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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल&#187; रतन टाटा</title>
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		<title>कर्म साधना ही असली दिवाली</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Oct 2011 11:23:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[अमेरिका में भारत]]></category>
		<category><![CDATA[अनिल अंबानी]]></category>
		<category><![CDATA[कर्म साधना]]></category>
		<category><![CDATA[दिवाली]]></category>
		<category><![CDATA[न्यूयॉर्क]]></category>
		<category><![CDATA[रतन टाटा]]></category>
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		<description><![CDATA[दिवाली के दिन 26 अक्टूबर को एयर इंडिया की मुंबई-न्यूयॉर्क उड़ान एआई-191 ने मुंबई से मंगलवार रात 1.30 बजे उड़ान भरी। डायरेक्ट फ्लाइट के लिए अमेरिका की दूरी 15.30 घंटे में तय होनी थी। 300 से अधिक यात्रियों वाली उड़ान में सिर्फ 37 यात्री थे। जहाज के कप्तान परमार के अनुसार भी ये सबसे हल्की उड़ान थी। 37 यात्रियों में एक मैं था, एक मेरा अमेरिकन दोस्त बॉब और दो थे बिलेनियर रतन टाटा और अनिल अंबानी। टाटा को तो [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2115" alt="कर्म साधना ही असली दिवाली" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2011/10/144.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">दि</span>वाली के दिन 26 अक्टूबर को एयर इंडिया की मुंबई-न्यूयॉर्क उड़ान एआई-191 ने मुंबई से मंगलवार रात 1.30 बजे उड़ान भरी। डायरेक्ट फ्लाइट के लिए अमेरिका की दूरी 15.30 घंटे में तय होनी थी। 300 से अधिक यात्रियों वाली उड़ान में सिर्फ 37 यात्री थे। जहाज के कप्तान परमार के अनुसार भी ये सबसे हल्की उड़ान थी। 37 यात्रियों में एक मैं था, एक मेरा अमेरिकन दोस्त बॉब और दो थे बिलेनियर रतन टाटा और अनिल अंबानी।</p>
<p>टाटा को तो मैंने प्लेन के टेकऑफ के समय देख लिया था, लेकिन प्लेन के स्टाफ ने अनिल अंबानी के बारे में भी बताया। अनिल अंबानी सीट-1 पर और उसके ठीक पीछे रतन टाटा सीट-2 पर बैठे थे। यात्रा के दौरान दोनों से मिलने और फोटो की इच्छा जाहिर की लेकिन फर्स्ट क्लास के यात्रियों से मिलने के लिए सब निर्णय जहाज का कप्तान ही लेता है।</p>
<p>न्यूयॉर्क में सुबह 7.30 बजे उतरते समय दोनों को बहुत करीब से देखा और व्यक्तिगत रूप से अनिल अंबानी और रतन टाटा को हैप्पी दिवाली कहा, जिसका उन्होंने बड़े मुस्कराते हुए उत्तर दिया। अनिल अंबानी हरी टी-शर्ट और ऊपर से ओवरकोट और टाटा बिजनेस शर्ट और ओवरकोट में थे।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">कर्म-साधना ही असली लक्ष्मी-पूजा है, बता दिया रतन और अनिल ने!! हैप्पी दिवाली&#8230;.।<span></span></div>
<p>दोनों के लिए अमेरिका में भी प्लेन के दरवाजे पर उनके भारतीय मूल के आफिसर रिसीव करने आए थे, इमीग्रेशन में दोनों दस खिड़कियों की दूरी पर खड़े थे और फिर रतन टाटा तो सामान के लिए बैगेज एरिया में भी पांच मिनट रुके।</p>
<p>टाटा को प्लेन में देखकर अच्छा लगा लेकिन अनिल अंबानी को देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि दिवाली के दिन अपने देश और घर से दूर ये लक्ष्मी पुत्र किस लक्ष्मी की सेवा में सात समुंदर पार आए थे? क्योंकि अनिल अंबानी तो वैसे भी काफी धार्मिक हैं। क्या प्लेन में इन दोनों ने एक-दूसरे से कोई बात की, वो फर्स्ट क्लास के पर्दे के पीछे छुपा है। दिवाली के दिन अमेरिका में अनिल अंबानी और रतन टाटा को हैप्पी दिवाली बोलकर और सुनकर मैं तो धन्य हो गया। और हां, मेरी मां सहित भारत की हर मां के लिए जिनका बेटा दिवाली के दिन उनके साथ नहीं हैं, एक संदेश कि कोकिला बेन अंबानी भी आप ही की तरह हैं!! कर्म-साधना ही असली लक्ष्मी-पूजा है, बता दिया रतन और अनिल ने!! हैप्पी दिवाली&#8230;.।</p>
