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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल&#187; इंदौर</title>
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		<title>रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून</title>
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		<pubDate>Fri, 26 Jul 2002 10:41:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[अमेरिकी अर्थव्यवस्था]]></category>
		<category><![CDATA[अमेरिका की अर्थव्यवस्था]]></category>
		<category><![CDATA[इंदौर]]></category>
		<category><![CDATA[डो जोंस]]></category>
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		<category><![CDATA[न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज]]></category>
		<category><![CDATA[रहिमन पानी राखिए]]></category>
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		<description><![CDATA[पानी शब्द पढ़ते ही नईदुनिया के पाठकों को वो जल याद आ जाएगा, जो नल में कभी-कभी आता है और सावन में भी बरस नहीं रहा, लेकिन आज मेरा संकेत रहीम के उस &#8216;पानी&#8216; से नहीं- जिसके बिना &#8216;मोती&#8216; और &#8216;चून&#8217; सून हो जाते हैं, वरन मनुष्य जीवन के चरित्र और ईमान के उस &#8216;पानी&#8216; से है, जिसके ओझल हो जाने से आज सारे विश्व का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर से विश्वास &#8216;पानी-पानी&#8216; हो रहा है। एक ओर जहां इंदौर में [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2113" alt="रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2002/07/140.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">पा</span>नी शब्द पढ़ते ही नईदुनिया के पाठकों को वो जल याद आ जाएगा, जो नल में कभी-कभी आता है और सावन में भी बरस नहीं रहा, लेकिन आज मेरा संकेत रहीम के उस &#8216;<em>पानी</em>&#8216; से नहीं- जिसके बिना &#8216;<em>मोती</em>&#8216; और &#8216;चून&#8217; सून हो जाते हैं, वरन मनुष्य जीवन के चरित्र और ईमान के उस &#8216;<em>पानी</em>&#8216; से है, जिसके ओझल हो जाने से आज सारे विश्व का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर से विश्वास &#8216;<em>पानी-पानी</em>&#8216; हो रहा है।</p>
<p>एक ओर जहां इंदौर में &#8216;<em>इंद्र</em>&#8216; की अनावृष्टि को मनाने के लिए यज्ञ-कर्म हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका में कुछ लालची और लोभी कंपनी मालिकों की &#8216;<em>इंद्रियों</em>&#8216; की अतिवृष्टि ने निवेशकों के खरबों डॉलर की जमा पूंजी को होम करके स्वाहा-सा कर दिया।</p>
<p><b>डो जोंस को आखिर हुआ क्या है</b><b>?</b></p>
<p>10 दिनों तक लगातार गिरने के बाद कल पहली बार न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज का डो जोंस इन्डेक्स उन्मुक्त होकर 488 अंश चढ़ा है, जिससे सबकी सांस में सांस आई है। क्या यह बढ़त स्थायी है या सिर्फ चातक की स्वाति बूंद? ये तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इसके पिछले महीनों में जो हुआ, उससे तो पूरा अमेरिका सिहर उठा है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था तो पिछले 18 महीनों