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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल&#187; डॉट कॉम</title>
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		<title>फ्री ई-मेल सुविधा : अब दिन गिनती के हैं</title>
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		<pubDate>Tue, 24 Jul 2001 11:07:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[अमेरिकी अर्थव्यवस्था]]></category>
		<category><![CDATA[ई-मेल]]></category>
		<category><![CDATA[डॉट कॉम]]></category>
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		<category><![CDATA[माइक्रोसॉफ्ट]]></category>
		<category><![CDATA[याहू डॉट कॉम]]></category>
		<category><![CDATA[हॉटमेल डॉट कॉम]]></category>

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		<description><![CDATA[अब इंटरनेट कमाने की राह पर आगे बढ़ रहा है। यहां विश्व के प्रमुख ई-मेल सेवा प्रदाताओं से संकेत मिले हैं कि वे करोड़ों डॉलर खर्च करके इसे मुफ्त में उपलब्ध कराने के लिए तैयार नहीं हैं। ई-मेल सेवाओं को शुल्क (भुगतान) आधारित सेवाएं बनाने की सुगबुगाहट से विश्व के 400 मिलियन मेल प्रेमियों में चिंता है। दूसरी ओर लाखों यूजर्स को मेल सेवा देने में लगी डॉट कॉम कंपनियां इस बात को लेकर उत्साहित भी हैं कि उन्हें बहुप्रतीक्षित [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1518" alt="फ्री ई-मेल सुविधा : अब दिन गिनती के हैं" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2001/07/35.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">अ</span>ब इंटरनेट कमाने की राह पर आगे बढ़ रहा है। यहां विश्व के प्रमुख ई-मेल सेवा प्रदाताओं से संकेत मिले हैं कि वे करोड़ों डॉलर खर्च करके इसे मुफ्त में उपलब्ध कराने के लिए तैयार नहीं हैं। ई-मेल सेवाओं को शुल्क (भुगतान) आधारित सेवाएं बनाने की सुगबुगाहट से विश्व के 400 मिलियन मेल प्रेमियों में चिंता है। दूसरी ओर लाखों यूजर्स को मेल सेवा देने में लगी डॉट कॉम कंपनियां इस बात को लेकर उत्साहित भी हैं कि उन्हें बहुप्रतीक्षित &#8216;<em>रेवेन्यू मॉडल</em>&#8216; मिल रहा है।</p>
<p><b>बिल्ली के गले में कौन बांधे घंटी </b><b>? </b></p>
<p>&#8216;ई-मेल सेवा प्रदाताओं में आम सहमति तो बन गई कि &#8216;<em>ई-मेल यूजर्स को इतनी त्वरित सेवा पाने के लिए कुछ राशि तो खर्च करना पड़ेगी</em>&#8216;, लेकिन इस निर्णय को कौन लागू करे? यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न था। विश्व के अग्रणी सेवा प्रदाताओं जैसे हॉटमेल डॉट कॉम, याहू डॉट कॉम तथा यूएसए डॉट नेट में इस बात पर कोई सहमति नहीं हो सकी कि वे ई-मेल सेवा को रातोंरात एक साथ भुगतान योग्य सेवा के रूप में परिवर्तित कर दें। आखिर यह निर्णय लेने का साहस सबसे पहले यूएसए डॉट नेट ने लिया। यूएसए डॉट नेट, जो एक बड़ी ई-मेल सेवा मानी जाती है, ने फैसला किया है कि वह 31 जुलाई से अपने सभी ग्राहकों से 30 डॉलर प्रतिवर्ष के हिसाब से शुल्क लेगी।</p>
