्छा प्रकाश डाला गया है। फिल्म यह भी बताती है कि नगण्य-सी भूलें और गैर जिम्मेदाराना कार्य, भयावह आपदाओं के कारण बन जाते हैं। इसकी मिसाल लें। अमेरिका के राडार को जब एक पहाड़ी पर बेहतर कार्य क्षमता के लिए चढ़ाने का आग्रह किया जाता है तो नकारात्मक जवाब मिलता है, क्योंकि &#8216;वह पहाड़ी वन्य जीव जन्तुओं के लिए सुरक्षित क्षेत्र था।&#8217; इसी राडार के संचालक मुख्यालय को जब हवाई आक्रमण की सूचना देते हैं, तो उन्हें जवाब मिलता है &#8216;घबराओ मत, शायद तुम दिवास्वप्न देख रहे हो। नतीजतन 7 युद्धपोत, 4 सहयोगी जलयान, 2 विनाशक जलयान, प्रतिरक्षा के लिए तैनात वायु बेड़ा और 2403 अमेरिकियों का अंत हो गया, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध को एक नया मोड़ दिया। इसका समापन परमाणु बम के उपयोग के साथ हुआ। &#8216;टोरा-टोरा-टोरा&#8217; सचमुच एक ऐतिहासिक सुबह की रोंगटे खड़े कर देने वाली यादगार फिल्म है।</p>
<p><strong>फिल्म</strong> : टोरा टोरा टोरा (रंगीन)</p>
<p><strong>भाषा</strong> : अंग्रेजी एवं जापानी (अंग्रेजी सबटाइटल सहित)</p>
<p><strong>निर्माता</strong> : एल्मो विलियम</p>
<p><strong>निर्देशक</strong> : रिचर्ड फ्लैथर, रिजो किकुसावा</p>
<p><strong>पार्श्व संगीत</strong> : जैरी गोल्डस्मिथ</p>
<p><strong>कलाकार</strong> : जोसफ गोटन, जैसन बॉबर्ड, ई. मार्शल</p>
<p><strong>छायांकन</strong> : चार्ल्स व्हीलर</p>
<p><strong>स्क्रीनप्ले</strong> : लैरी फोरस्टर, हिडिओ ओगिनी</p>
<p><strong>निर्माण संस्था</strong> : 20 सैन्चुरी फॉक्स</p>
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