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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल&#187; टाटा एअर लाइंस</title>
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		<title>यूं हुआ देश में विमान सेवाओं का जन्म</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:44:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[इंपीरियल एयरवेज]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा एअर लाइंस]]></category>
		<category><![CDATA[मेसर्स टाटा एंड संन्स]]></category>
		<category><![CDATA[लॉग बुक]]></category>

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		<description><![CDATA[दिसंबर 7, 1937। विमान प्रकार-वेको.सी-6 । इंजिन प्रकार जाकोबो; एच.डी.-225 । बंबई से इंदौर-उड़ान समय 2 घंटे 20 मिनट। वापसी दिसंबर 8 इंदौर से बंबई, समय 2 घंटे 15 मिनट। सहचालक नेविल विन्टसेन्ट के साथ। आधा उड़ान समय दर्ज। ऊपर लिखे इस वर्णन को पहली बार पढ़ने पर तो शायद आपको कुछ ज्यादा समझ नहीं आएगा, लेकिन अगर यह बताया जाए कि यह &#8216;पायलट लॉग बुक&#8217; (किसी भी विमान चालक द्वारा उड़ान के गंतव्य, प्रस्थान व आगमन के समय आदि [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd10_jrd_on_throttle.jpg" alt="यूं हुआ देश में विमान सेवाओं का जन्म" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3140" /><span class="dropcap">दि</span>संबर 7, 1937। विमान प्रकार-वेको.सी-6 । इंजिन प्रकार जाकोबो; एच.डी.-225 । बंबई से इंदौर-उड़ान समय 2 घंटे 20 मिनट। वापसी दिसंबर 8 इंदौर से बंबई, समय 2 घंटे 15 मिनट। सहचालक नेविल विन्टसेन्ट के साथ। आधा उड़ान समय दर्ज।</p>
<p>ऊपर लिखे इस वर्णन को पहली बार पढ़ने पर तो शायद आपको कुछ ज्यादा समझ नहीं आएगा, लेकिन अगर यह बताया जाए कि यह <em>&#8216;पायलट लॉग बुक&#8217;</em> (किसी भी विमान चालक द्वारा उड़ान के गंतव्य, प्रस्थान व आगमन के समय आदि के विवरण को दर्ज करने की पुस्तिका) का एक पन्ना है, तो शायद स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। आपको यह जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि यह विवरण किसी साधारण पायलट की &#8216;<em>लॉग बुक</em>&#8216; का नहीं, बल्कि भारत में उड्‌डयन के प्रणेता, भारत रत्न जे.आर.डी. (जहांगीर रतनजी दादाभाई) टाटा की ऐतिहासिक <em>&#8216;लॉग बुक&#8217;</em> से है। जे.आर.डी. की &#8216;<em>पायलट लॉग बुक</em>&#8216; और उसमें इंदौर का जिक्र, वह भी ठेठ 1937 का? थोड़ा सब्र कीजिए।</p>
<p>भारत में हवाई डाक सेवा का शुभारंभ 15 अक्टूबर 1932 को हुआ था, जब कराची (विभाजन से पूर्व भारत में) से अहमदाबाद होते हुए बंबई की उड़ान भरकर जे.आर.डी. टाटा ने इतिहास रचा था।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">दी इंडियन नेशनल एअरवेज ने प्रस्तावित विमानतल पर रात्रि में विमानों के उतरने से संबंधित सुविधाओं की व्यवस्था करने के लिए शासन से निवेदन किया है<span></span></div>
<p>उस उड़ान के कुछ ही समय पहले जे.आर.डी. और उनके &#8216;<em>नेविल विन्टसेन्ट</em>&#8216; के संयुक्त प्रयासों के बाद टाटा एअर लाइंस का जन्म हुआ था। वह उद्‌घाटन उड़ान टाटा एअर लाइंस के ही विमान &#8216;डी. हैवीलैण्ड पस मोथ&#8217; में पायलट के रूप में जे.आर.डी. टाटा ने 6 घंटे 50 मिनट में पूरी की थी।</p>
