<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="https://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="https://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="https://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="https://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="https://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="https://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>Jitendra Muchhal &#124; Jitendra Muchhal Website &#124; J Muchhal &#124; जीतेंद्र मुछाल &#187; खेल | खेल खिलाड़ी पर जीतेंद्र मुछाल के विचार और प्रतिक्रिया</title>
	<atom:link href="https://www.jmuchhal.com/vividha/khel-khiladi/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://www.jmuchhal.com</link>
	<description></description>
	<lastBuildDate>Tue, 28 May 2013 14:46:29 +0000</lastBuildDate>
	<language>hi-IN</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=3.5</generator>
		<item>
		<title>महिला टेनिस में रुसी क्रांति</title>
		<link>https://www.jmuchhal.com/mahila-tenis-mein-rusi-kranti</link>
		<comments>https://www.jmuchhal.com/mahila-tenis-mein-rusi-kranti#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 12 Jun 2005 12:29:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल / खिलाड़ी]]></category>
		<category><![CDATA[अन्ना कोर्निकोवा]]></category>
		<category><![CDATA[महिला टेनिस]]></category>
		<category><![CDATA[मारिया शारापोवा]]></category>
		<category><![CDATA[रूसी टेनिस]]></category>
		<category><![CDATA[रूसी महिला खिलाड़ी]]></category>
		<category><![CDATA[विम्बल्डन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">https://www.jmuchhal.com/?p=340</guid>
		<description><![CDATA[फुटबॉल विश्व कप और भारत की वेस्टइंडीज पर ऐतिहासिक जीत खेल समाचारों पर ऐसे छाए हुए हैं कि टेनिस के वार्षिक महाकुंभ विम्बल्डन पर तो गोया इंग्लैंड वालों की भी कम नजर है। इस बार के विम्बलडन या यूं कहें, पूरे महिला टेनिस जगत में पिछले 2-3 सालों से एक &#8216;लाल क्रांति&#8217; सी आ गई है। यह आंदोलन है महिला टेनिस में रूसी महिला खिला‍ड़ियों का दबदबा, जो इस वक्त पुरजोर है। इन आंकड़ों पर एक नजर डालिए और हर [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-3142" alt="महिला टेनिस में रूसी क्रांति" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2013/04/14693.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">फु</span>टबॉल विश्व कप और भारत की वेस्टइंडीज पर ऐतिहासिक जीत खेल समाचारों पर ऐसे छाए हुए हैं कि टेनिस के वार्षिक महाकुंभ विम्बल्डन पर तो गोया इंग्लैंड वालों की भी कम नजर है। इस बार के विम्बलडन या यूं कहें, पूरे महिला टेनिस जगत में पिछले 2-3 सालों से एक &#8216;लाल क्रांति&#8217; सी आ गई है। यह आंदोलन है महिला टेनिस में रूसी महिला खिला‍ड़ियों का दबदबा, जो इस वक्त पुरजोर है। इन आंकड़ों पर एक नजर डालिए और हर टेनिस प्रेमी शायद अचंभित हो जाएगा। 1974 में आखिरी बार किसी रूसी महिला खिलाड़ी ओल्गा मोरोज़ोवा ने टेनिस का ग्रैंड स्लैम फाइनल खेला था। 2002 में टेनिस की पहली 30 पायदान में सिर्फ एक रूसी महिला खिलाड़ी थी।</p>
<p>फिर- 2004 के आते पहली विश्व महिला टेनिस के पहले दस में से 5 स्थान रूस के नाम थे। 2004 के साल में फ्रेच, विम्बल्डन और उस यूएस ओपन जीतने वाली तीनों महिलाएं रूसी थीं। इस वर्ष विम्बल्डन में रैंकिंग प्राप्त 32 महिला खिलाड़ियों में से 8 रूसी हैं, जिनमें पहले 17 में से 6 रूसी हैं। विम्बल्डन में भाग ले रही 128 महिला खिलाड़ियों में 30 रूस से हैं (यह पंक्तियां लिखे जाने तक <strong>#</strong> 4 मारिया शारापोवा, <strong>#</strong> 7 एलेना देमेनतिएवा और <strong>#</strong> 9 अनास्तसिया मिस्किना विम्बल्डन के क्वार्टर फाइनल दौर  में अंतिम 8 तक पहुंच गई हैं)। और इस वक्त महिला टेनिस दुनिया की पहली 100 रैंकिंग में से कोई 20 रू‍सी बालाओं ने टेनिस के कोर्ट और उसे बाहर &#8211; दोनों जगह अपनी धाक जमा दी है। यह विम्बल्डन ही है कि 1911 के बाद इस साल पहली बार कोई भी अमेरिकी खिलाड़ी पुरुष और महिला एकल प्रतियोगिता के क्वार्टर फाइनल में भी नहीं पहुंचा है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">बात 2004 की है, तब विश्व महिला टेनिस के पहले 10 में से 5 स्थानों पर रुसी नाम थे<span></span></div>
<p><b>महिला टेनिस के पिछले 25 साल : </b></p>
<p>पिछले 25 सालों के महिला टेनिस को देखें तो कई विशिष्ट हिस्से नजर आते हैं। सबसे पहले था मार्टिना, क्रिस एवर्ट और ट्रेसी ऑस्टिन का दौर, जिसके खत्म होने तक स्टेफी ग्राफ, मोनिका सेलेस और जेनिफर कैप्रियाती महिला टेनिस पर छाई रहीं। फिर आया बूम-बूम विलियम वीनस और सेरेना बहनों का बेजोड़ तोड़, जिसने महिला टेनिस को घर की बपौती बना दिया। और इसी के पटाक्षेप में आ गया है &#8216;रूसी लाल क्रांति&#8217;।</p>
<p><b>अन्ना कोर्निकोवा ने की शुरुआत : </b></p>