से सुस्त ही है, उस पर ओसामा के 11 सितंबर के वारों ने आग में घी का काम किया, लेकिन डॉट कॉम और आतंकवाद से ये घाव कुछ अलग हैं, क्योंकि ये अंदरूनी हैं। व्यवस्था की निष्पक्षता, सिस्टम की स्ट्रेंथ और कार्पोरेट गवर्नेंस का विश्व में पाठ पढ़ाने वाले राष्ट्र के खुद के पिछवाड़े में इतनी पोल? ऑडिटर्स, बैंकर्स, कंपनी के ऑफिसर्स और वॉल स्ट्रीट के दलालों की मिलीभगत ने मिलकर ऐसा तांडव मचाया है कि चरमराई आर्थिक परिस्थिति में &#8216;<em>विश्वासघात</em>&#8216; की दोहरी मार से अमेरिका के पूरे शेयर बाजार का मूल्यांकन मार्च 2000 के 17 ट्रिलियन डॉलर से घटकर सिर्फ 10 ट्रिलियन डॉलर रह गया है। 7 ट्रिलियन डॉलर का घाटा यानी भारत की सालाना जीडीपी का 16 गुना। नेस्डैक मार्च 2000 के 5000 इंडेक्स में तो लगभग 75 प्रतिशत की गिरावट आ गई है और 23 जुलाई तक सिर्फ 9 दिनों में डो इंडेक्स 18 प्रतिशत गिर गया था।</p>
<div class="simplePullQuoteRightGolden">7 ट्रिलियन डॉलर का घाटा यानी भारत की सालाना जीडीपी का 16 गुना<span></span></div>
<p>नहीं, बल्कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था तो सुधार पर है, 2002 की पहली तिमाही में जीडीपी ने रिकॉर्ड 6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, ब्याज दर 1.75 प्रतिशत के न्यूनतम स्तर पर है, महंगाई भी नहीं के बराबर है। जो अवयव बिगड़ गया है, वह है कंपनियों के फाइनेंशियल स्टेटमेंट्‌स और उनके सीईओ और मुख्य अधिकारियों की नीयत और अपने अंशधारकों के प्रति जवाबदेही पर से लोगों का विश्वास, जो कि एनरॉन, एंडरसन, वर्ल्डकॉम, एडेलफिया और ऐसी कई नामी-गिरामी कंपनियों के इस साल में &#8216;<em>काले चिट्ठों</em>&#8216; के एक साथ उजागर होने से हिल गया है।</p>
<p><b>पितामह ग्रीनस्पेन उवाच</b></p>
<p>हाल ही में अमेरिकी सांसदों के सामने बोलते हुए फेडरल रिजर्व बैंक के चेयरमैन और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के &#8216;<em>पितामह भीष्म</em>&#8216; एलन ग्रीनस्पेन ने इस मद को नया नाम दिया &#8216;इन्फेक्शियस ग्रीड।&#8217; चातुर्मास में किसी संत के प्रवचन जैसे उद्‌गारों में उन्होंने कहा, &#8216;<em>हमारे अधिकांश आर्थिक समुदाय को मानो</em> &#8216;<em>लालच की महामारी</em>&#8216; ने ग्रस्त कर लिया है। ऐसा नहीं है कि आज का मानव पुरानी पीढ़ी के बजाय कुछ ज्यादा लोभी हो गया है, सच तो ये है कि आज उसकी लोभ-लालसा पूर्ति के साधन बहुत बढ़ गए हैं और इन सब साधनों की पंक्ति में सबसे मादक साबित हुए स्टॉक और स्टॉक ऑपशन्स।</p>
<p><b>कनक-कनक ते सौ गुनी</b><b>, </b><b>मादकता अधिकाय</b></p>
<p>90 के दशक में अमेरिका की आर्थिक प्रगति का सर्वोच्च परिचायक था, यहां के स्टॉक मार्केट के कुलांचे और अंशधारकों के स्टॉक्स की बढ़ती कीमत। कंपनियों के सारे मुख्य अधिकारियों के वेतन का मुख्य हिस्सा कंपनी के स्टॉक्स की प्रगति पर आधारित था और उद्देश्य बहुत साफ था। सब अधिकारी मिलकर कंपनी की प्रगति के लिए जी-जान लगाएंगे, जिससे होंगे कंपनी के अच्छे वार्षिक परिणाम और उससे बढ़ेगी स्टॉक की कीमत, जिससे अंशधारक, कर्मचारी और अधिकारी सभी लाभान्वित होंगे। 1995 से 2000 तक का ये &#8216;<em>स्वर्णिम युग</em>&#8216; तो हम सबको याद है। अधिकारियों और कर्मचारियों को तो घटे दरों से भविष्य में कंपनी के स्टॉक्स खरीदने के लिए लाखों स्टॉक ऑप्शन भी प्रदान किए जाते रहे और ये प्रचलन टेक्नालॉजी कंपनियों में सर्वाधिक था, जिसके अधिकांश प्रभाव तो काफी कारगर सिद्ध हुए।</p>
