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	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल &#187; इन्द्रधनुष | जे मुछाल के नए विषयो पर आलेख</title>
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		<title>सिंधिया स्कूल के &#8216;प्रेरक और प्राण&#8217; माधवराव</title>
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		<pubDate>Mon, 01 Oct 2001 06:33:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[इन्द्रधनुष]]></category>
		<category><![CDATA[फाउंडर्स डे]]></category>
		<category><![CDATA[माधवराव सिंधिया]]></category>
		<category><![CDATA[माधवरावजी]]></category>
		<category><![CDATA[सिंधिया स्कूल]]></category>
		<category><![CDATA[सिंधिया स्कूल वार्षिकोत्सव]]></category>

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		<description><![CDATA[21 और 22 अक्टूबर के दिन माधवराव सिंधिया के कैलेंडर में हर साल के लिए तय थे और पिछले कई साल से ये दिन होते थे ग्वालियर के किले पर स्थित सिंधिया स्कूल के वार्षिकोत्सव (फाउंडर्स डे) और अगले दिन ओल्ड बॉयज डे&#8230; और माधवराव सिंधिया का पूरा परिवार इसमें पूरे मन से न सिर्फ शरीक होता था, बल्कि उन्हें उसका हर साल इंतजार रहता था। ग्वालियर में सिंधिया परिवार द्वारा स्थापित सिंधिया स्कूल ने 1997 में ही अपने 100 [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2049" alt="सिंधिया स्कूल के 'प्रेरक और प्राण' माधवराव " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2001/10/104.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">21</span> और 22 अक्टूबर के दिन माधवराव सिंधिया के कैलेंडर में हर साल के लिए तय थे और पिछले कई साल से ये दिन होते थे ग्वालियर के किले पर स्थित सिंधिया स्कूल के वार्षिकोत्सव (<em>फाउंडर्स डे</em>) और अगले दिन ओल्ड बॉयज डे&#8230; और माधवराव सिंधिया का पूरा परिवार इसमें पूरे मन से न सिर्फ शरीक होता था, बल्कि उन्हें उसका हर साल इंतजार रहता था।</p>
<p>ग्वालियर में सिंधिया परिवार द्वारा स्थापित सिंधिया स्कूल ने 1997 में ही अपने 100 वर्ष पूरे किए हैं और पहले एक स्टूडेंट के रूप में और बाद में सिंधिया स्कूल के बोर्ड आफ गवर्नर्स के चेयरमैन के रूप में, महाराज माधवरावजी को सिंधिया स्कूल, उसकी प्रगति, उसके नाम और उससे निकले हर स्टूडेंट के लिए दिल में एक विशेष स्थान था। यहां तक अटकलें लगती थीं कि सिंधिया स्कूल के सर्वश्रेष्ठ हाउस की ट्रॉफी अमूमन हर साल जयाजी हाउस को इसलिए प्रदान की जाती थी कि वो &#8216;महाराज का हाउस था।&#8217;</p>
<p>सौभाग्य से मुझे भी सिंधिया स्कूल में उस &#8216;हाउस&#8217; (यानी होस्टल) में रहने का अनुभव मिला, जिसमें वर्षों पूर्व माधवराव रहते थे- नाम था जयाजी हाउस&#8230; लेकिन एक मुश्किल थी, साल में लगभग 5-6 बार बगैर किसी सूचना के माधवरावजी जब भी अपने किसी खास मित्र नेता, पत्रकार आदि को लेकर ग्वालियर का किला और सिंधिया स्कूल दिखाने लाते थे, जयाजी हाउस जरूर लाते थे, इसलिए जयाजी हाउस में रहने वाले छात्र को साफ-सफाई और अनुशासन के प्रति विशेष चौकन्ना रहना पड़ता था, लेकिन इस सब के पीछे उनका जयाजी हाउस और पूरे सिंधिया स्कूल के लिए जो प्रेम था, वो देखते बनता था। ग्वालियर में कोई भी विशेष अतिथि हो, उसे माधवराव सिंधिया स्कूल तो लाएंगे ही।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">उनका जीवन भी तो सिंधिया स्कूल के शीर्ष वाक्य में ही बीत गया &#8216;सा विद्या या विमुक्तया।&#8217;<span></span></div>
<p>ये बात शायद बहुत कम लोगों को पता है कि लोकसभा चुनाव के समय माधवरावजी सिंधिया स्कूल के कुछ <em>&#8216;शिक्षकों&#8217;</em> से खास दरख्वास्त करके उनसे चुनाव के खर्चे का हिसाब रखन को कहते थे, उनका मानना था कि इस मायायुग में भी अगर वो किसी पर पैसे के सही हिसाब का भरोसा कर सकते थे, तो वे थे सिंधिया स्कूल के अध्यापक।</p>
<p>1982 से 1986 के मेरे सिंधिया स्कूल के कार्यकाल में मुझे कई बार माधवरावजी से मिलने और उनसे चर्चा का अवसर मिला और &#8216;<em>फॉउंडर्स</em>&#8216; डे के दो दिन तो माधवरावजी भी बिलकुल एक ओल्ड बॉय बन जाते थे। 22 अक्टूबर को सुबह क्रिकेट मैच में शरीक होना, उसके बाद सब ओल्ड बॉयज के साथ दोपहर को भोजन और 21 की शाम मुख्य अतिथि को पूरे स्कूल का दौरा खुद लगवाकर माधवराव मानो हर साल अपने अतीत के प्रतिबिंब को वर्तमान में झांक लेते थे और उनका जीवन भी तो सिंधिया स्कूल के शीर्ष वाक्य में ही बीत गया <em>&#8216;सा विद्या या विमुक्तया।&#8217;</em></p>
<p>दिल्ली, बॉम्बे यहां तक कि न्यूयॉर्क में भी सिंधिया स्कूल के पुराने छात्रों से मुलाकात और उनसे घुलने-मिलने के लिए माधवरावजी के पास हमेशा समय रहता था। सिंधिया स्कूल की प्रगति के लिए उन्हें किसी से भी बात करने में सदैव आनंद आता था। मुझे तो हमेशा याद रहेगा कि सामान्यतः सिंधिया स्कूल में दाखिला फरवरी में हो जाता है, मुझे जून के महीने में ग्वालियर के चन्द्रमोहनजी नागौरी और मेरे नानाजी दामोदरदासजी झंवर की अर्जी पर खुद माधवरावजी ने सिंधिया स्कूल में एडमिशन की मंजूरी दी थी।</p>
<p>आने वाले 21 अक्टूबर की शाम <em>&#8216;ऋषि गालव की तपस्थली&#8217;</em> पर बसे हुए ज्ञान तीर्थ को हर साल की तरह अपने प्रिय शिष्य माधव का इंतजार रहेगा, जिसने सिंधिया स्कूल को भारत के सबसे अच्छे पब्लिक स्कूल्स की श्रेणी में पहुंचा दिया था। पूरे देश ने एक होनहार नेता खो दिया, कांग्रेस ने उसका नेतृत्व खो दिया। ग्वालियर प्रांत तो अपना लायक बेटा खोकर आज अनाथ हो गया और सिंधिया स्कूल ने अपना सबसे जगमगाता शिष्य!! ग्वालियर के सिंधिया स्कूल और उसके सारे शिक्षक, छात्र और सारे विश्व में फैले पूर्व-शिष्य-समुदाय की ओर से महाराज माधवरावजी को शत्‌-शत्‌ नमन!!</p>