<p>इसमें कोई शक नहीं कि इस आंदोलन की पहली पहचान थी अन्ना कोर्निकोवा। अन्ना कोर्निकोवा की शोहरत की शुरआत तो टेनिस कोर्ट से ही हुई थी, लेकिन अपनी किशोर उम्र और आकर्षक नाक-नक्श से अन्ना बहुत ही जल्द व्यावसायिक मॉडलिंग की दुनिया में छा गई। यह और बात है कि वह अपने टेनिस करियर में कोई भी ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता जीत नहीं पाई। लेकिन उनके पोस्टर और फोटोग्रॉफ सारी दुनिया में छा गए। पांच वर्ष की आयु में टेनिस रैकेट हाथ में लेने वाली कोर्निकोवा 11 वर्ष की आयु में फ्लोरिडा के निक बोलेटिएरी टेनिस अकादमी में टेनिस सीखने आ गई। उसके बाद तो उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।</p>
<p><b>रूसी टेनिस की पहचान &#8211; मारिया शारापोवा : </b></p>
<p>कोर्निकोवा की ही तरह मारिया शारापोवा भी 8 वर्ष की उम्र में अपने देश रूस को पीछे छोड़कर फ्लोरिडा की निक बोलेटिएरी टेनिस अकादमी में आ गई थीं। 2004 की विम्बल्डन विजेता मारिया शारापोवा ने टेनिस के कोर्ट और उसके बाहर मॉडलिंग की दुनिया में धूम मचा दी है। इन सबसे उनकी सालाना कमाई 1.50 करोड़ डॉलर (75 करोड़ रुपए) आंकी गई है। महंगी गाड़ियों और प्रसाधनों के कई विज्ञापनों में शारापोवा नजर आती हैं। लेकिन इसके रहते सिर्फ 19 वर्षीय शारापोवा ने अपने टेनिस पर आंच नहीं आने दी है।</p>
<div class="simplePullQuoteLeftOrange">2004 की विम्बल्डन विजेता मारिया शारापोवा ने टेनिस के कोर्ट और उसके बाहर मॉडलिंग की दुनिया में धूम मचा दी है<span></span></div>
<p><b>टेनिस कन्याओं की </b><b>“फैक्टरी” : </b></p>
<p>हालांकि रूस की महिला टेनिस में प्रगति उल्लेखनीय है, लेकिन इसमें कोई सरकारी या सार्वजनिक मुहिम का योगदान नहीं है। बस, सोवियत साम्राज्य के विघटन के बाद आर्थिक प्रगति के रास्ते तलाशते कई परिवारों को खेल और टेनिस का रास्ते नजर आया। मॉस्को के पास स्पार्टक क्लब की सिर्फ एक इंडोर टेनिस कोर्ट पर अभ्यास करते हुए कोई 150 रूसी कन्याओं में से आज के नामी सितारे निकल आए हैं। इसमें कोर्निकोवा,  मिस्किना और देमेनतिएवा तो एक दूसरे के साथ खेलकर ही बड़ी हुई थीं। और उनकी कोच थी टेनिस खिलाड़ी राइसा उजलोवा, जिनके बेटे मरात साफिन और बेटी दिनारा साफिन दोनों ने टेनिस में अच्छी सफलता हासिल की है। स्पार्टक क्लब के कोच महज 5-6 वर्ष की आयु में ही प्रतिभावान कन्याओं को ढूंढ़कर उनको अभ्यास कराना प्रारंभ कर देते हैं। टेनिस के कोर्ट और उसके बाहर मॉडलिंग और विज्ञापन की दुनिया से जोरदार कमाई और कोर्निकोवा-शारापोवा की शोहरत और व्यावसायिक सफलता।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>https://www.jmuchhal.com/mahila-tenis-mein-rusi-kranti/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>ओलंपिक 2012 &#8211; मेजबानी के लिये न्यूयॉर्क की प्रबल दावेदारी</title>
		<link>https://www.jmuchhal.com/olympics-2012-mezbani-ke-liye-newyork</link>
		<comments>https://www.jmuchhal.com/olympics-2012-mezbani-ke-liye-newyork#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 27 Feb 2005 06:24:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल / खिलाड़ी]]></category>
		<category><![CDATA[ओलंपिक 2012 न्यूयोर्क]]></category>
		<category><![CDATA[ओलंपिक खेलगांव]]></category>
		<category><![CDATA[ओलंपिक्स]]></category>
		<category><![CDATA[ग्रीष्मकालीन ओलंपिक]]></category>

		<guid isPermaLink="false">https://www.jmuchhal.com/?p=349</guid>
		<description><![CDATA[जहाँ आप रेल बजट, फिल्मफेयर, ऑस्कर्स और आम बजट के बीच शामें गुजार रहे हैं, न्यूयॉर्क में कई लोग दिल थामकर बैठे हैं जुलाई के इंतजार में। 2000 सिडनी, 2004 एथेंस, 2008 बीजिंग और 2012 &#8211; ? ग्रीष्मकालीन ओलंपिक की 2012 में मसाल के पड़ाव के लिए फैसला अंतिम पांच शहरों में सिमट गया है; लंदन, मैड्रिड, न्यूयॉर्क, पेरिस और मॉस्को। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने 13 सदस्य &#8216;जांच दल&#8216; का गठन किया है, जो इन शहरों, उनकी व्यवस्था और ओलंपिक [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/2005/02/nyc2012pic.gif" alt="ओलंपिक 2012 - मेजबानी के लिये न्यूयॉर्क की प्रबल दावेदारी" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-2889" /><span class="dropcap">ज</span>हाँ आप रेल बजट, फिल्मफेयर, ऑस्कर्स और आम बजट के बीच शामें गुजार रहे हैं, न्यूयॉर्क में कई लोग दिल थामकर बैठे हैं जुलाई के इंतजार में। 2000 सिडनी, 2004 एथेंस, 2008 बीजिंग और 2012 &#8211; ? ग्रीष्मकालीन ओलंपिक की 2012 में मसाल के पड़ाव के लिए फैसला अंतिम पांच शहरों में सिमट गया है; लंदन, मैड्रिड, न्यूयॉर्क, पेरिस और मॉस्को। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने 13 सदस्य &#8216;<em>जांच दल</em>&#8216; का गठन किया है, जो इन शहरों, उनकी व्यवस्था और ओलंपिक खेलों की मेजबानी की तैयारी और प्रतिबद्धता का आकलन कर रहा है। इस दल के सदस्यों ने लंदन और मैड्रिड के बाद बीता सप्ताह न्यूयॉर्क शहर में बिताया।</p>
