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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल&#187; जे.आर.डी.टाटा</title>
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		<title>एक युग की शुरुआत&#8230; &#8230;और युग का अंत।</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:42:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[ए.आर. दलाल]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी.टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा घराने]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा सन्स]]></category>
		<category><![CDATA[बॉम्बे हाउस]]></category>
		<category><![CDATA[रतन टाटा]]></category>

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		<description><![CDATA[26 जुलाई 1938 को प्रातः 11.30 बजे टाटा सन्स के निदेशक मंडल की बैठक &#8216;बॉम्बे हाउस&#8217;, फोर्ट में हुई। बैठक का विवरणः श्री जे.आर.डी. टाटा, श्री एस.डी. सकलातवाला, श्री ए.आर. दलाल, श्री एच.आर. दलाल, श्री एचपी. मोदी उपस्थित थे। श्री एच.पी. मोदी को अध्यक्षीय आसन संभालने का प्रस्ताव पारित किया गया। श्री एस.डी. सकलातवाला ने मार्मिक शब्दों में अध्यक्ष, सर नौरोजी सकलातवाला की दुःखद और असामयिक मृत्यु पर शोक व्यक्त किया और निम्नलिखित शोक प्रस्ताव सर्वानुमति से पारित किया गया। [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd12_jrd_ratan.jpg" alt="एक युग की शुरुआत... ...और युग का अंत।" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3136" /><span class="dropcap">26</span> जुलाई 1938 को प्रातः 11.30 बजे टाटा सन्स के निदेशक मंडल की बैठक &#8216;बॉम्बे हाउस&#8217;, फोर्ट में हुई। बैठक का विवरणः</p>
<p>श्री जे.आर.डी. टाटा,</p>
<p>श्री एस.डी. सकलातवाला,</p>
<p>श्री ए.आर. दलाल,</p>
<p>श्री एच.आर. दलाल,</p>
<p>श्री एचपी. मोदी उपस्थित थे।</p>
<p>श्री एच.पी. मोदी को अध्यक्षीय आसन संभालने का प्रस्ताव पारित किया गया। श्री एस.डी. सकलातवाला ने मार्मिक शब्दों में अध्यक्ष, सर नौरोजी सकलातवाला की दुःखद और असामयिक मृत्यु पर शोक व्यक्त किया और निम्नलिखित शोक प्रस्ताव सर्वानुमति से पारित किया गया।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">कंपनी के उद्‌गम-दस्तावेज की धारा 118 के अंतर्गत श्री सोहराब सकलातवाला ने यह प्रस्ताव रखा और श्री अरदेशीर दलाल ने उसकी पुष्टि की, कि श्री जे.आर.डी. टाटा को टाटा सन्स के निदेशक मंडल का अध्यक्ष मनोनीत किया जाता है<span></span></div>
<p>टाटा सन्स के निदेशक मंडल को उनके अध्यक्ष, सर नौरोजी सकलातवाला के आकस्मिक निधन के समाचार से धक्का पहुंचा है। अपने प्रभावी व्यक्तित्व और अनेक विशेषताओं से उन्होंने अपने साथियों का आदर और स्नेह, दोनों ही पाया। जिस आत्मविश्वास का संचार उन्होंने अपने सभी सहयोगियों और टाटा घराने के अन्य कर्मचारियों में किया, वह टाटा घराने की परम्पराओं को बरकरार रखने में सदा याद किया जाएगा। कंपनी के उद्‌गम-दस्तावेज की धारा 118 के अंतर्गत श्री सोहराब सकलातवाला ने यह प्रस्ताव रखा और श्री अरदेशीर दलाल ने उसकी पुष्टि की, कि श्री जे.आर.डी. टाटा को टाटा सन्स के निदेशक मंडल का अध्यक्ष मनोनीत किया जाता है।</p>
<p><strong>20 फरवरी&#8217; 1991</strong> को जे.आर.डी. ने दफ्तार में एक व्यस्त दिन व्यतीत करने के बाद शाम को एक सार्वजनिक समारोह में भाषण दिया। अगले दिन प्रातः जमशेदपुर रवाना होने से पहले उनकी छाती में दर्द महसूस होने लगा, फिर भी वे जमशेदपुर के लिए प्रस्थान कर गए। 3 मार्च को उन्होंने वहां संस्थापक दिवस के कार्यक्रमों में भाग लिया। वहां भी उन्हें छाती की तकलीफ बरकरार रही। जमशेदपुर से लौटने के पश्चात उन्हें पांच दिन बंबई में ब्रीच कैंडी अस्पताल में आराम करने की सलाह दी गई, जिसका उन्होंने न चाहते हुए भी पालन किया। अस्पताल से घर आने के अगले सप्ताह बुधवार, 27 मार्च को टाटा सन्स निदेशक मंडल की हर माह के अंतिम बुधवार को होने वाली परंपरागत बैठक निर्धारित थी। लेकिन जे.आर.डी. के आग्रहानुसार उसे दो दिन पूर्व, यानी 25 मार्च 1991 को ही बुला लिया गया। कार्यसूची में सामान्य विषयों के अलावा एक विशिष्ट मसौदा दर्ज था, &#8216;<em>जे.आर.डी. के पत्र पर विचार करना।</em>&#8216;</p>
<p>बैठक के प्रारंभ में ही जे.आर.डी. ने टाटा घराने से अपने साठ वर्षों से भी अधिक के संबंधों और अनुभवों का जिक्र किया। बैठक में उपस्थित निदेशकों के अनुसार वह बड़ा ही मार्मिक उद्‌बोधन था। उसके अंत में जे.आर.डी. ने कहा, <em>&#8216;मैंने 53 वर्षों के लंबे कार्यकाल का निर्वाहन किया है। अब मैं सेवानिवृत्त होना चाहता हूं और अपनी ओर से श्री रतन टाटा के नाम का टाटा सन्स के अध्यक्ष पद के लिए प्रस्ताव रखता हूं।&#8217;</em> टाटा सन्स में जे.आर.डी. के सहयोगी और लगभग 15 प्रतिशत के हिस्सेदार शापूरजी पालोनजी मिस्त्री ने प्रस्ताव की पुष्टि की। वहां उपस्थित किसी भी निदेशक ने उसमें कोई परिवर्तन का प्रस्ताव नहीं रखा। और, रतन टाटा टाटा सन्स लिमिटेड के अध्यक्ष बन गए। एक स्वर्णिम युग का पटाक्षेप हो गया।</p>