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		<title>अराउंड द वर्ल्ड इन एट डॉलर्स</title>
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		<pubDate>Thu, 20 Apr 2000 06:23:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[इन्द्रधनुष]]></category>
		<category><![CDATA[डेविड फिलिप्स कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[डॉलर]]></category>
		<category><![CDATA[फिलिप्स]]></category>
		<category><![CDATA[हैल्थी चॉइस कंपनी]]></category>

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		<description><![CDATA[ये नाम बीते दिनों की एक प्रसिद्ध अंगरेजी फिल्म का था जिसमें चंद डॉलर्स में सारी दुनिया की सैर की कहानी है। पर मानो ये सब सच हो जाए तो? ऐसा ही है कुछ अभी डेविड फिलिप्स के साथ जो कि कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियर हैं। फिलिप्स की नजर पड़ी एक विज्ञापन पर जिसमें लिखा था- खाद्य पदार्थ बनाने वाली हैल्थी चॉइस कंपनी के 10 सामान जून 1999 से पहले खरीदिए और पाइए 1000 &#8216;फ्रिक्वंट फ्लाइट माइल&#8216; मुफ्त! &#8216;फ्रिक्वंट [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1640" alt="'अराउंड द वर्ल्ड इन एट डॉलर्स' " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/04/95.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">ये</span> नाम बीते दिनों की एक प्रसिद्ध अंगरेजी फिल्म का था जिसमें चंद डॉलर्स में सारी दुनिया की सैर की कहानी है। पर मानो ये सब सच हो जाए तो? ऐसा ही है कुछ अभी डेविड फिलिप्स के साथ जो कि कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियर हैं।</p>
<p>फिलिप्स की नजर पड़ी एक विज्ञापन पर जिसमें लिखा था- खाद्य पदार्थ बनाने वाली हैल्थी चॉइस कंपनी के 10 सामान जून 1999 से पहले खरीदिए और पाइए 1000 &#8216;<em>फ्रिक्वंट फ्लाइट माइल</em>&#8216; मुफ्त! &#8216;<em>फ्रिक्वंट फ्लाइट माइल</em>&#8216; दुनिया में अधिकांशतः सभी वायुसेवाएं प्रदान करती हैं -यात्रियों को आकर्षित करने के लिए- जो कि वायुयान में यात्रा की निर्धारित दूरी तय करने पर मुफ्त में प्रदान किए जाते हैं। और निश्चित माइल इकट्ठे होने पर मुफ्त टिकट मिलते हैं। यही नहीं, कई बार ये &#8216;<em>माइल</em>&#8216; वायुसेवाओं के साथ संयुक्त विज्ञापन में होटल में रात गुजारने, किराए पर कार लेने या कुछ सामान खरीदने पर भी मिलते हैं।</p>
<p>ऐसी ही स्कीम पर नजर पड़ी थी फिलिप्स की, और उसे मिल गई हैल्थी चॉइस कंपनी की एक चॉकलेट पुडिंग, सिर्फ 25 सेंट (लगभग 10 रुपए) में। उसने जोड़ा, सिर्फ 62.50 डॉलर से उसे 25,000 &#8216;<em>माइल</em>&#8216; मिल जाएंगे। फिलिप्स तो जैसे दीवाना ही हो गया। पूरे इलाके में उसे जहां भी ये पुडिंग कप मिले, उसने खरीद डाले। उसने 3000 डॉलर के 12150 पुडिंग कप खरीदे और उसे मिल गए 12,50,000 &#8216;माइल।&#8217;</p>
<div class="simplePullQuoteRight">ऐसी ही स्कीम पर नजर पड़ी थी फिलिप्स की, और उसे मिल गई हैल्थी चॉइस कंपनी की एक चॉकलेट पुडिंग, सिर्फ 25 सेंट (लगभग 10 रुपए) में<span></span></div>
<p>भारत-अमेरिका की एक रिटर्न यात्रा में मिलते हैं 15,000 &#8216;<em>माइल</em>&#8216; और टिकट होता है अमूमन 1000 डॉलर। यानी 12,50,000 माइल इकट्ठे करने के लिए भारत-अमेरिका की लगभग 100 यात्राएं करनी होंगी, जिसमें लगेंगे टिकट खरीदने के लगभग एक लाख डॉलर। लेकिन फिलिप्स ने महज 3000 डॉलर खर्च करके बगैर प्लेन में पांव रखे ये &#8216;<em>माइल</em>&#8216; अर्जित कर लिए। और तो और, बाद में उसने ये पुडिंग कप दान में देकर 800 डॉलर की टैक्स छूट भी हासिल कर ली। फिलिप्स के पास अब इतनी फ्री &#8216;<em>फ्रिक्वंट फ्लाइट माइल</em>&#8216; हैं कि वो सारी दुनिया की बारंबार सैर कर सकता है। उसकी पुत्रियां केटी और एमा तथा पत्नी सिंडी उन जगहों की तलाश में हैं, जहां उन्हें घूमने जाना है। पर क्या करें, फिलिप्स को साल में मात्र 18 छुट्टियां ही मिलती हैं। और ऐसी चूक पुडिंग कम्पनी या वायुसेवा से हुई कैसे कि इतनी सस्ती वस्तु पर इतने अधिक माइल इनाम में मुफ्त? कारण जो भी हो, फिलिप्स डेविड को अब शायद जीवन में प्लेन और होटल में एक सेंट भी न खर्चना होगा।</p>
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		<title>100 डेज़ आफ्टर आईसी-814</title>
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		<pubDate>Mon, 17 Apr 2000 06:57:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[इन्द्रधनुष]]></category>
		<category><![CDATA[प्रधानमंत्री वाजपेयी]]></category>
		<category><![CDATA[वायुसेना]]></category>
		<category><![CDATA[विमान अपहरण]]></category>
		<category><![CDATA[विमान हाईजैक]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछली शताब्दी जाते-जाते भारत और भारतवासियों को एक अजीब-सी बेबसी में छोड़ गई थी। आईसी-814 में 5 हाईजैकर्स की बंदूक के बल पर 173 घंटे तक न सिर्फ जहाज में यात्री बैठे रहे, वरन पूरा देश बंदूक की नोक पर था। और फिर यात्रियों की रिहाई के बदले तीन दुर्दांत आतंकवादियों को छोड़ना। याद करके ही मन बोझ से भारी हो जाता है। लेकिन ज्यादा अहम सवाल है कि क्या हम अगले किसी आईसी-814 को अपहृत होने से रोकने में [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1648" alt="100 डेज़ आफ्टर आईसी 814 " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/04/100.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">पि</span>छली शताब्दी जाते-जाते भारत और भारतवासियों को एक अजीब-सी बेबसी में छोड़ गई थी। आईसी-814 में 5 हाईजैकर्स की बंदूक के बल पर 173 घंटे तक न सिर्फ जहाज में यात्री बैठे रहे, वरन पूरा देश बंदूक की नोक पर था। और फिर यात्रियों की रिहाई के बदले तीन दुर्दांत आतंकवादियों को छोड़ना। याद करके ही मन बोझ से भारी हो जाता है। लेकिन ज्यादा अहम सवाल है कि क्या हम अगले किसी आईसी-814 को अपहृत होने से रोकने में पूर्णतः सक्षम हो गए हैं? या दुर्भाग्यवश आईसी-814 जैसे अपहरण से निपटने की हमने कोई तैयारी कर ली है? इस सवाल का जवाब तो वक्त ही देगा।</p>