<p>2012 में न्यूयॉर्क शहर में ओलंपिक्स आयोजित करने के सपने के मुख्य प्रणेता रहे हैं एक भूतपूर्व बैंकर, ब्लूमबर्ग प्रशासन में खास डैनियल डॉक्टर ऑफ. डैनियल ने अपने खुद की जेब से लगभग कोई 16 करोड़ रुपए खर्च कर दिए हैं। इस सपने को साकार रूप देने के लिए कि न्यूयॉर्क शहर ओलंपिक्स के लिए ना सिर्फ सही, अपितु लायक जगह है क्योंकि सारी दुनिया का प्रतिबिंब है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">राष्ट्रपति बुश ने उनके स्वागत में एक संदेश भेजा और न्यूयॉर्क की मेजबानी को उनकी सरकार का पूरा समर्थन व्यक्त किया<span></span></div>
<p>ब्लूमबर्ग प्रशासन ने भी &#8216;<em>एनवाय 2012</em>&#8216; मुहिम को अपना पूरा समर्थन दिया है। पिछले सप्ताह जांच दल के लोगों को न्यूयॉर्क की कला, संस्कृति व्यवस्थाएं, योजनाएं और जनजीवन को करीब से देखने का मौका मिला। राष्ट्रपति बुश ने उनके स्वागत में एक संदेश भेजा और न्यूयॉर्क की मेजबानी को उनकी सरकार का पूरा समर्थन व्यक्त किया। शहर के मुख्य आकर्षण केंद्रों पर आम जनता ने भी इसके पक्ष में अपनी स्वीकृति जाहिर की।</p>
<p>न्यूयॉर्क की आयोजन समि‍ति ने 2012 में ओलंपिक्स की मेजबानी के लिए प्रारूप तो पूरा तैयार किया है, जिसमें मैनहट्टन, क्वीन्स, ब्रोंक्स, ब्रूकलिन और स्टेटन आयलंड में ओलंपिक्स की मुख्य प्रतियोगिताएं होंगी। ओलंपिक खेलगांव की कल्पना के सामने ईस्ट नदी के तट पार क्वींस में की गई है। 4400 फिट्‍स में कोई 16000 खिलाड़ी और कोच रहेंगे, जो कि बाद में 18000 रहवासी या इनके काम आ सकेगी। मैनहट्‍टन के पश्चिमी भाग में एक नई विशाल स्टेडियम की भी कल्पना है, जो कि काफी विवादास्पद है।</p>
<p>न्यूयॉर्क के अलावा बाकी चारों दावेदार शहर उन देशों की राजधानियां भी हैं। वैसे तो फैसला आईओसी के 117 के सदस्यों के हाथ में है, जो इस वर्ष 4-5 को सिंगापुर में होने वाली अपनी आम बैठक में 2012 के ओलंपिक्स पर फैसला करेंगे। जांच दल के सदस्यों को तो न्यूयॉर्कवासियों ने पलक पावड़े बिछाकर उनकी जोरदार खातिरदारी करी और वह बहुत खुश भी हुए; लेकिन सिर्फ यह &#8216;<em>फील-गुड</em>&#8216; न्यूयॉर्क को जिताने के लिए काफी नहीं है। न्यूयॉर्क जैसे व्यावसायिक शहर के बीच ओलंपिक्स, उससे जुड़े सुरक्षा के सवाल और ओलंपिक्स के चुनाव में राजनीति- यह सभी मिलकर मेजबान का फैसला करेंगी। न्यूयॉर्क ने अपनी चाल तो चल दी, फैसला जुलाई में खुलेगा।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>https://www.jmuchhal.com/olympics-2012-mezbani-ke-liye-newyork/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5437</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>गौरवपूर्ण आयोजन &#8211; शुभ स्वागतम्‌</title>
		<link>https://www.jmuchhal.com/gouravpoorn-aayojan-shubh-swagatam</link>
		<comments>https://www.jmuchhal.com/gouravpoorn-aayojan-shubh-swagatam#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 07 Oct 1989 08:48:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल / खिलाड़ी]]></category>
		<category><![CDATA[इमरान खान]]></category>
		<category><![CDATA[कपिल देव]]></category>
		<category><![CDATA[क्रिकेट विश्व कप]]></category>
		<category><![CDATA[गावस्कर]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय क्रिकेट]]></category>
		<category><![CDATA[रिचर्ड्‌स]]></category>
		<category><![CDATA[रिलायंस कप]]></category>

		<guid isPermaLink="false">https://www.jmuchhal.com/?p=180</guid>
		<description><![CDATA[जिस फासले को कम करने के लिए पिछले 40 वर्षों से कई वार्ताएं असफल रहीं, जिस खाई को पाटने में स्व. महात्मा गांधी, भुट्‌टो और श्रीमती इंदिरा गांधी जीवनपर्यंत असफल रहीं, उसे एक लकड़ी का बल्ला और एक गेंद अत्यंत सहजता से ओझल कर देंगे। यह कल्पनातीत था। परंतु यह सत्य है। भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट सचमुच शांति और बंधुत्व के मसीहा के रूप में चरितार्थ हो गया है। तभी तो रिलायंस कप का ध्रुव वाक्य सार्थक प्रतीत होता है [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1989/10/jm_z1_reliance_cup.jpg" alt="गौरवपूर्ण आयोजन - शुभ स्वागतम्‌" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3146" /><span class="dropcap">जि</span>स फासले को कम करने के लिए पिछले 40 वर्षों से कई वार्ताएं असफल रहीं, जिस खाई को पाटने में स्व. महात्मा गांधी, भुट्‌टो और श्रीमती इंदिरा गांधी जीवनपर्यंत असफल रहीं, उसे एक लकड़ी का बल्ला और एक गेंद अत्यंत सहजता से ओझल कर देंगे। यह कल्पनातीत था। परंतु यह सत्य है। भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट सचमुच शांति और बंधुत्व के मसीहा के रूप में चरितार्थ हो गया है। तभी तो रिलायंस कप का ध्रुव वाक्य सार्थक प्रतीत होता है &#8216;<em>शांति के लिए क्रिकेट।</em>&#8216;</p>
<p><strong>तीन विश्व कप आयोजन&#8230;</strong></p>
<p>1975 से 1983 तक तीन विश्व कप आयोजन क्रिकेट विशेषकर एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को बढ़ावा के लिए कारगर सिद्ध हुए हैं। इन तीनों में कई समानताएं थीं। तीनों बार यह आयोजन क्रिकेट की जन्मभूमि और उसे राष्ट्रमंडल में प्रचार-प्रसार करने वाले देश इंग्लैंड में हुआ। तीनों विश्वकप का आयोजन प्रूडेंशियल इंश्योरेंस कंपनी ने किया। तीनों में वेस्ट इंडीज फाइनल में पहुंची और तीनों बार विजेता टीम ने एक दिवसीय क्रिकेट की प्रचलित नीति के विरुद्ध पहले बल्लेबाजी करते हुए विजय प्राप्त की।</p>