<p>भारत में यह साहसिक (संभवतः आत्मघाती भी) कदम उठाने का फैसला किया 123 इंडिया डॉट कॉम ने। इसने अपनी ई-मेल सेवाओं को अति त्वरित और तमाम सुविधाओं के साथ प्रदान करने का वादा करते हुए अपने 2 मिलियन यूजर्स को एक संदेश द्वारा सूचित कर दिया कि वे भुगतान करने के लिए तैयार रहें। कंपनी ने ग्राहकों से 1 अगस्त के बाद छह महीने के लिए 599 रुपए तथा एक वर्ष के लिए 999 रुपए फीस के रूप में शुल्क लेने का फैसला किया। भारतीय संदर्भ में ई-मेल की आवश्यकता तथा तमाम अन्य फ्री मेल की सुविधा को देखते हुए यह राशि कुछ ज्यादा लगती है। यह तो समय ही बताएगा कि 123 इंडिया डॉट कॉम को कहां तक सफलता मिलती है या फिर उसके ग्राहक किसी अन्य फ्री मेल सेवा में पंजीबद्ध होने के लिए निकल पड़ते हैं।</p>
<p><b>बड़े खिलाड़ी </b><b>&#8216;</b><b>देखो और इंतजार करो</b><b>&#8216; </b><b>की मुद्रा में </b></p>
<p>विश्व के जाने पहचाने ई-मेल सेवा प्रदाताओं ने अभी &#8216;<em>देखो और इन्तजार करो</em>&#8216; की नीति अपना रखी है। यहां खबर है कि याहू ने यूजर्स का रुख जानने के लिए एक निश्चित जगह से ज्यादा जगह लेने पर &#8216;<em>सर्वर स्पेस</em>&#8216; के लिए अतिरिक्त शुल्क लेना शुरू कर दिया है। याहू को उम्मीद है कि इस तरह की सेवाओं को कम्पनियां जरूर काम में लेंगी। उल्लेखनीय है कि अमेरिका की सबसे बड़ी इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी अमेरिकन ऑन लाइन (एओएल) डॉट कॉम अपने ग्राहकों से पहले ही शुल्क लेती रही है।</p>
<div class="simplePullQuoteRightGolden">विश्व के जाने पहचाने ई-मेल सेवा प्रदाताओं ने अभी ‘देखो और इन्तजार करो’ की नीति अपना रखी है<span></span></div>
<p><b>माइक्रोसॉफ्ट की योजना </b></p>
<p>यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि माइक्रोसॉफ्ट अपनी बिजनेस नीति के अनुसार ही पहले अपनी सेवाओं को सुधारने की इच्छुक है। उसका मानना है कि ई-मेल पर शुल्क लगने के बाद मुफ्त में मेल करने वाले यूजर्स उसकी वेबसाइट पर रजिस्टर्ड होंगे। उन्हें वह कुछ दिनों तक अच्छी सेवा देकर बाद में &#8216;<em>पेड ई-मेल</em>&#8216; का रास्ता दिखा देगी।</p>
<p><b>क्या लोग पैसा देंगे</b><b>? </b></p>
<p>यह सवाल हर किसी की जुबान पर है। ई-मेल अति उपयोगी सेवा है, लेकिन क्या यह सेवा इतनी आवश्यक हो गई है कि लोग इसके लिए शुल्क देंगे? अमेरिका के लोग इसके लिए नाममात्र के भुगतान के लिए तैयार हो सकते हैं, बशर्ते उन्हें बेहतर गुणवत्ता की सेवाएं मिलें। भारत में यूजर्स की यह मानसिकता कम से कम अभी तक बनती दिखाई नहीं देती। उसका एक और कारण है कि &#8216;<em>फ्री ई-मेल</em>&#8216; देने वाली अनगिनत वेबसाइट्‌स मौजूद हैं। एक बंद होती है तो दो नई शुरू हो जाती हैं। अमेरिका में &#8216;<em>वाल स्ट्रीट जरनल</em>&#8216; तथा &#8216;<em>इकोनॉमिस्ट</em>&#8216; जैसे अखबारों में अपनी चयनित तथा विशेष सामग्री को पहले दिन से ही न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध कराया था। आज इस मॉडल की ओर सारी डॉट कॉम कंपनियों की निगाहें हैं, लेकिन माइक्रोसॉफ्ट की पत्रिका स्लेट डॉट कॉम को शुल्क आधारित बनाने का प्रयास पूरी तरह से असफल साबित हुआ।</p>