<p>पर आईसी-814 की दास्तान को हादसे के 100 दिनों बाद एसोसिएटेड प्रेस के दिल्ली संवाददाता नीलेश मिश्रा ने अपनी किताब &#8216;<em>173 अवर्स इन कैप्टिविटी : द हाईजैकिंग ऑफ आईसी-814</em>&#8216; में बहुत ही करीब से पेश किया है। नीलेश मिश्रा ने इस किताब का आधार आईसी-814 के यात्रियों और चालक दल से अपने इंटरव्यू और अपने अन्य विश्वस्त सूत्रों के बयानों पर तैयार किया है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">अपहरण होने के 40 मिनट बाद तक प्रधानमंत्री वाजपेयी को इसकी खबर नहीं दी गई<span></span></div>
<p>किताब बहुत ही &#8216;<em>फास्ट पेस्ड</em>&#8216; है और अगर सिर्फ एक फिक्शन होती तो बहुत अच्छी लगती, लेकिन विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की 173 घंटों के चीफ, बर्गर, भोला, शंकर और डॉक्टर के आगे बेबसी की यह दास्तान काफी कुछ दर्दनाक और विचारोत्तेजक है। आईसी-814 के दिनों में मीडिया में काफी कुछ प्रकाशित हो ही चुका था, पर कुछ खास बातें हैं जो शायद इस किताब में ही पढ़ने को मिली हैं। अपहरण होने के 40 मिनट बाद तक प्रधानमंत्री वाजपेयी को इसकी खबर नहीं दी गई, जबकि वे भी उस वक्त बिहार से वायुसेना के एक विमान से लौट रहे थे और कैप्टन शरण के संदेश एक ओपन फ्रिक्वेंसी पर आ रहे थे। सीएमजी- आपात प्रबंधन समिति के पास ऐसी आपात परिस्थिति से निपटने का कोई तैयार प्लान नहीं था। अमृतसर में लगभग 50 मिनट विमान खड़े रहने के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाए और वहां पर कैप्टन शरण की थोड़ी <em>&#8216;पैनिक और इम्मेच्योरिटी&#8217;</em> भी नजर आई, जब अपहरणकर्ताओं की धमकियों को उन्होंने सब सच मानकर एटीसी को जैसे संदेश दिए, उससे लगा प्लेन में जैसे नरसंहार शुरू हो गया था। और सबसे खास कि किस्सा खत्म होने और यात्रियों के भारत लौटने के बाद अपहरणकर्ता पुनः कंधार में खड़े प्लेन के पास गए थे। उसमें से कुछ सामान निकाला और 31 दिसंबर की रात वहीं कंधार एयरपोर्ट पर गुजारी।</p>
<p>वाकया तो अब इतिहास की धरोहर है पर हमारी &#8216;<em>शॉर्ट पब्लिक मेमोरी</em>&#8216; का परिचायक तो रूपेन कत्याल के पिता का वह कथन था, जो बिल क्लिंटन से मिलने के बाद उन्होंने दिया था कि हादसे के बाद किसी नेता ने उनके घर में झांका भी नहीं और क्लिंटन भारत के मंत्रियों से कहीं ज्यादा चिंतित (कंन्सर्ड) थे उनके परिवार के बारे में। आईसी-814 और मौलाना मसूद अजहर वो काला पन्ना है, जिसकी याद हमें हमेशा &#8216;<em>तैयार</em>&#8216; रखेगी कि लोकतंत्र और देश अपने आप सुरक्षित नहीं रहते। वरना फिर किसी रूपेन कत्याल की जान दांव पर लग सकती है।</p>
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		<title>पढ़िए उपन्यास बिना कागज-स्याही के !</title>
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		<pubDate>Wed, 05 Apr 2000 06:49:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[इन्द्रधनुष]]></category>
		<category><![CDATA[इंटरनेट वेबसाइट]]></category>
		<category><![CDATA[ई- बुक रीडर]]></category>
		<category><![CDATA[ई-बुक]]></category>
		<category><![CDATA[सॉफ्टवेयर कंपनी]]></category>

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		<description><![CDATA[आज से ठीक दो साल पहले अमेरिका में हम विश्व की दूसरे नंबर की प्रकाशन कंपनी क्यूबेकोर के लिए कुछ सॉफ्टवेयर बनाने में सहयोग दे रहे थे। उन दिनों इंटरनेट का बुखार अमेरिका में अपनी पूरी रवानी पर था और ऐसा लग रहा था कि जीवन का शायद ही कोई अंग इंटरनेट से अछूता रह पाएगा। उसी के रहते एक दिन मजाक में दोपहर के भोजन के समय मैंने कंपनी के अधिकारी पॉल गैबरी से कहा- पॉल, कहीं ऐसा तो [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1642" alt="पढ़िए उपन्यास बिना कागज-स्याही के !" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/04/96.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">आ</span>ज से ठीक दो साल पहले अमेरिका में हम विश्व की दूसरे नंबर की प्रकाशन कंपनी क्यूबेकोर के लिए कुछ सॉफ्टवेयर बनाने में सहयोग दे रहे थे। उन दिनों इंटरनेट का बुखार अमेरिका में अपनी पूरी रवानी पर था और ऐसा लग रहा था कि जीवन का शायद ही कोई अंग इंटरनेट से अछूता रह पाएगा।</p>
<p>उसी के रहते एक दिन मजाक में दोपहर के भोजन के समय मैंने कंपनी के अधिकारी पॉल गैबरी से कहा- पॉल, कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि प्रकाशन की जरूरत ही न पड़े और किताबें भी इंटरनेट पर मिलने लगेंगी और कुछ ऐसे संयंत्र आ जाएंगे जिसमें सैकड़ों किताबें समा जाएंगी। पॉल ने भी हंसकर कहा, हां हो तो सकता है।</p>
<p>न मैं गंभीर था न पॉल, पर परिवर्तन के कदम तो उस ओर चल ही पड़े थे। कुछ दिनों पहले एक कंपनी का नाम सुना, जिसमें आज एक पुस्तकनुमा इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफार्म है जिसमें काफी &#8216;मैटर&#8217; पढ़ सकते हैं, बिना कागज के। यानी एक तरह की इलेक्ट्रॉनिक बुक रीडर।</p>
<p>पर हाल ही में इसी तर्ज पर अमेरिका में धूम मचा दी उपन्यासकार स्टिफन किंग के 66 पन्नों के लघु उपन्यास &#8216;<em>राइडिंग द बुलेट्‌स</em>&#8216; ने। यह सिर्फ कम्प्यूटर संस्करण में ही जारी हुआ, यानी उपन्यास कहीं भी बाजार में सामान्य कागज पर छपे उपन्यास के रूप में नहीं बिक रहा था, बल्कि यह सिर्फ इंटरनेट वेबसाइट जैसे <a href="https://www.amazon.com/"><strong>www.amazon.com</strong></a> पर मुफ्त में डाउनलोड के लिए उपलब्ध है और प्राप्त आंकड़ों के अनुसार पहले ही दिन &#8216;<em>राइडिंग द बुलेट्‌स</em>&#8216; के 5 लाख डाउनलोड हो चुके थे। क्या है यह नया जादू &#8216;<em>ई-बुक</em>&#8216; का? क्या यह सिर्फ एक कौतूहल है या वाकई आने वाले दिनों में उपन्यास ऐसे ही बिकेंगे। हालांकि किंग का यह उपन्यास तो मुफ्त था और क्या कागज-स्याही का युगांतर आ गया है?</p>