<p>परंतु तृतीय विश्वकप के बाद प्रूडेंशियल इंश्योरेंस कंपनी ने प्रायोजक बने रहने में असमर्थता जाहिर की। ऐसा ही कुछ विचार इंग्लैंड के टेस्ट काउंटी क्रिकेट बोर्ड का भी था पर क्रिकेट के मैदानों की दृष्टि व मौसम के हिसाब से इंग्लैंड सर्वोत्तम था। खिलाड़ियों को आवागमन में ज्यादा समय नहीं व्यतीत करना पड़ता था और फिर वहां पर जून के महीने में शाम 7.30 बजे तक रोशनी बनी रहती है। फलस्वरूप मैच 60 ओवर प्रति टीम के हुआ करते थे, पर क्रिकेट और विश्व कप किसी देश की जागीर तो है नहीं। इस पर तो संपूर्ण क्रिकेट विश्व का समान अधिकार और दायित्व है।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">भारत और एक दिवसीय क्रिकेट के संबंध 1975 में स्थापित हुए। 1971 तक शैशव काल समाप्त नहीं हुआ था। परंतु, 1983 में भारतीय क्रिकेट टीम ने एक धमाका-सा कर दिया<span></span></div>
<p>भारत और एक दिवसीय क्रिकेट के संबंध 1975 में स्थापित हुए। 1971 तक शैशव काल समाप्त नहीं हुआ था। परंतु, 1983 में भारतीय क्रिकेट टीम ने एक धमाका-सा कर दिया। विश्व विजयी वेस्ट इंडीज टीम जो कि दिग्गजों से सजी हुई थी, सिर्फ 183 रन भी न बना सकी और फाइनल में पराजित हुई। भारत क्रिकेट का अधिकृत विश्व चैंपियन बन गया। 18 जून, 1983 तारीख फाइनल की नहीं है, परंतु यह दिन उतना ही महत्वपूर्ण था। भारतीय टीम के कप्तान कपिल देव ने दबाव में जिस तरह धाराप्रवाह बल्लेबाजी का प्रदर्शन किया। भारत के इरादे तो उसी दिन से नजर आने लगे थे। 6 छक्कों और 16 चौकों की मदद से कपिल के नाबाद 175 रन क्रिकेट का इतिहास बन गए थे और उस दिन जब कपिल बल्लेबाजी करने मैदान में उतरे थे तब भारत के पांच विकेट मात्र 17 रनों पर गिर चुके था। उसके बाद जो हुआ वह तो अब इतिहास है।</p>
<p>अभिमान के बजाय आत्मविश्वास से ओतप्रोत टीम अंततः अपने अभियान में सफल रही थी। रातों-रात क्रिकेट के 14 खिलाड़ी पूरे भारत के लाड़ले बन गए थे। क्रिकेट प्रेमियों ने उन्हें सिर आंखों पर बैठा लिया। वो दिन था और आज का दिन है- 25 जून को लार्ड्‌स की वह शाम भारत के समय के अनुसार अर्द्धरात्रि में जीत की मदहोशी और पटाखों की गूंज अभी भी सुनाई दे रही है। उसी परिणाम को स्वदेश में दोहराने की इच्छा ने भारत को चौथे विश्वकप में मेजबानी करने के लिए प्रेरित किया। आज इस निष्कर्ष पर पहुंचना कि क्या भारत अकेले इस आयोजन को नहीं कर सकता था, बहुत कठिन है। हां, इतना निश्चित है कि संयुक्त आयोजन करने से दोनों राष्ट्रों के संगठनों और जनता के बीच क्रिकेट का जो सेतु बन गया है, अद्वितीय है।</p>
<p><strong>आयोजन का आर्थिक भार कौन उठाएगा?</strong></p>
<p>इतने विशाल पैमाने पर हो रहे आयोजन का आर्थिक भार कौन उठाएगा? कई अंतरराष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस आशय के प्रस्ताव लेकर क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के दरवाजे खटखटाने लगीं। किंतु, अत्यंत अल्प समय में बेशुमार समृद्धि और शोहरत अर्जित करने वाली पूर्ण स्वदेशी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड का प्रस्ताव बोर्ड को उत्तम लगा। प्रमुख कारण यह था कि पिछले वर्ष जब बोर्ड को तैयारियों के लिए आर्थिक स्त्रोतों की तीव्र आवश्यकता थी, रिलायंस ने उसी समय उनकी जरूरत को पूरा कर दिया था।</p>
<p>विश्व कप को रिलायंस कप का नाम प्रदान करना सस्ता सौदा नहीं था। सिर्फ नामांकन के रिलायंस कंपनी को 2.20 करोड़ रुपए बोर्ड को देने पड़े। क्या सिर्फ नामांकन के लिए कुछ महंगा सौदा नहीं था? रिलायंस के निदेशक अनिल अंबानी के अनुसार पिछले छः महीनों में रिलायंस शब्द का उपयोग इस महाद्वीप में असंख्य बार नागरिकों और मीडिया द्वारा किया जाएगा इस विज्ञापन की क्या कोई कीमत आंकी जा सकती है? इसके अलावा 2.60 करोड़ रुपए में रिलायंस की सहभागी कंपनी मुद्रा कम्युनिकेशन ने सभी 21 केंद्रों में स्टेडियम के अंदर के विज्ञापन अधिकार खरीद लिए। श्री अंबानी ने एक अंग्रेजी मासिक को दिए गए साक्षात्कार में कहा- बोर्ड को हमारा यह प्रस्ताव इसलिए पसंद आया, क्योंकि उन्हें हर विज्ञापनदाता से बातचीत करने के झंझट से मुक्ति मिल गई। यह सारा काम मुद्रा ने अपने हाथों में ले लिया और लगभग 90 प्रतिशत विज्ञापन बोर्ड आरक्षित हो चुके हैं। रिलायंस ने इसके अलावा दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले एक कार्यक्रम पर भी काफी खर्च किया है। कुल मिलाकर रिलायंस कंपनी को लगभग 6 करोड़ रुपए का भुगतान करना पड़ा है।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>https://www.jmuchhal.com/gouravpoorn-aayojan-shubh-swagatam/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>होल्कर : एक फैसला, एक गलती, एक इतिहास</title>
		<link>https://www.jmuchhal.com/holkar-ek-faisla-ek-galti-ek-itihaas</link>
		<comments>https://www.jmuchhal.com/holkar-ek-faisla-ek-galti-ek-itihaas#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 08 Jan 1989 08:46:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल / खिलाड़ी]]></category>
		<category><![CDATA[मुश्ताक अली]]></category>
		<category><![CDATA[रणजी ट्रॉफी]]></category>
		<category><![CDATA[रणजी ट्रॉफी प्रतियोगिता]]></category>
		<category><![CDATA[विजय हजारे]]></category>
		<category><![CDATA[सी.के. नायडू]]></category>