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		<title>पद्‌मभूषण सम्मान की सूचना से अभिभूत हैं डॉ. राणावत</title>
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		<pubDate>Mon, 29 Jan 2001 05:58:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[इंदौर और इंदौरी]]></category>
		<category><![CDATA[इंदौर]]></category>
		<category><![CDATA[डॉ. चितरंजन राणावत]]></category>
		<category><![CDATA[डॉ. राणावत]]></category>
		<category><![CDATA[पद्‌मभूषण पुरस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय डॉक्टर]]></category>

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		<description><![CDATA[गणतंत्र दिवस की संध्या पर न्यूयॉर्क स्थित भारतीय उच्चायोग में न्यूयॉर्क इलाके के गणमान्य नागरिकों के कार्यक्रम में कुछ अलग-सा माहौल था। एक-दूसरे से मिलने और गणतंत्र दिवस की बधाई से पहले लोग एक-दूसरे से गुजरात में आए भूकम्प से विनाश की ज्यादा बातें कर रहे थे। इंदौर से जुड़े होने पर गर्व मेरी नजर अचानक पड़ी विश्व प्रसिद्ध अस्थि रोग विशेषज्ञ और भारत सरकार द्वारा पद्‌मभूषण से अलंकृत डॉ. चितरंजन राणावत पर, जो वहां उच्चायोग के सभागार में दाखिल [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1459" alt="पद्‌मभूषण सम्मान की सूचना से अभिभूत हैं डॉ. राणावत" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2001/01/8.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">ग</span>णतंत्र दिवस की संध्या पर न्यूयॉर्क स्थित भारतीय उच्चायोग में न्यूयॉर्क इलाके के गणमान्य नागरिकों के कार्यक्रम में कुछ अलग-सा माहौल था। एक-दूसरे से मिलने और गणतंत्र दिवस की बधाई से पहले लोग एक-दूसरे से गुजरात में आए भूकम्प से विनाश की ज्यादा बातें कर रहे थे।</p>
<p><strong>इंदौर से जुड़े होने पर गर्व</strong></p>
<p>मेरी नजर अचानक पड़ी विश्व प्रसिद्ध अस्थि रोग विशेषज्ञ और भारत सरकार द्वारा पद्‌मभूषण से अलंकृत डॉ. चितरंजन राणावत पर, जो वहां उच्चायोग के सभागार में दाखिल हो ही रहे थे। मैंने तुरंत सारे इंदौर की ओर से बढ़कर डॉ. राणावत को पद्‌मभूषण पर हार्दिक बधाई और शुभकामना व्यक्त की और कहा कि हमें आपके इंदौर से जुड़े होने पर गर्व है। अत्यंत सहजता से धन्यवाद कहते हुए डॉ. राणावत ने अपनी चिर-परिचित सी मुस्कान की झलक दे दी। पूछने पर उन्होंने बताया कि उन्हें तो पहले इस अवॉर्ड के बारे में कुछ भी नहीं मालूम था और उनके अलंकरण की सूचना उन्हें न्यूयॉर्क में भारतीय उच्चायुक्त शशि त्रिपाठी ने फोन करके दी।</p>
<div class="simplePullQuoteRightGolden">मैंने डॉ. राणावत से पूछा कि कैसा लग रहा है तो निःश्छलता से बोले &#8216;अच्छा ही लग रहा है&#8217;<span></span></div>