<p><b>भुगतान के माध्यम की समस्या </b></p>
<p>भुगतान किस रूप में हो, इस पर भी बड़े विवाद हैं। यूएसए डॉट नेट ने भुगतान को क्रेडिट कार्ड के जरिये स्वीकार करने का फैसला किया है, लेकिन अमेरिका के बाहर कितने लोगों के पास क्रेडिट कार्ड हैं? भारत में क्रेडिट कार्ड को भुगतान का माध्यम बनने में अभी कम से कम दो वर्ष और लगेंगे, लेकिन डॉट कॉम विशेषज्ञों का मानना है कि 2002 के गुजरते ही &#8216;<em>फ्री ई-मेल</em>&#8216; का जमाना भी गुजर जाएगा।</p>
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		<title>डॉट कॉम युग की सुनहरी दास्तान अब रजत पटल पर &#8211; &#8216;स्टार्टअप डॉट कॉम&#8217;</title>
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		<pubDate>Sun, 20 May 2001 06:05:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[हॉलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[इंटरनेट]]></category>
		<category><![CDATA[गोवर्क्स डॉट कॉम]]></category>
		<category><![CDATA[डॉट कॉम]]></category>
		<category><![CDATA[स्टार्टअप डॉट कॉम फिल्म]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले 4 साल विश्व के औद्‌योगिक इतिहास में &#8216;डॉट कॉम&#8217; युग के नाम से ही जाने जाएंगे, जब &#8216;सपने सच हुए&#8217; वाली कहानियों ने सारे विश्व को अचंभित कर रखा था। इस पूरे आंदोलन पर दर्जनों किताबें, सैकड़ों पत्रिकाएं और हजारों कॉलम लिखे गए और पिछले सप्ताह इस डॉटकॉम युग पर बनी पहली फिल्म &#8216;स्टार्टअप डॉट कॉम&#8217; भी रिलीज हो गई। इस फिल्म का घटनाक्रम भी अजीबो-गरीब है। एक सच्ची डॉट कॉम कंपनी गोवर्क्स डॉट कॉम की प्रारंभिक पीड़ा और [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2001/05/jm_n2_startup.jpg" alt="डॉट कॉम युग की सुनहरी दास्तान अब रजत पटल पर - 'स्टार्टअप डॉट कॉम'" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3172" /><span class="dropcap">पि</span>छले 4 साल विश्व के औद्‌योगिक इतिहास में &#8216;डॉट कॉम&#8217; युग के नाम से ही जाने जाएंगे, जब &#8216;सपने सच हुए&#8217; वाली कहानियों ने सारे विश्व को अचंभित कर रखा था। इस पूरे आंदोलन पर दर्जनों किताबें, सैकड़ों पत्रिकाएं और हजारों कॉलम लिखे गए और पिछले सप्ताह इस डॉटकॉम युग पर बनी पहली फिल्म &#8216;स्टार्टअप डॉट कॉम&#8217; भी रिलीज हो गई।</p>
<p>इस फिल्म का घटनाक्रम भी अजीबो-गरीब है। एक सच्ची डॉट कॉम कंपनी गोवर्क्स डॉट कॉम की प्रारंभिक पीड़ा और फिर मिली सफलता को डायरेक्टर और क्रिस हेगडस अपने घरेलू वीडियो कैमरे में कैद करने लगे। देखते-देखते उनके पास इस कंपनी के बारे में 400 घंटे से ज्यादा की शूटिंग जमा हो गई। और सबसे विस्मयादि ये कि शूटिंग के चलते-चलते ही डॉट कॉम युग ने पलटी मारी। गोवर्क्स डॉट कॉम के दिन भी फिर गए और कंपनी बंद होने की कगार पर आ गई। लेकिन शूटिंग जारी रही और उसी प्रयास को पर्दे पर पेश किया गया है स्टार्टअप डॉट कॉम नामक 2 घंटे की डॉक्यूमेंट्री में।</p>