		<category><![CDATA[होल्कर टीम]]></category>

		<guid isPermaLink="false">https://www.jmuchhal.com/?p=178</guid>
		<description><![CDATA[1944-45 में रणजी ट्रॉफी प्रतियोगिता में बंगाल को परास्त कर होल्कर टीम सेमीफाइनल में पहुंची थी, जहां उसका मुकाबला मद्रास से था। दूसरे सेमीफाइनल में तो बंबई की विजय लगभग तय ही थी। हमारी जीत के आसार भी अच्छे थे। मद्रास में सेमीफाइनल मुकाबले के दौरान होल्कर टीम के कप्तान कर्नल सी.के. नायडू को बंबई क्रिकेट एसोसिएशन का एक तार मिला। तार का आशय यह था कि अगर होल्कर टीम बंबई में फाइनल खेलने को राजी हो जाए तो बंबई [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-3144" alt="होल्कर : एक फैसला, एक गलती, एक इतिहास" src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1989/01/jm_z_mushtaqali.jpg" width="311" height="307" /><span class="dropcap">1</span>944-45 में रणजी ट्रॉफी प्रतियोगिता में बंगाल को परास्त कर होल्कर टीम सेमीफाइनल में पहुंची थी, जहां उसका मुकाबला मद्रास से था। दूसरे सेमीफाइनल में तो बंबई की विजय लगभग तय ही थी। हमारी जीत के आसार भी अच्छे थे। मद्रास में सेमीफाइनल मुकाबले के दौरान होल्कर टीम के कप्तान कर्नल सी.के. नायडू को बंबई क्रिकेट एसोसिएशन का एक तार मिला। तार का आशय यह था कि अगर होल्कर टीम बंबई में फाइनल खेलने को राजी हो जाए तो बंबई सी.के. नायडू के सहायतार्थ मैच की मेजबानी करने को तैयार है। उस दिन शाम को कर्नल नायडू ने हम सबसे कहा, &#8216;<em>वी शैल प्ले द फाइनल एट बांबे एंड बीट देम देअर ओनली।</em>&#8216; हम सब अवाक् रह गए। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने कर्नल साहब से कहा, &#8216;<em>रोटेशन की प्रथा के अनुसार फाइनल तो इंदौर में ही खेलना चाहिए, फिर इंदौर की मैटिंग पर हमारे गेंदबाज ज्यादा कारगर सिद्ध होंगे, बजाय बंबई के टर्फ पर</em>।&#8217;</p>
<p>कर्नल साहब को जैसे हमारी जीत का पक्का भरोसा था। हमने मद्रास को मद्रास में 10 विकेट से हराया और फिर लंबा सफर तय करके सीधे बंबई पहुंचे। चार दिन सी.के. नायडू सहायतार्थ मैच खेल गया और सिर्फ एक दिन के विश्राम के बाद छह दिन का रणजी फाइनल। मुश्ताक ने दोनों पारियों में शानदार शतक लगाए और दूसरी पारी में डेनिस कांप्टन ने 249 रन बनाए। इसके बावजूद बंबई ने हमें 374 रनों से पराजित कर दिया। क्रिकेट में भविष्यवाणी का कोई महत्व नहीं है, फिर भी फाइनल मैच अगर इंदौर में खेला जाता तो हमारे गेंदबाज बेहतर प्रदर्शन कर पाते।</p>
<div class="simplePullQuoteRight">मैं यह तो नहीं कह सकता कि सी.एस. ने जानबूझकर ऐसा किया, लेकिन उसके बाद उनकी ज्यादातर गेंदें लेग स्टंप के बाहर टप्पा खाने लगीं और बल्लेबाजों ने आराम से रन बनाए<span></span></div>
<p><strong>1945-46</strong> के फाइनल में बड़ौदा को हराने के बाद 1946-47 में पुनः फाइनल में होल्कर-बड़ौदा मुकाबला हुआ। हमारी पहली पारी के 202 रन के स्कोर के जवाब में बड़ौदा ने 784 रन का विशाल स्कोर खड़ा कर लिया। चौथे विकेट की भागीदारी में गुल मोहम्मद और विजय हजारे का 577 रन का विश्व कीर्तिमान आज भी कायम है। बड़ौदा एक पारी और 409 रनों से विजयी रहा। 1947-48 में होल्कर ने बंबई को हराकर खिताब पुनः हासिल कर लिया, लेकिन उस दशक में केवल 1948-49 में होल्कर टीम फाइनल में नहीं पहुंची। उसे बड़ौदा ने सेमीफाइनल में ही प्रतियोगिता से बाहर कर दिया, किंतु होल्कर टीम को दोबारा अपनी धाक जमाने का मौका भी बड़ौदा के विरुद्ध ही मिला <strong>1949-50</strong> में। बड़ौदा में खेले गए फाइनल मैच में होल्कर टीम ने पहली पारी में 419 रनों का सम्मानजनक स्कोर बनाया। रणजी ट्रॉफी में पहली पारी के आधार पर बढ़त अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। मनोवैज्ञानिक दबाव के अलावा मैच ड्रॉ होने की स्थिति में इसी बढ़त के आधार पर मैच का फैसला किया जाता है। बड़ौदा हमारी पहली पारी की रनसंख्या से लगभग 30 रन पीछे था, तब नई गेंद लेने का समय हो गया था। मैंने कर्नल साहब से नई गेंद लेने को कहा, पर वे सी.एस. नायडू से कुछ और ओवर कराने के पक्ष में थे। सी.एस. अधिकांशतः फाइन लेग पर कोई क्षेत्ररक्षण नहीं रखते थे, परंतु उनकी दो गेंदों पर लगातार फाइन लेग क्षेत्र में दो चौके पड़ गए, इसलिए सी.के. ने फाइन लेग पर एक फील्डर खड़ा कर दिया।</p>
<p>मैं यह तो नहीं कह सकता कि सी.एस. ने जानबूझकर ऐसा किया, लेकिन उसके बाद उनकी ज्यादातर गेंदें लेग स्टंप के बाहर टप्पा खाने लगीं और बल्लेबाजों ने आराम से रन बनाए। जब बड़ौदा पहली पारी के आधार पर 18 रन की बढ़त ले चुका था, तब कर्नल साहब ने मुझे नई गेंद दी और बड़ौदा के अंतिम दोनों बल्लेबाज घोरपड़े और अमीर इलाही उसी ओवर में आउट हो गए। हालांकि बढ़त सिर्फ 18 रनों की थी, परंतु हमारे मनोबल पर इसका असर तो हुआ ही था। बड़ौदा चार विकेट से विजयी रहा। 1950-51 में होल्कर और गुजरात फाइनल में थे। गुजरात 189 रनों से परास्त हो गया, लेकिन अगले वर्ष 10 टेस्ट खिलाड़ियों से सज्जित बंबई की टीम निश्चित रूप से हमसे श्रेष्ठ थी। बंबई के पहली पारी के 596 रनों के जवाब में हमने 410 रन बनाए और दूसरी पारी में हमारी पूरी टीम महज 97 रनों पर ही ढेर हो गई, लेकिन फिर अगले बरस 48 वर्षीय नायडू की कप्तानी में होल्कर ने बंगाल को पहली पारी की बढ़त के आधार पर पराजित कर चौथी बार रणजी ट्रॉफी पर अपना नाम अंकित कर दिया। यह सी.के. का आखिरी रणजी मैच था।</p>