<p>पास खड़ी श्रीमती राणावत ने तो चुटकी लेते हुए कहा कि डॉ. राणावत को तो ठीक से पुरस्कार का नाम भी नहीं पता था। मैंने डॉ. राणावत से पूछा कि कैसा लग रहा है तो निःश्छलता से बोले &#8216;<em>अच्छा ही लग रहा है</em>&#8216;। वे और उनकी पत्नी आपस में कयास लगाने लगे कि यह पुरस्कार कौन तय करता है और राष्ट्रपति भवन से यह नाम की घोषणा कैसे होती है। श्रीमती राणावत ने डॉ. राणावत को बताया कि संगीत से जुड़ी दो हस्तियों को सबसे बड़ा अलंकरण मिला है पर उस अलंकरण का नाम वे भूल रही थीं।</p>
<div>
<p><strong>डॉ. राणावत से बातचीत</strong></p>
<p>मैंने डॉ. राणावत से पूछा कि आपकी अगली हिन्दुस्तान और इंदौर यात्रा, हंसकर बोले अभी तो कुछ तय नहीं, पर देखिए शायद जब यह अलंकरण समारोह हो तब। अमेरिकन महिला होने के बावजूद बातचीत से श्रीमती राणावत तुरंत भांप गईं कि यह कोई इंदौर वाला डॉ. राणावत को बधाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि वे 1969 में पहली बार इंदौर गई थीं और आखिरी बार पिछले साल और इन दोनों के बीच इंदौर में बहुत बदलाव आया है।</p>
</div>
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		<title>भारतीय नक्षत्रों का धरती पर समागम</title>
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		<pubDate>Mon, 08 May 2000 06:09:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[अमेरिका में भारत]]></category>
		<category><![CDATA[इंदौर]]></category>
		<category><![CDATA[ग्रहों के नक्षत्र]]></category>
		<category><![CDATA[टीआईई वार्षिक अधिवेशन]]></category>
		<category><![CDATA[टीआईई- कॉन 2000]]></category>
		<category><![CDATA[डॉट कॉम]]></category>
		<category><![CDATA[सिलिकॉन वैली]]></category>

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		<description><![CDATA[अमेरिका में वर्तमान तकनीकी प्रगति में भारतीयों की अहम भूमिका रही है। इसका प्रभाव और प्रभुत्व देखने के लिए 2000 में टीआईई का वार्षिक अधिवेशन बहुत उपयुक्त स्थान था। 5 मई को आकाश में ग्रहों और सूर्य के एक रेखा में आने की विलक्षण घटना के मानो एक ही दिन बाद धरती पर पुनरावृत्ति हो गई। अगर एक समय एक ही छत के नीचे सिकामोर के संस्थापक डॉ. गुरुराज देशपांडे, हेलथों के सहसंस्थापक पवन निगम, प्रख्यात वेंचर कैपिटलिस्ट और सन [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/05/JM_b_TiE.jpg" alt="भारतीय नक्षत्रों का धरती पर समागम" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3044" /><span class="dropcap">अ</span>मेरिका में वर्तमान तकनीकी प्रगति में भारतीयों की अहम भूमिका रही है। इसका प्रभाव और प्रभुत्व देखने के लिए 2000 में टीआईई का वार्षिक अधिवेशन बहुत उपयुक्त स्थान था। 5 मई को आकाश में ग्रहों और सूर्य के एक रेखा में आने की विलक्षण घटना के मानो एक ही दिन बाद धरती पर पुनरावृत्ति हो गई। अगर एक समय एक ही छत के नीचे सिकामोर के संस्थापक डॉ. गुरुराज देशपांडे, हेलथों के सहसंस्थापक पवन निगम, प्रख्यात वेंचर कैपिटलिस्ट और सन माइक्रोसिस्टम्स के सहसंस्थापक विनोद खोसला, इंटेल के विनोद धाम, मुकेश चत्तर, कंवल रेखी, राज वट्‌टीकुट्टी, प्रकाश भालेराव, एक्सोडस के संस्थापक बी.वी. जगदीश और के.बी. चंद्रशेखर, भारतीय अरबपति/करोड़पति (बिलिएनर/मिलिएनर) दिग्गजों की सूची तो इतनी लंबी है, जैसे पूरी सिलिकॉन वैली ही एक सभागार में समा गई थी। अवसर था सिलिकॉन वैली में 1994 से कार्यरत टीआईई (द इंडस इंटरप्रीन्यूर्स) का सातवां वार्षिक कार्यक्रम टीआईई- कॉन 2000, जो सेन जोस (जिसे ऐसे लिखा गया था) में 6 और 7 मई को आयोजित किया गया था।</p>
