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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल&#187; जॉर्ज बुश</title>
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		<title>न्यूयॉर्क में रिपब्लिकन पार्टी का महाकुंभ</title>
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		<pubDate>Wed, 01 Sep 2004 12:23:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जनजीवन]]></category>
		<category><![CDATA[अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव]]></category>
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		<description><![CDATA[अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव (मंगलवार 2 नवंबर) से ठीक 60 दिन पहले सारे देश के रिपब्लिकन राजनीतिक न्यूयॉर्क में उतर आए हैं। अवसर है, चुनाव पूर्व पार्टी के परंपरागत 4 वर्षीय अधिवेशन का। न्यूयॉर्क सिटी (मैनहट्‍टन), जो डेमोक्रेट्‍स का ‘गढ़’ है, और पांच बार डेमोक्रेटिक अधिवेशन का मेजबान रह चुका है। वहां रिपब्लिकन पार्टी का ‘कनवेंशन’ पहली बार हो रहा है। रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के लिए चुनाव टिकट पर जॉर्ज बुश और डिक चेनी की दोबारा उम्मीदवारी की औपचारिक [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1688" alt="न्यूयॉर्क में रिपब्लिकन पार्टी का महाकुंभ" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2004/09/115.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">अ</span>मेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव (मंगलवार 2 नवंबर) से ठीक 60 दिन पहले सारे देश के रिपब्लिकन राजनीतिक न्यूयॉर्क में उतर आए हैं। अवसर है, चुनाव पूर्व पार्टी के परंपरागत 4 वर्षीय अधिवेशन का। न्यूयॉर्क सिटी (मैनहट्‍टन), जो डेमोक्रेट्‍स का ‘<em>गढ़</em>’ है, और पांच बार डेमोक्रेटिक अधिवेशन का मेजबान रह चुका है। वहां रिपब्लिकन पार्टी का ‘<em>कनवेंशन</em>’ पहली बार हो रहा है। रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के लिए चुनाव टिकट पर जॉर्ज बुश और डिक चेनी की दोबारा उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा भी इसी अधिवेशन में की जाएगी। इस बार न्यूयॉर्क चुने जाने के कई कारण थे; लेकिन शायद सर्वोपरि था सितंबर 11 के बाद इस शहर और शहरवासियों से जुड़ी संवेदना। राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल का गोया मकसद ‘<em>आतंकवाद का सफाया और अमेरिका की स्वतंत्रता की पूर्ण रक्षा</em>’ के लिए भी न्यूयॉर्क से ज्यादा परिचायक शहर कोई और नहीं था। फिर इस बार तो न्यूयॉर्क के राज्यपाल पतकी, महापौर ब्लूमबर्ग और पूर्व महापौर गुलियानी सभी रिपब्लिकन हैं।</p>
<p><b>अधिवेशन की रूपरेखा :</b></p>
<p>30 अगस्त से 2 सितंबर तक चलने वाले इस 4 दिवसीय अधिवेशन का मुख्य कार्यक्रम तो हर दिन शाम को ही होता है। मैडिसन स्क्वायर गार्डन हॉल में रिपब्लिकन पार्टी के देशभर से आए पांच हजार से अधिक चुनिंदा ‘<em>डे‍लिगेट्‍स</em>’ के सामने पार्टी के राष्ट्रीय नेता पार्टी और राष्ट्रपति की उपलब्धियों पर अपने विचार रखते हैं। पहली संध्या को रुडी गुलियानी ने सितंबर 11 के बाद के अमेरिका में बुश के योगदान और नेतृत्व का जबरदस्त समर्थन करते हुए उन्हें आतंकवाद से लड़ाई जारी रखने के लिए 4 साल और चुने जाने का आह्वान किया। वहीं दूसरी शाम कैलिफोर्निया के <em>‘स्टार</em>’ राज्यपाल अर्नोल्ड और बुश की पत्नी लौरा बुश ने जॉर्ज बुश के व्यक्तित्व को भावनात्मक रूप से पेश किया। पार्टी ने माहौल बनाने के लिए ‍जार्जिया के डेमोक्रेटिक सीनेटर का भी भाषण रखा है, जो बुश की नीतियों का समर्थन करते हैं (मानो कांग्रेस के अधिवेशन में सोनियाजी की तारीफ में प्रमोद महाजन का भाषण!!) 1 सितंबर की शाम उपराष्ट्रपति चेनी और उनकी पत्नी का मुख्य भाषण होगा और अधिवेशन के अंतिम दिन 2 सितंबर को ही जॉर्ज बुश का यहां आगमन होगा और वह मुख्य उद्‍बोधन के जरिए पार्टी का नामांकन स्वीकार करेंगे। ऐसा ही सब कुछ 2 माह पहले डेमोक्रेटिक अधिवेशन में बोस्टन में हो चुका है, जब जॉन केरी और जॉन एडवर्ड्स को उनकी पार्टी ने उम्मीदवार घोषित किया।</p>
