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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल&#187; जे.आर.डी</title>
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		<title>यूं हुआ देश में विमान सेवाओं का जन्म</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:44:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[इंपीरियल एयरवेज]]></category>
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		<category><![CDATA[मेसर्स टाटा एंड संन्स]]></category>
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		<description><![CDATA[दिसंबर 7, 1937। विमान प्रकार-वेको.सी-6 । इंजिन प्रकार जाकोबो; एच.डी.-225 । बंबई से इंदौर-उड़ान समय 2 घंटे 20 मिनट। वापसी दिसंबर 8 इंदौर से बंबई, समय 2 घंटे 15 मिनट। सहचालक नेविल विन्टसेन्ट के साथ। आधा उड़ान समय दर्ज। ऊपर लिखे इस वर्णन को पहली बार पढ़ने पर तो शायद आपको कुछ ज्यादा समझ नहीं आएगा, लेकिन अगर यह बताया जाए कि यह &#8216;पायलट लॉग बुक&#8217; (किसी भी विमान चालक द्वारा उड़ान के गंतव्य, प्रस्थान व आगमन के समय आदि [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd10_jrd_on_throttle.jpg" alt="यूं हुआ देश में विमान सेवाओं का जन्म" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3140" /><span class="dropcap">दि</span>संबर 7, 1937। विमान प्रकार-वेको.सी-6 । इंजिन प्रकार जाकोबो; एच.डी.-225 । बंबई से इंदौर-उड़ान समय 2 घंटे 20 मिनट। वापसी दिसंबर 8 इंदौर से बंबई, समय 2 घंटे 15 मिनट। सहचालक नेविल विन्टसेन्ट के साथ। आधा उड़ान समय दर्ज।</p>
<p>ऊपर लिखे इस वर्णन को पहली बार पढ़ने पर तो शायद आपको कुछ ज्यादा समझ नहीं आएगा, लेकिन अगर यह बताया जाए कि यह <em>&#8216;पायलट लॉग बुक&#8217;</em> (किसी भी विमान चालक द्वारा उड़ान के गंतव्य, प्रस्थान व आगमन के समय आदि के विवरण को दर्ज करने की पुस्तिका) का एक पन्ना है, तो शायद स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। आपको यह जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि यह विवरण किसी साधारण पायलट की &#8216;<em>लॉग बुक</em>&#8216; का नहीं, बल्कि भारत में उड्‌डयन के प्रणेता, भारत रत्न जे.आर.डी. (जहांगीर रतनजी दादाभाई) टाटा की ऐतिहासिक <em>&#8216;लॉग बुक&#8217;</em> से है। जे.आर.डी. की &#8216;<em>पायलट लॉग बुक</em>&#8216; और उसमें इंदौर का जिक्र, वह भी ठेठ 1937 का? थोड़ा सब्र कीजिए।</p>
<p>भारत में हवाई डाक सेवा का शुभारंभ 15 अक्टूबर 1932 को हुआ था, जब कराची (विभाजन से पूर्व भारत में) से अहमदाबाद होते हुए बंबई की उड़ान भरकर जे.आर.डी. टाटा ने इतिहास रचा था।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">दी इंडियन नेशनल एअरवेज ने प्रस्तावित विमानतल पर रात्रि में विमानों के उतरने से संबंधित सुविधाओं की व्यवस्था करने के लिए शासन से निवेदन किया है<span></span></div>
<p>उस उड़ान के कुछ ही समय पहले जे.आर.डी. और उनके &#8216;<em>नेविल विन्टसेन्ट</em>&#8216; के संयुक्त प्रयासों के बाद टाटा एअर लाइंस का जन्म हुआ था। वह उद्‌घाटन उड़ान टाटा एअर लाइंस के ही विमान &#8216;डी. हैवीलैण्ड पस मोथ&#8217; में पायलट के रूप में जे.आर.डी. टाटा ने 6 घंटे 50 मिनट में पूरी की थी।</p>