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		<title>पैनी नजर &#8216;जहांगीर&#8217; की</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:40:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[एअर इंडिया]]></category>
		<category><![CDATA[जहांगीर रतनजी दादाभाई]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी.टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[विमान सेवा]]></category>

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		<description><![CDATA[जे.आर.डी. टाटा के प्रबंधन की सदैव यह विशेषता रही है कि उन्होंने छोटी से छोटी बात को भी हमेशा पूरा महत्व दिया। शायद इसके सबसे जीवंत उदाहरण जे.आर.डी. द्वारा विभिन्न समयों पर एअर इंडिया की विमान सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए दिए गए सुझाव थे। पहली नजर में तो अधिकांश मुद्दे &#8216;तुच्छ&#8217; जान पड़ते हैं, पर करीब से देखने पर इनसे जे.आर.डी. की विलक्षण क्षमताओं का सागर दिखाई पड़ता है, जो उस ऐतिहासिक वाक्य को चरितार्थ करता है, &#8216;आप [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd3_JRD_AirIndia.jpg" alt="पैनी नजर 'जहांगीर' की" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3134" /><span class="dropcap">जे</span>.आर.डी. टाटा के प्रबंधन की सदैव यह विशेषता रही है कि उन्होंने छोटी से छोटी बात को भी हमेशा पूरा महत्व दिया। शायद इसके सबसे जीवंत उदाहरण जे.आर.डी. द्वारा विभिन्न समयों पर एअर इंडिया की विमान सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए दिए गए सुझाव थे।</p>
<p>पहली नजर में तो अधिकांश मुद्दे <em>&#8216;तुच्छ&#8217;</em> जान पड़ते हैं, पर करीब से देखने पर इनसे जे.आर.डी. की विलक्षण क्षमताओं का सागर दिखाई पड़ता है, जो उस ऐतिहासिक वाक्य को चरितार्थ करता है, <em>&#8216;आप छोटी चीजों की ओर ध्यान दे दें, बड़ी चीजें खुद-ब-खुद ठीक हो जाएंगी।&#8217;</em> एअर इंडिया में अपनी हर यात्रा के दौरान जे.आर.डी. विमान में हर पहलू पर अपने अनुभव नोट करते थे और उनके आधार पर अपने सुझाव, प्रशंसा अथवा रोष को लगातार व्यक्त करते रहते थे।</p>
<p>एक बार उन्होंने एअर इंडिया के विज्ञापनों में कुछ परिवर्तन करने के लिए मध्य रात्रि में प्रचार प्रमुख जाल कावसजी को फोन कर दिया। <em>&#8216;महाराजा&#8217;</em> (एयर इंडिया का पहचान चिह्न) को सतत श्रेष्ठता की ओर अग्रसर होते देखना चाहने वाले &#8216;जहांगीर&#8217; की पैनी नजर के कुछ उदाहरण देखिए :</p>
<div class="simplePullQuoteRightPerpal">मैंने कुछ परिचारिकाओं को सफेद लिपिस्टिक का प्रयोग करते हुए देखा है, वह दूर से अच्छी नहीं दिखाई पड़ती<span></span></div>
<ul>
<li>&#8216;हमारे विमानों में गाढ़ी ब्रिटिश बीयर यात्रियों को पेय के रूप में दी जाती है। मेरे विचार में उड़ान के दौरान यात्री हल्की बीयर ज्यादा पसंद करेंगे।</li>
<li> जिनेवा से उड़ान के बाद दी गई चाय का रंग कॉफी से ज्यादा अलग नहीं था। यह रंग उसमें नैसर्गिक तौर पर है अथवा अधिक उकाली के कारण, कृपया जांच करवाएं।</li>
<li> विमान में कुछ कुर्सियां अधिक आरामदेह हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए, हर यात्री को समान रूप से आरामदेह यात्रा का अधिकार है।</li>
<li> परिचालक दल के सदस्य उड़ान के दौरान विमान के गलियारे में धूम्रपान करते हैं। इससे यात्रियों के मन में हमारी विमान सेवा का विपरीत प्रभाव पड़ता है। परिचालक दल को सिर्फ उनके लिए निर्धारित स्थान पर ही बैठकर धूम्रपान की अनुमति होनी चाहिए।</li>
<li> उड़ान के दौरान भोजन परोसते समय यात्रियों की कुर्सियों के ऊपर लगी रोशनी अवश्य जलाई जानी चाहिए। इससे भोजन परोसने और खाने के बर्तनों की चमक बढ़ जाएगी और यात्रियों पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा।</li>
<li> विमान परिचारिकाओं को उनके पहनावे और साज-श्रृंगार का निर्णय करने की पूर्ण स्वतंत्रता रहनी चाहिए। परंतु उन्हें इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें सैकड़ों यात्री देखते हैं और उनका सुंदर किंतु सौम्य व्यक्तित्व यात्रियों के मन में एअरलाइन की अच्छी छवि अंकित करता है। मैंने कुछ परिचारिकाओं को सफेद लिपिस्टिक का प्रयोग करते हुए देखा है, वह दूर से अच्छी नहीं दिखाई पड़ती।</li>
<li> उड़ान से पूर्व प्रसाधन कक्ष (टॉयलट) में टिश्यू पेपर के रोल व्यवस्थित ढंग से नहीं रखे हुए थे।&#8217;</li>
</ul>
<p>जिस विमान सेवा के अध्यक्ष भी उसकी सेवाओं के प्रति इतना सजग और जागरूक हों उसकी सफलता में तो कोई संदेह रह ही नहीं जाता और यही हुआ भी। इसीलिए कड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के बावजूद 1968 में लंदन के एक अखबार द्वारा किए गए सर्वेक्षण में एअर इंडिया <em>&#8216;विश्व की सबसे अच्छी विमान सेवा&#8217;</em> के खिताब से पुरस्कृत हुई। निर्णायक मंडल की एक सदस्या के अनुसार, <em>&#8216;मैं रोम में विमान के पड़ाव के दौरान अपनी कुछ चाकलेट विमान में अपनी सीट पर रखकर उतर गई थी। जब मैं वापस लौटी, तो चाकलेट यथावत रखी थी किंतु सिर्फ उसी कुर्सी के पास की खिड़की बंद कर दी गई थी, ताकि चाकलेट धूप पड़ने से पिघल न जाए।&#8217;</em></p>