<div class="simplePullQuoteRightGreen">चुनाव पूर्व किसी भी आतंकवादी गड़बड़ी की आशंका के बीच रिपब्लिकन अधिवेशन की सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व है<span></span></div>
<p><b>मैडिसन स्क्वायर गार्डन जैसे फौज की छावनी :</b></p>
<p>अधिवेशन का मुख्य हॉल मैडिसन स्क्वायर गार्डन मैनहट्टन के मध्य और अत्यंत व्यस्त क्षेत्र में स्थित है। इस हॉल के ठीक नीचे न्यूयॉर्क का मेन रेलवे स्टेशन है; जहां से न्यू जर्सी, लॉग आयलैंड की ट्रेंस आती-जाती हैं और लाखों लोग वहां से दिन में गुजरते हैं। चुनाव पूर्व किसी भी आतंकवादी गड़बड़ी की आशंका के बीच रिपब्लिकन अधिवेशन की सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व है। न्यूयॉर्क शहर के पूरे 37,000 पुलिस कर्मी और उसके साथ न्यू जर्सी पुलिस, सेना और खुफिया पुलिस के हजारों लोग अधिवेशन की सुरक्षा में जुटे हैं। अधिवेशन स्थल की ‍ओर जाने वाले हर मार्ग और सब-वे के अंदर पुलिस की गहन चौकसी है। पेन स्टेशन से आने-जाने वाली हर ट्रेन की तलाशी ली जा रही है। इस सभी की आशंका से इस सप्ताह मैनहट्टन में काम करने वालों की संख्या बहुत कम नजर आ रही है, लेकिन फिर भी यह मानना पड़ेगा कि मुझ जैसे हजारों लोग सब-वे के जरिए अपने कार्यालय तक आसानी से आ-जा रहे हैं। सुरक्षा की इस तैयारी में कितने महीने और कितने करोड़ों डॉलर लगेंगे, अंदाज लगाना मुश्किल है। हां, 3 सितंबर तक सब कुछ ठीक ठाक समाप्त हो जाने पर यहां के सभी अधिकारी चैन की लंबी सांस ले सकेंगे।</p>
<p><b>अधिवेशन के लिए शहर में आए 50,000 लोग : </b></p>
<p>आयोजकों का ऐसा अनुमान है कि अधिवेशन के माध्यम से करीब 50,000 यात्री मैनहट्‍टन में आए हैं। इनमें से करीब 5000 तो देश के हर राज्य से आए रि‍पब्लिकन पार्टी के कार्यकर्ता हैं। देश-विदेश के करीब 15000 संवाददाता इस अधिवेशन को कवरेज करने यहां आए हैं। उनके लिए मैडिसन स्क्वायर गार्डन से ठीक ‍पीछे न्यूयॉर्क के मुख्य डाकघर में सूचना केंद्र की व्यवस्था की गई है। शहर में करीब 40,000 होटल के कमरे रिपब्लिकन अधिवेशन में आए मेहमानों के लिए आरक्षित किए गए हैं। चूंकि अधिवेशन की मुख्य गतिविधि तो सिर्फ शाम को ही है; तो चारों दिनों को क्रमश: न्यूयॉर्क में खरीदी, क्रीड़ा, संस्कृति और इतिहास दिवस के रूप में मेहमानों के लिए विशेष आकर्षणों की तैयारी भी की गई है। न्यूयॉर्क में सत्ता पक्ष का अधिवेशन हो और यहां के बड़े व्यापारी मेजबानी में पीछे कैसे रहें; न्यूयॉर्क और अमेरिका की मुख्य कंपनियों ने अधिवेशन को सफल बनाने में मुक्त-हस्त से अपना समर्थन दिया है। सभी ‘<em>डेलिगेट्‍स</em>’ को दिए जाने वाले <em>‘फ्री गिफ्ट बैग’</em> में और वस्तुएं के अलावा एक ‍डिजिटल कैमरा भी है, जिससे वे अधिवेशन की अपनी यादें सदा के लिए कैमरे में कैद कर सकें।</p>
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		<title>इराक और युद्ध के बीच सिर्फ चंद लम्हे</title>
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		<pubDate>Mon, 17 Mar 2003 13:27:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जनजीवन]]></category>
		<category><![CDATA[आर्ट ऑफ द इम्पॉसिबल]]></category>
		<category><![CDATA[इराक युद्ध]]></category>
		<category><![CDATA[ओसामा बिन लादेन]]></category>
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		<category><![CDATA[सद्‌दाम]]></category>