<p>वैसे मूलभूत योजना कुछ इस प्रकार थी कि तत्कालीन इंपीरियल एयरवेज लंदन से कराची तक हवाई डाक सेवा का संचालन कर रही थी। उसी सेवा से पूरे भारत को जोड़ने के लिए कराची से अहमदाबाद होते हुए बंबई और फिर बंबई से बेलारी होते हुए मद्रास विमान से डाक और थोड़े ही समय बाद यात्रियों को ले जाने का सिलसिला प्रारंभ हुआ। धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्से भी विमान सेवा के जरिये जुड़ने लगे।</p>
<p>इसी तारतम्य में इंदौर में भी हवाई पट्‌टी निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। सन्‌ 1934 की होल्कर स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट जिसके प्रमुख अंश इंदौर गजेटियर में उद्‌धृत हैं, के अनुसार, &#8216;मेसर्स टाटा एंड संन्स, विमान विभाग (टाटा एअर लाइंस का प्रारंभिक स्वरूप) के मिस्टर विन्टसेन्ट से परामर्श करने के बाद विमानतल के निर्माण के लिए बिजासनी स्थल को चुना गया। संपूर्ण योजना मंजूर कर दी गई है। लागत का अनुमान 1,84,092 रुपए है। प्रथमावास्था में 14,500 रुपए की अनुमानित लागत से एक विमान-शाला (हेंगर) के लिए भी व्यवस्था की गई है।&#8217;</p>
<p><strong>1 फरवरी, 1935</strong> को कमांडर वॉट, विमानतल अधिकारी, कराची ने स्थल का निरीक्षण किया और अपने सुझावों सहित प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसे तत्कालीन सरकार ने स्वीकृति प्रदान कर 2,20,488 रुपए की राशि मंजूर कर दी। कमांडर वॉट के प्रतिवेदन में भी रात्रि अवतरण-क्षेत्र का जिक्र था। वहीं दूसरी ओर 1936 के आते टाटा एअर लाइंस में नए अमेरिकी &#8216;वेको वाय.क्यू.सी.-6&#8242; विमान का आगमन हो गया। ब्रिटिश &#8216;पस मोथ&#8217; के 120 हॉर्स पॉवर शक्ति वाले इंजिन के मुकाबले &#8216;<em>वेको</em>&#8216; की इंजिन 225 हॉर्स पॉवर की थी। यह &#8216;पथ मोथ&#8217; से एक और मायने में बेहतर था- &#8216;पस मोथ&#8217; के इंजिन को स्वयं चालक को हाथ से घुमाकर शुरू करना पड़ता था, जबकि &#8216;<em>वेको</em>&#8216; में यह व्यवस्था स्वचालित थी। इसी &#8216;<em>वेको</em>&#8216; के आगमन के पश्चात टाटा एअर लाइंस ने दिल्ली से ग्वालियर, भोपाल और इंदौर होते हुए बंबई के लिए हवाई डाक सेवा प्रारंभ करने का विचार बनाया। चूंकि उस वक्त टाटा एअर लाइंस में सिर्फ तीन ही पायलट थे (जे.आर.डी., विन्टसेन्ट और होमी भरूचा), इसलिए जे.आर.डी. को भी विमान चालन का काफी भार उठाना पड़ा था।</p>
<p><strong>9 नवंबर, 1937</strong> को दिल्ली से बंबई की उद्‌घाटन उड़ान को बिदा करने के लिए दिल्ली की वेलिंगटन हवाई पट्‌टी पर खासी भीड़ जमा थी। टाटा लाइंस के दो विमानों से उस सेवा की शुरुआत हुई, जिसमें से एक नेविल विन्टसेन्ट उड़ा रहे थे। उस विमान में 3,500 चिटि्‌ठयां और एक यात्री बैठा था। दूसरे विमान में तीन पत्रकार थे। रेशम की चार नीली सुनहरी थैलियों में तत्कालीन वाइसराय द्वारा तीनों रियासतों के प्रमुखों और बंबई के गवर्नर के लिए शुभकामना संदेश थे। पूरे समारोह की रपट रेडियो से प्रसारित की गई थी। उद्‌घाटन सेवा में कुल उड़ान समय 6 घंटे 15 मिनट का रहा। यानी, 10000 करोड़ रुपए से भी अधिक कारोबार वाले समूह का प्रमुख तब इंदौर सिर्फ &#8216;डाकिए&#8217; के रूप में आता था। हां, इसमें उसकी पूर्ण स्वेच्छा थी, कोई मजबूरी नहीं। उपरोक्त संदर्भ के साथ उल्लेखनीय है कि इंदौर में नियमित हवाई सेवा 26 जुलाई, 1948 को प्रारंभ हुई। यहां यह भी विचारणीय है कि जिस रात्रि विमान सेवा हेतु विमानतल को सुसज्जित करने का प्रावधान सन्‌ 1935 में बना था और जिसे शासन की मंजूरी भी मिल गई थी, उसे नागरिक विमानन सेवा में लागू होते-होते 53 साल लग गए, जब 20 अप्रैल 1988 को इंदौर हवाई अड्‌डे पर रात्रि विमान सेवा की अंतिम रिहर्सल की गई।</p>