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		<title>एक युग की शुरुआत&#8230; &#8230;और युग का अंत।</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:42:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[ए.आर. दलाल]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी.टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा घराने]]></category>
		<category><![CDATA[टाटा सन्स]]></category>
		<category><![CDATA[बॉम्बे हाउस]]></category>
		<category><![CDATA[रतन टाटा]]></category>

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		<description><![CDATA[26 जुलाई 1938 को प्रातः 11.30 बजे टाटा सन्स के निदेशक मंडल की बैठक &#8216;बॉम्बे हाउस&#8217;, फोर्ट में हुई। बैठक का विवरणः श्री जे.आर.डी. टाटा, श्री एस.डी. सकलातवाला, श्री ए.आर. दलाल, श्री एच.आर. दलाल, श्री एचपी. मोदी उपस्थित थे। श्री एच.पी. मोदी को अध्यक्षीय आसन संभालने का प्रस्ताव पारित किया गया। श्री एस.डी. सकलातवाला ने मार्मिक शब्दों में अध्यक्ष, सर नौरोजी सकलातवाला की दुःखद और असामयिक मृत्यु पर शोक व्यक्त किया और निम्नलिखित शोक प्रस्ताव सर्वानुमति से पारित किया गया। [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd12_jrd_ratan.jpg" alt="एक युग की शुरुआत... ...और युग का अंत।" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3136" /><span class="dropcap">26</span> जुलाई 1938 को प्रातः 11.30 बजे टाटा सन्स के निदेशक मंडल की बैठक &#8216;बॉम्बे हाउस&#8217;, फोर्ट में हुई। बैठक का विवरणः</p>
<p>श्री जे.आर.डी. टाटा,</p>
<p>श्री एस.डी. सकलातवाला,</p>
<p>श्री ए.आर. दलाल,</p>
<p>श्री एच.आर. दलाल,</p>
<p>श्री एचपी. मोदी उपस्थित थे।</p>
<p>श्री एच.पी. मोदी को अध्यक्षीय आसन संभालने का प्रस्ताव पारित किया गया। श्री एस.डी. सकलातवाला ने मार्मिक शब्दों में अध्यक्ष, सर नौरोजी सकलातवाला की दुःखद और असामयिक मृत्यु पर शोक व्यक्त किया और निम्नलिखित शोक प्रस्ताव सर्वानुमति से पारित किया गया।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">कंपनी के उद्‌गम-दस्तावेज की धारा 118 के अंतर्गत श्री सोहराब सकलातवाला ने यह प्रस्ताव रखा और श्री अरदेशीर दलाल ने उसकी पुष्टि की, कि श्री जे.आर.डी. टाटा को टाटा सन्स के निदेशक मंडल का अध्यक्ष मनोनीत किया जाता है<span></span></div>
<p>टाटा सन्स के निदेशक मंडल को उनके अध्यक्ष, सर नौरोजी सकलातवाला के आकस्मिक निधन के समाचार से धक्का पहुंचा है। अपने प्रभावी व्यक्तित्व और अनेक विशेषताओं से उन्होंने अपने साथियों का आदर और स्नेह, दोनों ही पाया। जिस आत्मविश्वास का संचार उन्होंने अपने सभी सहयोगियों और टाटा घराने के अन्य कर्मचारियों में किया, वह टाटा घराने की परम्पराओं को बरकरार रखने में सदा याद किया जाएगा। कंपनी के उद्‌गम-दस्तावेज की धारा 118 के अंतर्गत श्री सोहराब सकलातवाला ने यह प्रस्ताव रखा और श्री अरदेशीर दलाल ने उसकी पुष्टि की, कि श्री जे.आर.डी. टाटा को टाटा सन्स के निदेशक मंडल का अध्यक्ष मनोनीत किया जाता है।</p>