<p>वैसे मूलभूत योजना कुछ इस प्रकार थी कि तत्कालीन इंपीरियल एयरवेज लंदन से कराची तक हवाई डाक सेवा का संचालन कर रही थी। उसी सेवा से पूरे भारत को जोड़ने के लिए कराची से अहमदाबाद होते हुए बंबई और फिर बंबई से बेलारी होते हुए मद्रास विमान से डाक और थोड़े ही समय बाद यात्रियों को ले जाने का सिलसिला प्रारंभ हुआ। धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्से भी विमान सेवा के जरिये जुड़ने लगे।</p>
<p>इसी तारतम्य में इंदौर में भी हवाई पट्‌टी निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। सन्‌ 1934 की होल्कर स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट जिसके प्रमुख अंश इंदौर गजेटियर में उद्‌धृत हैं, के अनुसार, &#8216;मेसर्स टाटा एंड संन्स, विमान विभाग (टाटा एअर लाइंस का प्रारंभिक स्वरूप) के मिस्टर विन्टसेन्ट से परामर्श करने के बाद विमानतल के निर्माण के लिए बिजासनी स्थल को चुना गया। संपूर्ण योजना मंजूर कर दी गई है। लागत का अनुमान 1,84,092 रुपए है। प्रथमावास्था में 14,500 रुपए की अनुमानित लागत से एक विमान-शाला (हेंगर) के लिए भी व्यवस्था की गई है।&#8217;</p>
<p><strong>1 फरवरी, 1935</strong> को कमांडर वॉट, विमानतल अधिकारी, कराची ने स्थल का निरीक्षण किया और अपने सुझावों सहित प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसे तत्कालीन सरकार ने स्वीकृति प्रदान कर 2,20,488 रुपए की राशि मंजूर कर दी। कमांडर वॉट के प्रतिवेदन में भी रात्रि अवतरण-क्षेत्र का जिक्र था। वहीं दूसरी ओर 1936 के आते टाटा एअर लाइंस में नए अमेरिकी &#8216;वेको वाय.क्यू.सी.-6&#8242; विमान का आगमन हो गया। ब्रिटिश &#8216;पस मोथ&#8217; के 120 हॉर्स पॉवर शक्ति वाले इंजिन के मुकाबले &#8216;<em>वेको</em>&#8216; की इंजिन 225 हॉर्स पॉवर की थी। यह &#8216;पथ मोथ&#8217; से एक और मायने में बेहतर था- &#8216;पस मोथ&#8217; के इंजिन को स्वयं चालक को हाथ से घुमाकर शुरू करना पड़ता था, जबकि &#8216;<em>वेको</em>&#8216; में यह व्यवस्था स्वचालित थी। इसी &#8216;<em>वेको</em>&#8216; के आगमन के पश्चात टाटा एअर लाइंस ने दिल्ली से ग्वालियर, भोपाल और इंदौर होते हुए बंबई के लिए हवाई डाक सेवा प्रारंभ करने का विचार बनाया। चूंकि उस वक्त टाटा एअर लाइंस में सिर्फ तीन ही पायलट थे (जे.आर.डी., विन्टसेन्ट और होमी भरूचा), इसलिए जे.आर.डी. को भी विमान चालन का काफी भार उठाना पड़ा था।</p>
<p><strong>9 नवंबर, 1937</strong> को दिल्ली से बंबई की उद्‌घाटन उड़ान को बिदा करने के लिए दिल्ली की वेलिंगटन हवाई पट्‌टी पर खासी भीड़ जमा थी। टाटा लाइंस के दो विमानों से उस सेवा की शुरुआत हुई, जिसमें से एक नेविल विन्टसेन्ट उड़ा रहे थे। उस विमान में 3,500 चिटि्‌ठयां और एक यात्री बैठा था। दूसरे विमान में तीन पत्रकार थे। रेशम की चार नीली सुनहरी थैलियों में तत्कालीन वाइसराय द्वारा तीनों रियासतों के प्रमुखों और बंबई के गवर्नर के लिए शुभकामना संदेश थे। पूरे समारोह की रपट रेडियो से प्रसारित की गई थी। उद्‌घाटन सेवा