<p><strong>फिल्म के सारे पात्र गोवर्क्स कंपनी के&#8230;</strong></p>
<div class="simplePullQuoteRightGreen">कंपनी में सिर्फ 6 महीने में 5 से 250 कर्मचारी, काम का बेहद तनाव, बिगड़ते पारिवारिक संबंध और करोड़पति बनने का सच होता सपना<span></span></div>
<p>चूंकि सारी शूटिंग रीयल लाइफ है, इसलिए फिल्म के सारे पात्र गोवर्क्स कंपनी के संस्थापक और कर्मचारी ही हैं। प्रमुख भूमिका में हैं स्टार्ट अप डॉट कॉम के असली संस्थापक खलील इजा तुस्मान और टॉम हेरमान। ये दोनों गहरे दोस्त हैं जो कंपनी को एक कमरे से 250 लोगों तक बढ़ा ले जाते हैं और अंत में उनमें इतने मतभेद हो जाते हैं कि एक संस्थापक दूसरे संस्थापक को कंपनी से बर्खास्त कर देता है।</p>
<p>डॉट कॉम कंपनियों की दुनिया से थोड़ा भी संपर्क में आए लोगों को फिल्म में बहुत अपनापन लगेगा। शुरू में एक सपना, (इसी कंपनी का सपना था कि अमेरिका में नागरिकों से संबंधित सारे सरकारी काम इंटरनेट और कंप्यूटर पर ही हो जाएँ) उस सपने के कारण अच्छी खासी नौकरी को तिलांजलि, महीनों तक वेंचर केपिटलिस्ट के चक्कर, फिर पैसा, कंपनी में सिर्फ 6 महीने में 5 से 250 कर्मचारी, काम का बेहद तनाव, बिगड़ते पारिवारिक संबंध और करोड़पति बनने का सच होता सपना और फिर एकदम तीव्र गति से सब कुछ चंद महीनों में ताश के पत्तों की तरह ढह गया</p>
<p>फिल्म आधारित तो है गोवर्क्स डॉट कॉम पर लेकिन अमेरिका की अधिकांश डॉट कॉम कंपनियों के संस्थापक ओैर कर्मचारियों की कहानी खालिल तुस्मान जैसी ही है। शुरू होती है फिल्म खालिल द्वारा गोल्डमैन शख्स के बढ़िया नौकरी को छोड़कर एक कमरे में गोवर्क्स डॉट कॉम शुरू करने से और खत्म होती है गोवर्क्स डॉट कॉम का किसी और कंपनी द्वारा अधिग्रहण कर लेने पर।</p>
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		<title>भारतीय नक्षत्रों का धरती पर समागम</title>
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		<pubDate>Mon, 08 May 2000 06:09:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[अमेरिका में भारत]]></category>
		<category><![CDATA[इंदौर]]></category>
		<category><![CDATA[ग्रहों के नक्षत्र]]></category>
		<category><![CDATA[टीआईई वार्षिक अधिवेशन]]></category>
		<category><![CDATA[टीआईई- कॉन 2000]]></category>
		<category><![CDATA[डॉट कॉम]]></category>
		<category><![CDATA[सिलिकॉन वैली]]></category>