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		<title>समय की पाबंदी</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:43:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
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		<category><![CDATA[टाटा एअर लाइंस]]></category>
		<category><![CDATA[वायुसेवा]]></category>
		<category><![CDATA[विमान सेवा]]></category>
		<category><![CDATA[हवाई डाक सेवा]]></category>

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		<description><![CDATA[भारत में नागरिक उड्‌डयन के जनक जे.आर.डी. टाटा के अनुसार एक अच्छी विमान सेवा की सबसे पहली पहचान है- समय की पाबंदी। अगर अन्य साधनों से अधिक पैसा खर्च करके भी यात्री समय पर अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सकते तो फिर वायुसेवा का क्या औचित्य रह जाता है? नागरिक उड्‌डयन निदेशालय द्वारा 1933-34 में जारी रिपोर्ट में टाटा एअर लाइंस के कार्यकलापों का वर्णन कुछ इस प्रकार था। &#8216;हवाई डाक सेवा के आदर्श संचालन के लिए एक मिसाल के [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd4_jrd_in_office_air_india.jpg" alt="समय की पाबंदी" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3138" /><span class="dropcap">भा</span>रत में नागरिक उड्‌डयन के जनक जे.आर.डी. टाटा के अनुसार एक अच्छी विमान सेवा की सबसे पहली पहचान है- समय की पाबंदी। अगर अन्य साधनों से अधिक पैसा खर्च करके भी यात्री समय पर अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सकते तो फिर वायुसेवा का क्या औचित्य रह जाता है?</p>
<p>नागरिक उड्‌डयन निदेशालय द्वारा 1933-34 में जारी रिपोर्ट में टाटा एअर लाइंस के कार्यकलापों का वर्णन कुछ इस प्रकार था। &#8216;हवाई डाक सेवा के आदर्श संचालन के लिए एक मिसाल के रूप में हम टाटा एअर लाइंस की सेवाओं की प्रशंसा करते हैं, जिन्होंने 10 अक्टूबर 1933 को सदा की तरह समय पर कराची पहुंचकर कामकाज का एक वर्ष सौ फीसदी समय की पाबंदी का पालन करते हुए पूर्ण किया है। प्रकृति की विषम परिस्थितियों-आंधी, तूफान, मूसलधार वर्षा में जब पश्चिमी घाटों के ऊपर हवाई उड़ान अत्यंत दुष्कर और</p>
<div class="simplePullQuoteRight">पचास के दशक में एक बार जिनेवा में एक स्विस नागरिक ने दूसरे से पूछा, &#8216;भाई, इस वक्त क्या बजा है?&#8217; दूसरे ने तुरंत खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा, <em>&#8216;ठीक 11 बजे हैं&#8217;</em> पहले ने पूछा, &#8216;<em>पर आपने घड़ी तो देखी ही नहीं।</em>&#8216; दूसरे बोला, &#8216;एअर इंडिया का विमान अभी-अभी उतरा है, इसलिए ठीक 11 ही बजे हैं।&#8217;<span></span></div>
<p>जोखिमभरा कार्य था, उन हालातों के बावजूद एक बार भी बंबई से मद्रास डाक पहुंचने में देर नहीं हुई। लेटलतीफ इंपीरियल एयरवेज को अपने कर्मचारियों को समय की पाबंदी सीखने के लिए टाटा एअर लाइंस <em>&#8216;डेपुटेशन&#8217;</em> पर भेजना चाहिए।&#8217;</p>