<p><strong>20 फरवरी&#8217; 1991</strong> को जे.आर.डी. ने दफ्तार में एक व्यस्त दिन व्यतीत करने के बाद शाम को एक सार्वजनिक समारोह में भाषण दिया। अगले दिन प्रातः जमशेदपुर रवाना होने से पहले उनकी छाती में दर्द महसूस होने लगा, फिर भी वे जमशेदपुर के लिए प्रस्थान कर गए। 3 मार्च को उन्होंने वहां संस्थापक दिवस के कार्यक्रमों में भाग लिया। वहां भी उन्हें छाती की तकलीफ बरकरार रही। जमशेदपुर से लौटने के पश्चात उन्हें पांच दिन बंबई में ब्रीच कैंडी अस्पताल में आराम करने की सलाह दी गई, जिसका उन्होंने न चाहते हुए भी पालन किया। अस्पताल से घर आने के अगले सप्ताह बुधवार, 27 मार्च को टाटा सन्स निदेशक मंडल की हर माह के अंतिम बुधवार को होने वाली परंपरागत बैठक निर्धारित थी। लेकिन जे.आर.डी. के आग्रहानुसार उसे दो दिन पूर्व, यानी 25 मार्च 1991 को ही बुला लिया गया। कार्यसूची में सामान्य विषयों के अलावा एक विशिष्ट मसौदा दर्ज था, &#8216;<em>जे.आर.डी. के पत्र पर विचार करना।</em>&#8216;</p>
<p>बैठक के प्रारंभ में ही जे.आर.डी. ने टाटा घराने से अपने साठ वर्षों से भी अधिक के संबंधों और अनुभवों का जिक्र किया। बैठक में उपस्थित निदेशकों के अनुसार वह बड़ा ही मार्मिक उद्‌बोधन था। उसके अंत में जे.आर.डी. ने कहा, <em>&#8216;मैंने 53 वर्षों के लंबे कार्यकाल का निर्वाहन किया है। अब मैं सेवानिवृत्त होना चाहता हूं और अपनी ओर से श्री रतन टाटा के नाम का टाटा सन्स के अध्यक्ष पद के लिए प्रस्ताव रखता हूं।&#8217;</em> टाटा सन्स में जे.आर.डी. के सहयोगी और लगभग 15 प्रतिशत के हिस्सेदार शापूरजी पालोनजी मिस्त्री ने प्रस्ताव की पुष्टि की। वहां उपस्थित किसी भी निदेशक ने उसमें कोई परिवर्तन का प्रस्ताव नहीं रखा। और, रतन टाटा टाटा सन्स लिमिटेड के अध्यक्ष बन गए। एक स्वर्णिम युग का पटाक्षेप हो गया।</p>
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		<title>क्या खतरा मात्र आर्थिक शक्ति बढ़ने से है?</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Jul 1992 08:39:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[जे आर डी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[अर्थव्यवस्था]]></category>
		<category><![CDATA[जमशेदजी टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[जे.आर.डी.टाटा]]></category>
		<category><![CDATA[दादाभाई नौरोजी]]></category>
		<category><![CDATA[रतन टाटा]]></category>

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		<description><![CDATA[हमारे देश के सामने समाजवादी अर्थव्यवस्था का ढांचा रखा गया है। अगर समाजवाद का अर्थ सभी को समान अधिकार और मौके, दलितों के ऊपर उठने के उचित अवसर और न्यायप्रिय वैधानिक समाज व्यवस्था से है, तो मैं उस समाजवाद का पक्षधर हूं, परंतु अगर उस समाजवाद का तात्पर्य व्यक्तिगत प्रयत्नों पर पाबंदी, उद्योगों पर सरकार के नियंत्रण और निजी इच्छा के विपरीत सरकार द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार जीवन-यापन से है, तो मैं ऐसे समाजवाद के सख्त खिलाफ हूं। किसी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/07/jm_jrd5_profile_pic.jpg" alt="jm_jrd5_profile_pic" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3132" /><span class="dropcap">ह</span>मारे देश के सामने समाजवादी अर्थव्यवस्था का ढांचा रखा गया है। अगर समाजवाद का अर्थ सभी को समान अधिकार और मौके, दलितों के ऊपर उठने के उचित अवसर और न्यायप्रिय वैधानिक समाज व्यवस्था से है, तो मैं उस समाजवाद का पक्षधर हूं, परंतु अगर उस समाजवाद का तात्पर्य व्यक्तिगत प्रयत्नों पर पाबंदी, उद्योगों पर सरकार के नियंत्रण और निजी इच्छा के विपरीत सरकार द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार जीवन-यापन से है, तो मैं ऐसे समाजवाद के सख्त खिलाफ हूं। किसी भी व्यक्ति को अपनी निजी और पारिवारिक जरूरतों का पूरा करने के मार्ग में निर्धारित बनकर बैठने वाली व्यवस्था कैसे प्रशंसनीय हो सकती है?&#8217;</p>