<div class="simplePullQuoteRight">कुछ दिनों पहले एक कंपनी का नाम सुना, जिसमें आज एक पुस्तकनुमा इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफार्म है जिसमें काफी &#8216;<em>मैटर</em>&#8216; पढ़ सकते हैं, बिना कागज के। यानी एक तरह की इलेक्ट्रॉनिक बुक रीडर<span></span></div>
<p>सवाल सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं है। फिल्में, गाने, एलबम, इंटरनेट और उससे जुड़े नए, लेकिन सस्ते उपकरणों ने यह संभव कर दिया है कि लोग घर बैठे फिल्म बना सकते हैं और वेबसाइट पर प्रदर्शन कर सकते हैं आदि। ई-बुक का एक और फायदा है कि अब कोई भी सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तक की छपी हुई प्रतियों की कमी (आउट ऑफ प्रिंट) नहीं होंगी। इलेक्ट्रॉनिक पुस्तकों में पाठकों की रुचि बढ़ाने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। इलेट्रॉनिक्स पुस्तकों के अक्षर आम पुस्तकों की तरह दिखें, इस बारे में बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियां विशद्‌ शोध कार्य कर रही हैं।</p>
<p>इससे मानवीय सृजन की अभिव्यक्ति के ये सारे अवयव अब धीरे-धीरे हर आम और खास की पहुंच में होंगे, ताकि अगर उसके दिल में कोई विचार कुलबुला रहा है, तो किसी निर्माता या प्रकाशक के राजी नहीं होने पर उसका विचार दफन होकर नहीं रह जाएगा।</p>
<p><b>क्या है इलेक्ट्रॉनिक बुक रीडर यानी चलती-फिरती पर्सनल लायब्रेरी</b><b>?</b></p>
<p>कुछ अग्रणी कंपनियों ने इस तरह के इलेक्ट्रॉनिक बुक (ई-बुक) प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं, जिनकी मदद से इंटरनेट द्वारा किसी भी चाही पुस्तक को डाउनलोड करके बाद में इन्हें यात्रा के दौरान या स्वीमिंग पूल के किनारे बैठकर अथवा सुविधा अनुसार अन्य किसी भी जगह पढ़ा जा सकता है। ज्यादातर ई-बुक रीडर प्लेटफॉर्म किताबों या पत्र-पत्रिकाओं के आकार में ही विकसित किए गए हैं। कंपनियों ने कोशिश यह की कि पढ़ने वालों को अक्षर साफ-सुथरे दिखाई दें तथा पुस्तकें पढ़ने में आने वाली अधिकतर परेशानियों को ई-रीडर में दूर किया जा सके। ई-बुक रीडर की मदद से न केवल मनचाही पुस्तकें पढ़ी जा सकती हैं, बल्कि इनमें ग्रॉफिक्स तथा चित्र भी बखूबी देखे जा सकते हैं। अक्षरों को अपनी जरूरत के मुताबिक छोटा-बड़ा करना, एक साथ अपनी पंसदीदा कई पुस्तकों को डाउनलोड करने की सुविधा तथा निश्चित समय के बाद स्वतः पेज बदलना इन चलती-फिरती पर्सनल लाइब्रेरी जैसी मशीनों की अन्य सुविधाएं हैं।</p>
<p><b>रिचर्ड ब्रास : सूचना युग के गटेनबर्ग</b></p>
<p>दुनिया को कागजरहित समाज बनाने की परिकल्पना को साकार करने हेतु हजारों लोग दिन-रात जुटे हैं। उनमें एक उल्लेखनीय नाम है रिचर्ड ब्रास का। ब्रास पिछले 20 वर्षों से ई-बुक रीडर को इस तरह से विकसित करने में लगे हुए हैं कि आम आदमी उसमें विद्यमान इलेक्ट्रॉनिक मैटर को एक सामान्य पुस्तक की तरह ही पढ़ सके। सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात तो यह है कि ई- बुक रीडर की कल्पना को साकार एक ऐसा व्यक्ति कर रहा है जिसके पास विश्वविद्यालय की कोई डिग्री नहीं है। रिचर्ड ब्रास की रुचि ई-बुक रीडर विकसित करने में तब से ज्यादा बढ़ी, जब एक पत्रकार के रूप में उनकी खराब भाषा (स्पेलिंग) के कारण उन्हें काम में परेशानी हुई। 48 वर्षीय रिचर्ड इरा ब्रास विभिन्न सॉफ्टवेयर कंपनियों में इस परिकल्पना को साकार करने में जुटे रहे तथा रिटायरमेंट के बाद माइक्रोसॉफ्ट ने उन्हें 1997 में ई-बुक रीडर पर काम करने का प्रस्ताव दिया। ब्रास तब से अनवरत अपने काम में जुटे हुए हैं। इसी बीच कंपनी ने ई-बुक रीडर बाजार में लांच कर दिए हैं, जिनकी मदद से इंटरनेट के जरिये आसानी से किताबों को डाउनलोड किया जा सकता है। ब्रास और उनकी 100 लोगों की टीम के सामने ई-बुक्स को आम पुस्तकों की तरह सुलभ और पढ़ने में आरामदायक बनाने के साथ-साथ सबसे बड़ी चुनौती है लोगों की इसमें रुचि पैदा करना। अभी तक ई-बुक्स ने बहुत ज्यादा बिजनेस नहीं किया है।</p>
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		<title>रेगिस्तान में हरियाली &#8211; कायाकल्प केंद्र</title>
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		<pubDate>Sun, 02 Apr 2000 06:59:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[इन्द्रधनुष]]></category>
		<category><![CDATA[आयुर्वेद]]></category>
		<category><![CDATA[कायाकल्प]]></category>
		<category><![CDATA[कायाकल्प रिर्सच सेन्टर]]></category>
		<category><![CDATA[प्राकृतिक चिकित्सा]]></category>
		<category><![CDATA[योग]]></category>
		<category><![CDATA[हनुमान मंदिर सालासरजी]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले दिनों तीन दिन की छुट्टी मिली। मैं जयपुर के आसपास कोई ऐसी जगह खोज रहा था, जहां जाकर शरीर और मन दोनों रीचार्ज हो जाएं। तभी किसी ने सुझाया &#8216;कायाकल्प&#8217; क्यों नहीं जाते? &#8216;नेचरोपैथी&#8216; नाम सुनते ही मन में आता है- उबली हुई सब्जियां, मिट्टी की पट्टी का शरीर पर लेप, इलाज आदि-आदि। फिर भी विचार बना ही लिया कि चलो &#8216;कायाकल्प&#8217; ही चलते हैं, देखें तो सही, जगह क्या है, जब नाम इतना है तो। जयपुर से कोई [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="https://www.jmuchhal.com/registan-mein-hariyali-kayakalp-kendra/kayakalp" rel="attachment wp-att-3716"><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2000/04/kayakalp.jpg" alt="रेगिस्तान में हरियाली – कायाकल्प केंद्र" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3716" /></a><span class="dropcap">पि</span>छले दिनों तीन दिन की छुट्टी मिली। मैं जयपुर के आसपास कोई ऐसी जगह खोज रहा था, जहां जाकर शरीर और मन दोनों रीचार्ज हो जाएं। तभी किसी ने सुझाया <em>&#8216;कायाकल्प&#8217;</em> क्यों नहीं जाते? &#8216;<em>नेचरोपैथी</em>&#8216; नाम सुनते ही मन में आता है- उबली हुई सब्जियां, मिट्टी की पट्टी का शरीर पर लेप, इलाज आदि-आदि। फिर भी विचार बना ही लिया कि चलो <em>&#8216;कायाकल्प&#8217;</em> ही चलते हैं, देखें तो सही, जगह क्या है, जब नाम इतना है तो।</p>