<p>पचास के दशक में एक बार जिनेवा में एक स्विस नागरिक ने दूसरे से पूछा, <em>&#8216;भाई, इस वक्त क्या बजा है?&#8217;</em> दूसरे ने तुरंत खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा, &#8216;<em>ठीक 11 बजे हैं।</em>&#8216; पहले ने पूछा, <em>&#8216;पर आपने घड़ी तो देखी ही नहीं।&#8217;</em> दूसरे बोला, &#8216;एअर इंडिया का विमान अभी-अभी उतरा है, इसलिए ठीक 11 ही बजे हैं।&#8217; और वर्तमान में भारत की नागरिक विमान सेवाओं की <em>&#8216;समय की पाबंदी&#8217;</em> के शब्दों में, &#8216;आजकल तो भारत में कई बार विमान गंतव्य पर पहुंचने के उनके निर्धारित समय तक तो &#8216;<em>टेक-ऑफ</em>&#8216; ही नहीं करते हैं। जब उड़ान ही नहीं भरी तो फिर पहुंचने के समय का क्या ठिकाना?&#8217;</p>
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		<title>जे.आर.डी. की उड़ान</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:37:05 +0000</pubDate>
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				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
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		<category><![CDATA[टाटा एअरक्राफ्ट]]></category>
		<category><![CDATA[सबसे ऊंची उड़ान]]></category>

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		<description><![CDATA[जीवन में पांच वर्ष की अबोध अवस्था से अस्सी बसंत की सुदीर्घ आयु तक कैसे कोई अगाध प्रेम की दास्तां के उन्माद का चंद शब्दों में वर्णन कर सकता है? जे.आर.डी. और &#8216;एविएशन&#8217; की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। नीचे इस ऐतिहासिक सफर की उन चुनिंदा तारीखों का जिक्र है जो जे.आर.डी. की उड़ान के साथ भारत के उड्‌डयन इतिहास की भी सबसे ऊंची उड़ान हैं। 1929 22 जनवरी : जे.आर.डी. टाटा की पहली प्रशिक्षण उड़ान 3 फरवरी : [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd1_50yrsinflight.png" alt="जे.आर.डी. की उड़ान" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3130" /><span class="dropcap">जी</span>वन में पांच वर्ष की अबोध अवस्था से अस्सी बसंत की सुदीर्घ आयु तक कैसे कोई अगाध प्रेम की दास्तां के उन्माद का चंद शब्दों में वर्णन कर सकता है? जे.आर.डी. और <em>&#8216;एविएशन&#8217;</em> की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। नीचे इस ऐतिहासिक सफर की उन चुनिंदा तारीखों का जिक्र है जो जे.आर.डी. की उड़ान के साथ भारत के उड्‌डयन इतिहास की भी सबसे ऊंची उड़ान हैं।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1929</b></span></p>
<p><strong>22 जनवरी</strong> : जे.आर.डी. टाटा की पहली प्रशिक्षण उड़ान</p>
<p><strong>3 फरवरी</strong> : जे.आर.डी. टाटा की जुहू हवाई हवाई पट्‌टी, बंबई से पहली &#8216;<em>सोलो</em>&#8216; (एकल) उड़ान</p>
<p><strong>10 फरवरी</strong> : जे.आर.डी. को पायलट लाइसेंस प्राप्त।</p>
<p><strong>17 मई</strong> : लंदन से फ्रांस के बीच जे.आर.डी. की &#8216;<em>पायलट</em>&#8216; के रूप में पहली अंतरराष्ट्रीय उड़ान।</p>
<p><strong><span style="text-decoration: underline;">1930</span></strong></p>
<p><strong>3 मई</strong> ड्रिग रोड, कराची से उड़ान भरकर जे.आर.डी. द्वारा आगा खां प्रतियोगिता (भारत से इंग्लैंड) जीतने का प्रयास</p>