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		<description><![CDATA[अमेरिका में वर्तमान तकनीकी प्रगति में भारतीयों की अहम भूमिका रही है। इसका प्रभाव और प्रभुत्व देखने के लिए 2000 में टीआईई का वार्षिक अधिवेशन बहुत उपयुक्त स्थान था। 5 मई को आकाश में ग्रहों और सूर्य के एक रेखा में आने की विलक्षण घटना के मानो एक ही दिन बाद धरती पर पुनरावृत्ति हो गई। अगर एक समय एक ही छत के नीचे सिकामोर के संस्थापक डॉ. गुरुराज देशपांडे, हेलथों के सहसंस्थापक पवन निगम, प्रख्यात वेंचर कैपिटलिस्ट और सन [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/05/JM_b_TiE.jpg" alt="भारतीय नक्षत्रों का धरती पर समागम" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3044" /><span class="dropcap">अ</span>मेरिका में वर्तमान तकनीकी प्रगति में भारतीयों की अहम भूमिका रही है। इसका प्रभाव और प्रभुत्व देखने के लिए 2000 में टीआईई का वार्षिक अधिवेशन बहुत उपयुक्त स्थान था। 5 मई को आकाश में ग्रहों और सूर्य के एक रेखा में आने की विलक्षण घटना के मानो एक ही दिन बाद धरती पर पुनरावृत्ति हो गई। अगर एक समय एक ही छत के नीचे सिकामोर के संस्थापक डॉ. गुरुराज देशपांडे, हेलथों के सहसंस्थापक पवन निगम, प्रख्यात वेंचर कैपिटलिस्ट और सन माइक्रोसिस्टम्स के सहसंस्थापक विनोद खोसला, इंटेल के विनोद धाम, मुकेश चत्तर, कंवल रेखी, राज वट्‌टीकुट्टी, प्रकाश भालेराव, एक्सोडस के संस्थापक बी.वी. जगदीश और के.बी. चंद्रशेखर, भारतीय अरबपति/करोड़पति (बिलिएनर/मिलिएनर) दिग्गजों की सूची तो इतनी लंबी है, जैसे पूरी सिलिकॉन वैली ही एक सभागार में समा गई थी। अवसर था सिलिकॉन वैली में 1994 से कार्यरत टीआईई (द इंडस इंटरप्रीन्यूर्स) का सातवां वार्षिक कार्यक्रम टीआईई- कॉन 2000, जो सेन जोस (जिसे ऐसे लिखा गया था) में 6 और 7 मई को आयोजित किया गया था।</p>
<p>इस साल कॉन्फ्रेंस में कल्पनातीत 1800 से अधिक लोगों ने भाग लिया (रजिस्ट्रेशन 3 सप्ताह पहले ही बंद हो गए थे) और भाग लेने वालों में सभी लोग थे। अपने &#8216;<em>आइडिया</em>&#8216; या सपने को साकार करने के जोश और उत्साह से भरे युवा इंजीनियर &#8216;<em>इंटरप्रीन्यूर्स</em>&#8216; अपनी-अपनी &#8216;<em>इंटरनेट स्टार्ट अप</em>&#8216; का &#8216;<em>बिजनेस प्लान&#8217; लेकर उन्हीं में अगले सबीर भाटिया के.बी. चंद्रशेखर की तलाश में थे। पूरा माहौल ऐसा लग रहा था जैसे, अमेरिका में सिलिकॉन वैली हिन्दुस्तानियों की। &#8216;परिंदा भी पर नहीं मार सकता।</em>&#8216;</p>
<div class="simplePullQuoteRightGolden">टीआईई की ख्याति इतनी बढ़ गई है कि हाल ही में वॉल स्ट्रीट जर्नल और फॉरच्यून पत्रिका, दोनों ने सिलिकॉन वैली में भारतीयों की सफलता और टीआईर्ई के बारे में खासा कवरेज दिया<span></span></div>
<p>खचाखच भरे सभागार में कार्यक्रम का प्रारंभ नेटस्केप और हेल्टोन के संस्थापक जिम क्लॉर्क के उद्‌बोधन से हुआ। जिम क्लॉर्क ने अपने अनुभवों से नए &#8216;<em>इंटरप्रीन्यूर्स&#8217;</em> को अत्यंत संजीदगी से आत्मसात कराया और उसी के बाद था अमेरिका में सबसे अमीर भारतीय डॉ. गुरुराज देशपांडे का भाषण, जिन्होंने अत्यंत ओजस्वी और जोशीले भाषण में कहा कि एक नई कंपनी को बनाकर बड़ा करने के रोजाना के दुख-सुख में आनंद पाने वाले ही इस यात्रा के सही हकदार हैं। सिर्फ &#8216;<em>आईपीओ</em>&#8216; और कंपनी को बेचकर पैसा बनाने के ख्वाब से चालू की गई कंपनी बहुत आगे नहीं जाती।</p>