<p><strong>1953-54</strong> में होल्कर टीम के नेतृत्व की बागडोर संभाली मुश्ताक अली ने। पूर्वी पंजाब को हराने के बाद सेमीफाइनल में हमारा मुकाबला बंगाल से था। बंगाल और बंबई की टीम कॉयर मैटिंग पर कमजोर थी, इसलिए हमने सेमीफाइनल के पहले काफी डटकर अभ्यास किया और एक अभ्यास मैच भी खेला। बंगाल टीम की अगवानी के लिए हम सब स्टेशन गए थे। स्टेशन पर बंगाल टीम के कप्तान निर्मल चटर्जी ने मुश्ताक से पूछा, &#8216;वॉट आर वी प्लेयिंग ऑन? &#8216;मुश्ताक ने जवाब दिया, &#8216;<em>जूट मैटिंग।</em>&#8216; मैं हतप्रभ रह गया। तुरंत मुश्ताक को कोने में ले जाकर मैंने कहा, &#8216;हम इतने दिनों से कॉयर मैटिंग पर अभ्यास कर रहे हैं। हमारे मुख्य गेंदबाज गायकवाड़ की गेंदबाजी कॉयर पर कई बार घातक सिद्ध होती है, फिर यह जूट मैटिंग क्यों? मुश्ताक के पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं था। मैच जूट मैटिंग पर ही हुआ। हालांकि हमने बंगाल को 315 रनों से हरा दिया, किंतु फाइनल मैच में बंबई से हमें मुंह की खानी पड़ी। ठीक उसी तर्ज पर अगले साल मद्रास ने भी हमें इंदौर में ही पराजित किया। 1954-55 का रणजी ट्रॉफी फाइनल होल्कर टीम का अंतिम रणजी मैच था- और मेरा भी। उन दस वर्षों की हार-जीत के पुनरावलोकन का मेरा मकसद टीम के साथियों पर अंगुली उठाना कदापि नहीं है। कोई भी व्यक्ति या खिलाड़ी हमेशा सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता। उद्देश्य सिर्फ यही है कि अतीत की गलतियां भविष्य में कभी अपने को दोहराएं नहीं, जीत और पराजय का फासला कोई एक गलती पाट सकती है।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>https://www.jmuchhal.com/holkar-ek-faisla-ek-galti-ek-itihaas/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>476</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>मेरे शब्दकोष में तटस्थ अम्पायरिंग का नाम नहीं</title>
		<link>https://www.jmuchhal.com/mere-shabdkosh-mein-tatsth-ampairing</link>
		<comments>https://www.jmuchhal.com/mere-shabdkosh-mein-tatsth-ampairing#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 28 Dec 1987 11:20:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल / खिलाड़ी]]></category>
		<category><![CDATA[अम्पायरिंग]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय क्रिकेट]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय टीम]]></category>
		<category><![CDATA[राजसिंह डूंगरपुर]]></category>
		<category><![CDATA[रिलायंस कप]]></category>
		<category><![CDATA[सुनील-कपिल]]></category>

		<guid isPermaLink="false">https://www.jmuchhal.com/?p=184</guid>
		<description><![CDATA[राजसिंह डूंगरपुर क्रिकेट का एक ऐसा व्यक्तित्व है, जिन्हें हम क्रिकेट का &#8216;इनसायक्लोपीडिया&#8217; कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। रिलायंस कप बिलकुल पास है और ऐसी परिस्थितियों में उनसे खुलकर भारतीय क्रिकेट पर चर्चा करना सुखद पहलू है। जितेंद्र मुछाल की राजसिंह डूंगरपुर से बातचीत पिछले दिनों राजभाई इंदौर आए थे, जितेन्द्र मुछाल ने उनसे क्रिकेट पर लंबी बातचीत की। क्या वास्तव में सुनील-कपिल में मतभेद हैं? राजभाई का कहना है कि दोनों में कोई मतभेद नहीं है, हां दोनों [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1987/12/jm_y2_rajSinghji.jpg" alt="मेरे शब्दकोष में तटस्थ अम्पायरिंग का नाम नहीं" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3148" /><span class="dropcap">रा</span>जसिंह डूंगरपुर क्रिकेट का एक ऐसा व्यक्तित्व है, जिन्हें हम क्रिकेट का &#8216;इनसायक्लोपीडिया&#8217; कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। रिलायंस कप बिलकुल पास है और ऐसी परिस्थितियों में उनसे खुलकर भारतीय क्रिकेट पर चर्चा करना सुखद पहलू है।</p>
<p><b>जितेंद्र मुछाल की राजसिंह डूंगरपुर से बातचीत</b></p>
<p>पिछले दिनों राजभाई इंदौर आए थे, जितेन्द्र मुछाल ने उनसे क्रिकेट पर लंबी बातचीत की। क्या वास्तव में सुनील-कपिल में मतभेद हैं? राजभाई का कहना है कि दोनों में कोई मतभेद नहीं है, हां दोनों की शैली बिलकुल भिन्न है। एक अंतर्मुखी है तो दूसरा बहिर्मुखी। एक पश्चिम भारत से आया है और दूसरा उत्तर भारत से। दोनों की आदतें अलग हैं, दोनों का लालन-पालन अलग-अलग ढंग से हुआ है। प्रस्तुत है उनसे लंबी बातचीत के अंश-</p>
<p><strong>प्रश्न</strong> - राजसिंहजी, अभिवादन शब्द के रूप में आपने सिर्फ &#8216;नमस्कार&#8217; का उपयोग कब से शुरू किया?</p>
<p><strong>उत्तर</strong>- ये बात 1979 की है। 1978 में जब बिशनसिंह बेदी के नेतृत्व में भारतीय टीम पाकिस्तान के दौरे पर गई थी, तब पाकिस्तानी टेलीजिन पर हम लोग &#8216;गुड मार्निंग&#8217; या <em>&#8216;असलामालिकुम&#8217;</em> कहा करते थे। <em>&#8216;गुड मार्निंग&#8217;</em> तो हमने किसी दूसरे मुल्क से उधार लिया है, और फिर हमारा मौलिक अभिवादन तो <em>&#8216;नमस्कार&#8217;</em> ही है।</p>