<div class="simplePullQuoteRight">जे.आर.डी. की उड़ान के साथ भारत के उड्‌डयन इतिहास की भी सबसे ऊंची उड़ान<span></span></div>
<p><strong>12 मई</strong> : क्रायडन, लंदन पहुंचकर प्रतियोगिता मार्ग संपूर्ण, किंतु पुरस्कार एस्पी इंजीनियर को।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1932</b></span></p>
<p><strong>24 अप्रैल</strong> : जे.आर.डी. व नेविल विन्टसेन्ट के प्रयासों के फलस्वरूप टाटा एअर लाइंस और ब्रिटिश सरकार के बीच कराची-बंबई-मद्रास हवाई डाक सेवा प्रारंभ करने हेतु समझौते पर हस्ताक्षर।</p>
<p><strong>15 अक्टूबर</strong> : जे.आर.डी. द्वारा प्रातः 6 बजकर 35 मिनट पर कराची से अहमदाबाद होते हुए बंबई के लिए उड़ान भरकर भारत में हवाई डाक सेवा का शुभारंभ। कुछ दिनों बाद यात्री सेवा भी प्रारंभ।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1937</b></span></p>
<p><strong>6 नवंबर</strong> : टाटा एअर लाइंस द्वारा दिल्ली-ग्वालियर, भोपाल-इंदौर-बंबई उड़ान सेवा का प्रारंभ। कुल उड़ान समय 6 घंटे 15 मिनट।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1942</b></span></p>
<p><strong>मार्च</strong> : भारत में विमान निर्माण हेतु टाटा एअरक्राफ्ट कंपनी का जन्म, किंतु ब्रिटिश सरकार के असहयोग के कारण योजना सफल नहीं।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1943</b></span></p>
<p>योरप में विमान दुर्घटना में नेविल विन्टसेन्ट की मृत्यु।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1946</b></span></p>
<p>टाटा एअरलाइंस (अभी तक टाटा सन्स का ही एक निजी प्रभाग) सार्वजनिक निर्गम के बाद एअर इंडिया लिमिटेड के नाम से ज्वाइंट स्टॉक कंपनी में तब्दील, जे.आर.डी. टाटा कंपनी के अध्यक्ष।</p>
<p><strong>26 अक्टूबर</strong> : &#8216;<em>अयाटा</em>&#8216; (इंटरनेशनल एअर ट्रेफिक एसोसिएशन) की दूसरी सामान्य बैठक में भाग लेने जे.आर.डी. टाटा काहिरा में।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><b>1948</b></span></p>
<p><strong>8 मार्च</strong> : जे.आर.डी. की पहल पर सरकार द्वारा अप्रत्याशित रूप से तुरंत स्वीकृति के पश्चात भारत सरकार (49 प्रतिशत), टाटा घराने (25 प्रतिशत) और सामान्य जनता (26 प्रतिशत) की भागीदारी से भारत की सर्वप्रथम संयुक्त क्षेत्र की कंपनी एअर इंडिया इंटरनेशनल का जन्म।</p>
<p><strong>8 जून</strong> : &#8216;<em>मलाबार प्रिंसेस</em>&#8216; नामक लोकहीड कॉन्सटेलेशन 749 विमान द्वारा एअर इंडिया इंटरनेशनल की पहली उड़ान बंबई से काहिरा, रोम और जिनेवा होते हुए लंदन के लिए रवाना। उद्‌घाटन उड़ान के यात्रियों में एअर इंडिया इंटरनेशनल के अध्यक्ष जे.आर.डी. टाटा भी।</p>
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		<title>जीवन का चरमोत्कर्ष : मेरी पहली &#8216;सोलो&#8217; उड़ान</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:35:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[जेआरडी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा एअर लाइंस]]></category>
		<category><![CDATA[विश्व युद्ध]]></category>