<p>जयपुर से कोई 150 किलोमीटर पर सीकर से आगे लक्ष्मणगढ़ जगह है। यहां से प्रसिद्ध हनुमान मंदिर सालासरजी जाने के लिए एक रास्ता कटता है। उसी पर मुख्य मार्ग से कोई 15-16 किलोमीटर की दूरी पर ताराकुंज में बना है &#8216;<em>शांतिप्रसाद गोयनका कायाकल्प एंड रिर्सच सेन्टर</em>।&#8217; स्थान, हरी घास के बगीचे, फूलों की क्यारियों से घिरा कैम्पस, भव्य इमारत- प्रथम दृष्टि में तो काफी प्रभावी लगा। अंदर जाते ही रिसेप्शन में कमरे की एंट्री की और वहीं पर मुलाकात हुई कायाकल्प के स्थानीय मैनेजर श्री जालोदिया से, जो संयोग से इंदौर के ही थे। परिचयों का सिलसिला निकल पड़ा और बड़ा अच्छा लगा। कायाकल्प मुख्यतः जीवन का पुनर्निर्माण केन्द्र है।</p>
<p>सालासर के हनुमानजी के परम भक्त उद्योगपति, सदैव कर्म में प्रवृत्त रहने वाले कर्मयोगी, स्वप्नदृष्टा, अन्वेषी श्री शांतिप्रकाश गोयनका ने त्रस्त मानवता को रोगमुक्त करने तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य के विकास का सपना देखा कि स्वास्थ्य समस्या का स्थायी तथा सही समाधान भारत की प्राचीन एवं प्रभावी चिकित्सा पद्धति शुद्ध आयुर्वेद, योग, सिद्ध तथा प्राकृतिक चिकित्सा में सन्निहित है। विशाल कायाकल्प सेन्टर के रूप में वह सपना साकार हो उठा है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">जयपुर से कोई 150 किलोमीटर पर सीकर से आगे लक्ष्मणगढ़ जगह है। यहां से प्रसिद्ध हनुमान मंदिर सालासरजी जाने के लिए एक रास्ता कटता है। उसी पर मुख्य मार्ग से कोई 15-16 किलोमीटर की दूरी पर ताराकुंज में बना है &#8216;शांतिप्रसाद गोयनका कायाकल्प एंड रिर्सच सेन्टर।&#8217;<span></span></div>
<p>प्राचीन-पवित्र आयुर्वेद, योग तथा प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान द्वारा समस्त पीड़ित मानवता के लिए शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक सुख, शांति प्राप्ति को समर्पित विश्व का अनूठा केंद्र है। करोड़ों रुपयों से निर्मित यह केंद्र परम्परागत प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति एवं आधुनिकतम जीवनशैली का बेजोड़ समन्वय एवं स्थापत्य कला का अपूर्व नमूना है। सुख, शांति एवं स्वास्थ्य का प्रकाश फैलाते श्री शांतिप्रकाश गोयनका कायाकल्प एवं अनुसंधान केंद्र में तन, मन तथा चेतना के रूपान्तरण द्वारा जीवन का <em>&#8216;कायाकल्प&#8217;</em> किया जाता है।</p>
<p>यहां राष्ट्रीय स्वास्थ्य निर्माण का अपूर्व प्रयोग चल रहा है। सरल एवं स्वाभाविक आश्रमीय जीवन पर आधारित रोगियों तथा स्वास्थ्य साधकों का कार्यक्रम प्रातः साढ़े चार बजे प्रारम्भ होकर रात्रि दस बजे स्वास्थ्यदायी सृजनात्मक चिन्तन के साथ समाप्त होता है। स्वास्थ्य संबंधी नित्य नवीन शोधों से परिपूर्ण व्याख्यान एवं नैसर्गिक जीवनशैली, सम्यक चिन्तन, सम्यक विश्राम, सम्यक भोजन तथा प्रकृति के पंच तत्वों के उन्मुक्त सम्यक सेवन के व्यावहारिक ज्ञान से रोगियों को सुसंस्कारित कर स्वस्थ जीवन में प्रतिष्ठित किया जाता है। रोगी यहां से रोग मुक्ति के साथ-साथ चिकित्सक बनकर जाता है। वह समझ जाता है कि रोग क्या है, रोग का कारण क्या है।</p>
<p>केन्द्र में 125 रोगियों के रहने के लिए पृथक-पृथक 56 कमरे, विशाल डाइनिंग हॉल, कम्युनिटी हॉल तथा योग चिकित्सा कक्ष की व्यवस्था इस प्रकार की गई है कि वह गर्मी के दिनों में ठंडा, ठंड के दिनों में गरम रखा जा सके। प्रत्येक कमरा वातानुकूलित है। प्रत्येक कमरे में रंगीन दूरदर्शन (टेलीविजन), ड्रेसिंग टेबल, गलीचा, टेलीफोन आदि आधुनिक सुविधाएं दी गई हैं। प्रत्येक वातानुकूलित कमरा आधुनिक स्नान घर से सुसज्जित है। चिकित्सा के विभागों में हाइड्रो थैरेपी विभाग, मड थैरेपी विभाग, फिजियो थैरेपी एवं जिम विभाग, एक्यूप्रेशर विभाग, मैग्नेट थैरेपी विभाग, योग थैरेपी विभाग, रैकी और वैकल्पिक चिकित्सा विभाग शामिल हैं।</p>
<p>कमरों का भाड़ा पहले पहल तो थोड़ा-सा ज्यादा प्रतीत होता है (तल मंजिल पर डबल रूम 1700 रुपए रोज और पहली मंजिल पर 2200 रुपए रोज क्योंकि ये कमरे थोड़े बड़े और बालकनी के साथ हैं), लेकिन सभी समय का भोजन और अन्य उपचार सुविधाएं मिलाकर यह काफी ठीक है क्योंकि <em>&#8216;कायाकल्प&#8217;</em> में प्राकृतिक उपचार के साथ-साथ आधुनिक जीवन जीने की व्यवस्था, जनरेटर (जाजोदियाजी ने कहा कि मासिक खर्च में डीजल ही सबसे बड़ा खर्च है।) से सभी वातानुकूलित कमरे और पूरे कैम्पस की बिजली का खर्च और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए पात्रता सिद्ध होने पर निःशुल्क उपचार की व्यवस्था भी है।</p>
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		<title>अमृतसर से लौटकर</title>
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		<pubDate>Thu, 13 Oct 1988 06:18:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[इन्द्रधनुष]]></category>
		<category><![CDATA[अमृतसर]]></category>
		<category><![CDATA[पंजाब]]></category>
		<category><![CDATA[वैष्णो देवी मंदिर]]></category>
		<category><![CDATA[स्वर्ण मंदिर]]></category>
		<category><![CDATA[हरमंदिर साहब]]></category>