में कुल उड़ान समय 6 घंटे 15 मिनट का रहा। यानी, 10000 करोड़ रुपए से भी अधिक कारोबार वाले समूह का प्रमुख तब इंदौर सिर्फ &#8216;डाकिए&#8217; के रूप में आता था। हां, इसमें उसकी पूर्ण स्वेच्छा थी, कोई मजबूरी नहीं। उपरोक्त संदर्भ के साथ उल्लेखनीय है कि इंदौर में नियमित हवाई सेवा 26 जुलाई, 1948 को प्रारंभ हुई। यहां यह भी विचारणीय है कि जिस रात्रि विमान सेवा हेतु विमानतल को सुसज्जित करने का प्रावधान सन्‌ 1935 में बना था और जिसे शासन की मंजूरी भी मिल गई थी, उसे नागरिक विमानन सेवा में लागू होते-होते 53 साल लग गए, जब 20 अप्रैल 1988 को इंदौर हवाई अड्‌डे पर रात्रि विमान सेवा की अंतिम रिहर्सल की गई।</p>
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		<title>जे.आर.डी. गुणा-भाग फ्रेंच में ही करते हैं</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:34:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
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		<description><![CDATA[इतने वर्षों तक भारत में रहने के बावजूद फ्रांस का यह अवशेष तो बाकी रह ही गया। जब भी जे.आर.डी. को मानसिक गणित करने की जरूरत पड़ती है तो वे अंकों के साथ अंग्रेजी के बजाय फ्रेंच में गुणा-भाग करते हैं। जे.आर.डी. के शरीर की आयु भले ही 88 वर्ष हो गई हो, मन से वे अभी भी जवान हैं। वैसे, जे.आर.डी. अपनी शारीरिक तंदुरुस्ती का पूरा ख्याल रखते हैं। 41 वर्ष की आयु में जब अधिकांश लोग शारीरिक श्रम [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2021" alt="जे.आर.डी. गुणा-भाग फ्रेंच में ही करते हैं " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/621.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">इ</span>तने वर्षों तक भारत में रहने के बावजूद फ्रांस का यह अवशेष तो बाकी रह ही गया। जब भी जे.आर.डी. को मानसिक गणित करने की जरूरत पड़ती है तो वे अंकों के साथ अंग्रेजी के बजाय फ्रेंच में गुणा-भाग करते हैं।</p>
<p>जे.आर.डी. के शरीर की आयु भले ही 88 वर्ष हो गई हो, मन से वे अभी भी जवान हैं। वैसे, जे.आर.डी. अपनी शारीरिक तंदुरुस्ती का पूरा ख्याल रखते हैं। 41 वर्ष की आयु में जब अधिकांश लोग शारीरिक श्रम से पीठ फेरने लगते हैं, उस उम्र में जे.आर.डी. ने &#8216;<em>स्कीइंग</em>&#8216; करना शुरू किया और फिर जो सिलसिला शुरू हुआ वो अनवरत अगले 44 वर्षों</p>
<div class="simplePullQuoteRight">41 वर्ष की आयु में जब अधिकांश लोग शारीरिक श्रम से पीठ फेरने लगते हैं, उस उम्र में जे.आर.डी. ने &#8216;<em>स्कीइंग</em>&#8216; करना शुरू किया और फिर जो सिलसिला शुरू हुआ वो अनवरत अगले 44 वर्षों तक जारी रहा<span></span></div>
<p>तक जारी रहा। 85 वर्ष की आयु तक हर वर्ष तीन सप्ताह के लिए जे.आर.डी. योरप में आल्पस की बर्फीली पहाड़ियों में &#8216;<em>स्कीइंग</em>&#8216; का लुत्फ उठाने अवश्य जाते थे। घर पर जे.आर.डी. ने अपने प्रसाधन कक्ष में वर्जिश का साजो-सामान इकट्‌ठा कर रखा था। यूं तो जे.आर.डी. को गोल्फ भी बहुत पसंद था, और हर सप्ताहांत पर वे गोल्फ अवश्य खेलने जाते थे, परंतु अपनी पत्नी थेली को लकवा हो जाने के बाद वह गतिविधि भी बंद कर दी। &#8216;<em>अब न जाने हमारा कितना साथ बाकी है, इसलिए मैं ज्यादा से ज्यादा समय अपनी पत्नी के साथ बिताना चाहता हूं।</em>&#8216;</p>