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		<description><![CDATA[राजनीति का दूसरा नाम ही है &#8216;आर्ट ऑफ द इम्पॉसिबल&#8216; जिसमें सब कुछ संभव है। अत्यंत जटिल मसलों का भी समय कोई हल निकाल देता है लेकिन जॉर्ज बुश और अमेरिकी नेतृत्व में खाड़ी क्षेत्र में तैयार 2 लाख 75 हजार सैनिकों के पास अब सद्‌दाम को देने के लिए और समय नहीं है। इन पंक्तियों को लिखने और आपके पढ़ने के घंटों के बीच भी इराक पर आक्रमण का शंखनाद हो सकता है। रविवार को पुर्तगाल के एक द्वीप [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2003/03/jm_p_AirCarrier.jpg" alt="इराक और युद्ध के बीच सिर्फ चंद लम्हे" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3105" /><span class="dropcap">रा</span>जनीति का दूसरा नाम ही है &#8216;<em>आर्ट ऑफ द इम्पॉसिबल</em>&#8216; जिसमें सब कुछ संभव है। अत्यंत जटिल मसलों का भी समय कोई हल निकाल देता है लेकिन जॉर्ज बुश और अमेरिकी नेतृत्व में खाड़ी क्षेत्र में तैयार 2 लाख 75 हजार सैनिकों के पास अब सद्‌दाम को देने के लिए और समय नहीं है। इन पंक्तियों को लिखने और आपके पढ़ने के घंटों के बीच भी इराक पर आक्रमण का शंखनाद हो सकता है। रविवार को पुर्तगाल के एक द्वीप पर हुई &#8216;<em>एक घंटे</em>&#8216; की अनूठी शीर्ष वार्ता और उसी दिन चेनी-पावेल के वक्तव्यों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब इराक और उसका शासन &#8216;<em>तुरंत</em>&#8216; त्यागने के अलावा सद्‌दाम के लिए युद्ध का सामना अवश्यंभावी है। यह संदेश सिर्फ सद्दाम के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा परिषद के 15 सदस्य राष्ट्र और विश्व के सभी देशों को भी था कि सद्‌दाम-इराक के विषय में चर्चाओं और समीकरण के दौर अब &#8216;<em>अंतिम चौराहे</em>&#8216; पर हैं।</p>
<p><b>बीते कुछ दिन</b></p>
<p>अमेरिकी प्रशासन ने तो यह बार-बार कह दिया कि उन्हें सद्‌दाम पर सामरिक कार्रवाई करने के लिए सुरक्षा परिषद में दोबारा बहुमत की कोई आवश्यकता नहीं है, अमेरिका के लिए अनुमोदन 1441 ही काफी है। वह तो सिर्फ अपने घनिष्ठ सहयोगी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दबे स्वरों में अब &#8216;<em>बुश के पालतू</em>&#8216; कहलाने वाले टोनी ब्लेयर को उनके देश इंग्लैंड में हो रहे भारी विरोध से जूझने के लिए सुरक्षा परिषद में नए अनुमोदन को पारित करवाने के भरसक प्रयास कर रहा था लेकिन 15 में से 9 का बहुमत भी उन्हें नजर नहीं आया। इसलिए पिछले सप्ताह तक दोबारा वोट पर अडिग बुश ने भी अपना विचार बदल लिया, क्योंकि वे भी सुरक्षा परिषद में परास्त अनुमोदन की अवहेलना करके और अधिक कूटनीतिक सख्ती नहीं चाहते। फ्रांस, जर्मनी तो इतनी जल्दी सैनिक कार्रवाई के विरोध में खुलकर थे, बुश के पिछले सालों के नए मित्र रशिया के पुतिन और पाकिस्तान के मुशर्रफ ने भी अमेरिका के साम और &#8216;<em>दाम</em>&#8216; के खुले आश्वासन के बावजूद सहमति व्यक्त नहीं की।</p>
<p>तुर्की के भरोसे इराक के उत्तरी भाग से जमीन और हवाई आक्रमण की सारी योजना तुर्की की संसद के विरोध से धरी रह गई। किए गए सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका की जनता अभी भी सद्‌दाम हुसैन को इराक से हटाने को सही मानती है, हालांकि अधिकांश की यह भी इच्छा है कि सैनिक कार्रवाई संयुक्त राष्ट्र के अनुमोदन से होना चाहिए और महीनों से मीडिया पर छाई इराक-लड़ाई की चर्चा और उससे उत्पन्न अनिश्चितता ने पहले से ही नरम अर्थव्यवस्था को पुनः मंदी के कगार पर ला खड़ा किया है। तेल की कीमत पिछले महीनों में दोगुनी हो गई है।</p>
<div class="simplePullQuoteLeftRed">इराक से सद्‌दाम को निर्णायक रूप से हटाने के लिए अमेरिका के लगभग 2 लाख 25 हजार से अधिक सैनिक, सैकड़ों वायुयान, कई विमान वाहक युद्धपोत, खाड़ी क्षेत्र में जमा हैं<span></span></div>
<p>अब अमेरिका के जनमत का तो मानना है कि अगर लड़ाई होनी ही है, तो वह फिर परसों के बजाय कल ही हो जाए ताकि अनिश्चितता की दौड़ से तो आगे बढ़ सकें। पिछले दिनों अल कायदा के सरगना खालिद शेखमोहम्मद के पाकिस्तान में पकड़े जाने के बाद ओसामा बिन लादेन को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के अमेरिकी प्रयासों में बहुत तेजी आ गई है क्योंकि अगर इन्हीं दिनों में किसी तरह भी बिन लादेन अगर पकड़ा गया तो आतंकवाद के खिलाफ बुश की जेहाद को सारी दुनिया का समर्थन मिल जाएगा और इराक के खिलाफ सैनिक कार्रवाई का विरोध एकदम ठंडा पड़ सकता है।</p>