<p>इसी अवसर पर कंवल रेखी ने भारत सरकार द्वारा वेंचर कैपिटल इन्वेस्टमेंट के संबंध में टीआईई के सभी सुझाव मानने पर संतोष व्यक्त किया। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में दो विषयों पर सर्वाधिक जोर था। सफल लोगों द्वारा नई कंपनियों के अपने अनुभवों से सुझाव &#8216;<em>गुरु-शिष्य परंपरा</em>&#8216; और आपस में नेटवर्किंग &#8216;<em>भाईचारा</em>।&#8217; और नेटवर्किंग तो देखते ही बनती थी, अंदर तीन सभागारों में दिनभर अलग विषयों पर विशिष्ट वक्ताओं के पेनल, जिनमें प्रो. अमर भिड़े, डॉ. सी.के. प्रहलाद जैसे दिग्गज मिलाकर 65 स्पीकर शामिल थे- अपने विचार प्रकट कर रहे थे, वहीं चारों ओर गलियारे में लोग एक-दूसरे से मिलने और अपने डॉट कॉम &#8216;<em>सपने</em>&#8216; को &#8216;<em>सच</em>&#8216; करने की तलाश में लगे थे। वहां ऐसा लगा जैसे हाल ही की नस्दक में भारी गिरावट के बाद भी कोई 200-250 नई डॉट कॉम स्टार्टअप के प्रणेता वहां हाजिर थे।</p>
<p><strong><span style="color: #252324; font-family: mangal, Georgia, 'Times New Roman', Times, serif;">कौन पहुंचा </span>महाकुंभ में :</strong></p>
<p>ऐसा नहीं था कि सिर्फ सिलिकॉन वैली के लोग वहां मौजूद थे, न सिर्फ अमेरिका के हर कोने, वरन भारत से भी कई लोग इस &#8216;<em>महाकुंभ</em>&#8216; में डुबकी लगाने आए थे, जिनमें उद्योगपति डॉ. बी.के. मोदी, आईटीसी चेयरमैन के. चुघ, थॉपर आदि प्रमुख थे। पंजाब सरकार के प्रमुख सचिव समेत कई अन्य प्रशासक वहां आए थे। यही नहीं, इंदौर मूल के भी करीब 10 लोग उस कार्यक्रम में थे, जो कि इंदौर की प्रगतिशीलता का अच्छा परिचायक है। टीआईई की ख्याति इतनी बढ़ गई है कि हाल ही में वॉल स्ट्रीट जर्नल और फॉरच्यून पत्रिका, दोनों ने सिलिकॉन वैली में भारतीयों की सफलता और टीआईर्ई के बारे में खासा कवरेज दिया। टीआईई की अब भारत में 5, अमेरिका में 9 और कनाडा में 1 प्रांतीय शाखाएं कार्यरत हैं और &#8216;<em>नेटवर्किंग</em>&#8216; के जरिये आगे बढ़ने के लिए हर सुझाव का लाभ उठाते युवा उद्यमी, माहौल बड़ा जोरदार रहता है।</p>
<p>यहां पर मैं कंवल रेखी का विशेष उल्लेख करना चाहूंगा, जिनके चेहरे और हावभाव को देखकर ही लगता है कि अपने अनुभव से वे हर नए उद्यमी और अपनी मातृभूमि भारत की भरसक मदद करना चाहते हैं और &#8216;<em>इकोनॉमिक इंटरप्रीन्यूर्स</em>&#8216; के बाद &#8216;<em>सोशल इंटरप्रीन्यूर्स</em>&#8216; की भूमिका बखूबी निभा रहे हैं। शायद उद्यमियों में नारायण मूर्ति और अजीम प्रेमजी और प्रशंसकों में चंद्रबाबू नायडू वहां और होते, तो समूचे भारतीय आईटी समुदाय की सनद पूरी हो जाती। टाइकॉन का सब लाभ उठा सकें, इसके लिए टीआईई ने अपनी वेबसाइट डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू.ओआरजी पर इन गतिविधियों के साइबरकास्ट की व्यवस्था भी की है।</p>
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