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		<description><![CDATA[अमृतसर का पवित्र स्वर्ण मंदिर अब भय, आतंक और उपद्रव की गतिविधियों से पूर्णतया मुक्त हो चुका है। दर्शनार्थी अब पुनः निर्भय और निःशंक होकर अरदास के लिए वहां जाने लगे हैं। पवित्र हरमंदिर साहब के दर्शन करते ही मन शांति और आदर से ओतप्रोत हो जाता है। जम्मू-कश्मीर में स्थित वैष्णो देवी मंदिर के विषय में यह किंवदंती प्रसिद्ध है कि अगर &#8216;माता का बुलावा&#8216; न आया हो तो दर्शनार्थी मंदिर की चौखट तक पहुंचकर भी बगैर दर्शन के [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-2045" alt="अमृतसर से लौटकर " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1988/10/96.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">अ</span>मृतसर का पवित्र स्वर्ण मंदिर अब भय, आतंक और उपद्रव की गतिविधियों से पूर्णतया मुक्त हो चुका है। दर्शनार्थी अब पुनः निर्भय और निःशंक होकर अरदास के लिए वहां जाने लगे हैं। पवित्र हरमंदिर साहब के दर्शन करते ही मन शांति और आदर से ओतप्रोत हो जाता है।</p>
<p>जम्मू-कश्मीर में स्थित वैष्णो देवी मंदिर के विषय में यह किंवदंती प्रसिद्ध है कि अगर &#8216;<em>माता का बुलावा</em>&#8216; न आया हो तो दर्शनार्थी मंदिर की चौखट तक पहुंचकर भी बगैर दर्शन के लौट आते हैं। कुछ इसी प्रकार का किस्सा मेरे साथ भी हुआ। पिछले सप्ताह उत्तर भारत में हुई भीषण अतिवृष्टि से आवागमन के अधिकांश साधन अवरुद्ध हो गए थे। जिस ट्रेन से मैं जम्मू के लिए सफर कर रहा था, वह पठानकोट पर ही रुक गई। पठानकोट से जब वापस दिल्ली की ओर चला तो ट्रेन अमृतसर समाप्त हो गई। मार्ग के सभी नदी-नाले अपने पूरे उफान पर थे। सतलज का जलस्तर पटरी से सिर्फ कुछ फुट ही नीचे रह गया था। यहां तक कि कई स्थानों पर तो ट्रेन के चलने की आवाज ही आना बंद हो गई थी। कारण, पटरियों पर भी पानी भर गया था।</p>
<p>ऐसे हालात में हम अमृतसर पहुंचे। पिछले कुछ वर्षों से पंजाब और विशेषकर अमृतसर के लिए मन में एक विशिष्ट-सी छवि बन गई है। अब जब शहर में पहुंच ही गए थे तो आवास आदि के स्थान देखने के लिए स्टेशन से बाहर निकलना तो अनिवार्य था। कुछ सहमे-से, कुछ डरे-से हम होटल पहुंचे। इसी आशा के साथ कि हमारा अमृतसर प्रवास सिर्फ कुछ घंटों तक सीमित रह जाए, परंतु जल, थल, वायु के आवागमन मार्गों की बिगड़ी हुई स्थिति से यह साफ जाहिर था कि ऐसा होगा नहीं और हुआ भी ऐसा ही। हमें चार दिन अमृतसर में रुकना पड़ा।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">सामने के घंटाघर का गुंबद पूरी तरह ध्वस्त स्थिति में खड़ा था। घड़ी की गति न जाने कब से थम गई थी। दीवारों पर गोली-बारूद से हुए नुकसान के अवशेष साफ झलकते हैं<span></span></div>
<p>स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वर्ण मंदिर और जलियांवाला बाग देखने का कार्यक्रम बना। तांगे में बैठकर (अमृतसर में तांगे और मानव चालित रिक्शा सार्वजनिक यातायात के प्रचलित साधन हैं) स्वर्ण मंदिर का मार्ग अत्यंत ही कौतूहल और विस्मय में व्यतीत हुआ। पुराने शहर के मध्य स्वर्ण मंदिर तक पहुंचने के समय तक यह ख्याल बार-बार मन में उठ रहा था कि आज समूचा भारत इन गली-कूचों और सड़कों को किन पाशविक कृत्यों का पर्याय समझ रहा है।</p>
<p>स्वर्ण मंदिर परिसर के बाहर ही सुरक्षा कर्मियों से पहली बार नजरें चार हुईं। &#8216;<em>मेटल डिटेक्टर</em>&#8216; से चेकिंग करने के पश्चात हमें कैमरा भी अंदर ले जाने की पूर्ण छूट दे दी गई। मंदिर के समीप पहुंचते ही &#8216;<em>ब्ल्यू स्टार</em>&#8216; और &#8216;<em>ब्लैक थंडर</em>&#8216; की यादें ताजा हो गईं। सामने के घंटाघर का गुंबद पूरी तरह ध्वस्त स्थिति में खड़ा था। घड़ी की गति न जाने कब से थम गई थी। दीवारों पर गोली-बारूद से हुए नुकसान के अवशेष साफ झलकते हैं। अगर सिर्फ गुंबद को ही देखें और अन्य इमारतों पर ध्यान न दें तो लगता है जैसे वर्षों से इस क्षत-विक्षत खंडहर का कोई हरनुमा न रहा हो, परंतु जैसे ही अंदर प्रवेश कर हरमंदिर साहब के पावन दर्शन होते हैं, मन शांति और आदर से ओतप्रोत हो जाता है।</p>
<p>जैसा कि चित्रों से ज्ञात है, हरमंदिर साहब एक जलाशय के मध्य में स्थित है। इसके ठीक सामने अकाल तख्त है और जलाशय परिक्रमा के चारों ओर कई अन्य इमारतें बनी हुई हैं, जैसे गुरु रामदास सराय, लंगर भवन, घंटाघर आदि। परिक्रमा के बगल में कई कमरे कतार में बने हुए हैं। कुछ समय पहले तक इन्हीं में से कई कमरे आतंकवादियों के गढ़ थे, परंतु अब सभी की पुताई-रंगाई और सफाई का काम चल रहा है। उल्लेखनीय है कि परिक्रमा और परिसर के विशाल क्षेत्रफल के बावजूद वहां की सफाई काबिले-तारीफ है। </p>
<div class="simplePullQuoteLeftRed">लौट आए स्वर्ण मंदिर में दर्शनार्थियों की अपार भीड़ और &#8216;<em>केशर द ढाबा</em>&#8216; के बाहर रात को दो बजे हलुवा प्रेमियों का सैलाब। उसी सब का बेसब्री से इंतजार है अमृतसर शहरवासियों को, सारे देश को<span></span></div>
<p>ज्ञात हुआ है कि दिन में दो बार सफाई का यह कार्य सार्वजनिक रूप से किया जाता है, जिसमें जाति, धर्म, आयु, वर्ग के बंधनों से परे सभी भक्त योगदान देते हैं, परंतु यह जरूर प्रश्न का विषय रहा कि मंदिर की प्रसिद्धि और आकार-प्रकार को देखते हुए दर्शनार्थियों का आना-जाना तो सिर्फ इक्के-दुक्के में चल रहा था। यहां तक कि हरमंदिर साहब के गर्भगृह में भी बैठने के लिए पर्याप्त जगह आसानी से मिल जाती है।</p>
<p>मंदिर परिसर में कोई भी सुरक्षाकर्मी वर्दी में दिखाई नहीं दिए, परंतु साधारण वस्त्रों में कई सुरक्षाकर्मी निश्चित तौर पर निगरानी का कार्य संभालते होंगे, ऐसा अनुमान बेबुनियाद नहीं हो सकता। वर्तमान में तो शहर में चर्चा का विषय सिर्फ यही था कि वे कौन भाग्यशाली हैं, जिनकी संपत्ति सरकार द्वारा स्वर्ण मंदिर परिसर के निकट होने के कारण ध्वस्त की जा रही है। बाजार भाव से लगभग चार-पांच गुना कीमत पर सरकार पैसे का त्वरित भुगतान कर रही है और ऐसा अनुमान है कि अमृतसर में तो जमीन-जायदाद के भावों में तेजी के बजाय मंदी ही आई है।</p>