<p><b>कैसा होगा यह इराक युद्ध</b><b>?</b></p>
<p>अमेरिका ने अपनी सैन्य शक्ति का पूरा बल खाड़ी क्षेत्र में लगा दिया है। इराक से सद्‌दाम को निर्णायक रूप से हटाने के लिए अमेरिका के लगभग 2 लाख 25 हजार से अधिक सैनिक (इंग्लैंड के 40 हजार इसके अलावा हैं), सैकड़ों वायुयान, कई विमान वाहक युद्धपोत, खाड़ी क्षेत्र में जमा हैं। उस इलाके में सहयोगी राष्ट्र कम होने से कुवैत, कतर आदि में ही जमीनी सेना ने अपने डेरे जमा रखे हैं और अधिकांश उड़ानें अमेरिका के विमान वाहक युद्धपोत से ही होंगी। इस युद्ध की कमान होगी जनरल टॉमीफ्रेंक के हाथ, जिनका पूरा मुख्यालय फ्लोरिडा से उठकर कतर में स्थानांतरित हो गया है। राष्ट्रपति बुश के सिर्फ आदेश की देरी है, अमेरिका सेना ने पहले 48 घंटे में ही इराक पर इतनी भीषण हवाई गोलाबारी की योजना बनाई है कि उससे सद्‌दाम का पूरा प्रशासन और रक्षातंत्र नष्ट हो जाएगा। उसके तुरंत बाद जमीनी सेना और टैंक कुवैत के मार्ग से बगदाद की ओर कूच करेंगे। सामरिक कार्रवाई की मुख्य आधारशिला है कि सद्‌दाम और उनकी सेना पर इतने कम समय में इतना भारी आक्रमण कि इराक की सेना खुद ही हथियार डाल दे।</p>
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		<title>अटलजी दे सकते हैं श्री बुश को कुछ भीष्म उपदेश</title>
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		<pubDate>Sat, 16 Dec 2000 10:07:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[व्हाईट हाऊस]]></category>
		<category><![CDATA[अटल बिहारी वाजपेयी]]></category>
		<category><![CDATA[अटलजी]]></category>
		<category><![CDATA[जॉर्ज बुश]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रपति श्री जॉर्ज बुश]]></category>

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		<description><![CDATA[और अब मेरे ही शब्दों में, वक्त आ गया है कि मुझे चलना चाहिए, धन्यवाद और शुभरात्रि। इन लफ्जों के साथ श्री अल गोर ने कल रात राष्ट्र के नाम संदेश में अपनी हार औपचारिक रूप से स्वीकार कर श्री जॉर्ज बुश को अमेरिका के 43वें राष्ट्रपति बनने की बधाई दी। यहां यह कहना पड़ेगा कि न सिर्फ अमेरिका की चुनाव प्रणाली, वरन यहां की पार्टी व्यवस्था में भी देश को आगे ले जाने की कला में भारतीय प्रधानमंत्री अटलजी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1528" alt="अटलजी दे सकते हैं श्री बुश को कुछ भीष्म उपदेश  " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/12/40.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">औ</span>र अब मेरे ही शब्दों में, वक्त आ गया है कि मुझे चलना चाहिए, धन्यवाद और शुभरात्रि। इन लफ्जों के साथ श्री अल गोर ने कल रात राष्ट्र के नाम संदेश में अपनी हार औपचारिक रूप से स्वीकार कर श्री जॉर्ज बुश को अमेरिका के 43वें राष्ट्रपति बनने की बधाई दी। यहां यह कहना पड़ेगा कि न सिर्फ अमेरिका की चुनाव प्रणाली, वरन यहां की पार्टी व्यवस्था में भी देश को आगे ले जाने की कला में भारतीय प्रधानमंत्री अटलजी श्री बुश को जरूर कुछ भीष्म उपदेश दे सकते हैं।</p>
<p><strong>&#8220;श्री बुश को यह ताज बड़े बोझ के साथ मिला है&#8221;</strong> ये ही शब्द श्री गोर ने ठीक आठ साल पहले पूर्व राष्ट्रपति श्री जॉर्ज बुश के लिए कहे थे कि अब समय आ गया है और उन्हें चले जाना चाहिए। विडंबना और कीर्तिमानों की फेहरिस्त तो इस राष्ट्रपति चुनाव में बहुत लंबी है।<br />
<strong>(1)</strong> 271 वोट पाकर सिर्फ एक वोट से निर्वाचक मंडल में जीतकर राष्ट्रपति बनने वाले श्री जॉर्ज बुश पहले व्यक्ति हैं।<br />
<strong>(2)</strong> इतिहास में चौथी और इस शताब्दी में पहली बार बगैर जनमत हासिल किए भी 54 वर्षीय श्री जॉर्ज बुश राष्ट्रपति बन रहे हैं।<br />
<strong>(3)</strong> 1824 में जॉन क्विंसी एडम्स की तरह वे अमेरिकी इतिहास में दूसरे पुत्र हैं, जो पिता के बाद राष्ट्रपति बन रहे हैं। जॉन क्विंसी एडम्स भी जनमत हारकर जीते थे।<br />
<strong>(4)</strong> श्री गोर की तरह उन्होंने भी टेनिसी के नागरिक को ही हराया था।<br />