		<category><![CDATA[सोलो उड़ान]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ वर्षों पूर्व एक पत्रकार ने जहांगीर रतनजी दादाभाई (जे.आर.डी.) से पूछ था- आपके जीवन के सबसे अनमोल क्षण कौन-से हैं? जे.आर.डी. की आंखों में चमक आ गई और उन्होंने तुरंत जवाब दिया, &#8216;मेरी पहली सोलो (एकल) उड़ान से ज्यादा खुशी और संतुष्टि मुझे कभी नहीं हुई।&#8216; जेआरडी टाटा जैसे व्यापक और बहुआयामी जीवन व्यतीत करने वाले बिरले ही होते हैं,परंतु विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े रहने के बावजूद वह क्षेत्र एक या दो ही होते हैं, जिनमें संलग्न होकर वह [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd2_inaugaralFlight.jpg" alt="जीवन का चरमोत्कर्ष : मेरी पहली 'सोलो' उड़ान" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3128" /><span class="dropcap">कु</span>छ वर्षों पूर्व एक पत्रकार ने जहांगीर रतनजी दादाभाई (जे.आर.डी.) से पूछ था- आपके जीवन के सबसे अनमोल क्षण कौन-से हैं? जे.आर.डी. की आंखों में चमक आ गई और उन्होंने तुरंत जवाब दिया, &#8216;<em>मेरी पहली सोलो (एकल) उड़ान से ज्यादा खुशी और संतुष्टि मुझे कभी नहीं हुई।</em>&#8216; जेआरडी टाटा जैसे व्यापक और बहुआयामी जीवन व्यतीत करने वाले बिरले ही होते हैं,परंतु विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े रहने के बावजूद वह क्षेत्र एक या दो ही होते हैं, जिनमें संलग्न होकर वह व्यक्ति &#8216;<em>आत्मिक शांति और तृप्ति</em>&#8216; की अनुभूति प्राप्त करता है। जेआरडी भी इससे विलग नहीं हैं। जो आनंद उन्हें स्वच्छंद हवा में उड़ान भरने अथवा दूधिया, बर्फीली पहाड़ियों में <em>&#8216;स्कीइंग&#8217;</em> करने में आता है, वह अन्य किसी गतिविधि में नहीं।</p>
<p>वायुयान से अपने पहले परिचय के बारे में याद करते हुए जेआरडी कहते हैं, <em>&#8216;बचपन में, जब मेरी उम्र 7-8 वर्षों की रही होगी, तब फ्रांस में प्रथम विश्व युद्ध के पहले मेरा वायुयानों से सरोकार हुआ था।&#8217;</em> वायुयान और जेआरडी के आपसी रिश्तों को अगर &#8216;पहली नजर में प्यार&#8217; कहा जाए तो कदापि अतिशयोक्ति नहीं होगी। हां, सामान्य तौर पर घटने के बजाय समय के साथ-साथ यह &#8216;<em>प्यार</em>&#8216; बढ़कर &#8216;<em>दीवानगी</em>&#8216; की हद तक पहुंच गया था। जेआरडी के पिता रतनजी दादाभाई टाटा का फ्रांस में नार्मेन्डी के पास इंग्लिश चैनल के तट पर हार्डिलोट कस्बे में &#8216;<em>लॉ-मस्कोट</em>&#8216; नामक एक छोटा-सा ग्रीष्मकालीन निवास था। इत्तिफाक से, इंग्लिश चैनल को वायुयान से पार करने वाले सबसे पहले व्यक्ति लुई ब्लेरियट ने भी छुटि्‌टयां बिताने के लिए अपना एक घर वहां बनाया था। पड़ोसी होने की वजह से दोनों परिवारों के सदस्यों, खासकर बच्चों में अच्छी दोस्ती हो गई थी।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">इसी आगा खां प्रतियोगिता के दौरान जेआरडी ने अपनी खिलाड़ी भावना का अप्रतिम परिचय दिया<span></span></div>
<p>कभी-कभी ब्लेरियट के वायुयान वहीं समुद्र तट पर उतरते थे। उन्हें उड़ाने वाला &#8216;पायलट&#8217; ब्लेरियट तो नहीं, बल्कि अडोल्फ पीगोड था, जिसने वायुयान से जांबाज कलाबाजियां प्रदर्शित कर सभी को हतप्रभ कर दिया था। इसी जांबाज उड़ाकू के करतबों को नियमित तौर पर देखते हुए बालक जहांगीर के मन में भी &#8216;<em>प्लेन</em>&#8216; में घूमने की इच्छा प्रबल होती गई। प्रथम विश्व युद्ध के बाद फ्रांस में कई &#8216;<em>पायलट</em>&#8216; अपने वायुयानों में नागरिकों को बैठाकर हवाई यात्रा का आनंद (जॉय-राइड) दिया करते थे। ऐसी ही एक हवाई &#8216;<em>जॉय राइड</em>&#8216; के लिए बालक जहांगीर ने एक बार अपने पिता से जिद पकड़ ली। बालहठ के आगे पिता आर.डी. टाटा को न चाहते हुए भी हामी भरनी पड़ी। &#8216;उस दिन मैं पहली बार वायुयान में बैठकर आसमान में उड़ा था। मुझे पूरा विश्वास है कि जब तक हमारा प्लेन सकुशल उतर नहीं गया, मेरे पिताजी ने सिर्फ भगवान को ही याद किया होगा। उस वक्त मैं सिर्फ 15 वर्ष का था और मेरा विचार पक्का हो चुका था- मैं पायलट (विमान चालक) बनना चाहता था।&#8217;</p>