<p><strong>प्रश्न</strong>- अब सीधे क्रिकेट पर आ जाते हैं। हाल ही में संपन्न भारत-पाक श्रृंखला के बाद क्या आप यह सोचते हैं कि कप्तान के रूप में कपिल का चयन सही है?</p>
<p><strong>उत्तर</strong> - निस्संदेह। मैं अत्यधिक बारीकियों में तो नहीं जाना चाहूंगा परंतु बार-बार कप्तानी में परिवर्तन टीम के लिए उत्साहवर्द्धक नहीं सिद्ध होता है। एक व्यक्ति, जो कि जुलाई में किसी कार्य के लिए सक्षम है, वह एकदम मार्च में इतना खराब तो नहीं हो सकता। मेरे ख्याल से तो भारतीय टीम स्तरहीन क्रिकेट खेली है। कपिल एक ऐसे कप्तान तो निश्चित तौर पर नहीं हैं, जो कि बहुत नीति व दूरदर्शिता से खेलते हैं। वह तो अपनी स्वाभाविक प्रकृति पर अधिक निर्भर करते हैं। और, ऐसे बहुत से कप्तान हुए हैं, जो कि नीतियों के मामले में निपुण थे, परंतु टीम ग्यारह खिलाड़ियों के सामूहिक प्रदर्शन से बनती है, किसी एक से नहीं।</p>
<div class="simplePullQuoteRightGolden">वे बातचीत में निपुण हैं और वे एक बहुत अच्छे नेता हैं। आखिर, नेतृत्व भी तो कप्तानी के आयामों में से एक है। एक अच्छे कप्तान को अच्छा नेता होना बहुत जरूरी है<span></span></div>
<p><strong>प्रश्न</strong>- क्या आपको यह नहीं लगता कि उनमें दिमाग के बजाय दमखम ज्यादा है?</p>
<p><strong>उत्तर</strong>- वे निःसंदेह रूप से एक बुद्धिजीवी या क्रिकेट के महान दृष्टा तो नहीं हैं, परंतु वे खेल के मौलिक तत्वों से भलीभांति परिचित हैं।</p>
<p><strong>प्रश्न</strong>- तो क्या आपके अनुसार वे मैदान पर पूरा अपना जी-जान लगाते हैं?</p>
<p><strong>उत्तर</strong>- बेशक। और उनके साथ सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे बातचीत में निपुण हैं और वे एक बहुत अच्छे नेता हैं। आखिर, नेतृत्व भी तो कप्तानी के आयामों में से एक है। एक अच्छे कप्तान को अच्छा नेता होना बहुत जरूरी है।</p>
<p><strong>प्रश्न</strong>- परंतु, मोहिंदर अमरनाथ द्वारा बेहतरीन प्रदर्शन के बावजूद गेंदबाज के रूप में कपिल उनका प्रयोग इतना कम क्यों करते हैं?</p>
<p><strong>उत्तर</strong>- मोहिंदर एक ऐसे गेंदबाज हैं, जिन्हें सफल होने के लिए वातावरण या गेंद की चमक की सहायता चाहिए। परंतु जब कपिल के पास अन्य प्रारंभिक गेंदबाज टीम में होते हैं तो फिर वही नई गेंद मोहिंदर को नहीं दे पाते हैं और फिर कपिल कोई बहुत ज्यादा &#8216;परीक्षण&#8217; करने वाले कप्तानों में नहीं हैं।</p>
<p><strong>प्रश्न</strong>- लेकिन, श्रीकांत, अजहर या राजपूत को तो वे गेंद सौंप देते हैं?</p>
<p><strong>उत्तर</strong>- श्रीकांत को तो वे सिर्फ एक-दो ओवर के लिए गेंद देते हैं। वह भी इसलिए कि जिसने श्रीकांत की गेंदें पहले नहीं खेली हों, उन बल्लेबाजों को श्रीकांत कुछ कठिनाई में डाल देते हैं। वे एक ऑफ स्पिनर माने जाते हैं, परंतु उनकी गेंदें तो दूसरी ओर घूमती हैं। परंतु एक बार खेलने के बाद तो उनकी गेंदबाजी काफी सरल नजर आती है। उनका उपयोग वे चंद ओवर से ज्यादा नहीं करते।</p>
<p><strong>प्रश्न</strong>- अगर गावस्कर को रिलायंस कप के लिए कप्तान चुना गया तो क्या आप समझते हैं कि वे स्वीकार कर लेंगे?</p>
<p><strong>उत्तर</strong>- ये तो खुद सुनील ही बता सकते हैं। परंतु जैसा मैं उन्हें जानता हूं, वे नहीं करेंगे। एक बार वे किसी चीज का परित्याग कर देते हैं तो फिर उसे वापस बहुत कम ही स्वीकार करते हैं। और अगर वे ऐसा करते हैं तो यह उनके विचारों का अच्छा प्रतिबिंब नहीं होगा। और क्या भारतीय टीम इतनी जर्जर स्थिति में है कि हम सिर्फ सुनील को कप्तान बना सकते हैं, यह जानते हुए भी कि वे खुद अपनी मर्जी से इसका त्याग कर चुके हैं।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>https://www.jmuchhal.com/mere-shabdkosh-mein-tatsth-ampairing/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>4</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>सनी का कोई सानी नहीं</title>
		<link>https://www.jmuchhal.com/sani-ka-koi-sani-nahi</link>
		<comments>https://www.jmuchhal.com/sani-ka-koi-sani-nahi#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 09 Mar 1987 11:23:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल / खिलाड़ी]]></category>
		<category><![CDATA[क्रिकेट]]></category>
		<category><![CDATA[विश्व क्रिकेट]]></category>
		<category><![CDATA[सनी]]></category>
		<category><![CDATA[सुनील गावस्कर]]></category>
		<category><![CDATA[सुनील मनोहर गावस्कर]]></category>

		<guid isPermaLink="false">https://www.jmuchhal.com/?p=187</guid>