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		<title>क्या खतरा मात्र आर्थिक शक्ति बढ़ने से है?</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:39:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[अर्थव्यवस्था]]></category>
		<category><![CDATA[जमशेदजी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी.टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[दादाभाई नौरोजी]]></category>
		<category><![CDATA[रतन टाटा]]></category>

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		<description><![CDATA[हमारे देश के सामने समाजवादी अर्थव्यवस्था का ढांचा रखा गया है। अगर समाजवाद का अर्थ सभी को समान अधिकार और मौके, दलितों के ऊपर उठने के उचित अवसर और न्यायप्रिय वैधानिक समाज व्यवस्था से है, तो मैं उस समाजवाद का पक्षधर हूं, परंतु अगर उस समाजवाद का तात्पर्य व्यक्तिगत प्रयत्नों पर पाबंदी, उद्योगों पर सरकार के नियंत्रण और निजी इच्छा के विपरीत सरकार द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार जीवन-यापन से है, तो मैं ऐसे समाजवाद के सख्त खिलाफ हूं। किसी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd5_profile_pic.jpg" alt="jm_jrd5_profile_pic" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3132" /><span class="dropcap">ह</span>मारे देश के सामने समाजवादी अर्थव्यवस्था का ढांचा रखा गया है। अगर समाजवाद का अर्थ सभी को समान अधिकार और मौके, दलितों के ऊपर उठने के उचित अवसर और न्यायप्रिय वैधानिक समाज व्यवस्था से है, तो मैं उस समाजवाद का पक्षधर हूं, परंतु अगर उस समाजवाद का तात्पर्य व्यक्तिगत प्रयत्नों पर पाबंदी, उद्योगों पर सरकार के नियंत्रण और निजी इच्छा के विपरीत सरकार द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार जीवन-यापन से है, तो मैं ऐसे समाजवाद के सख्त खिलाफ हूं। किसी भी व्यक्ति को अपनी निजी और पारिवारिक जरूरतों का पूरा करने के मार्ग में निर्धारित बनकर बैठने वाली व्यवस्था कैसे प्रशंसनीय हो सकती है?&#8217;</p>
<p><b>कन्सनट्रेशन ऑफ इकोनोमिक पावर</b></p>
<p>&#8216;हमारे नेताओं के भाषण सुनकर तो ऐसा लगने लगा है, मानो हमारे देश को बढ़ती हुई आबादी, सांप्रदायिकता, गरीबी, बेरोजगारी आदि किसी से भी नहीं, बल्कि सिर्फ आर्थिक शक्ति के एकत्रित होने से खतरा है। अगर निजी हाथों में आर्थिक शक्ति है, तो उसका सीधा तात्पर्य उपयुक्त स्थानों पर मनचाहे उद्योग लगाने की स्वतंत्रता, बाजार से आवश्यकतानुसार पैसा उधार अथवा अंशों के जरिये एकत्रित करने की आजादी और मनचाही शर्तों पर कर्मचारियों को नियुक्त करने की खुली छूट से है। परंतु इनमें से ऐसी कोई भी चीज नहीं है, जो हमारे देश का उद्योगपति स्वेच्छा से कर सकता है। तो फिर उसकी आर्थिक शक्ति का क्या फायदा। सही मायनों मे तो &#8216;<em>कन्सनट्रेशन ऑफ इकोनोमिक पॉवर हमारे सरकारी अफसरों और मंत्रियों के पास है, जिससे कि देश की प्रगति को वास्तविक खतरा है।</em>&#8216;</p>
<p>(उपरोक्त विचार वर्तमान आर्थिक परिवर्तनों के पूर्व व्यक्त किए गए हैं।)</p>
<p><b>मूल्य एवं आस्था</b></p>
<p>&#8216;दुःख का विषय है कि मूल्य आधारित सभ्यता अब समाप्त हो गई है। मैं जिन मूल्यों व स्तर का अनुसरण करने का प्रयास करता हूं, वह मुझे जमशेदजी टाटा से मिले हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं। स्वतंत्रता के बाद अधिक काला धन बनाने के साथ मूल्यों का ह्रास अधिक हुआ है। आज मोटे तौर पर मूल्यों में तो बहुत बदलाव नहीं आया है। हां, हमारे द्वारा उन्हें दिए जाने वाले महत्व में आमूल परिवर्तन हो गया है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">वह मेरी जिंदगी का पहला अवसर था, जब मेरे पास करोड़ रुपए अथवा कई लाख रुपए निजी संपदा के रूप में आए थे<span></span></div>
<p>मूल्यों में आई गिरावट के मेरे मान से प्रमुख कारण कुछ इस प्रकार हैं। पहला, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रगति ने धर्म पर से हमारी आस्था को डिगा दिया है, जो कि पुरातन समय में हमारे नैतिक आचरण का सबसे बड़ा संबल थी। दूसरा, यथार्थवाद और आर्थिक उपलब्धि की अंधी दौड़ ने मनुष्य को इतना स्वार्थी बना दिया है कि उसे अपने हितों के आगे कुछ दिखाई नहीं देता। तीसरा, हमारे देश में सरकारी कर्मचारियों को दी जाने वाली &#8216;<em>शर्मनाक</em>&#8216; तनख्वाह और उसके साथ उनके हाथों में लाइसेंस-परमिट देने का मनमाना अधिकार। अगर हमें मूल्यों को वहीं उनके उचित स्थान और गौरव पर लौटाना है तो इन सब मुश्किलों के उपाय तो ढूंढने ही पड़ेंगे।&#8217;</p>
<p><b>पुरस्कार और सम्मान</b></p>
<p>&#8216;मुझे देश-विदेश में कई पुरस्कार मिले हैं, हालांकि मेरी उनके लिए पात्रता कदापि नहीं थी। परंतु अपने जीवन में मुझे सबसे ज्यादा खुशी दादाभाई नौरोजी सम्मान पाकर हुई। वह इसलिए कि यह वह व्यक्ति था, जिसने सही मायनों में समाज सुधार का बीड़ा उठाया था। उनकी शिक्षा पूर्ण होने के बाद जब उन्हें ज्ञात हुआ कि कॉलेज का अधिकांश खर्च सरकार की ओर से मिलता है, जो उसे गरीबों से लिए गए कर में से देती है। बस, तभी उन्हें लग गया कि उनकी शिक्षा का खर्च तो उन गरीबों ने उठाया है, जिन्हें खुद पढ़ना भी नहीं आता।</p>