<p>इस साल कॉन्फ्रेंस में कल्पनातीत 1800 से अधिक लोगों ने भाग लिया (रजिस्ट्रेशन 3 सप्ताह पहले ही बंद हो गए थे) और भाग लेने वालों में सभी लोग थे। अपने &#8216;<em>आइडिया</em>&#8216; या सपने को साकार करने के जोश और उत्साह से भरे युवा इंजीनियर &#8216;<em>इंटरप्रीन्यूर्स</em>&#8216; अपनी-अपनी &#8216;<em>इंटरनेट स्टार्ट अप</em>&#8216; का &#8216;<em>बिजनेस प्लान&#8217; लेकर उन्हीं में अगले सबीर भाटिया के.बी. चंद्रशेखर की तलाश में थे। पूरा माहौल ऐसा लग रहा था जैसे, अमेरिका में सिलिकॉन वैली हिन्दुस्तानियों की। &#8216;परिंदा भी पर नहीं मार सकता।</em>&#8216;</p>
<div class="simplePullQuoteRightGolden">टीआईई की ख्याति इतनी बढ़ गई है कि हाल ही में वॉल स्ट्रीट जर्नल और फॉरच्यून पत्रिका, दोनों ने सिलिकॉन वैली में भारतीयों की सफलता और टीआईर्ई के बारे में खासा कवरेज दिया<span></span></div>
<p>खचाखच भरे सभागार में कार्यक्रम का प्रारंभ नेटस्केप और हेल्टोन के संस्थापक जिम क्लॉर्क के उद्‌बोधन से हुआ। जिम क्लॉर्क ने अपने अनुभवों से नए &#8216;<em>इंटरप्रीन्यूर्स&#8217;</em> को अत्यंत संजीदगी से आत्मसात कराया और उसी के बाद था अमेरिका में सबसे अमीर भारतीय डॉ. गुरुराज देशपांडे का भाषण, जिन्होंने अत्यंत ओजस्वी और जोशीले भाषण में कहा कि एक नई कंपनी को बनाकर बड़ा करने के रोजाना के दुख-सुख में आनंद पाने वाले ही इस यात्रा के सही हकदार हैं। सिर्फ &#8216;<em>आईपीओ</em>&#8216; और कंपनी को बेचकर पैसा बनाने के ख्वाब से चालू की गई कंपनी बहुत आगे नहीं जाती।</p>
<p>इसी अवसर पर कंवल रेखी ने भारत सरकार द्वारा वेंचर कैपिटल इन्वेस्टमेंट के संबंध में टीआईई के सभी सुझाव मानने पर संतोष व्यक्त किया। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में दो विषयों पर सर्वाधिक जोर था। सफल लोगों द्वारा नई कंपनियों के अपने अनुभवों से सुझाव &#8216;<em>गुरु-शिष्य परंपरा</em>&#8216; और आपस में नेटवर्किंग &#8216;<em>भाईचारा</em>।&#8217; और नेटवर्किंग तो देखते ही बनती थी, अंदर तीन सभागारों में दिनभर अलग विषयों पर विशिष्ट वक्ताओं के पेनल, जिनमें प्रो. अमर भिड़े, डॉ. सी.के. प्रहलाद जैसे दिग्गज मिलाकर 65 स्पीकर शामिल थे- अपने विचार प्रकट कर रहे थे, वहीं चारों ओर गलियारे में लोग एक-दूसरे से मिलने और अपने डॉट कॉम &#8216;<em>सपने</em>&#8216; को &#8216;<em>सच</em>&#8216; करने की तलाश में लगे थे। वहां ऐसा लगा जैसे हाल ही की नस्दक में भारी गिरावट के बाद भी कोई 200-250 नई डॉट कॉम स्टार्टअप के प्रणेता वहां हाजिर थे।</p>
<p><strong><span style="color: #252324; font-family: mangal, Georgia, 'Times New Roman', Times, serif;">कौन पहुंचा </span>महाकुंभ में :</strong></p>