<strong>(5)</strong> शताब्दी में पहली बार कैलिफोर्निया के चुनाव हारकर भी कोई राष्ट्रपति बना है।<br />
<strong>(6)</strong> सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राष्ट्रपति बनने वाले भी श्री जॉर्ज बुश 1876 के बाद पहले राष्ट्रपति हैं।</p>
<p>परसों रात को 10 बजे सुप्रीम कोर्ट के 5-4 वोट से फ्लोरिडा में पुनर्गणना रोकने के बाद यह तय था कि पिछले 36 दिनों की चुनावी रामायण का उत्तरकांड आ गया है। अमेरिकावासी भी कुछ-कुछ ऊब से गए थे, इस कभी न खत्म होने वाले मैच से। यह वह देश है जहां कुछ घंटे से ज्यादा तो कोई खेल स्पर्धा भी नहीं चलती। रात 9 बजे, आठ मिनट के अपने संदेश में श्री अल गोर ने ये स्पष्ट कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं हैं, पर उसका सम्मान और आदर करेंगे और श्री जॉर्ज बुश के राष्ट्रपति काल में उन्हें पूर्ण सहयोग देंगे। इसके बाद वे क्या करेंगे, उन्होंने नहीं सोचा, अपने गृह राज्य टेनिसी जाकर पुराने रिश्तों को ठीक-ठाक करेंगे। ज्ञात रहे कि श्री अल गोर अपने गृहराज्य में भी जीते नहीं। सबसे पहले उन्होंने श्री बुश को बधाई संदेश का फोन किया और यह भी कहा कि मैं आज आपको दोबारा फोन करके बधाई वापस नहीं लूंगा। सोचिए श्री गोर क्या महसूस कर रहे होंगे जब वे 17 महीनों से दिन-रात के इतने प्रचार के बाद और सिर्फ निर्वाचक मंडल में एक मत से सुप्रीम कोर्ट के फैसले से चुनाव हार गए। 24 वर्षों से लोकसेवा में रहे श्री गोर, जिस कुर्सी के आठ साल बहुत करीब रहे, परंतु वह उनके हाथ से दूर चली गई, तब उन्हें कैसा लगा होगा। हालांकि उन्होंने यह पन्ना खुला छोड़ दिया है कि वे फिर से चुनाव लड़ेंगे या नहीं।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">श्री बुश के नेतृत्व की परीक्षा रहेगी कि वे सारे देश को कैसे साथ लेकर चलते हैं। भारत के प्रति श्री बुश का रुख भी मैत्रीपूर्ण ही होना चाहिए<span></span></div>
<p>श्री बुश को यह ताज बड़े बोझ के साथ मिला है। सीनेट में बिलकुल 50-50 सदस्यों की बराबरी है और वीटो का वोट हमेशा उपराष्ट्रपति डिक चैनी को डालना पड़ेगा। आठ सालों से बढ़ती आर्थिक व्यवस्था और पूंजी बाजार भी कुछ थमते नजर आ रहे हैं। श्री गोर के भाषण के ठीक एक घंटे बाद अपने उद्‌बोधन में श्री बुश ने देश से यह वादा किया कि वे पार्टियों से ऊपर उठकर देश के हित में काम करेंगे। श्री बुश के साथ सकारात्मक पक्ष यह भी है कि उनके अधिकांश मंत्रिमंडलीय सदस्य उन्हें धरोहर में मिले हैं। सर्वश्री डिक चैनी, एन्ड्रयू कॉर्ड, जनरल कॉलिन पॉवेल (<strong>जिन्हें विदेश मंत्री बनाने की प्रबल संभावनाएं हैं</strong>) आदि सभी उनके पिता के साथ थे। ये सब अनुभवी हैं, लेकिन शीतयुद्ध से लेकर आज का विश्व और अमेरिका की राजनीति काफी अलग है।</p>
<p><strong>अमेरिकी क्या सोचते हैं श्री बुश के बारे में-और वह भी ऐसी स्थितियों में चुने जाने पर-</strong></p>
<p>काफी मिश्रित प्रतिक्रिया है। कुछ का मानना है कि ये ठीक हुआ, कुछ कहते हैं, बड़ा बुरा हुआ। निष्कर्ष में यह कि अब श्री बुश के नेतृत्व की परीक्षा रहेगी कि वे सारे देश को कैसे साथ लेकर चलते हैं। भारत के प्रति श्री बुश का रुख भी मैत्रीपूर्ण ही होना चाहिए। अंत में अवलोकन करते हुए यह लगता है कि श्री गोर ने अपने पार्टी के ब्रह्मास्त्र यानी श्री क्लिंटन का चुनाव प्रचार में उपयोग न करने की शायद कीमत चुकाई है। श्री क्लिंटन के व्यक्तिगत चरित्र के बाद भी श्रीमती क्लिंटन ने उनसे प्रचार कराया और जीती भीं। क्या श्रीमती हिलेरी तेज थीं और श्री गोर अति आदर्शवान और भावुक। ऐसा जवाब तो अब तारीख ही देगी। तो करिए इंतजार 20 जनवरी की सुबह का, जब श्री बुश का राज्याभिषेक होगा।</p>
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		<title>सवालों के अंबार पर बैठी अमेरिकी निर्वाचन प्रणाली</title>
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		<pubDate>Fri, 10 Nov 2000 09:53:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[व्हाईट हाऊस]]></category>