<p>दादाभाई घर-घर जाते थे और लोगों के घरों के द्वार के समीप ही बैठकर उनके बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाते थे। मुझे तो यह सब आश्चर्यजनक लगता है। इसीलिए, मुझे दादाभाई नौरोजी सम्मान मिलने पर जो आनंद की अनुभूति हुई, वह &#8216;भारत रत्न&#8217; मिलने पर भी नहीं हुई।&#8217;</p>
]]></content:encoded>
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		<title>जे.आर.डी. की उड़ान</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:37:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी. की उड़ान]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी.टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा एअर लाइंस]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा एअरक्राफ्ट]]></category>
		<category><![CDATA[सबसे ऊंची उड़ान]]></category>

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		<description><![CDATA[जीवन में पांच वर्ष की अबोध अवस्था से अस्सी बसंत की सुदीर्घ आयु तक कैसे कोई अगाध प्रेम की दास्तां के उन्माद का चंद शब्दों में वर्णन कर सकता है? जे.आर.डी. और &#8216;एविएशन&#8217; की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। नीचे इस ऐतिहासिक सफर की उन चुनिंदा तारीखों का जिक्र है जो जे.आर.डी. की उड़ान के साथ भारत के उड्‌डयन इतिहास की भी सबसे ऊंची उड़ान हैं। 1929 22 जनवरी : जे.आर.डी. टाटा की पहली प्रशिक्षण उड़ान 3 फरवरी : [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd1_50yrsinflight.png" alt="जे.आर.डी. की उड़ान" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3130" /><span class="dropcap">जी</span>वन में पांच वर्ष की अबोध अवस्था से अस्सी बसंत की सुदीर्घ आयु तक कैसे कोई अगाध प्रेम की दास्तां के उन्माद का चंद शब्दों में वर्णन कर सकता है? जे.आर.डी. और <em>&#8216;एविएशन&#8217;</em> की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। नीचे इस ऐतिहासिक सफर की उन चुनिंदा तारीखों का जिक्र है जो जे.आर.डी. की उड़ान के साथ भारत के उड्‌डयन इतिहास की भी सबसे ऊंची उड़ान हैं।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1929</b></span></p>
<p><strong>22 जनवरी</strong> : जे.आर.डी. टाटा की पहली प्रशिक्षण उड़ान</p>
<p><strong>3 फरवरी</strong> : जे.आर.डी. टाटा की जुहू हवाई हवाई पट्‌टी, बंबई से पहली &#8216;<em>सोलो</em>&#8216; (एकल) उड़ान</p>
<p><strong>10 फरवरी</strong> : जे.आर.डी. को पायलट लाइसेंस प्राप्त।</p>
<p><strong>17 मई</strong> : लंदन से फ्रांस के बीच जे.आर.डी. की &#8216;<em>पायलट</em>&#8216; के रूप में पहली अंतरराष्ट्रीय उड़ान।</p>
<p><strong><span style="text-decoration: underline;">1930</span></strong></p>
<p><strong>3 मई</strong> ड्रिग रोड, कराची से उड़ान भरकर जे.आर.डी. द्वारा आगा खां प्रतियोगिता (भारत से इंग्लैंड) जीतने का प्रयास</p>
<div class="simplePullQuoteRight">जे.आर.डी. की उड़ान के साथ भारत के उड्‌डयन इतिहास की भी सबसे ऊंची उड़ान<span></span></div>
<p><strong>12 मई</strong> : क्रायडन, लंदन पहुंचकर प्रतियोगिता मार्ग संपूर्ण, किंतु पुरस्कार एस्पी इंजीनियर को।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1932</b></span></p>
<p><strong>24 अप्रैल</strong> : जे.आर.डी. व नेविल विन्टसेन्ट के प्रयासों के फलस्वरूप टाटा एअर लाइंस और ब्रिटिश सरकार के बीच कराची-बंबई-मद्रास हवाई डाक सेवा प्रारंभ करने हेतु समझौते पर हस्ताक्षर।</p>
<p><strong>15 अक्टूबर</strong> : जे.आर.डी. द्वारा प्रातः 6 बजकर 35 मिनट पर कराची से अहमदाबाद होते हुए बंबई के लिए उड़ान भरकर भारत में हवाई डाक सेवा का शुभारंभ। कुछ दिनों बाद यात्री सेवा भी प्रारंभ।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1937</b></span></p>
<p><strong>6 नवंबर</strong> : टाटा एअर लाइंस द्वारा दिल्ली-ग्वालियर, भोपाल-इंदौर-बंबई उड़ान सेवा का प्रारंभ। कुल उड़ान समय 6 घंटे 15 मिनट।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1942</b></span></p>
<p><strong>मार्च</strong> : भारत में विमान निर्माण हेतु टाटा एअरक्राफ्ट कंपनी का जन्म, किंतु ब्रिटिश सरकार के असहयोग के कारण योजना सफल नहीं।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1943</b></span></p>
<p>योरप में विमान दुर्घटना में नेविल विन्टसेन्ट की मृत्यु।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1946</b></span></p>
<p>टाटा एअरलाइंस (अभी तक टाटा सन्स का ही एक निजी प्रभाग) सार्वजनिक निर्गम के बाद एअर इंडिया लिमिटेड के नाम से ज्वाइंट स्टॉक कंपनी में तब्दील, जे.आर.डी. टाटा कंपनी के अध्यक्ष।</p>
<p><strong>26 अक्टूबर</strong> : &#8216;<em>अयाटा</em>&#8216; (इंटरनेशनल एअर ट्रेफिक एसोसिएशन) की दूसरी सामान्य बैठक में भाग लेने जे.आर.डी. टाटा काहिरा में।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1948</b></span></p>
<p><strong>8 मार्च</strong> : जे.आर.डी. की पहल पर सरकार द्वारा अप्रत्याशित रूप से तुरंत स्वीकृति के पश्चात भारत सरकार (49 प्रतिशत), टाटा घराने (25 प्रतिशत) और सामान्य जनता (26 प्रतिशत) की भागीदारी से भारत की सर्वप्रथम संयुक्त क्षेत्र की कंपनी एअर इंडिया इंटरनेशनल का जन्म।</p>