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		<title>जीडी-जे.आर.डी.: इस &#8216;जहान&#8217; में ऐसे &#8216;बिरले&#8217; ही आते हैं!</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:33:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[जमशेदजी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[जी.डी. बिड़ला]]></category>
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		<category><![CDATA[बॉम्बे प्लॉन]]></category>

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		<description><![CDATA[अंग्रेजी के एक सुप्रसिद्ध उपन्यासकार इरविंग वालेस ने एक बेहतरीन काल्पनिक उपन्यास लिखा है &#8216;केन एंड एबल।&#8217; संक्षिप्त में उपन्यास का कथानक कुछ इस प्रकार है कि अमेरिका में दो युवक एक ही समय में बड़े हो रहे हैं- इसके अलावा उनके बीच हर मायने में असमानता है; शिक्षा, परिवेश, परिवार, माहौल आदि। फिर भी, एक दिन दोनों देश के सबसे बड़े व्यवसायी बन जाते हैं। अत्यंत विलग परिस्थितियों से समान ऊंचाइयों पर पहुंचने की इस कहानी के लेखक को [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2019" alt="जीडी-जे.आर.डी.: इस 'जहान' में ऐसे 'बिरले' ही आते हैं! " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/611.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">अं</span>ग्रेजी के एक सुप्रसिद्ध उपन्यासकार इरविंग वालेस ने एक बेहतरीन काल्पनिक उपन्यास लिखा है &#8216;केन एंड एबल।&#8217; संक्षिप्त में उपन्यास का कथानक कुछ इस प्रकार है कि अमेरिका में दो युवक एक ही समय में बड़े हो रहे हैं- इसके अलावा उनके बीच हर मायने में असमानता है; शिक्षा, परिवेश, परिवार, माहौल आदि। फिर भी, एक दिन दोनों देश के सबसे बड़े व्यवसायी बन जाते हैं।</p>
<p>अत्यंत विलग परिस्थितियों से समान ऊंचाइयों पर पहुंचने की इस कहानी के लेखक को वैसे कल्पना की भी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती। उसे सिर्फ भारत आकर जी.डी. बिड़ला-जे.आर.डी. से मिल लेना था। परिस्थितियों में पूरी असमानता के बावजूद प्रगति और प्रसिद्धि की समान ऊंचाइयों को छूने वाले ये दो शख्स आज उस मुहावरे के पीछे का पूरा अर्थ है, जहां भारत में संपदा, समृद्धि और उद्योगों का पर्याप्त शब्द &#8216;<em>टाटा-बिड़ला</em>&#8216; बन गया है।</p>
<p>जिस समय तक जी.डी. बिड़ला (घनश्यामदास बिड़ला) के दादा शिवनारायण बिड़ला 10 रुपए माहवार में मुनीम की नौकरी कर रहे थे, उस समय एक तो जमशेदजी टाटा नागपुर में एम्प्रेस मिल्स की शुरुआत कर चुके थे। अगर सीधे जी.डी. और जे.आर.डी. पर आएं, <strong>तो दोनों की भिन्नताएं देखिए।</strong></p>
<p><strong>जी.डी. का जीवन</strong></p>
<div class="simplePullQuoteRight">परिस्थितियों में पूरी असमानता के बावजूद प्रगति और प्रसिद्धि की समान ऊंचाइयों को छूने वाले ये दो शख्स आज उस मुहावरे के पीछे का पूरा अर्थ है, जहां भारत में संपदा, समृद्धि और उद्योगों का पर्याप्त शब्द &#8216;टाटा-बिड़ला&#8217; बन गया है<span></span></div>