		<category><![CDATA[अमेरिकी निर्वाचन प्रणाली]]></category>
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		<category><![CDATA[विश्व इतिहास]]></category>

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		<description><![CDATA[गवर्नर बुश, पिछले 45 मिनट में घटनाक्रम काफी बदल गया है और फ्लोरिडा में स्वतः ही पुनर्गणना होने वाली है, इसलिए मैं आपको दी हुई बधाई वापस लेता हूं।&#8217; &#8216;वाइस प्रेसिडेंट महोदय, तो क्या आप मुझे कहना चाहते हैं कि आप अपनी पराजय की स्वीकृति वापस लेना चाहते हैं।&#8216; &#8216;गवर्नर, आप इस पर इतना बौखलाइए मत। बड़े अजीब हालात हो रहे हैं।&#8217; &#8216;पर फ्लोरिडा के गवर्नर तो मेरे भाई जैब बुश हैं और उन्होंने मुझे अभी बताया है कि फ्लोरिडा [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1522" alt="सवालों के अंबार पर बैठी अमेरिकी निर्वाचन प्रणाली  " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2002/07/37.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">ग</span>वर्नर बुश, पिछले 45 मिनट में घटनाक्रम काफी बदल गया है और फ्लोरिडा में स्वतः ही पुनर्गणना होने वाली है, इसलिए मैं आपको दी हुई बधाई वापस लेता हूं।&#8217;</p>
<ul>
<li>&#8216;वाइस प्रेसिडेंट महोदय, तो क्या आप मुझे कहना चाहते हैं कि आप अपनी पराजय की स्वीकृति वापस लेना चाहते हैं।<strong>&#8216;</strong></li>
<li>&#8216;गवर्नर, आप इस पर इतना बौखलाइए मत। बड़े अजीब हालात हो रहे हैं।&#8217;</li>
<li>&#8216;पर फ्लोरिडा के गवर्नर तो मेरे भाई जैब बुश हैं और उन्होंने मुझे अभी बताया है कि फ्लोरिडा में हम विजयी हुए हैं।&#8217;</li>
<li>&#8216;गवर्नर साहब, आपके छोटे भाई फ्लोरिडा के चुनाव के अंतिम निर्णायक नहीं हैं, धन्यवाद और शुभरात्रि।&#8217;</li>
</ul>
<p>यह किसी फिल्म के सनसनीखेज संवाद नहीं वरन वह फोन वार्तालाप है जो अब विश्व इतिहास में दर्ज हो गया है। यह फोन वार्तालाप था वाइस प्रेसिडेंट गोर और गवर्नर बुश के बीच, कल रात लगभग ढाई बजे का जब गोर ने बुश को सिर्फ चंद मिनटों पहले स्वयं ही ने दी विजय की औपचारिक बधाई वापस ले ली। अमेरिका इस वक्त उन सवालों के अंबार पर बैठा है, जिसके बारे में शायद इन्होंने कभी सोचा ही नहीं था। सारा विश्व देख रहा है अचंभे से, आश्चर्य से कि दुनिया का सर्वाधिक शक्तिशाली और साधन संपन्न राष्ट्र अपने चुनाव भी ठीक से नहीं करवा सकता।</p>
<p>फ्लोरिडा में तो गुत्थियां ही गुत्थियां हैं। वेस्ट पाम बीच क्षेत्र में कई मतदाताओं का आरोप है कि बेलेट पत्र कुछ ऐसे गलत छपे थे कि वे वोट डालना चाहते थे गोर को, लेकिन वोट डल गया निर्दलीय उम्मीदवार बुकनेन को। तीन मतदाताओं ने तो कोर्ट में याचिका भी दाखिल कर दी है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">अमेरिका इस वक्त उन सवालों के अंबार पर बैठा है, जिसके बारे में शायद इन्होंने कभी सोचा ही नहीं था<span></span></div>
<p>बुश यदि फ्लोरिडा को थोड़े-बहुत अंतर से जीत भी जाते हैं तो उनकी विजय का आधार जनमत का बहुमत न होकर इलेक्टोरल में विजय रहेगी। तो क्या वे देश और विदेश का विश्वास जीत पाएंगे? अल गोर ने इस बात पर अपनी स्पष्ट राय देते हुए कहा कि वे संविधान द्वारा स्थापित इलेक्टोरल को ही मान्यता देंगे और उसका आदर करेंगे।</p>
<p><strong>सवाल अभी भी बाकी हैं&#8230;</strong></p>
<p>अभी डाक से आए मतपत्रों के सवाल भी बाकी हैं और फ्लोरिडा के गवर्नर और जॉर्ज बुश के छोटे भाई जैब बुश ने नैतिकता के आधार पर अपने आपको फ्लोरिडा की पुनर्गणना से अलग कर लिया है। वहीं दूसरी ओर सारे मीडिया जगत में बखेड़ा है कि एक रात में चंद घंटों के फैसले में एक नहीं दो बार गलत घोषणा और वो भी हर बड़े नेटवर्क द्वारा। पहले गोर के फ्लोरिडा जीतने की ओर फिर बुश के फ्लोरिडा और चुनाव जीतने की जबकि सवाल अभी भी बाकी हैं।</p>