<p><strong>8 जून</strong> : &#8216;<em>मलाबार प्रिंसेस</em>&#8216; नामक लोकहीड कॉन्सटेलेशन 749 विमान द्वारा एअर इंडिया इंटरनेशनल की पहली उड़ान बंबई से काहिरा, रोम और जिनेवा होते हुए लंदन के लिए रवाना। उद्‌घाटन उड़ान के यात्रियों में एअर इंडिया इंटरनेशनल के अध्यक्ष जे.आर.डी. टाटा भी।</p>
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		<title>बॉम्बे प्लान</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:31:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[घनश्यामदास बिड़ला]]></category>
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		<description><![CDATA[द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम वर्षों तक यह साफ दिखाई देने लगा था कि अंग्रेजों के भारत पर शासन के दिन अब पूरे हो चुके थे। उन्हीं दिनों दूरदर्शी जे.आर.डी. टाटा को यह विचार सताने लगा था कि आजादी के बाद देश की प्राथमिक आवश्यकता औद्योगीकरण और आर्थिक प्रगति की रहेगी। उस जटिल समस्या से जूझने के लिए जे.आर.डी. ने वर्ष 1944 में ही देश के अग्रणी उद्योगपतियों को आमंत्रित किया, ताकि वे सभी आजादी के बाद के आर्थिक कदमों [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2087" alt="बॉम्बे प्लान " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/601.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">द्</span>वितीय विश्व युद्ध के अंतिम वर्षों तक यह साफ दिखाई देने लगा था कि अंग्रेजों के भारत पर शासन के दिन अब पूरे हो चुके थे। उन्हीं दिनों दूरदर्शी जे.आर.डी. टाटा को यह विचार सताने लगा था कि आजादी के बाद देश की प्राथमिक आवश्यकता औद्योगीकरण और आर्थिक प्रगति की रहेगी। उस जटिल समस्या से जूझने के लिए जे.आर.डी. ने वर्ष 1944 में ही देश के अग्रणी उद्योगपतियों को आमंत्रित किया, ताकि वे सभी आजादी के बाद के आर्थिक कदमों का मार्ग पहले ही से निर्धारित कर लें। जे.आर.डी. टाटा ने इस हेतु घनश्यामदास बिड़ला, कस्तूरभाई लालभाई, सर पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और सर श्रीराम को एक साथ विचार-विमर्श का न्यौता दिया।</p>
<p>जे.आर.डी. सहित इन पांच उद्योगपतियों के अलावा तीन प्रखर बुद्धिजीवी भी उस &#8216;<em>थिंक टैंक</em>&#8216; में शामिल हुए। वे तीनों ही टाटा घराने से संबद्ध थे- सर अरदेशी दलाल, ए.डी. श्रॉफ व डॉ. जॉन मथाई। इन आठों अनुभवी, भविष्यदृष्टा और व्यापक सोच वाले व्यक्तियों की चाह एक ही थी- आजादी के बाद भारत को आर्थिक प्रगति की राह पर प्रशस्त करना। जब उस &#8216;समिति&#8217; की पहली बैठकों में तो कोई निश्चित लक्ष्य या दिशा-निर्धारण नहीं हो सका, तब जी.डी. बिड़ला ने यह सुझाव दिया कि आजादी के बाद भारत को क्या करना चाहिए, इस प्रश्न के संभावित उत्तर पर अटकलें लगाने के बजाय प्राथमिकता इस बात को दी जानी चाहिए कि आजादी के बाद हमारे नागरिकों की भोजन, रहवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की जरूरतें क्या होंगी और उसी को आधार मानकर उनकी पूर्ति हेतु कार्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>उसी का दूसरा नाम ‘बॉम्बे प्लान’&#8230;</strong></p>
<p>अंततः जो दस्तावेज तैयार किया गया, वह उसी आधार पर था। &#8216;<em>भारत के आर्थिक विकास की योजना</em>&#8216; नाम से जो ऐतिहासिक दस्तावेज उस समिति ने जारी किया, उसी का दूसरा नाम &#8216;<em>बॉम्बे प्लान</em>&#8216; अथवा &#8216;टाटा-बिड़ला प्लॉन&#8217; पड़ गया। जनवरी 1944 में सार्वजनिक तौर पर जारी इस योजना की पूरी &#8216;ड्राफ्टिंग&#8217; आठ सदस्यीय समिति के एक सदस्य, डॉ. जॉन मथाई ने ही की थी।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">जनवरी 1944 में सार्वजनिक तौर पर जारी इस योजना की पूरी &#8216;<em>ड्राफ्टिंग</em>&#8216; आठ सदस्यीय समिति के एक सदस्य, डॉ. जॉन मथाई ने ही की थी<span></span></div>
<p>आज पीछे मुड़कर देखें तो उस महत्वाकांक्षी योजना में उसके प्रणेताओं की विस्तृत सोच की झलक दिखाई पड़ती है। 15 वर्ष की भावी योजना को तीन पंचवर्षीय योजनाओं में विभक्त किया गया था। सभी नागरिकों के लिए पर्याप्त भोजन, रहवास, कपड़ा और मूलभूत शिक्षा को योजना के मुख्य उद्देश्य मानकर भारत के हर गांव में एक प्रशिक्षित डॉक्टर और दो नर्सों की सेवाओं का प्रावधान था। उस समय के मुद्रा मूल्य के आधार पर योजना में प्रथम पंचवार्षिकी में 1400 करोड़ रुपए, द्वितीय में 2900 करोड़ रुपए और तृतीय में 4700 करोड़ रुपए- इस प्रकार कुल 15 वर्षों के अंतराल में 10,000 करोड़ रुपए के खर्च का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इसी के साथ बुनियादी उद्योग, उपभोक्ता वस्तु आधारित उद्योग, कृषि, शिक्षा, रहवास और संचार माध्यमों सहित सभी मुख्य जरूरतों पर खर्च की जाने वाली राशि का विवरण था। यही नहीं, योजना में इस 10,000 करोड़ रुपए की राशि को एकत्र करने हेतु विभिन्न बाह्य एवं आंतरिक साधनों का भी जिक्र था।</p>