<p>जी.डी. का जन्म राजस्थान के पिलानी गांव में हुआ और जे.आर.डी. का सभ्यता की नगरी पेरिस में। जी.डी. की प्राथमिक शिक्षा सिर्फ ग्यारह वर्ष की उम्र तक ही ग्रामीण पाठशाला में सीमित रही, वहीं जे.आर.डी. भी पढ़े तो स्कूल ही में परंतु फ्रांस, भारत, जापान और इंग्लैंड में। दोनों ही प्रारंभिक दिनों से ही व्यवसाय में कूद पड़े। बिड़ला घराने की व्यावसायिक शुरुआत तो टाटा घराने के बहुत बाद हुई, लेकिन कुछ ही वर्षों में उन्होंने उद्योगों की संख्या में टाटा घराने को पछाड़ दिया।</p>
<p>यहां यह उल्लेखनीय है कि आजादी के तुरंत बाद और वर्तमान में भारत के अग्रगण्य औद्योगिक समूहों की सूची बनाई जाए, तो शायद टाटा-बिड़ला के अलावा और कोई भी नाम दोनों ही सूचियों में नहीं मिलेगा। आजादी के समय उद्योगपतियों में बांगड़, सोमानी, श्रीराम, लालभाई, डालमिया आदि प्रमुख थे, तो आज ये स्थान थापर, सिंघानिया, अंबानी ने ले लिए हैं। स्थायी हैं तो सिर्फ दो- &#8216;<em>टाटा-बिड़ला।</em>&#8216; जी.डी. जे.आर.डी. की बनिस्बत महात्मा गांधी और कांग्रेस के काफी करीब थे, गांधीजी उन्हें अपना छोटा भाई-सा ही मानते थे। जे.आर.डी. भी महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थे, लेकिन कभी भी वे गांधीजी के बहुत करीब नहीं आए। 1944 में सम्राज्ञी मेरी द्वारा दोनों में किसी एक के साथ भोजन करने की चाह व्यक्त करने पर तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड वेवल ने एक खत में लिखा था, <em>&#8216;जी.डी. जे.आर.डी. के बजाय भोजन के लिए ज्यादा रुचिकर मेहमान होंगे। टाटा हैं तो सभ्य युवक, लेकिन बोलते बहुत कम हैं। वहीं जी.डी. दुनियाभर की बातें कर सकते हैं।&#8217;</em></p>
<p><strong>भारत की भावी योजना का प्रारूप</strong></p>
<p>इसी वर्ष 1944 में जे.आर.डी. व जी.डी. ने एक साथ बैठकर भारत की भावी योजना का प्रारूप तैयार किया (देखें आलेख बॉम्बे प्लॉन)। वर्ष 1946 में दोनों के बीच नागरिक उड्‌डयन को लेकर कुछ विवाद छिड़ गया, जिस पर दोनों ने एक-दूसरे को कई पत्र लिखे। जे.आर.डी. की सोच यह थी कि भारत में नागरिक विमानन की सीमित संभावनाएं हैं, उसमें अगर कई विमान सेवाएं घुस गईं तो सभी को नुकसान होगा। वहीं दूसरी ओर जी.डी. बिड़ला को भारत एयरवेज के जरिये मुनाफे का एक अच्छा स्रोत और उड्‌डयन में टाटा के आधिपत्य को समाप्त करने का अवसर दिखाई दिया। अंततः हुआ वही, जिसकी जे.आर.डी. को आशंका थी; सभी विमान सेवाओं का राष्ट्रीयकरण हो गया।</p>
<p>औद्योगिक क्षेत्र में दोनों ही की इकाइयों ने भारतीय व्यवसाय-वाणिज्य में नए पन्ने जोड़े हैं। वैसे जहां जे.आर.डी. की कार्यप्रणाली अत्यंत &#8216;<em>जनतांत्रिक</em>&#8216; और खुली थी, वहीं जी.डी. अत्यंत पैनी नजर से हर इकाई पर नजर रखते थे। एक बड़ा महत्वपूर्ण फर्क था दोनों की शैलियों में- जहां बिड़ला उद्योगों के प्रबंधकों में सर्वोच्च प्राथमिकता कंपनी से भी ऊपर मालिक के प्रति वफादारी की थी, वहीं टाटा घराने में सिर्फ व्यक्ति की काबिलियत और अपनी कंपनी के प्रति निष्ठा महत्वपूर्ण रही है।</p>
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