<p>कई बड़े अखबारों के हेडलाइन पर बुश के विजयी होने के समाचार छप चुके थे और अखबार बंट भी गए। नेटवर्क्स की वेबसाइट्‌स पर रात ढाई बजे से लगभग आधे घंटे तक &#8216;बुश अमेरिका के 43वें राष्ट्रपति&#8217; सुर्खियां चलती रहीं। आखिर यहां कॉम्पीटिशन इतनी ज्यादा है कि ऐसे मौके पर होड़ में गलती की संभावना हो जाती है। सारे मीडिया में गहन आत्मावलोकन शुरू हो गया है और अब तो सवाल ये भी उठ रहा है कि अगर बुश जीते, लेकिन जनमत गोर के पास है तो क्या इलेक्टोरल प्रथा पर ही प्रश्नचिह्न नहीं लग जाता? और ये उस देश में जहां असंख्य परमाणु अस्त्र इंसान के एक छोटे से निर्णय से और अंगुली दबाते ही पृथ्वी नष्ट कर सकते है, वहां इतनी ढील-पोल?</p>
<p>भारत में चुनावों को लेकर इतना असंमजस कभी नहीं होता, जबकि वहां इससे कहीं ज्यादा पिछड़े मसले उभरते हैं। वहां राष्ट्रपति और गवर्नर के पास पालकीवाला, सोराबजी जैसे कई संविधान के पंडित सलाह देने के लिए होते हैं, लेकिन यहां तो कोई संविधानविद्‌ नजर नहीं आ रहा, यहां तक कि फ्लोरिडा की पुनर्गणना में अपने कानून पर्यवेक्षक के रूप में दोनों पक्षों ने भूतपूर्व सेक्रेटरी ऑफ स्टेट वारेन क्रिस्टोफर (डेमोक्रेट) और जेम्स बाकर (रिपब्लिकन) को भेजा है क्योंकि और तो कोई है ही नहीं। समस्या का मूल यह है कि यह देश जब किसी घटना के बारे में विचारता है तब उसके आगे- पीछे, संभव-असंभव सब सोच लेता है, लेकिन चुनाव प्रक्रिया में ऐसा घटनाक्रम तो इन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा। इसलिए उसकी तैयारी भी नहीं है। और मजा देखिए। कल शाम 6 बजे गिनती रोक दी गई कि सुबह 9 बजे फिर चालू करेंगे। एक ओर तो उम्मीदवार बिना खाए, सोए महीनों तक प्रचार करते रहे और अब गणना के बीच में विश्राम, बड़ा अजीब लगता है यह सब। नतीजा चाहे जो कुछ भी रहे। दोनों पक्ष काफी संतुलन भरे वक्तव्य दे रहे हैं। पर ये चुनाव जवाबों के बजाय सवाल अधिक छोड़ जाएगा।</p>
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		<title>कौन बनेगा अमेरिका का राष्ट्रपति</title>
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		<pubDate>Tue, 19 Sep 2000 11:09:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[व्हाईट हाऊस]]></category>
		<category><![CDATA[अमेरिका का राष्ट्रपति]]></category>
		<category><![CDATA[अल गोर]]></category>
		<category><![CDATA[जॉर्ज बुश]]></category>
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		<description><![CDATA[2000 में अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में जॉर्ज बुश और अल गोर के बीच कांटे की टक्कर थी। चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों तक यह कह पाना मुश्किल था कि आगे कौन था-रिपब्लिकन जार्ज बुश-जो अपने पिता के बाद पुनः एक बुश को व्हाइट हाउस में पहुंचाना चाहते थे- या फिर उपराष्ट्रपति अल गोर, जो अब &#8216;उप&#8216; से पूरे राष्ट्रपति बनने के दावेदार हैं। अब, जबकि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के मतदान की घड़ी (7 नवंबर) करीब आ रही है, [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/09/jm_k_BushGore2000.jpg" alt="कौन बनेगा अमेरिका का राष्ट्रपति" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3088" /><span class="dropcap">2</span>000 में अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में जॉर्ज बुश और अल गोर के बीच कांटे की टक्कर थी। चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों तक यह कह पाना मुश्किल था कि आगे कौन था-रिपब्लिकन जार्ज बुश-जो अपने पिता के बाद पुनः एक बुश को व्हाइट हाउस में पहुंचाना चाहते थे- या फिर उपराष्ट्रपति अल गोर, जो अब &#8216;<em>उप</em>&#8216; से पूरे राष्ट्रपति बनने के दावेदार हैं।</p>