<p>हालांकि योजना के प्रारूप को तैयार करने वाली समिति के सभी सदस्यों का यह विचार था कि उस &#8216;प्लान&#8217; के सफल क्रियान्वयन हेतु देश में स्वयं की राष्ट्रीय सरकार का सत्ता में होना बहुत लाभदायक रहेगा, फिर भी गरीबी-उन्मूलन और जीवन स्तर सुधार के लिए योजना के क्रियान्वयन में सरकार के स्वरूप बदलने का इंतजार करना देश के लिए अहितकारी होगा। उस योजना का एक ओर जहां &#8216;दूरदर्शिता और व्यापक सुझावों&#8217; के लिए स्वागत किया गया, वहीं दूसरी ओर उसको पूंजीवादी उद्योगपतियों की एक सोची-समझी &#8216;चाल&#8217; कहकर भी आलोचना की गई। वैसे योजना का सर्वाधिक विवादास्पद पक्ष था- उद्योग के लिए पचास प्रतिशत रखते हुए कृषि के क्षेत्र के लिए कुल रकम का सिर्फ दस प्रतिशत, जो कि भारत की तत्कालीन कृषि-बहुल अर्थव्यवस्था के लिए एक दिवास्वप्न-सा था।</p>
<p>वैसे &#8216;<em>बॉम्बे प्लान</em>&#8216; के प्रकाशन के कुछ ही दिनों में सर अरदेशी दलाल को वाइसराय की कार्यकारी परिषद में स्थान ग्रहण कर &#8216;<em>योजना विभाग</em>&#8216; के श्रीगणेश करने का सरकार द्वारा आमंत्रण मिला, जिसे उन्होंने स्वीकार किया। &#8216;<em>बॉम्बे प्लान</em>&#8216; का दूसरा खंड &#8216;विपणन-राज्यों की भूमिका&#8217; 1944 में ही दिसंबर माह में प्रकाशित हुआ, जिसके प्रारूप को लिखने में भी डॉ. जॉन मथाई ने ही उल्लेखनीय भूमिका अदा की है। भारत में परंपरागत योजना की शुरुआत तो सन 1951-52 में पहली योजना के शुभारंभ के साथ हुई, किंतु आजादी के भी तीन वर्ष पहले तैयार किए गए &#8216;बॉम्बे प्लान&#8217; के सुझाव कितने सही थे, इसका जीवंत उदाहरण तीस साल बाद भी मिलता रहा।</p>
<p>पांचवीं योजना के पहले योजना आयोग ने पहली चारों पंचवर्षीय योजनाओं की प्राथमिक कमजोरी पर रोशनी डालते हुए टिप्पणी की थी कि हमारे यहां योजना का पूरा ध्यान सिर्फ सकल आर्थिक उन्नति और विकास की ओर रहता है, जबकि हमारी पहली जरूरत है- विकास का आबादी के सीमित नहीं, अपितु सभी तबकों में व्यापक प्रभाव। यह आश्चर्यजनक सत्य है कि वर्षों पूर्व तैयार किए गए &#8216;बॉम्बे प्लान&#8217; में इसी बात पर जोर दिया गया था कि महज अंकों और सांख्यिकी में विकास दर में वृद्धि पर संतोष धारण करने के बजाय विकास कार्यक्रमों से समाज के आर्थिक रूप से विपन्न वर्गों तक समुचित लाभ पहुंचाना ही योजना की आधारशिला होनी चाहिए। वर्तमान स्थितियों को देखकर अगर जे.आर.डी. को क्षोभ और निराशा से पीड़ा होती है तो वह जायज ही है। आखिर उन्होंने तो और कल्पनाशील राष्ट्रभक्तों के साथ मिलकर देश की समुचित प्रगति का समग्र और महत्वाकांक्षी प्रारूप हमें आजादी से पहले ही थमा दिया था; पर हमने उसकी कोई कदर नहीं जानी।</p>
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		<title>बॉम्बे हाउस : टाटा सन्स की राजधानी</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:16:27 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[बॉम्बे हाउस&#8217; के गलियारों में एक रोचक किस्सा बहुत प्रसिद्ध है। एक बार रूसी मोदी ने &#8216;बॉम्बे हाउस&#8216; के सामने निषिद्ध स्थान पर अपनी कार पार्क कर दी। वे गाड़ी से उतरे ही थे कि पुलिस वाले ने उन्हें आकर ललकारा, &#8216;ऐ भाई, गाड़ी कहीं भी खड़ी कर दी है। क्या यह तुम्हारे बाप की सड़क है?&#8216; हाजिर जवाब रूसी को और क्या चाहिए था, परंतु बोले, &#8216;हां, ये वाकई मेरे बाप की सड़क है।&#8217; बॉम्बे हाउस सर होमी मोदी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1568" alt="बॉम्बे हाउस : टाटा सन्स की राजधानी " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/59.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">बॉ</span>म्बे हाउस&#8217; के गलियारों में एक रोचक किस्सा बहुत प्रसिद्ध है। एक बार रूसी मोदी ने &#8216;<em>बॉम्बे हाउस</em>&#8216; के सामने निषिद्ध स्थान पर अपनी कार पार्क कर दी। वे गाड़ी से उतरे ही थे कि पुलिस वाले ने उन्हें आकर ललकारा, &#8216;<em>ऐ भाई, गाड़ी कहीं भी खड़ी कर दी है। क्या यह तुम्हारे बाप की सड़क है?</em>&#8216; हाजिर जवाब रूसी को और क्या चाहिए था, परंतु बोले, <em>&#8216;हां, ये वाकई मेरे बाप की सड़क है।&#8217;</em> बॉम्बे हाउस सर होमी मोदी स्ट्रीट पर स्थित है, जिसका नामकरण रूसी मोदी के दिवंगत पिता सर होरमसजी मोदी के नाम पर ही रखा गया है।</p>
<p>वैसे फोर्ट इलाके में फ्लोरा फाउंटेन के निकट टाटा समूह की सभी महत्वपूर्ण कंपनी का यह मुख्यालय &#8216;<em>बॉम्बे हाउस</em>&#8216; 1924 में बना था। उससे पहले टाटा समूह की कंपनियों के दफ्तर &#8216;<em>नावसारी बिल्डिंग</em>&#8216; में थे। 1921 में <em>&#8216;गेटवे ऑफ इंडिया&#8217;</em> के अभिकल्पक जॉर्ज विरेट को यह काम सौंपा गया था जो कि 3 वर्षों बाद संपूर्ण हुआ।</p>
<div class="simplePullQuoteRightGreen">वैसे अगर बॉम्बे हाउस को टाटा समूह की <em>&#8216;राजधानी&#8217;</em> कहा जाए तो टाटा सन्स लिमिटेड को &#8216;<em>कैबिनेट</em>&#8216; कहना अनुचित नहीं होगा<span></span></div>
<p>यही वह कंपनी है जिसके चेयरमैन को टाटा समूह का प्रमुख माना जाता है। और जिसके निदेशक मंडल में टाटा समूह के सभी &#8216;<em>दिग्गज</em>&#8216; विराजते हैं। टाटा सन्स की अंशधारणी भी बहुत दिलचस्प है, लगभग 80 प्रतिशत अंश सार्वजनिक टाटा ट्रस्ट्‌स के पास हैं, लगभग 16 प्रतिशत अंश जे.आर.डी. के एक सहयोगी शापूरजी पालोनजी मिस्त्री के पास हैं और बाकी अंशधारणी टाटा घराने के पास है।</p>