		<description><![CDATA[छह मार्च 1971, पोर्ट ऑफ स्पेन, त्रिनिदाद। 7 मार्च, 1987 गुजरात स्टेडियम, अहमदाबाद। विश्व के पांचों महाद्वीपों में असंख्य क्रिकेट प्रेमियों के दिलों को अपनी प्रतिभा से मंत्रमुग्ध करने वाले सुनील मनोहर गावस्कर की रन यात्रा आज अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई है। 5472 दिनों के लगभग अनवरत सफर में अर्जित 10,000 रनों की दाद देने वाले हर चहेते को सर्वप्रथम धन्यवाद देना चाहिए एक अज्ञात व्यक्ति श्री नारायण मासुरेकर उर्फ सनी के नान-काका को। सुनील के जन्म के समय [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.jmuchhal.com/wp-content/uploads/1987/03/jm_x2_sunny.jpg" alt="सनी का कोई सानी नहीं" width="311" height="307" class="alignleft size-full wp-image-3150" /><span class="dropcap">छ</span>ह मार्च 1971, पोर्ट ऑफ स्पेन, त्रिनिदाद। 7 मार्च, 1987 गुजरात स्टेडियम, अहमदाबाद। विश्व के पांचों महाद्वीपों में असंख्य क्रिकेट प्रेमियों के दिलों को अपनी प्रतिभा से मंत्रमुग्ध करने वाले सुनील मनोहर गावस्कर की रन यात्रा आज अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई है। 5472 दिनों के लगभग अनवरत सफर में अर्जित 10,000 रनों की दाद देने वाले हर चहेते को सर्वप्रथम धन्यवाद देना चाहिए एक अज्ञात व्यक्ति श्री नारायण मासुरेकर उर्फ सनी के नान-काका को। सुनील के जन्म के समय उन्होंने अस्पताल में बालक के बाएं कान के पास एक निशान देखा था। अगले दिन वह निशान गायब था।</p>
<p>दौड़-धूप के बाद पता चला कि नहलाने के बाद नर्स ने सनी को गलती से एक मछुआरिन के पास पालने में लिटा दिया था। अगर नान-काका की पैनी निगाहों से वह चूक हो जाती तो उसके परिणाम विश्व क्रिकेट में वर्णनातीत ही नहीं होते। सलामी बल्लेबाजी को सनी ने जो रूप दिया है, उससे न सिर्फ भारतीय वरन विश्व क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों की टीम में वे निर्विरोध रूप से स्थान पा गए हैं। और अगर क्रिकेट के समूचे इतिहास में से 11 खिलाड़ियों को चुना जाए तो भारत की ओर से गावस्कर ही इस गौरव को प्राप्त कर सकेंगे। सनी के साथ टेस्ट मैचों में सलामी बल्लेबाजी के लिए उपयुक्त जोड़ीदार की तलाश में चयनकर्ता 17 खिलाड़ियों को मौका दे चुके हैं। पर सिर्फ तीन, चेतन चौहान, श्रीकांत व आंशिक रूप से अंशुमन गायकवाड़- सनी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में सफल रहे हैं। परन्तु इसके बावजूद विश्व के सभी धुआंधार व घुमावदार गेंदाबजों का सनी ने जिस समार्थ्य व एकाग्रता से सामना किया है, वह सर लेन हटन के शब्दों में, &#8216;<em>एक साधारण व महान खिलाड़ी में फर्क जाहिर करता है।</em>&#8216;</p>
<div class="simplePullQuoteRight">सनी के खेल की बढ़ाई आंकड़ों के जंजाल व समीक्षकों के विश्लेषणों से कहीं बढ़कर है। वे तो भारत के लाखों युवाओं में हैं, जो बल्ला लेकर गली-कूचे मैदान में खेलते वक्त यह सोचते हैं &#8216;क्या सनी भी ऐसा ही खेलता?&#8217;<span></span></div>
<p>अहमदाबाद में ही तीन वर्षों पहले सुनील ने जैफ बॉयकाट का सर्वाधिक व्यक्तिगत रनों (8114) का कीर्तिमान तोड़ा था और आज रनों की हिमालय श्रृंखला की &#8216;सगरमाथा&#8217; भी अहमदाबाद पर ही सनी के बल्ले से लिखी गई। उचित ही है कि लिटिल मास्टर ने तेज गेंदबाजी में सिरमौर वेस्ट इंडीज के खिलाफ सिर्फ 27 टेस्टों में 2749 रन बनाए हैं, जिनमें 221 चौकों व 6 छक्कों से सुसज्जित 3 द्विशतक व 10 शतक शामिल हैं। अपनी पहली टेस्ट श्रृंखला में 154.80 के औसत से 774 रन बनाकर सनी ने सम्पूर्ण क्रिकेट विश्व को हतप्रभ कर दिया था। और 124 टेस्ट मैचों व 212 पारियों के लम्बे सफर को तय करने के बाद भी आज गावस्कर का औसत 50 से ऊपर है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रारंभिक बल्लेबाजी आजकल जिस दिलेरी व साहस का कार्य बन गया है, वह खिलाड़ियों के सुरक्षा कवचों को देखकर जाहिर हो जाता है, परन्तु सिर्फ 5 फुट 5 इंच ऊंचे सुनील ने जिन ऊंचाइयों को छू लिया है, उन पर भविष्य में कोई पहुंच पाएगा? यह सवाल ही अत्यन्त जटिल लगता है, फिर उसके जवाब को पूरा करने वाला खिलाड़ी कैसा होगा- इसका जवाब तो सिर्फ सनी दे सकते हैं।</p>
<p><strong>क्रिकेट में सुनील का योगदान</strong></p>
<p>भारतीय व विश्व क्रिकेट में सुनील के योगदान को रनों व शतकों के रूप में नहीं आंका जा सकता। कीर्तिमान कभी स्थायी नहीं रहते, वर्ना खुद गावस्कर रोजाना कीर्तिमानों व आंकड़ों को बनाते-तोड़ते नहीं रहते। परन्तु इस आयाम को ही निभाने में बी.बी. मामा व सुधीर वैद्य का आधा समय निश्चित गुजर जाता होगा। यहां तक कि सी.डी. क्लार्क ने तो रिकार्ड-ब्रेकिंग गावस्कर नाम की एक पुस्तक सुनील के नित नए कीर्तिमानों की गाथा में लिखी है।</p>
<p>गावस्कर ने जो पूर्णतः &#8216;<em>कमिटेड</em>&#8216; खिलाड़ी का रूप प्रस्तुत किया है, जो क्रीज पर अपना पूरा ध्यान व एकाग्रता कर अपने खेल में एक महान फनकार की कला का उत्कृष्टतम सृजन उजागर होता है। सनी शुरू से ही सिर्फ सर्वश्रेष्ठ की खोज में रहे हैं। और उनकी तुलना भी &#8216;<em>रन मशीन</em>&#8216; कहलाने वाले ब्रेडमैन से की जाती है। निःसंदेह ब्रेडमैन ने बहुत कम समय में बहुत अधिक रन अर्जित किए हैं और उनका औसत गावस्कर से दोगुना है, परन्तु सलामी बल्लेबाजी की अपनी शैली व एकाग्रता में सनी बेजोड़ हैं। शतकवीर गावस्कर की हर शतक में कोई नयापन होता है, परन्तु उनके हर स्ट्रोक व ड्राइव में वर्षों की तपस्या झलक उठती है।</p>
<p>टेस्ट क्रिकेट में ज्यादातर &#8216;<em>धीमे</em>&#8216; कहलाने वाले सनी ने सन्‌ 1978 में सिर्फ 76 दिनों में 1000 रन बनाकर आलोचकों की इस संज्ञा को भी गलत ठहरा दिया। गौरवशाली हैं इमरान खान, जिन्हें सुनील को टेस्ट मैचों में सर्वाधिक बार आउट करने का श्रेय प्राप्त है।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>https://www.jmuchhal.com/sani-ka-koi-sani-nahi/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>7</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>