<p>अब, जबकि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के मतदान की घड़ी (7 नवंबर) करीब आ रही है, दोनों उम्मीदवारों ने सभी मायनों में अपना तन-मन-धन दांव पर लगा दिया है। रिपब्लिकन पार्टी के अधिवेशन के बाद जॉर्ज बुश का पलड़ा काफी भारी था। डिक चैनी के रूप में अपने उपराष्ट्रपति पद के साथी को चुनकर बुश ने उन खबरों को दरकिनार कर दिया, जिसमें बुश को &#8216;<em>कम अनुभवी</em>&#8216; और &#8216;<em>विदेश नीति में उतने निपुण नहीं</em>&#8216; करार दिया जाता था। डिक चैनी अमेरिकी प्रशासन में काफी महत्वपूर्ण पद पहले ही संभाल चुके हैं, जिनमें तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के राष्ट्रपति काल का समय भी शामिल है। डेमोक्रेटिक पार्टी के लॉस एंजिल्स अधिवेशन के पहले तक अल गोर की दुविधा बरकरार थी कि वे 8 वर्षों तक क्लिंटन प्रशासन की सफलता का लाभ लेते हुए श्री बिल क्लिंटन की व्यक्तिगत खामियों से अपने को अलग रहना चाहते थे।</p>
<p><strong>कुछ थी उम्मीदें :</strong></p>
<div class="simplePullQuoteRight">भारत की दृष्टि से दोनों ही प्रशासन में रुख मित्रवत होने की आशा है<span></span></div>
<p>अधिवेशन तक यह भी उम्मीद थी कि क्लिंटन प्रशासन के आखिरी दिनों और श्रीमती हिलेरी क्लिंटन द्वारा प्रचार की उम्मीद से पूरा अधिवेशन कहीं बिल-हिलेरी क्लिंटन का यश-गान होकर न रह जाए। श्री अल गोर को भारी कूटनीतिक फायदा मिला, वयस्क सीनेटर और कट्‌टर &#8216;<em>परंपरावादी</em>&#8216; श्री लिबेरमन को अपना साथी उम्मीदवार चुनकर।<br />
लिबेरमन की छवि एकदम &#8216;<em>धार्मिक</em>&#8216; और &#8216;<em>मूल्यों की मर्यादा</em>&#8216; मानने वाले व्यक्ति की है और डेमोक्रेट होते हुए भी मोनिका कांड के समय उन्होंने बिल क्लिंटन के चरित्र की सार्वजनिक निंदा की थी। डेमोक्रेट अधिवेशन की अंतिम शाम पार्टी की अपनी उम्मीदवारी को औपचारिक रूप से स्वीकारते हुए अल गोर ने काफी जोर देकर कहा, &#8216;<em>आई एम माई ऑन मैन</em>&#8216;। श्री क्लिंटन से गहरी मित्रता के बावजूद वे श्री क्लिंटन की महज परछाई नहीं हैं।</p>
<p>हर बार होता है कि अधिवेशन के बाद संबंधित पार्टी के उम्मीदवार का पलड़ा भारी हो जाता है और इस बार भी ऐसा ही हुआ। लेकिन, पिछले कुछ दिनों से सारे मीडिया और जनता में लगने लगा है जैसे श्री अल गोर की बढ़त उन्हें विजयश्री तक पहुंचा देगी। बुश पर भी अपने पिता और पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का &#8216;<em>अत्यधिक प्रभाव</em>&#8216; होने की कहानियां प्रेस में लगातार छपती रहती हैं। हालांकि कहते हैं कि सहस्राब्दी सम्मेलन के दौरान जॉर्ज बुश ने विशेष रूप से अटलजी और जसवंतसिंह को फोन लगाकर उनसे बात की और भारत के प्रति अपना समर्थन जताया। भारत की दृष्टि से दोनों ही प्रशासन में रुख मित्रवत होने की आशा है, शायद अल गोर में अधिक। अटलजी की वॉशिंगटन यात्रा के दौरान उनके सम्मान में अल गोर ने दोपहर के भोजन का आयोजन किया। बुश और अल गोर में अमेरिका के आंतरिक विषयों पर भी काफी बहस छिड़ी हुई है, जिसमें मेडिकल इंश्योरेंस की बढ़ती दरें, टैक्स कम करने से लेकर प्रारंभिक शिक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं।</p>
<p><strong>कुछ मतभेद :</strong></p>
<p>पिछले दिनों एक नया मतभेद उभरकर आया है, जिसके रहते श्री बुश की छवि को थोड़ा धक्का लगा है। अमेरिका में प्रथा है कि राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवार टी.वी. पर आमने-सामने 90 मिनट का वाद-विवाद करते हैं, जिससे पूरी जनता को उन्हें करीब से और दोनों को आमने-सामने देखने-सुनने व परखने का अवसर मिल जाता है। इसे स्वतंत्र परिषद आयोजित करती है और अमेरिका से सभी प्रमुख टी.वी. नेटवर्क इसे प्रसारित करते हैं।</p>
<p>आंकड़ों के अनुसार पिछले चुनाव के दौरान एक ऐसी &#8216;<em>परिचर्चा</em>&#8216; को अमेरिका की 25 करोड़ की आबादी में से लगभग 10 करोड़ लोगों ने &#8216;<em>लाइव</em>&#8216; देखा था। इस बार भी हर बार की तरह तीन अलग-अलग शहरों में इस &#8216;<em>बहस</em>&#8216; का आयोजन तय किया गया था, जिन्हें अल गोर चुनाव प्रचार समिति ने स्वीकार कर लिया। लेकिन, श्री बुश ने श्री गोर को ललकारते हुए कहा कि ऐसी तीन डिबेट्‌स (बहस) के बजाय वे श्री गोर से &#8216;<em>टोरी किंग लाइव</em>&#8216; जैसे टॉक शो में भी बात करना चाहेंगे।</p>
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