<p>वर्तमान में टाटा सन्स में 21 निदेशक हैं, उनमें सबसे वयोवृद्ध 89 वर्षीय जे.आर.डी. हैं। मंडल की औसत आयु 65 वर्ष है और उसमें सबसे युवा निदेशक उसके चेयरमैन 54 वर्षीय रतन टाटा हैं।</p>
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		<title>भूत-प्रेतों से साक्षात्कार</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:01:39 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[भूत-प्रेत]]></category>
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		<description><![CDATA[पूना में टाटा मैनेजमेंट ट्रेनिंग सेंटर के रजत जयंती समारोह में बोलते हुए जे.आर.डी. ने एक मजेदार वाकया सुनाया, &#8216;बात उस वक्त की है, जब पूना में हमने यह बंगला खरीदा था, जहाँ वर्तमान में यह ट्रेनिंग सेंटर चल रहा है। एक रात मेरी पत्नी ने झकझोर कर मुझे नींद में से उठाकर कहा कि मैं उसे धक्का क्यों दे रहा हूं?&#8217; मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया होने से साफ इंकार कर दिया, आखिर गहरी नींद में मुझे ऐसी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1566" alt="भूत-प्रेतों से साक्षात्कार " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/58.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">पू</span>ना में टाटा मैनेजमेंट ट्रेनिंग सेंटर के रजत जयंती समारोह में बोलते हुए जे.आर.डी. ने एक मजेदार वाकया सुनाया, &#8216;बात उस वक्त की है, जब पूना में हमने यह बंगला खरीदा था, जहाँ वर्तमान में यह ट्रेनिंग सेंटर चल रहा है। एक रात मेरी पत्नी ने झकझोर कर मुझे नींद में से उठाकर कहा कि मैं उसे धक्का क्यों दे रहा हूं?&#8217; मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया होने से साफ इंकार कर दिया, आखिर गहरी नींद में मुझे ऐसी शरारत कहां सूझती?</p>
<div class="simplePullQuoteRight">क्या विज्ञान और प्रौद्योगिकी में दिन-रात बिताने वाले जे.आर.डी. भूत-प्रेत पर विश्वास करते हैं?<span></span></div>
<p>थोड़ी ही देर बाद मेरी बारी थी। शरीर पर किसी के द्वारा धक्का दिए जाने का आभास होने पर जब मैंने मेरी पत्नी से पूछा तो वह भी ऐसी कोई हरकत किए होने से साफ मुकर गईं। मुझे ऐसा लगता है कि वह उस मकान मालकिन की रूह थी, जिसका मकान हमने खरीदा था।&#8217;</p>
<div>
<p>&#8216;दूसरा वाकया डॉ. होमी भाभा की विमान दुर्घटना में मृत्यु होने के कुछ ही दिनों बाद का है। उसी दुर्घटना में मरने वालों में एक पादरी भी था, जिसकी आत्मिक शांति के लिए हुई प्रर्थना सभा में मैं भी मौजूद था। अगली बार जब मैं स्विट्‌जरलैंड गया, तो मैंने एक रात उसी पादरी को अपने बिस्तर के पास खड़ा पाया।&#8217; क्या विज्ञान और प्रौद्योगिकी में दिन-रात बिताने वाले जे.आर.डी. भूत-प्रेत पर विश्वास करते हैं? मजाकिया लहजे में उत्तर देते हुए जे.आर.डी. ने कहा, <em>&#8216;अब जब जीवन में दो बार उनसे साक्षात्कार हो चुका है, तो फिर मानना ही पड़ेगा।&#8217;</em></p>
</div>
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		<title>आधुनिक विचारों और शाश्वत आस्थाओं का संगम</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 07:59:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[टाटा सन्स लिमिटेड]]></category>
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		<description><![CDATA[नामकरण के अनुसार जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा, कुछ समय पहले तक टाटा उद्योग से जुड़े हर व्यक्ति के &#8216;चेयरमैन&#8216;; करोड़ों देशवाशियों के &#8216;जे.आर.डी&#8216; और चंद अजीज साथियों के लिए सिर्फ &#8216;जेह&#8217;-आज अपने जीवन के 88 घटनापूर्ण वर्षों के पूरे होने पर आयु के नवासीवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। आज ही से ठीक 54 वर्षों पूर्व जे.आर.डी. टाटा ने न सिर्फ समय के मान से अपने जीवन के सबसे लंबे, बल्कि सर्वाधिक महत्व के पद का कार्यभार भी संभाला [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="https://www.jmuchhal.com/aadhunik-vicharon-aur-shashvat-asthaon-ka-sangam/jrd_lessblack" rel="attachment wp-att-3702"><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/JRD_lessBlack.jpg" alt="JRD_lessBlack" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3702" /></a><span class="dropcap">ना</span>मकरण के अनुसार जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा, कुछ समय पहले तक टाटा उद्योग से जुड़े हर व्यक्ति के &#8216;<em>चेयरमैन</em>&#8216;; करोड़ों देशवाशियों के &#8216;<em>जे.आर.डी</em>&#8216; और चंद अजीज साथियों के लिए सिर्फ &#8216;जेह&#8217;-आज अपने जीवन के 88 घटनापूर्ण वर्षों के पूरे होने पर आयु के नवासीवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। आज ही से ठीक 54 वर्षों पूर्व जे.आर.डी. टाटा ने न सिर्फ समय के मान से अपने जीवन के सबसे लंबे, बल्कि सर्वाधिक महत्व के पद का कार्यभार भी संभाला था। 26 जुलाई 1938 को जे.आर.डी. संपूर्ण टाटा औद्योगिक समूह की पैतृक कंपनी, टाटा सन्स लिमिटेड के अध्यक्ष मनोनीत किए गए थे।</p>