<p>जिस वक्त जे.आर.डी. फ्रांस में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, उसी समय भारत में एक दूरदर्शी व्यवसायी और समाजसेवी, सर विक्टर सेसून के प्रयासों से बंबई फ्लाइंग क्लब की शुरुआत भी हो चुकी थी। मछुआरों की बस्ती जुहू के निकट अरब महासागर के तट पर हवाई पट्‌टी तैयार की गई। ब्रिटिश जलसेना से जुड़े रहे पायलट ई.डी. कमिंग्स को बंबई फ्लाइंग क्लब में प्रशिक्षक नियुक्त किया गया। जिस समय जे.आर.डी. फ्रांस से भारत आए, तब तक कमिंग्स के प्रशिक्षण में कुछ इच्छुकों का विमान चालन प्रशिक्षण प्रारंभ हो चुका था।</p>
<p><strong>22 जनवरी 1929</strong> को 25 वर्षीय युवक जे.आर.डी. ने बंबई फ्लाइंग क्लब में अपनी पहली &#8216;<em>पायलट लॉग बुक</em>&#8216; (चालक द्वारा रखा जाने वाला उड़ान के समय, स्थान, तारीख और विशेष घटनाओं का लेखा-जोखा) प्राप्त की और उसी दिन <em>&#8216;वी.टी.-ए.ए.ई.&#8217;</em> नामांकन वाले &#8216;डी-हैवीलैंड मोथ&#8217; विमान में ई.डी. कमिंग्स ने जेआरडी को 20-30 मिनट की उड़ान के दौरान पहला पाठ सिखाया। अपनी पहली प्रशिक्षण उड़ान के बाद सिर्फ एक ही पखवाड़ा बीतते वह स्वर्णिम दिन आ गया, जो जे.आर.डी. के सिर्फ &#8216;<em>ऐविएशन</em>&#8216; पहलू ही नहीं, वरन्‌ 88 बसंत के पूरे जीवन का चरमोत्कर्ष था। महज 3 घंटे 45 मिनट की युगल प्रशिक्षण उड़ानों के बाद अमेरिकन प्रशिक्षक ए.ई. एल्टन और कमिंग्स ने जे.आरडी. को अपनी पहली &#8216;सोलो&#8217; (एकल) उड़ान की इजाजत दे दी।</p>
<p><strong>3 फरवरी 1929</strong>, पूर्वाह्न, जुहू हवाई पट्‌टी के पूर्वी &#8216;<em>टू-सेवन</em>&#8216; छोर से <em>&#8216;डी.एच. मोथ&#8217;</em> विमान पश्चिम की ओर मुड़कर उड़ान भरने के लिए तैयार खड़ा था। विमान में सवार एकमात्र युवक, जो कि उसका चालक भी था, ने मानसिक तौर पर अपने सभी विमान चालन के पाठों को याद किया, मंद गति से विमान को &#8216;रन-वे&#8217; पर आगे बढ़ाते हुए &#8216;<em>कंट्रोल-स्टिक</em>&#8216; पर संचालन बनाए रखते हुए जमीन के स्पर्श से विलग होते हुए विमान को नभ-पथ पर अग्रसर कर दिया।</p>
<p>10 मिनट की पहली एकल उड़ान के बाद जब विमान चालक ने अपने प्रशिक्षक की ओर देखा तो उनकी आंखों से उसे संतोष दिखाई पड़ा। जेआरडी की उस 10 मिनट की संक्षिप्त &#8216;<em>सोलो</em>&#8216; उड़ान के दूरगामी महत्व का सबसे उपयुक्त वर्णन शायद चंद्र-विजयी नील आर्मस्ट्रांग के उस ध्रुव-वाक्य से मिला-जुला हो सकता है, &#8216;एक इंसान के लिए एक छोटी-सी उड़ान थी, मगर इंसानियत के लिए वह एक दूरगामी हवाई सफर था।&#8217; अगले सात दिनों तक जेआरडी ने एकल उड़ानें भरकर अपना अनुभव व विश्वास बढ़ाया और 10 फरवरी 1929 को 45 मिनट की &#8216;सोलो&#8217; उड़ान के पश्चात विमान चालक (पायलट) का लाइसेंस प्राप्त करने की पात्रता अर्जित कर ली थी।</p>
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