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		<title>एक स्कूल के नब्बे साल</title>
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		<pubDate>Sun, 01 Nov 1987 06:38:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[इन्द्रधनुष]]></category>
		<category><![CDATA[मध्यप्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[श्री माधवराव सिंधिया]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कृत श्लोक]]></category>
		<category><![CDATA[सिंधिया पब्लिक स्कूल]]></category>
		<category><![CDATA[सिंधिया स्कूल]]></category>

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		<description><![CDATA[ऋषि गालब की तपस्थली पर, बसे हुए अविराम, पुण्य तीर्थ, हे ज्ञान तीर्थ, हे विद्या के धाम, तुमको विनत्‌ प्रणाम।&#8217; विशाल सभागार में पियानो के साथ एक स्वर होकर प्राचार्य, शिक्षकगण और सभी छात्र पहले संस्कृत श्लोक, फिर अंगरेजी प्रार्थना और फिर हिंदी में वंदन गीत के साथ हर दिन के विद्योपार्जन की शुरुआत करते हैं। सभागार के बीचोंबीच दीवार पर विद्यालय का चिह्न-सूर्य और शेषनाग अंकित हैं। उसके ठीक नीचे लिखा है विद्यालय का ध्रुववाक्य &#8216;सा विद्या या विमुक्तये।&#8217; [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="alignleft size-full wp-image-2053" alt="एक स्कूल के नब्बे साल " src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1992/10/105.jpg" width="311" height="307" />ऋषि गालब की तपस्थली पर,</p>
<p style="text-align: center;">बसे हुए अविराम,</p>
<p style="text-align: center;">पुण्य तीर्थ, हे ज्ञान तीर्थ,</p>
<p style="text-align: center;">हे विद्या के धाम,</p>
<p style="text-align: center;">तुमको विनत्‌ प्रणाम।&#8217;</p>
<p>विशाल सभागार में पियानो के साथ एक स्वर होकर प्राचार्य, शिक्षकगण और सभी छात्र पहले संस्कृत श्लोक, फिर अंगरेजी प्रार्थना और फिर हिंदी में वंदन गीत के साथ हर दिन के विद्योपार्जन की शुरुआत करते हैं। सभागार के बीचोंबीच दीवार पर विद्यालय का चिह्न-सूर्य और शेषनाग अंकित हैं। उसके ठीक नीचे लिखा है विद्यालय का ध्रुववाक्य &#8216;सा विद्या या विमुक्तये।&#8217;</p>
<p>मध्यप्रदेश ही नहीं, वरन्‌ समूचे भारत में विद्यालयीन शिक्षा के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में ग्वालियर के सिंधिया स्कूल का नाम अग्रगण्य है। पब्लिक स्कूल पद्धति पर आधारित लड़कों का यह विद्यालय 1 नवंबर 1987 को अपनी स्थापना की 90वीं जयती उपराष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा के मुख्य आतिथ्य में मना रहा है।</p>
<div class="simplePullQuoteRightPerpal">मध्यप्रदेश ही नहीं, वरन्‌ समूचे भारत में विद्यालयीन शिक्षा के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में ग्वालियर के सिंधिया स्कूल का नाम अग्रगण्य है<span></span></div>
<p>ग्वालियर के ऐतिहासिक दुर्ग पर लगभग 110 एकड़ के क्षेत्र में बसे इस विद्यालय की स्थापना के प्रेरक ग्वालियर राज्य के तत्कालीन शासक स्वर्गीय महाराजा माधवराव सिंधिया थे। सन्‌ 1897 में यह विद्यालय &#8216;<em>सरदार स्कूल</em>&#8216; के नाम से शुरू किया गया था, राजाओं, सरदारों ओर जागीरदारों के पुत्रों के लिए ताकि वे किशोरावस्था में ही अनुशासन और पाबंदी का जीवन व्यतीत करना सीख सकें। यह विद्यालय सिंधिया एज्युकेशन सोसायटी के तत्वावधान में शुरू किया गया था। उसी समिति द्वारा ग्वालियर शहर में &#8216;<em>सिंधिया कन्या विद्यालय</em>&#8216; नामक लड़कियों का भी एक आवासीय विद्यालय संचालित किया है।</p>
<p>सन्‌ 1933 में समिति ने यह निर्णय लिया कि विद्यालय को सार्वजनिक स्वरूप दिया जाए- तब इसका नाम सरदार स्कूल से बदलकर &#8216;सिंधिया स्कूल&#8217; रखा गया। शहर में लगभग 300 फुट की ऊंचाई पर बसे ग्वालियर दुर्ग के ऐतिहासिक अवशेषों की देखरेख और मरम्मत के बाद उन्हें छात्रावास और विद्यालय परिसर का प्रारूप दिया गया। विद्यालय में पढ़ रहे देश-विदेश के लगभग 750 छात्र, समस्त शिक्षक और उनके परिवार और अन्य कर्मचारियों को मिलाकर सिंधिया स्कूल के लगभग 2 हजार लोगों का एक परिवार दुर्गपर आवास करता है।</p>
<p>सिंधिया स्कूल में तीसरी कक्षा से लेकर बारहवीं तक शिक्षा प्रदान की जाती है। विद्यालय में दाखिले के लिए एक परीक्षा होती है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एज्युकेशन, नई दिल्ली द्वारा निर्देशित पाठ्‌यक्रम का विद्यालय में पालन किया जाता है। पब्लिक स्कूल प्रणाली में किताबी शिक्षा के अलावा अन्य गतिविधियों में छात्र के संपूर्ण विकास पर बल दिया जाता है। सिंधिया स्कूल में छात्र कई खेल व क्रीड़ाएं जैसे तैराकी, घुड़सवारी, क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, टेनिस, स्क्वैश, जिमनास्टिक्स, गोल्फ, मुक्केबाजी, योग, एथलेटिक्स, टेबल टेनिस, बॉस्केटबॉल आदि खेलने के अवसर प्राप्त करता है।</p>
<p>लगभग 750 विद्यार्थियों का स्वाभाविक तौर पर वर्गीकरण करना आवश्यक है। इसलिए छात्रों को शिक्षा और आवास की दृष्टि से दो वर्गों में बांटा गया है। कक्षा तीसरी से छठी तक जूनियर वर्ग और कक्षा सातवीं से बारहवीं का समावेश सीनियर वर्ग में किया गया है। जूनियर वर्ग के छात्र तीन छात्रावासों में रहते हैं- जनकोजी, दत्ताजी व कनेरखेड़। उसी प्रकार सीनियर वर्ग के छात्रों को 9 छात्रावासों में बांटा गया है- जयाजी, रणोजी, महादजी, जीवाजी, शिवाजी, माधव, जयप्पा, ज्योतिबा व दौलत। सभी छात्रावासों के नाम सिंधिया राजवंश से संबंधित व्यक्तियों पर रखे गए हैं। सिंधिया स्कूल का &#8216;अस्ताचल&#8217;, खुला नाट्‌य मंच और वहां कर कम्प्यूटर सेंटर इसके विशिष्ट आकर्षण हैं।</p>