<p>ऐसा नहीं था कि सिर्फ सिलिकॉन वैली के लोग वहां मौजूद थे, न सिर्फ अमेरिका के हर कोने, वरन भारत से भी कई लोग इस &#8216;<em>महाकुंभ</em>&#8216; में डुबकी लगाने आए थे, जिनमें उद्योगपति डॉ. बी.के. मोदी, आईटीसी चेयरमैन के. चुघ, थॉपर आदि प्रमुख थे। पंजाब सरकार के प्रमुख सचिव समेत कई अन्य प्रशासक वहां आए थे। यही नहीं, इंदौर मूल के भी करीब 10 लोग उस कार्यक्रम में थे, जो कि इंदौर की प्रगतिशीलता का अच्छा परिचायक है। टीआईई की ख्याति इतनी बढ़ गई है कि हाल ही में वॉल स्ट्रीट जर्नल और फॉरच्यून पत्रिका, दोनों ने सिलिकॉन वैली में भारतीयों की सफलता और टीआईर्ई के बारे में खासा कवरेज दिया। टीआईई की अब भारत में 5, अमेरिका में 9 और कनाडा में 1 प्रांतीय शाखाएं कार्यरत हैं और &#8216;<em>नेटवर्किंग</em>&#8216; के जरिये आगे बढ़ने के लिए हर सुझाव का लाभ उठाते युवा उद्यमी, माहौल बड़ा जोरदार रहता है।</p>
<p>यहां पर मैं कंवल रेखी का विशेष उल्लेख करना चाहूंगा, जिनके चेहरे और हावभाव को देखकर ही लगता है कि अपने अनुभव से वे हर नए उद्यमी और अपनी मातृभूमि भारत की भरसक मदद करना चाहते हैं और &#8216;<em>इकोनॉमिक इंटरप्रीन्यूर्स</em>&#8216; के बाद &#8216;<em>सोशल इंटरप्रीन्यूर्स</em>&#8216; की भूमिका बखूबी निभा रहे हैं। शायद उद्यमियों में नारायण मूर्ति और अजीम प्रेमजी और प्रशंसकों में चंद्रबाबू नायडू वहां और होते, तो समूचे भारतीय आईटी समुदाय की सनद पूरी हो जाती। टाइकॉन का सब लाभ उठा सकें, इसके लिए टीआईई ने अपनी वेबसाइट डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू.ओआरजी पर इन गतिविधियों के साइबरकास्ट की व्यवस्था भी की है।</p>
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		<title>इस धूल को तरसते हैं हम !</title>
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		<pubDate>Wed, 01 Dec 1999 06:11:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[इंदौर और इंदौरी]]></category>
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		<description><![CDATA[धुआं उगलते टेम्पो, सड़क के नाम पर सिर्फ एक रास्ता, गड्‌ढों और &#8216;दचकों&#8217; भरा सफर (यानी सफर तय करना हो हिंदी में लेकिन यात्रा के अंत तक सफर हो अंग्रेजी का)। इंदौर और मध्यप्रदेश के क्या हाल हो गए हैं। &#8216;सड़क&#8216; तो जैसे भूगोल की किताब में मीलों तय करने के बजाय सीधे इतिहास की किताबों के पन्ने में खंडहरों की तरह दफन हो गई है। अभी तक तो सिर्फ दोपहिया वाहन चालक ही मुंह पर अंतरिक्षमय, जैन साधुसम कुछ [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1996" alt="इस धूल को तरसते हैं हम ! " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1999/12/15.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">धु</span>आं उगलते टेम्पो, सड़क के नाम पर सिर्फ एक रास्ता, गड्‌ढों और <em>&#8216;दचकों&#8217;</em> भरा सफर (यानी सफर तय करना हो हिंदी में लेकिन यात्रा के अंत तक सफर हो अंग्रेजी का)। इंदौर और मध्यप्रदेश के क्या हाल हो गए हैं। &#8216;<em>सड़क</em>&#8216; तो जैसे भूगोल की किताब में मीलों तय करने के बजाय सीधे इतिहास की किताबों के पन्ने में खंडहरों की तरह दफन हो गई है। अभी तक तो सिर्फ दोपहिया वाहन चालक ही मुंह पर अंतरिक्षमय, जैन साधुसम कुछ लगा कर रखते थे, परंतु यहां तो मैंने पलासिया चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस मैन को भी वह पहने हुए देखा। तो अब जनता ही नहीं, वरन्‌ प्रशासन के अंग भी इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर चुके हैं। और तो और, अपने मित्र जे.पी. से मिला, पांच मिनट की मुलाकात में ढेरों बार खांसी। पूछने पर हताश होकर बोला, ये तो यार अब इंदौर में रहने वाले हर व्यक्ति, जो स्कूटर-साइकिल पर घूमता हो, उसको होना तय है।</p>