<p>पाठकों के मन में इस सवाल का उठना स्वाभाविक है कि जे.आर.डी. टाटा के जन्म और पदभार ग्रहण की वर्षगांठ तो हर साल आती है, फिर इस बार उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर विशेष फोकस क्यों? बदलते हुए परिवेश के साथ मूल्य आधारित व्यवस्था और वैधानिक व्यवहार में पतन को तो हमने जैसे आधुनिकीकरण और औद्योगीकरण की प्रक्रिया का ही एक अभिन्न पहलू मानकर स्वीकार कर लिया है। आज हमारे सामाजिक, सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में तो इस गिरावट का असर स्पष्ट दिखाई देता ही है, किंतु जितनी सर्वव्याप्य और स्पष्ट यह समस्या आर्थिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों में है, उतनी शायद किसी और में नहीं। आज चारों ओर सिर्फ पैसा बटोरने की ही अंधी दौड़ चल रही है। और इस साध्य को पाने के लिए साधन की संतता पर किसी का ध्यान नहीं है। ऐसे मलिन माहौल में भी अगर कोई उद्योग और उद्योगपति अपने मूल्यों को तजने की बात सोचता भी नहीं हो, तो क्या वह हमारे आदर का हकदार नहीं है? इस लुप्तप्राय श्रेणी में अगर कोई नाम सबसे ऊपर है, तो वह निस्संदेह जे.आर.डी. का ही है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">ऐसे मलिन माहौल में भी अगर कोई उद्योग और उद्योगपति अपने मूल्यों को तजने की बात सोचता भी नहीं हो, तो क्या वह हमारे आदर का हकदार नहीं है?<span></span></div>
<p>आज टाटा समूह के उद्योग भारत में स्टील, ट्रक, रसायन, उपभोक्ता वस्तु, सीमेंट, अभियांत्रिकी कलपुर्जे, कम्प्यूटर, बिजली और संचार साधनों जैसे विविध और महत्वपूर्ण उत्पाद कार्यों में संलग्न हैं। लेकिन <em>&#8216;विविधता में एकता&#8217;</em> को चरितार्थ करते हुए कुछेक अपवादों को छोड़कर इस समूह की सभी इकाइयां; उत्पादकता, लाभप्रदता, मधुर औद्योगिक संबंध और उनके उत्पाद, गुणवत्ता के लिए हर ओर पहचाने जाते हैं। यह कोई आकस्मिक संयोग नहीं, वरन वर्षों की तपस्या और साधना से संचित <em>&#8216;गुडविल&#8217;</em> का मूर्त रूप है। स्वयं जे.आर.डी. ने इस बात को स्वीकार करते हुए एक बार कहा था- &#8216;कंपनियों को मूल्य आधारित और बाजार आधारित व्यवस्था पर एक साथ चलना कोई असंभव बात नहीं है। मुनाफा कमाने के लिए नीतियों को ताक पर रखना भी जरूरी नहीं है। शालीन और गरिमामयी ढंग से भी पैसा कमाया जा सकता है।&#8217;</p>
<p>वैसे जे.आर.डी. ने कभी टाटा समूह की प्रगति में अपने योगदान को उल्लेखनीय नहीं माना। उनके अनुसार उनकी भूमिका &#8216;<em>प्रवर्तक</em>&#8216; के बजाय &#8216;<em>पालक</em>&#8216; अथवा &#8216;<em>पोषक</em>&#8216; की अधिक रही है। कुछ अन्य लोगों का भी यह मानना है कि जिस वक्त तक जे.आर.डी. ने टाटा सन्स प्रमुख का पद संभाला, तब तक टिस्को, टोमको, इंडियन होटल, टाटा की तीनों बिजली कंपनियां अपने शैशव के कठिन दिन पार करके यौवन पथ पर अग्रसर थीं। अगर एक बारगी इस कथन को मान भी लिया जाए, तो क्या ऐसी विशाल कंपनियों का मात्र लालन-पालन-पोषण ही अपने आप में एक &#8216;भागीरथी&#8217; कार्य नहीं है? और फिर इस कथन की सत्यता या अन्यथा पर निर्णय करने के लिए सिर्फ एक ही आंकड़ा काफी है- जिस वक्त जे.आर.डी. ने टाटा सन्स के अध्यक्ष का पद संभाला था, तब टाटा समूह में 14 कंपनियां थीं, जिनका वार्षिक कारोबार 280 करोड़ रुपए था। रतन टाटा के पदभार संभालते समय टाटा समूह बढ़कर 15 कंपनियों का हो गया था, जिनका वार्षिक कारोबार 10,000 करोड़ रुपए से अधिक का है।</p>
<div class="simplePullQuoteLeftOrange">कंपनियों को मूल्य आधारित और बाजार आधारित व्यवस्था पर एक साथ चलना कोई असंभव बात नहीं है<span></span></div>
<p>जे.आर.डी. के प्रबंधन की सबसे खास बात रही है- उनकी जनतांत्रिक अथवा &#8216;कोनसेन्स&#8217; प्रणाली। &#8216;<em>प्रोफेशनल मैनेजमेंट</em>&#8216; शब्द विदेशों में किताबों के बाहर नहीं आया था, उन दिनों से जे.आर.डी. ने टाटा समूह की विभिन्न कंपनियों के समस्त कामकाज की जिम्मेदारी उस कंपनी से संबंधित प्रबंधकों को सौंप दी। कंपनी संचालकों को स्वायत्त नियंत्रण देने की प्रक्रिया को जे.डी.आर. ने इस चरम तक पहुंचा दिया, कि वे प्रबंधक कंपनी के मानो सर्वेसर्वा ही थे। यहां पर भी कुछेक आलोचकों का मानना है कि ऐसा करना जे.आर.डी. की मजबूरी थी, क्योंकि टाटा परिवार में इतने सदस्य थे नहीं कि हर कंपनी पर समुचित ध्यान दे सकें। लेकिन अगर ऐसी स्थिति होती, तो वे कंपनियां अब से बहुत पहले टाटा समूह से पृथक हो गई होतीं। 1969 में एम.आर.टी.पी. कानून और 1970 में मैनेजिंग एजेंसी प्रणाली की समाप्ति के बाद तो ऐसा कुछ भी नहीं था, जो सभी कंपनियों को एक साथ बांधे रखता। टाटा परिवार की अंशधारक के रूप में वित्तीय पकड़ भी नगण्य ही थी, अगर थी- तो एक पुकार, एक चाह उसी समूह के झंडे तले बने रहने की, उसी &#8216;चेयरमैन&#8217; के पीछे चलने की, जिसने टाटा उद्योगों के &#8216;कानफेडरेशन&#8217; की अथाह संपदा को सदैव राष्ट्रीय धरोहर और संपत्ति की तरह सहेज कर रखा, निजी पूंजी की तरह खर्चा नहीं। इसीलिए आज तमाम आकर्षणों और विकल्पों के बावजूद भारत में टाटा समूह की कंपनियों में रोजगार चाहने वालों की संख्या सर्वाधिक रहती है।</p>
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