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		<title>शमा जलाए रखना</title>
		<link>https://www.jmuchhal.com/shama-jalaye-rakhna</link>
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		<pubDate>Fri, 03 Jul 1987 08:03:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[इन्द्रधनुष]]></category>
		<category><![CDATA[एकला चलो रे]]></category>
		<category><![CDATA[भ्रष्टाचार]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा हॉल]]></category>

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		<description><![CDATA[अंग्रेजी में एक बहुत प्रचलित कहावत का हिंदी में अनुवाद कुछ इस प्रकार है- जब मनुष्य का पैसा चला जाता है, तो समझो कि कुछ नहीं गया। अगर स्वास्थ्य खराब हो जाता तो समझना चाहिए कि थोड़ा कुछ खो गया और अगर चरित्र की पवित्रता चली जाए, तो बस सब कुछ ही चला गया। मगर वर्तमान काल में तो पूरी तरह इस कहावत का उल्टा ही हो रहा है जिसके पास पैसा है, उसके पास सब कुछ है और जिसके [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1658" alt="शमा जलाए रखना" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1987/07/105.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">अं</span>ग्रेजी में एक बहुत प्रचलित कहावत का हिंदी में अनुवाद कुछ इस प्रकार है- जब मनुष्य का पैसा चला जाता है, तो समझो कि कुछ नहीं गया। अगर स्वास्थ्य खराब हो जाता तो समझना चाहिए कि थोड़ा कुछ खो गया और अगर चरित्र की पवित्रता चली जाए, तो बस सब कुछ ही चला गया। मगर वर्तमान काल में तो पूरी तरह इस कहावत का उल्टा ही हो रहा है जिसके पास पैसा है, उसके पास सब कुछ है और जिसके पास सिर्फ चरित्र है, उसके पास आधुनिक वातावरण के हिसाब से कुछ भी नहीं है।</p>
<p>इस परिवर्तन ने तो समाज में प्रचलित सर्वमान्य आदर्शों की नींव तक घात कर दिया है। और अगर आज हम इस परिवर्तन के मार्ग का पुनरावलोकन करें, तो हमें कुछ दिखाई नहीं देगा। धीरे-धीरे यह जहर पूरे राष्ट्र में इतना गहरा फैल चुका है कि उसे साफ करना तो दूर, खुद को बचा पाना ही मुश्किल है।</p>
<p>सिर्फ भारत के संदर्भ में ही विचार करें तो आज से सिर्फ चालीस वर्ष पूर्व इतिहास के पन्ने ऐसे हजारों नामों से गौरवान्वित थे, जिन्होंने आदर्श व चरित्र के सामने जीवन को भी तुच्छ समझा। स्वतंत्रता संग्राम आखिर था ही अपने आदर्शों व मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए। अगर कुछ प्रतिशत नागरिकों को छोड़ दें तो ज्यादातर जनता को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि राजगद्दी पर कौन विराजमान है- भारतीय या विदेशी? परंतु जीवन की भौतिक सुख-समृद्धि व आराम से बढ़कर कुछ है, कम से कम उस समय तो यह मान्यता थी। यह बात नहीं है कि तब हर व्यक्ति सच्चरित्र व सत्यवान था, पर अब अनुपात बिलकुल बदल गया है। और आज जो व्यक्ति अपने मूल्यों की श्रद्धा करना चाहता है, वह तो पूर्णतः तिरस्कृत समझा जाता है।</p>
<div class="simplePullQuoteRightGolden">जन्म से तो घूस लेना या देना कोई नहीं सीखता। व्यवहार व भ्रष्टाचार के बीच की रेखा अब अत्यंत संकुचित हो गई है। बचपन से हर मोड़ पर इस आचरण को देखकर बालक इसे जीवन का आवश्यक अंग समझते हैं<span></span></div>
<p>यह ट्रांसिशन (संक्रमण) किस सत्ता काल में आया, इसका अंदाज लगाना तो बहुत मुश्किल है लेकिन भ्रष्ट आचरण का युग अपने शैशवकाल से यौवन की दहलीज पर कदम रख चुका है। भ्रष्टाचार सिर्फ टैक्स चुराने या लाखों-करोड़ों के गबन का ही नाम नहीं है। भ्रष्टाचार तो ट्रेन में अधिकारी को &#8216;ऊपर&#8217; से रुपए देकर टिकट लेना व सिनेमा हॉल में ब्लैक से खरीदना इनका भी नाम है। चोरी एक रुपए की हो या दस रुपए की, वह चोरी ही रहती है। ऐसी बात नहीं है कि सभी इस श्रेणी में आते हैं। जन्म से तो घूस लेना या देना कोई नहीं सीखता। व्यवहार व भ्रष्टाचार के बीच की रेखा अब अत्यंत संकुचित हो गई है। बचपन से हर मोड़ पर इस आचरण को देखकर बालक इसे जीवन का आवश्यक अंग समझते हैं। और शिक्षा प्रणाली भी कितनी खोखली है। जब शिक्षक सदाचार व चरित्र गुण का पाठ पढ़ाए और खुद भ्रष्ट हो तो छात्रों पर प्रभाव कैसे पड़ सकता है? भ्रष्टाचार की मदद न लेने वालों को अत्यंत पुरातन करार दिया जाता है और प्रगति की अंधी दौड़ में चरित्र रूपी चक्षुओं की कोई पूछ नहीं है।</p>
<p>सदैव मूल्यों का पालन करने के लिए शरीर व मन, दोनों ही अत्यंत कठोर होना चाहिए। शरीर इसलिए कि मूल्यों के पालन में बाधक व भ्रष्टाचार का प्रवर्तक शरीर को सुखों की चाह ही है। और मन की शक्ति इसलिए ताकि दृढ़ प्रतिज्ञ होकर हर मुश्किल का सामना कर सकें। हर मनुष्य की आत्मा उसे ऐसे कृत्य करने से टोकती है, पर आत्मा की आवाज नजर अंदाज हो जाती है। कई मनुष्य इसलिए दुर्गम मार्ग को छोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें अकेले पड़ जाने का भय रहता है। कोई भी परिवर्तन अत्यंत सुगमता से परिपूर्ण नहीं होता है। यह बात नीति व तौर-तरीकों के लिए भी लागू होती है। अपने अंदर मौजूद इंसान व समानता की लौ को बुझाने का हमें कोई अधिकार नहीं है। सिर्फ शारीरिक दुःख-सुख का मापदंड तो उचित नहीं है। अपने आदर्शों पर &#8216;एकला चलो रे&#8217; वाले सिद्धांत का पालन करने वालों को ही दीर्घ सफर में सहायक मिलते हैं। भारत की प्राचीन गरिमा का मुख्य स्रोत यही था। अगर आज भारतवासी चाहें कि हम भौतिकवाद से विश्व में अग्रगण्य के रूप में उभर सकें तो यह संभव नहीं है। इस देश ने तो सदैव आध्यात्म गुरु के रूप में जगत का मार्गदर्शन किया है। युवा पीढ़ी को चाहिए कि अतीत की इस गौरव गाथा का अध्यापन पुनः गाया जा सके-आदर्शों से व मूल्यों से देश की नींव को सुदृढ़ बनाएं।</p>
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