<p><b>कन्सनट्रेशन ऑफ इकोनोमिक पावर</b></p>
<p>&#8216;हमारे नेताओं के भाषण सुनकर तो ऐसा लगने लगा है, मानो हमारे देश को बढ़ती हुई आबादी, सांप्रदायिकता, गरीबी, बेरोजगारी आदि किसी से भी नहीं, बल्कि सिर्फ आर्थिक शक्ति के एकत्रित होने से खतरा है। अगर निजी हाथों में आर्थिक शक्ति है, तो उसका सीधा तात्पर्य उपयुक्त स्थानों पर मनचाहे उद्योग लगाने की स्वतंत्रता, बाजार से आवश्यकतानुसार पैसा उधार अथवा अंशों के जरिये एकत्रित करने की आजादी और मनचाही शर्तों पर कर्मचारियों को नियुक्त करने की खुली छूट से है। परंतु इनमें से ऐसी कोई भी चीज नहीं है, जो हमारे देश का उद्योगपति स्वेच्छा से कर सकता है। तो फिर उसकी आर्थिक शक्ति का क्या फायदा। सही मायनों मे तो &#8216;<em>कन्सनट्रेशन ऑफ इकोनोमिक पॉवर हमारे सरकारी अफसरों और मंत्रियों के पास है, जिससे कि देश की प्रगति को वास्तविक खतरा है।</em>&#8216;</p>
<p>(उपरोक्त विचार वर्तमान आर्थिक परिवर्तनों के पूर्व व्यक्त किए गए हैं।)</p>
<p><b>मूल्य एवं आस्था</b></p>
<p>&#8216;दुःख का विषय है कि मूल्य आधारित सभ्यता अब समाप्त हो गई है। मैं जिन मूल्यों व स्तर का अनुसरण करने का प्रयास करता हूं, वह मुझे जमशेदजी टाटा से मिले हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं। स्वतंत्रता के बाद अधिक काला धन बनाने के साथ मूल्यों का ह्रास अधिक हुआ है। आज मोटे तौर पर मूल्यों में तो बहुत बदलाव नहीं आया है। हां, हमारे द्वारा उन्हें दिए जाने वाले महत्व में आमूल परिवर्तन हो गया है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">वह मेरी जिंदगी का पहला अवसर था, जब मेरे पास करोड़ रुपए अथवा कई लाख रुपए निजी संपदा के रूप में आए थे<span></span></div>
<p>मूल्यों में आई गिरावट के मेरे मान से प्रमुख कारण कुछ इस प्रकार हैं। पहला, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रगति ने धर्म पर से हमारी आस्था को डिगा दिया है, जो कि पुरातन समय में हमारे नैतिक आचरण का सबसे बड़ा संबल थी। दूसरा, यथार्थवाद और आर्थिक उपलब्धि की अंधी दौड़ ने मनुष्य को इतना स्वार्थी बना दिया है कि उसे अपने हितों के आगे कुछ दिखाई नहीं देता। तीसरा, हमारे देश में सरकारी कर्मचारियों को दी जाने वाली &#8216;<em>शर्मनाक</em>&#8216; तनख्वाह और उसके साथ उनके हाथों में लाइसेंस-परमिट देने का मनमाना अधिकार। अगर हमें मूल्यों को वहीं उनके उचित स्थान और गौरव पर लौटाना है तो इन सब मुश्किलों के उपाय तो ढूंढने ही पड़ेंगे।&#8217;</p>
<p><b>पुरस्कार और सम्मान</b></p>
<p>&#8216;मुझे देश-विदेश में कई पुरस्कार मिले हैं, हालांकि मेरी उनके लिए पात्रता कदापि नहीं थी। परंतु अपने जीवन में मुझे सबसे ज्यादा खुशी दादाभाई नौरोजी सम्मान पाकर हुई। वह इसलिए कि यह वह व्यक्ति था, जिसने सही मायनों में समाज सुधार का बीड़ा उठाया था। उनकी शिक्षा पूर्ण होने के बाद जब उन्हें ज्ञात हुआ कि कॉलेज का अधिकांश खर्च सरकार की ओर से मिलता है, जो उसे गरीबों से लिए गए कर में से देती है। बस, तभी उन्हें लग गया कि उनकी शिक्षा का खर्च तो उन गरीबों ने उठाया है, जिन्हें खुद पढ़ना भी नहीं आता।</p>
<p>दादाभाई घर-घर जाते थे और लोगों के घरों के द्वार के समीप ही बैठकर उनके बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाते थे। मुझे तो यह सब आश्चर्यजनक लगता है। इसीलिए, मुझे दादाभाई नौरोजी सम्मान मिलने पर जो आनंद की अनुभूति हुई, वह &#8216;भारत रत्न&#8217; मिलने पर भी नहीं हुई।&#8217;</p>
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