<p>सिर्फ दो ही इलाज हैं। या तो दिनभर ऑफिस के बाहर निकलो नहीं या फिर सिर्फ एयरकंडीशंड गाड़ी में घूमो, अमूमन यह नामुमकिन है। यह तो रहा रहवासी होने के दुःख-दर्द का नजारा। वहीं अमेरिका के &#8216;<em>स्वस्थ</em>&#8216; माहौल से आते ही परिवार सहित शादी के चल समारोह में मैं जब शरीक हुआ, तो बरात और घोड़ी और &#8216;<em>राष्ट्रीय नौशाद</em>&#8216; बैंड के साथ-साथ &#8216;थिरकने&#8217; का भी अवसर प्राप्त हुआ- &#8216;<em>मेरे देश की धरती सोना उगले&#8217;, &#8216;होहोऽऽ&#8230;.निंबुड़ा निंबुड़ा</em>&#8216; और फिर तोरण द्वार पर बजने वाला वो गीत, जिसका कॉपीराइट पूरे भारत के हर बैण्ड के पास है- &#8216;<em>बहारों फूल बरसाओ</em>&#8216;- इन धुनों को सुन कर जो दिल को ठंडक पहुंचती है, उसका अंदाजा सिर्फ अनिवासी ही लगा सकते हैं, जिन्हें ये बैंड, बरात, घोड़ी नसीब ही नहीं होते।</p>
<div class="simplePullQuoteLeftOrange">न्यूयॉर्क में महीने में सिर्फ एक बार औपचारिकतावश जूते साफ करने की आदत से मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया। जीजाजी शायद समझ नहीं पाएंगे। पर ‘इस धूल को कितना तरसते हैं हम।’<span></span></div>
<p><strong>इस धूल को कितना तरसते हैं हम !</strong></p>
<p>अपने भाई, जीजी-जीजाजी के साथ बरात चलने के पहले आधा-पौन घंटा <em>&#8216;डांस&#8217;</em> और &#8216;<em>फुगड़ी</em>&#8216; करने के बाद जब औरों की तरह मैंने भी अपने जूतों को देखा, जो श्यामवर्ण होकर भी धूल-मिट्टी की परत से श्वेतमय हो चले थे तो अनायास ही दूसरों के मुंह से निकल पड़ा &#8216;<em>उफ</em>&#8216; कितनी धूल उड़ती है यहां पर, जूते की पॉलिश खराब हो गई। वहीं न्यूयॉर्क में महीने में सिर्फ एक बार औपचारिकतावश जूते साफ करने की आदत से मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया। जीजाजी शायद समझ नहीं पाएंगे। पर &#8216;<em>इस धूल को कितना तरसते हैं हम।</em>&#8216;</p>
<p>ये वो धूल-मिट्टी है, जिसने अमेरिका में साफ मोजे-जूते पहनने वाले मेरे पांवों से पिछले साल सीधे न्यूयॉर्क के प्लेन से उतरकर ब्रज-वृंदावन में पांच-सात कोस की गिरिराज परिक्रमा लगवा दी, जबकि पूरा मार्ग कंकड़, कीचड़, गोबर और धूल-मिट्टी से सराबोर था। एक नजर में वही धूल-मिट्टी है जो पांव में छाले और फेफड़े में दमा कर देती है और दूसरी नजर में वही ब्रज रज और मातृभूमि की मिट्टी आस्था और श्रद्धाभरे पांवों को कोमल मरहम-सा सहला देती है। शायद फर्क इसीलिए है कि &#8216;<em>इस धूल को बहुत तरसते हैं हम।</em>&#8216; सहस्राब्दी की ढलान पर खड़े हुए कभी-कभी डर भी लगता है कि कहीं यह मिट्टी गरीबी और गड़बड़ी की &#8216;<em>गर्द</em>&#8216; में न बदल जाए। वैसे, अपने राग और रस को बरकरार रख पाए तो इस &#8216;<em>रज</em>&#8216; को, सारी दुनिया को अपने बस में करने की अद्‌भुत क्षमता है। तभी तो हम जैसे गृहविरही अनिवासी पुलक और श्रद्धा से यह कह पाते हैं कि &#8216;<em>इस धूल को बहुत तरसते हैं हम!</em>&#8216;</p>
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